राजनयिक दूत

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राजनयिक दूत (Diplomatic Envoys) संप्रभु राज्य या देश द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि होते हैं, जो अन्य राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन अथवा अंतरराष्ट्रीय संस्था में अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं।

वर्तमान अंतरराष्ट्रीय विधि का प्रचलन आरंभ होने के बहुत पूर्व से ही रोम, चीन, यूनान और भारत आदि देशों में एक राज्य से दूसरे राज्य में दूत भेजने की प्रथा प्रचलित थी। रामायण, महाभारत, मनुस्मृति, कौटिल्यकृत अर्थशास्त्र और 'नीतिवाक्यामृत' में प्राचीन भारत में प्रचलित दूतव्यवस्था का विवरण मिलता है। इस काल में दूत अधिकांशत: अवसरविशेष पर अथवा कार्यविशेष के लिए ही भेजे जाते थे। यूरोप में रोमन साम्राज्य के पतन के उपरांत छिन्न भिन्न दूतव्यवस्था का पुनरारंभ चौदहवीं शताब्दी में इटली के स्वतंत्र राज्यों एवं पोप द्वारा दूत भेजने से हुआ। स्थायी राजदूत को भेजने की नियमित प्रथा का श्रीगणेश इटली के गणतंत्रों एवं फ्रांस के सम्राट् लुई ग्यारहवें ने किया। सत्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक दूतव्यवस्था यूरोप के अधिकांश देशों में प्रचलित हो गई थी।

परिचय[संपादित करें]

अंतरराष्ट्रीय विधि के अनुसार कोई भी राज्य या देश अन्य राज्यों से दौत्य संबंध स्थापित करने के लिए बाध्य नहीं है, परंतु अंतरराष्ट्रीय जगत्‌ में उत्तरोत्तर बढ़ते हुए पारस्परिक संबंध एवं सापेक्ष्य के कारण प्रत्येक राष्ट्र के लिए अन्य राष्ट्रों से दौत्य संबंध स्थापित करना उपयोगी सिद्ध होता है। दौत्य संबंध स्थापित करने का अधिकार केवल संप्रभु राष्ट्रों को ही है परंतु विशेष परिस्थितियों में यह अधिकार अर्धसंप्रभु और अधीनस्थ राज्यों को भी दिया जा सकता है। पोप और संयुक्त राष्ट्र यद्यपि राज्य की कोटि में नहीं आते तथापि दौत्य संबंध स्थापित करने का उनका अधिकार सर्वस्वीकृत है।

मध्यकालीन यूरोप में दूतों की वरिष्ठता और पौर्वांपर्यक्रम के प्रश्नों पर बहुधा विवाद होता था अतएव वियेना की कांग्रेस ने 1815 में दूतों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया। 1818 में एक्स-ला-शैपल की कांग्रेस ने एक चौथी श्रेणी जोड़ दी। तदनुसार वरिष्ठता के क्रम से दूतों के चार वर्ग हैं-

(1) राजदूत (Ambassadors),

(2) पूर्णशक्तियुक्त महादूत तथा असाधारण दूत (Ministers Plenipotentiory & Envoys extraordinary),

(3) निवासीमंत्री (Ministers Resdent),

(4) कार्यभारवाहक (Charges de' affaires)।

औपचारिकता एवं शिष्टचार के अतिरिक्त इस वर्गीकरण का अब कोई महत्व नहीं है। राष्ट्रमंडल के सदस्य राष्ट्रों के बीच परस्पर भेजे जानेवाले दूत 'उच्चायुक्त' कहे जाते हैं।

एक राष्ट्र में स्थित विदेशों के राजनयिक दूतों के समूह को 'राजनयिक निकाय' (Diplomatic corps) कहते हैं। इसमें वरिष्ठतम दूत को 'दूतशिरोमणि' (Doyen) कहते हैं। राजनयिक निकाय दूतों के सम्मान एवं उन्मुक्तियों के पालन का ध्यान रखता है।

नियुक्ति मे समय प्रत्येक दूत को राज्य या राष्ट्र का अध्यक्ष एक मुद्रांकित 'प्रत्ययपत्र' (Letter of credence) प्रदान करता है, जिसे दूत प्रत्यायित राष्ट्र के अध्यक्ष को औपचारिक समारोह में स्वयं देता है। संधिवार्ता आदि के लिए नियुक्त दूत को एक 'पूर्णाधिकारपत्र' भी दिया जाता है। कोई भी राष्ट्र दूसरे राष्ट्र से दौत्य संबंध स्वीकार करने को बाध्य नहीं है परंतु प्रश्न विशेष पर वार्ताहेतु आए दूत को स्वीकार न करना उस प्रश्न पर वार्तां न करने के निश्चय का द्योतक है। व्यक्तिविशेष को अन्य राष्ट्र के दूत रूप में ग्रहण न करना उसी दशा में उचित होगा जब अपने चरित्र, प्रत्यातित राष्ट्र के प्रति व्यक्त विचार अथवा प्रत्यातित राष्ट्र का नागरिक होने के कारण वह व्यक्ति ग्राह्य न हो।

