रामजियावन दास

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रामजियावन दास "बावला" (01 जून, 1922 ई. - 1 मई, 2012) भोजपुरी कवि थे। भोजपुरी साहित्य में उन्हें तुलसीदास सरीखा सम्मान मिला। भोजपुरी के जिन कवियों ने अपनी काव्य प्रतिभा से सबसे अधिक लोक प्रसिद्धि पायी है उनमें रामजियावन दास प्रमुख हैं। बावला जी ने रामचरितमानस को भोजपुरी में लिखने का प्रयास भी किया है और उसे काफी हद तक लिखा भी । अरण्य काण्ड, किष्किन्धा काण्ड ,राम केवट प्रसंग , कौशिल्या विरह इत्यादि प्रत्येक बिंदुओं पर बावला जी ने गीतों के माध्यम से आम जन तक भोजपुरी का रामायण पहुंचा दिया ।

बावला जी

कवि सम्मेलनों अथवा गोष्ठियों में वह अपना परिचय देते समय अधिकतर कविताई ही करते थे –

गंवई क निवासी बनबासी उदासी हम

घासी में पाती में जिनिगी बिताइला

बाहुबल बूता अछूता अस जंगल में

मंगल के कामना से मंगल मनाइला

सेवा में फूल फल जल में पहाड़ी के

पाहुन केहू आवे त परान अस जोगाइला

धूरी में माटी में अपने परिपाटी में

विंध्याचल घाटी में बावला कहाइला

लेकिन एक रचनाकार का जो जमीनी सरोकार होना चाहिए उसमें बावला जी एकदम भीतर तक जुड़े हुए दिखाई देते हैं । उनके अपने गाँव-घर, खेत-खलिहान, डीह-डिहुवार से लेकर पंच-सरपंच व कोर्ट कचहरी के काराधारा तक बदलते मिजाज पर भी नजर है । इन सबको एक साथ कई भाव में नमन करते हुए कहते हैं –

गाँव घर खेत खरिहान के नमन बाटै, नमन सिवान के नमन घूर घार के

ताल खाल नदी नार पोखरा इनार कुल, नमन करीला बाबा डीह-डिहुवार के

नाद कोना चरनी दुवार के दलान के भी, नमन कहार के नमन चौकीदार के

पंच सरपंच परधान के नमन बाटै, नमन बा टी0 बी0 नमन चित्रहार के

ब्लाक के नमन ताक झाँक के नमन बाटै, नमन विकास वाले रोजी रोजगार के

सींचपाल, लेखपाल आदि के नमन बाटै, नमन बा बिजुरी के बिल सरकार के

फीस के नमन न्यायाधीश के नमन बाटै नमन बा डोलीवाले पिछिला कहार के

थाने के नमन जेल खाने के नमन बाटै नमन दिवान के नमन थानेदार के (‘नमन बाटै’ कविता से)

इस राज व्यवस्था को पहचानने और इसकी सच्चाई बयान करने की कोशिश कई जगह दिखाई देता है। वो अपना ‘बात’ कविता में कहते हैं कि-

मीठी-मीठी बतिया में घतिया छिपल बाटै, जतिया क पतिया क होत बा लड़ाई

कुल्हियै इनरवा में भंगिया घोराइ गइले मनई से मनई करैला निठुराई

दागि-दागि पेटवा चपेटवा सहत जात दिनवा गरीब क न भेंटले – भेंटाई

उँचकी अटरिया के ओर सब निरखैला निचवां न ताकैला धँसल जाले खाई

इस अनैतिक बदलाव के बात पर अपनी चिंता सुनाने के बाद इसी कविता मे आगे बताते हुए कहते हैं कि किस तरह से यह व्यवस्था बदल रहा है जिसका कोई मतलब नहीं है!

