रामकृष्ण डालमिया

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

रामकृष्ण डालमिया ( ७ अप्रैल १८९३ -- २६ सितम्बर १९७८) भारत के उद्योगपति थे जिन्होंने अपने भाई जयदयाल डालमिया के साथ डालमिया समूह की स्थापना की थी। उन्होंने स्वामी करपात्री के साथ मिलकर गौ हत्या एवं हिंदू विवाह अधिनियम के मुद्दे पर जवाहरलाल नेहरू से कड़ी टक्कर ली थी। देश के सभी बड़े नेताओं से उनके मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे और वे उनकी खुले हाथ से आर्थिक सहायता किया करते थे।

1933 में एक चीनी मिल से इनका उदय हुआ था। भाग्य ने डटकर डालमिया का साथ दिया और कुछ ही वर्षों के बाद वे देश के सबसे बड़े उद्योगपति बन गए। उन्होंने सभी तरह के ब्यापार मे हाथ डाला और उसे सफलता के शिखर पर ले गये। उनका औद्योगिक साम्राज्य अविभाजित भारत के सभी भागों में फैला हुआ था जिसमें समाचारपत्र, बैंक, बीमा कम्पनियां, विमानसेवाएं, सीमेंट, वस्त्र उद्योग, खाद्य पदार्थ आदि सैकड़ों उद्योग शामिल थे।

डालमिया नगर में 3,800 एकड़ में फैले परिसर में सीमेंट, चीनी, कागज, रसायन, वनस्पति, एस्बेस्टस शीट बनाने वाली इकाइयाँ थीं। इस समूह का अपना बिजली घर और रेलवे भी था। इसके अलावा इस समूह के पास त्रिची, चरखी दादरी (दिल्ली के पास), डंडोट (लाहौर) और कराची में सीमेंट के कारखाने भी थे। इसके अलावा पटियाला में एक बिस्किट कारखाना और बिहार के झरिया और बंगाल के रानीगंज क्षेत्रों में कोयला खदानें थीं।

आरम्भिक जीवन[संपादित करें]

रामकृष्ण डालमिया का जन्म राजस्थान के चिड़ावा नामक एक कस्बे में एक गरीब अग्रवाल घर में हुआ था। यहीं उन्होंने मामूली शिक्षा प्राप्त की और मूलभूत अंकगणित, अंग्रेजी तथा महाजनी सीखी। जब वे केवल १८ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहान्त हो गया। इसके बाद पूरे परिवार को पालने का भार उनके कन्धों पर आ गया। उनके घर में उनकी पत्नी, उनकी माँ, दादी और छोटा भाई थे।

व्यवसाय एवं उद्योग[संपादित करें]

इस स्थिति में वे अपने मामा मोतीलाल झुनझुनवाला के पास कोलकाता चले गए थे। उनके मामा ने वहां पर बुलियन मार्केट में एक विक्रेता (सेल्समैन) का कार्य दिया। वे लन्दन के बुलियन एजेन्टों द्वारा भेजे गये टेलीग्राम को अपनी मामूली शीक्षा के वावजूद पढ़ लेते थे। इन कूट सन्देशों को पढ़ने का प्रभाव यह हुआ कि रामकृष्ण डालमिया में बुलियन व्यवसाय की बारीकियों से सम्बन्धित अन्तर्दृष्टि पैदा हो गयी। इससे उत्साहित होकर वे चाँदी के सट्टा बाजार में कूद पड़े। दुर्भाग्य से उन्हें इसमें वे सफल नहीं हुए। इसी के चलते उनके मामा से भी सम्बन्ध टूट गये।[1]

इसके बाद वे दलाली (ब्रोकरेज) के काम में लग गये। सौभाग्य से इसमें उनको १ लाख ५६ हजार रुपये का लाभ हुआ। इसके बाद वे अन्य वस्तुओं के सट्टे में भी हाथ आजमाने लगे। अपनी इमानदारी और लगन से इन्होंने बहुत से कारोबारियों का हृदय जीत लिया। इसी समय उन्होंने कलकत्ता शेयर और स्टोक एक्सचेंज के बालदेव दासजी नाथानी के साथ साझेदारी की। नाथानी के आदर्शों ने डालमिया के व्यापार तथा जीवन के प्रति दृष्टिकोण को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