हाथ गोड़ उहै बा कपार देह उहै बाटै अचरज लागैला बदल गइल बोलिया

गाँव गली घर कुल जइसे के तइसे हो राम जाने कइसे बदल गइल टोलिया

हवा पानी उहे बा परानी बदलाव मुँहे धीरे-धीरे होत बा उघार कुल पोलिया

चान भान धरती अकास कुल उहै बाटै मढ़वा पुरनका बदल गइल खोलिया

इन सबसे अलग बावला जी का एक बड़ा खासियत यह भी है कि उनका मन जहाँ लगता है वहाँ वह अपने सांस्कृतिक परिवेश के चित्रकारी करते हुए दिखाई देते हैं । प्रकृति के श्रृंगार से झिलमिल वह परिवेश उनका मन मोह लेता है । इस चित्रकारी में कवि के किसान मन को ठाट बाट दिखाई देता है । अपना ‘बात’ कविता में एक जगह रोपनी-डोभनी का चर्चा करते हुए कहते हैं कि -

मेड़न पै बिछिलै सरकै पग दाबि चलै देहियाँ बल खाला

बून परै झमकै बदरी कजरी अँखिया जनु मारत भाला

रोपत धान उतान उठै मुड़ि देखैं त चान बेचारा पराला

बोलत बा रस बात कबौं कुड़कै भउजी देवरा मुसुकाला

साल बदलता रहता है । सब लोग अपने-अपने नजदिकी लोगों को ‘हैपी न्यू इयर’ के कार्ड भेज रहे हैं । इस बदलते नया साल पर कवि रामजीयावन दास बावला के भी नजर एक टक पड़ता है और वो अपना तरफ से नया साल के जो संदेश रचें हैं , वो भोजपुरिया पाठकों को आज तक याद है ।

बासल बयार ऋतुराज क सनेस देत, गोरकी चननिया क अँचरा-गुलाल हो

खेत-खरिहान में सिवान भरी दाना-दाना,चिरई के पुतवो ना कतहूँ कँगाल हो

हरियर धनिया चटनिया-टमटरा क, मटरा के छेमिया के गदगर दाल हो

नया-नया भात हो सनेहिया के बात हो, एहि बिधि शुभ-शुभ-शुभ नया साल हो

बावला जी एक प्रकार से सहज-साधारण भक्ति-भाव के कवि थे । वो भक्ति-भाव, जिसमें लोक संस्कृति के आदर्श रचा-बसा है। जहाँ राम मतलब जगते हुए भी राम – सोते हुए भी राम होता है । जिसको जपने के लिए ध्यान-योग के कोई जरूरत नही पड़ता है । बावला जी इसी लोक परम्परा में एक भक्त कवि थे । उनके भीतर कोल-भील और बनवासी समाज के अनुभूति रचा-बसा था । उनके खातिर राम, भगवान से अधिक आम आदमी के रूप में थे । तभी तो ‘राम-बनवास’ पर लिखे उनके रचना में हर जगह से ठोकर खाए एक ऐसा आदमी नजर आता है जिसको कोई पूछने वाला नहीं है कोई हालचाल , तबियत के बारे में पूछने वाला नहीं है। जबकी उस आदमी से चारो-ओर प्रकाश है । बावला जी उस आदमी के शुभचिंतक बनकर खड़े नजर आते हैं –

कहवाँ से आवैला कवन ठाँव जइबा बबुआ बोलता ना

कौन दिहले तोहके बनबास, बबुआ बोलता ना

कवने करनवाँ बतावा अइला बनवां

कोने कोने घूमेला भँवरवा जइसे मनवाँ

कउनी हो नगरिया में अँजोरिया नाही भावे,बबुआ बोलता ना

कहवां रात भावै बरहो मास बबुआ बोलता ना

रूठि गइली रिद्धि सिद्धि चललीं रिसियाइ के

कउनी हो नगरिया में अगिया लगाइ के

कहवाँ के लोगवा के भोगवा नाहीं भावे बबुआ बोलता ना

दिहलें तोहके घरवा से निकास, बबुआ बोलता ना

बिधना जरठ मति अटपट कइलैं रे

कि या कवनों भूल तीनों मूरती से भइलैं रे

किया रे अभागा कउनों लागा बादी कइलें, बबुआ बोलता ना

कि या कतहूँ पउला ना सुपास, बबुआ बोलता ना

हम बनबासी बबुआ माना हमरी बतिया

बावला समाज में बिता ला एक रतिया

कन्द मूल फल जल सेवा में जुटइबै बबुआ बोलता ना

सेवा करबै माना बिसवास, बबुआ बोलता ना

जीवन परिचय[संपादित करें]