सट्टा बाजार में सफलता से उत्साहित होकर उन्होंने अपने व्यवसाय का विविधीकरण करने की सोची। इसी तारतम्य में वे एक दिन बिहार के दिनापुर गये और वहाँ ट्रेडिंग का काम शुरू किया। इसी समय उनकी दृष्टि उस क्षेत्र में एक चीनी मिल चालू करने की तरफ गयी जिसमें उनको अपार सम्भावना दिखी। इस विचार को कार्यरूप में बदलने के लिये उन्होंने आरा के प्रसिद्ध जमींदार निर्मल कुमार जैन के साथ हाथ मिला लिया। सन १९३२ में यह मिल बनकर तैयार हो गयी। यह मिल दिनापुर के निकट बिहटा में स्थापित हुई और इसका नाम 'साउथ बिहार सुगर मिल्स लिमिटेड' रखा गया। यह उस समय भारत की सबसे बड़ी चीनी मिल थी।

इसी बीच रामकृष्ण अपनी पुत्री रमा के लिये एक योग्य वर की तलाश में थे। अन्त में सन १९३२ में साहू शान्ति प्रसाद जैन से रमा का विवाह तय हुआ जो तत्कालीन संयुक्त प्रान्त (यूपी) के नजीबाबाद के एक प्रसिद्ध जमींदार और वित्तपोषक थे। शान्ति प्रसाद वित्त, अर्थशास्त्र और वाणिज्य के मामलों में पारंगत थे। विवाह के बाद शान्ति प्रसाद ने ही एक साझेदार के रूप में रामकृष्ण डालमिया के बंगाल, बिहार और उड़ीसाके उद्योंगों का प्रबन्धन किया। इनके मध्यप्रान्त, बाम्बे प्रेसिडेन्सी और दक्षीणी भारत में फैले उद्योगों का प्रबन्धन श्रियान्स प्रसाद जैन ने किया जो शान्ति प्रसाद के बहनोई थे।

रामकृष्ण डालमिया ने अपने विकसित हो रहे व्यवसाय में अपने छोटे भाई जयदयाल डालमिया को भी लगा लिया। जयदयाल एक जिज्ञासु प्रकृति के व्यक्ति थे और मशीनरी में उनकी अच्छी रुचि थी। अतः वे न केवल एक योग्य साझेदार सिद्ध हुए बल्कि डालमियानगर के कारखाने के सभी तकनीकी पहलुओं का योग्यतापूर्वक प्रबन्धन भी किया। डालमियानगर का यह कारखाना अत्यन्त विशाल था और इसमें डालमिया समूह की कई कम्पनियाँ चलतीं थीं। जयदयाल ने संसार भर से अद्यतन प्रौद्योगिकी और मशीनरी अपनी कम्पनियों में लगाया।

कुछ ही समय बाद रोहतास जिले के डेहरी-ऑन-सोन में एक दूसरी चीनी मिल आरम्भ की गयी। इसके बाद और कई चीनी मिलें आरम्भ की गयीं, जैसे सारण की 'एस के जी सुगर लिमिटेड', रामपुर की 'राजा सुगर कम्पनी लिमिटेड' (१९३२ में), रामपुर में ही 'बुलन्द सुगर कम्पनी लिमिटेड' , चम्पारन की एस के जी सुगर लिमिटेड आदि।

उनके उद्योग के विस्तार का अगला चरण १९३० के दशक के मध्य में हुआ जब उन्होंने देश के विभिन्न भागों में सीमेन्ट के कारखाने स्थापित किये। भारत के विकास में यह उनकी सबसे बड़ा योगदान है। उनका उद्देश एसीसी लिमिटेड के एकाधिकार को समाप्त करना था जिसका उस समय सीमेन्ट के निर्माण में एकछत्र राज्य था। इनका सबसे बड़ा कारखाना डालमियानगर में था। दूसरा कारखाना कराची के शान्तिनगर में था। डाल्मिया सीमेन्ट के पास कुछ छोटे सीमेन्ट कारखाने भी थे, जिसमें से एक ड्न्डोट (अब पाकिस्तान में) में था और दूसरा मद्रास प्रेसिडेन्सी में डालमियापुरम नामक स्थान पर था। एक और कारखाना डालमिया दादरी (अब हरियाणा में) में था।