रामजियावन दास बावला का जन्म 01 जून, 1922 ई. को उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद (तब वाराणसी के चकिया तहसील) के भीषमपुर गांव के एक अति सामान्य लोहार परिवार में हुआ। पिता रामदेव विश्वकर्मा जातीय व्यवसाय से जुड़े थे। माता सुदेश्वरी देवी घर का काम संभालती थीं। रामदेव के चार पुत्रों और दो पुत्रियों में बावला जी सबसे बड़े थे। परिवार में शिक्षा की कोई परंपरा नहीं थी, फिर भी बावला जी का नामांकन गांव के ही प्राथमिक पाठशाला में हुआ। इन्होंने दर्जा तीन तो पास कर लिया, मगर चार में फेल हो गए। कक्षा चार में फिर नाम लिखाया गया। नकल के सहारे इन्होंने दर्जा चार तो पास कर लिया, मगर इसके बाद पढ़ाई-लिखाई को सदा के लिए अलविदा करते हुए कहा कि संतन को कहां सीकरी सो काम। प्राथमिक शिक्षा के समय से ही इनका झुकाव कविता व संगीत की तरफ था। कहते हैं कि सोहबत का असर व्यक्ति पर पड़ता है। बावला जी के बड़े पिता रामस्वरूप विश्वंकर्मा संगीत व रामायण के मर्मज्ञ थे। बावला जी ने पुश्तैंनी पेशे को भी बड़ी आसानी से अपनाया। वह स्वयं कहते हैं, हम बंसुला लेके बाबू जी के साथ चल देहीं आउर रंदा भी खूब मरले हुईं।

बावला जी की हस्तलिपि

bawla ji

इसी बीच रामजियावन दास का विवाह मात्र 16 वर्ष की उम्र में मनराजी देवी के साथ संपन्न हुआ। अभी तक तो यह अकेले थे, मगर शादी के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियां भी लद गईं। घर की माली हालत ठीक न थी, सो भैंस पालने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। युवक रामजियावन सुबह भैंस लेकर जंगल की ओर मुखातिब हो जाते और घूमते-घूमते काफी दूर निकल जाते। यहीं धुसूरियां नामक स्थान पर बावला जी की मुलाकात स्थानीय कोल-भीलों और मुसहरों से हुई। रामभक्त रामजियावन का वनवासी राम से यही साक्षात्कार हुआ। खुद को कोल-भीलों की भूमिका में अनुभव करते हुए एक दिन अनायास ही मुख से बोल फूट पड़े-

कहवाँ से आवैला कवन ठाँव जइबा बबुआ बोलता ना

कौन दिहले तोहके बनबास, बबुआ बोलता ना

कवने करनवाँ बतावा अइला बनवां

कोने कोने घूमेला भँवरवा जइसे मनवाँ

कउनी हो नगरिया में अँजोरिया नाही भावे,बबुआ बोलता ना

कहवां रात भावै बरहो मास बबुआ बोलता ना

रूठि गइली रिद्धि सिद्धि चललीं रिसियाइ के

कउनी हो नगरिया में अगिया लगाइ के

कहवाँ के लोगवा के भोगवा नाहीं भावे बबुआ बोलता ना

दिहलें तोहके घरवा से निकास, बबुआ बोलता ना

बिधना जरठ मति अटपट कइलैं रे

कि या कवनों भूल तीनों मूरती से भइलैं रे

किया रे अभागा कउनों लागा बादी कइलें, बबुआ बोलता ना

कि या कतहूँ पउला ना सुपास, बबुआ बोलता ना

हम बनबासी बबुआ माना हमरी बतिया

बावला समाज में बिता ला एक रतिया

कन्द मूल फल जल सेवा में जुटइबै बबुआ बोलता ना

सेवा करबै माना बिसवास, बबुआ बोलता ना

यहीं से राम पर आधारित गीतों की रचना शुरू हुई। बावला उपनाम के पीछे भी एक रोचक किस्सा है। शुरू में उन्होंने कुछ भजनों की रचना की थी, जिसके प्रकाशन के लिए वे गांव के ही एक मित्र के साथ वाराणसी आए। छह वर्णों का रामजियावन नाम बैठता ही नहीं था। प्रकाशक ने कोई छोटा नाम रखने की सलाह दी। वह रात भर मानसिक उहापोह में रहे। सुबह होने पर दशाश्वमेघ घाट पर स्नान करने गए। वहीं पर एक व्यक्ति से टकरा गए। उसने झल्ला कर रामजियावन को कुछ कहा। उसकी बुदबुदाहट में उन्हें बावला शब्द सुनाई दिया। तुरंत ही बावला उपनाम अपना लिया। प्रथम बार रामजियावन बावला को सन् 1957-58 ई में कवि के रूप में आकाशवाणी वाराणसी में काव्य पाठ का अवसर प्राप्त हुआ। वहीं पर आकाशवाणी के हरिराम द्विवेदी ने इनके नाम के साथ दास शब्द जोड़ दिया, तब से यह रामजियावन दास बावला हो गए। इसी समय इन्हें भोजपुरी गौरव सम्मान से नवाजा गया।

बावला जी की रचनाओं में ग्रामीण समाज व किसान जीवन का अत्यंत जीवंत चित्रण मिलता है। गांव, समाज की दीन-दशा तथा सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी समस्याओं का इन्होंने बड़ी सहजता से चित्रण किया है। वे किसानों को दर्शाते हुए कहते हैं-

नाही भेद-भाव, न त केहु से दुराव बा

सबसे लगाव बा, मनवा के चंगा

खेत में किनई, सधुअई समान बा

सपना के सोध में उघार बा नंगा

समाज के अंदर उत्पन्न बुराइयों का चित्रण करते हुए कहते हैं-

हाय रे समाज, आज लाज बा न लेहाज बा

चोर, घुसखोर कुल बन जालन बांका

घोर अन्याय बा कोर्ट में कचहरी में

डहरी में लूट-पाट बम क धमाका

गांधी जी क सपना कलपना बुझात बा

खात बाये मेवा केहू करे फाका

बावला जी शिव उपासक हैं। अतः आपकी प्रारंभिक रचनाएं भक्‍तिपरक ही है। आप शिवजी की आराधना प्रतिदिन गीतों के माध्यम से करते हैं-

गांव क गंवार बस माटी क अधार बा

सगरी अन्हार नाही पाई उजियारे के

कलही समाज दगाबाज क दखल बा

कल नाही बा बोझ भरत कपारे के

छोट-छोट बात उतपात क न कह जात न सह जात सुसुक-सुसुक बेसहारे के

बाबा शिव शंकर भयंकर हो भूज देता आवे जे उघार करे बावला बेचारे के

बावला जी भारतीय संस्कृति व सभ्यकता के मूल्यों में आई गिरावट से काफी चिंतित हैं। राजनैतिक मूल्यों का गिरना और जातिगत राजनीति के ये प्रबल विरोधी है। परंपरागत सामाजिक संबंधों में आई कमी और ग्रामीण समाज की कमियों को दर्शाते हुए कहते हैं-

मानवता मरि रहल जहां पर, फिर भी देश महान

वाह रे हिन्दुस्तान

घूस लेत अधिकारी देखा। हर विभाग सरकारी देखा

टोपी सूट सफारी देखा। जरै आग में नारी देखा

साधु संत व्यापारी देखा। उल्टा बेट कुदारी देखा

कहां ज्ञान विज्ञान। वाह रे हिन्दुस्तान

बावला जी को तो वैसे अनेक सम्मान मिले, मगर ग्रामीण परिवेश के लोगों द्वारा गाए जाने वाले इनके गीत सबसे बड़े सम्मान हैं। भोजपुरी भाषा-भाषी क्षेत्र में बावला जी का नाम अति आदरणीय है। भोजपुरी का सबसे बड़ा सम्मान सेतु सम्मान इन्हें सन् 2002 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल वीरेन्द्र शाह ने प्रदान किया ।