इन कम्पनियों की सफलतापूर्वक स्थापना के बाद विस्तार का दूसरा चरण आरम्भ हुआ। १९३६ में भारत इन्श्योरेंस कम्पनी के अधिग्रहण से आरम्भ होकर डालमिया ने १९३७ में 'नेशनल सेफ डिपॉजिट ऐण्ड कोल्ड स्टोरेज लिमिटेड' की स्थापना की। इसके अन्तर्गत उन्होंने कोलकाता, लखनऊ, और कानपुर में लोहे की विशाल तिजोरियों से युक्त 'स्ट्रॉंग रूम' की एक शृंखला शुरू की। सन १९४३ में भारत फायर ऐण्ड जनरल इन्श्योरेंस लिमिटेड की स्थापना की जो सामान्य बीमा के क्षेत्र में अग्रणी कम्पनी थी। उसी वर्ष उन्होंने भारत बैंक लिमिटेड की स्थापना की जिसकी भारत के स्वन्तत्रता के समय २९२ शाखायें थीं।

इस प्रकार त्वरित विकास के बल पर डालमिया-जैन समूह (जिसे अब डालमिया-जैन इंटरप्राइजेज कहते हैं), बिड़ला और टाटा के बाद तीसरे स्थान पर आ धमका। १९४६ में उन्होंने तीन एन्ड्रू-यूल जूट मिलों का आधे से अधिक अंश का अधिग्रहण कर लिया। इसके बाद बम्बई के दो मिलों को खरीदा जो उस समय विकास के रास्ते पर थे। इनके नाम हैं- माधौजी धरमसी मन्युफैक्चरिंग कम्पनी लिमिटेड, तथा सर सपुरजी ब्रोचा मिल्स लिमिटेड। इसके ठीक बाद इस समूह ने मेडिया की महान कम्पनी 'बेनेट कोलमैन ऐण्ड कम्पनी' का भी अधिग्रहण कर लिया। भारत जर्नल लिमिटेड को भी इन्होंने अधिग्रहित किया जो अंग्रेजी तथा हिन्दी के कई समाचार पत्र निकालता था।

इसके बाद भी इस समूह का प्रसार निरन्तर जारी रहा और इन्होंने वाहनों के क्षेत्र में और रेलवे के क्षेत्र में (ढुलाई में) प्रवेश किया। इसके अलगले चरण में उन्होंने कई कोयला खादानों का अधिग्रहण किया जिनमें मध्यप्रान्त के जुनरदेव की 'खरखरी कोल कम्पनी', झरिया की महेशपुर कोलियरीज लिमिटेड तथा भारत कोलियरीज लिमिटेड प्रमुख हैं।

इसके अलावा इनकी अनेक कम्पनियाँ थीं, जैसे पटियाला राज्य में स्थित 'पटियाला बिस्कुट मैन्युफैक्चरिंग लिमिटेड' कानपुर की लेस्को केमिकल वर्क्स लिमिटेड (औषधि निर्माण), गुजरात के काठियावाड में स्थित ध्रंगधरा केमिकल वर्क्स, रामपुर डिस्टिलरी ऐण्ड केमिकल वर्क्स (स्पिरिट और अल्कोहल निर्माण), रामपुर मेज़ प्रोडक्ट्स लिमिटेड, और अनेकानेक कम्पनियाँ थीं।

यद्यपि इस समूह के कारखाने पूरे अविभाजित भारत में फैले हुए थे, किन्तु इनका डालमियानगर का कारखाना परिसर इनका शिरमौर था। यह ३८०० एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ एक टाउनशिप था जिसमें विशालकाय 'रोहतास इण्डस्ट्रीज लिमिटेड' स्थित थी। इसके अन्तर्गत अनेक कम्पनिया थीं जिनमें एक चीनी मिल, एक केमिकल संयंत्र, प्लाईवुड का एक कारखाना, वनस्पति घी बनाने का एक कारखाना, एक सीमेन्ट का कारखाना, एक ऐसबेस्टस सीमेन्ट कारखाना, एक कागज बनाने का कारखाना, एक हार्ड प्रेस्ड बोर्ड कारखाना, १२ मेगावाट का एक विद्युत संयंत्र, एक केन्द्रीय वर्कशॉप, आदि थे। इस संयंत्र में कर्मचारियों और उनके परिवार जनों के उपयोग की सभी सुविधायें भी निर्मित की गयीं थीं।

पारिवारिक और निजी जीवन[संपादित करें]

रामकृष्ण डालमिया शरीर से दुबले-पतले थे किन्तु शारीरिक और मानसिक रूप से सुदृढ थे। उनकी स्मृति भी असाधारण थी। विशाल उद्योगजगत के स्वामी होने के बावजूद वे एक सादा जीवन व्यतीत करते थे। वे साधारण भोजन करते और विलासिता के स्थान पर मितव्ययी जीवन पसन्द करते थे। वे अत्यन्त अध्यात्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। दर्शन और साहित्य से वे हृदय से जुड़े हुए थे। कहा जाता है कि गलियों के नामपट्ट को बंगाली में देखकर ही वे बांग्ला पढ़ना सीख गये थे। यह भी कहा जाता है कि वे कोलकाता के स्ट्रीटलाइट में बैठकर अंग्रेजी सीख लिये थे। उन्होंने अनेकों पुस्तकों की रचना की जिसमें 'अ गाइड टू ब्लिस', 'फीयरलेसनेस ऐण्ड डिवाइन लॉ' मुख्य हैं। वे हिन्दू धर्मग्रन्थों के साथ-साथ बाइबल, कुरान आदि से भी अच्छी तरह परिचित थे। इसके अलावा उन्होंने वेदान्त साहित्य (पञ्चदशी और योगवासिष्ठ), विवेकानन्द साहित्य और स्वामी रामतीर्थ के साहित्य का भी अध्ययन किया था।

उन्होंने छः विवाह किये किन्तु फिर भी उन्हें पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। उनके घर केवल कन्याओं ने ही जन्म लिया। उनकी छः पत्नियों में कुछ अच्छी पढ़ी-लिखी और विदुषी भी थीं। उनकी चौथी पत्नी सरस्वती सबसे प्रिय और विदुषी थीं। सर्वाधिक समय वे इनके साथ ही रहे और अपने इच्छापत्र में इनके नाम ही इन्होंने अपनी अधिकांश सम्पत्ति लिख दी। जब ये केवल १६ वर्ष के थे तभी इनकी पहली पत्नी नर्मदा देवी दिवंगत हों गयीं। इनकी दूसरी पत्नी का नाम दुर्गा देवी, तीसरी पत्नी का नाम प्रीतम, चौथी पत्नी का नाम सरस्वती, पाँचवी पत्नी का नाम आशा, तथा छठी पत्नी का नाम दिनेश नन्दिनी था।

सन १९७८ में ८५ वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

नेहरू के आलोचक[संपादित करें]

रामकृष्ण डालिया शुरू से ही गौहत्या विरोधी आंदोलन का खुलकर समर्थन करते थे। [2]नेहरू के साथ उनका कुछ बातों को लेकर असंतोष रहता था। वह विभाजन और शरणार्थियों की दुर्दशा के लिए भी पंडित नेहरू की खुलेआम आलोचना करते थे। इसी के चलते नेहरू ने 1956 में विवियन बोस जांच आयोग बनवाया था। इसके चलते डालमिया पर पैसों की हेराफेरी के साथ, शेयर बाजार की भी हेराफेरी का आरोप लगा। सरकार की इस वक्रदृष्टि के चलते उन्हें टाइम्स ऑफ़ इंडिया, हिन्दुस्तान लिवर और अनेक उद्योगों को औने-पौने दामों पर बेचना पड़ा। सवाई माधोपुर में स्थित सीमेंट फैक्ट्री को भी उन्होंने इसी दौरान खो दिया। न्यायालय में मुकदमा चला और रामकृष्ण डालमिया को तीन वर्ष कैद की सजा सुनाई गई।

इन सब घटनाओ के बाद डालमिया कभी उभर ही नहीं पाये। सन 1964 तक डालमिया ने मोहम्मद अली जिन्ना से खरीदे दिल्ली के बंगले को अपने पास रखा और फिर नीदरलैंड सरकार को बेच दिया। और तब से इसका इस्तेमाल नीदरलैंड के नई दिल्ली में राजदूत के आवास के रूप में हो रहा है।

जनसेवा[संपादित करें]

डालमिया परिवार जन सेवा में हमेशा से ही काम करता था और बाढ़, सूखा, भूकंप, जैसी प्राकृतिक आपदाओं में पीड़ितों को आर्थिक मदद के लिए हमेशा से आगे रहता था। 1951 में डालमिया ब्रदर्स ने एक ट्रस्ट शुरू की जिसका नाम 'डालमिया सेवा संस्थान' है। इसके माध्यम से निजी अस्पताल, स्कूलों, विधवा घरों, धर्मशालाओं को चलाने का काम होता है। डालमिया ट्रस्ट भी डालमिया भाइयों ने शुरू की थी।अपने गांव चिड़ावा में भी डालमिया परिवार के कई संस्थान आज भी चालू है जो वहां के लोगों के लिए जन कल्याण का कार्य करते हैं।

सन्दर्भ[संपादित करें]