Bawla ji 7

इसके अलावा काशी रत्न्, जनकवि गौरव समेत अनेकों सम्मान मिले हैं। गीतलोक एकमात्र प्रकाशित पुस्तक है।

रामजियावन दास 'बावला'

आधुनिक चकाचौंध से बिल्कुल अछूते बावला जी उम्र के 86वें पड़ाव पार करने के बाद भी गांव की प्राकृतिक वादियों में भोजपुरी साहित्य को समृद्घ करते हुए हिंदी साहित्य को भी एक नया आयाम देने में प्रयासरत हैं।

भोजपुरी गायक अभिनेता और राजनेता मनोज तिवारी मृदुल अपने एक इंटरव्यू में कहते हैं कि बावला जी जब राम केवट प्रसंग वाली अपना गीत गाते थे तो न केवल उनकी बल्कि श्रोताओं-दर्शकों की आंखों से आंसू गिरने लगते थे. यह थी उनकी कवित्व शक्ति –

केवट बोलल रामचन्द्र से हाथ जोरि अस बानी

ए बाबू राउर मरम हम जानी

पाथर से नारी तू कइला, हमरे घाट दया करि अइला

एकै बिनती बाटइ हमरी नइया बहुत पुरानी

ए बाबू राउर मरम हम जानी

पहिले राउर चरन पखरबै, फिर नदिया के पार उतरबै

मन में आवै त बतलावा भरि कठवत जल आनी

ए बाबू राउर मरम हम जानीं

अगर न चरन धोवावल चाहा, बेसी ना बतियावल चाहा

आगे से कुछ दूर उतरि जा, बाटइ थोरिकै पानी ए बाबू राउर मरम हम जानी

कुटुम भरे क नाव सहारा, कइसों कइसों करीं गुजारा

रत्ती भर न झूठ कहीं जाने गंगा महरानी

ए बाबू राउर मरम हम जानीं

दुइ में एक करै के होई, दूसर बाय उपाय न कोई

जो भावै सो कहा जल्दी नइया से बा जिनगानी

ए बाबू राउर मरम हम जानीं

जउ नइया से बन गइ नारी, जाई कुल रोजी रोजगारी

बड़ा बावला होइ जइहैं मोर घर क सकल परानी

ए बाबू राउर मरम हम जानी

बावला जी के बाद उनकी साहित्यिक विरासत यहीं खत्म नहीं हुई । बावला जी के पौत्र योगेन्द्र शर्मा 'योगी' जी और धीरेन्द्र पांचाल उनके साहित्यिक विरासत को ढोने वाले तीसरी पीढ़ी के रचनाकार हैं । योगेन्द्र शर्मा योगी जी की रचनाएं भी सामाजिक विकृतियों और समसामयिक मुद्दों पर बड़े ही सफाई से कटाक्ष करतीं हैं । भोजपुरी के अनेकों पत्र पत्रिकाओं और वेबसाइटों पर इनकी रचनाएं निरन्तर प्रकाशित होती रहती हैं ।

योगेन्द्र शर्मा 'योगी'
धीरेन्द्र पांचाल

साहित्य सम्मान[संपादित करें]

बावला जी 5

1. भोजपुरी साहित्य का सबसे बड़ा सेतु सम्मान (2002) में कोलकाता के विश्व भोजपुरी सम्मेलन में)

2. काशी रत्न अलंकरण (2004)

3. पुरविया गौरव सम्मान एकता मंच (2009)

4. भोजपुरी लोक रस सम्मान (गाजीपुर में 2011 में)

5. चंदौली महोत्सव 2003 तथा 2006

6. कुशवाहा सेवा संस्थान काशी सम्मान (1997)

7. यथार्थ परिवार सम्मान (2005)

8. अदवी संगम सम्मान (2001)

9. स्वदेशी मेला में सम्मान (2008)

10. भोजपुरी तुलसी रत्न (2009 में अखिल भारतीय पूर्वा लोकरत्न संगीत महोत्सव में)