अस्थयी राजनयिक दूत, समारोह अथवा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में, अपने देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए अथवा प्रश्नविशेष पर वार्ता के लिए भेजे जाते हैं। उनके कृत्य और अधिकार उसी प्रयोजन तक सीमित रहते हैं। स्थायी राजदूतों की कार्यापरिधि बहुत विस्तृत है। दूत अपने राष्ट्र की नीति का आधिकारिक प्रवक्ता है और वह दोनों के बीच समस्त वार्ता संवहन एवं संपर्क का माध्यम होता है। अपने राष्ट्र की कीर्ति बढ़ाना एवं विदेशी राष्ट्र में स्वदेश के प्रति सद्भावना बढ़ाना उसका कर्तव्य है। दूत का अन्य महत्वपूर्ण कार्य है दूसरे देश की राजनीतिक स्थिति एवं गतिविधियों का पर्यवेक्षण करना और उसकी सूचना अपनेदेश को भेजना। दूत अपने देश प्रवासी नागरिकों की तथा उनकी सपंत्ति की रक्षा करता है और उनके जन्म, मरण, विवाहादि का पंजीकरण भी करता है।

राजनयिक दूत को सप्रभु देश का प्रतिनिधि होने के नाते तथा अपना कार्य सुचारु रूप से करने की सुविधा के लिए कुछ विशिष्टाधिकार तथा उन्मुक्तियाँ प्राप्त हैं। दूत परराष्ट्र में अनुल्लंघनीय है। अपने देश में स्थित समस्त दूतों की सुरक्षा का प्रबंध करना प्रत्येक राष्ट्र का कर्तव्य है। राजदूत और उसका निवासस्थान, वाहन आदि भी प्रत्यातित राष्ट्र के क्षेत्राधिकार से परे हैं। राजदूत पर उसकी स्वेच्छा के बिना प्रत्यातित राष्ट्र के न्यायालयों में मुकदमा नहीं चल सकता और न अन्य न्यायिक कार्यवाही ही की जा सकती। कोई भी स्थानीय अधिकारी दूत की अनुमति के बिना उसके निवासस्थान अथवा कार्यालय में प्रवेश नहीं कर सकता। राजदूत को अपने देश से संपर्क स्थापन या संवादवहन की पूर्ण स्वतंत्रता है। दूतावास के कर्मचारियों और राजदूत के परिवार और वैयक्तिक सेवकों को भी राजनयिक विशिष्टाधिकार कुछ अंशों तक प्राप्त है।

राजनयिक दौत्य की समाप्ति दोनों में से किसी राष्ट्र के शासन में क्रांतिकारी परिर्वतन, राष्ट्रों की अध्यक्षता में वैधानिक परिवर्तन होने पर, दोनों में से किसी राष्ट्र के अनुरोध पर अथवा दोनों देशों में युद्ध छिड़ जाने पर हो जाती है। दोनों देशों में गंभीर वैमनस्य होने पर विरोध प्रकट करने के लिए भी स्थायी अथवा अस्थायी रूप से दौत्य संबंध का विच्छेद कर दिया जाता है।

आदर्श राजदूत[संपादित करें]

राजदूत का मूल कार्य राष्ट्रों के मध्य मैत्री व सौहार्द्रपूर्ण सम्बन्ध बनाना है। उनके इन कार्य का न केवल उसके देश के वरन् सम्पूर्ण विश्व के सम्बन्धो पर प्रभाव पड़ता है। विश्व में शांति रहे अथवा युद्ध इस प्रश्न का उत्तर भी उसकी योग्यता पर निर्भर करता है। अतः आवश्श्यकता है कि एक ऐसे व्यक्ति को ही राजदुत नियुक्त किया जावे जिसकी कुशलता व योग्यता असंदिग्ध हो क्योंकि इसी आधार पर विश्व शांति और व्यवस्था निर्भर है। ऐसे आदर्श राजनयिक को किस प्रकार का होना चाहिये ? उसके क्या गुण होने याहिये ? एक आदर्श राजनयिक कौन हो सकता है ? ये प्रश्न स्वाभाविक है।

यूनानी राजनय के प्रारम्भिक काल में राजदूतों का चयन उनकी आवाज, मधुर भाषण, मान्य बुद्धि एवं आकर्षक व्यक्तित्व के आधार पर होता था। बाइजेनटिनी युग के राजनयिक से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे विदेशियों के प्रति शिष्ट हो तथा उसकी आलोचना नंहीं करे। निकलसन के अनुसार राजनयिक व्यवस्था के अनुभव के आधार पर पन्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में आदर्श राजनयिक से निम्न नौ योग्यताओं की अपेक्षा की जाती थी :-

  • (1) वह अच्छा भाषाविद् हो,
  • (2) वह सुरुचिपूर्ण तथा विद्वान् हो,
  • (3) उसे आनी चतुरता छिपानी चाहिये और दुनिया के एक मौजी व्यक्ति की भांति प्रकट होनी चाहिये,
  • (4) उसे स्वाभाविक रूप से धैर्यशील व्यक्ति होना चाहिये,
  • (5) उसे आतिथ्य सत्कार करने वाला होना चाहिये,
  • (6) उसे प्रत्येक अच्छी बुरी परिस्थिति में वाणी संयम तथा मानसिक संतुलन बनाये रखना चाहिये।
  • (7) उसका निजी-जीवन इतना संयमशील होना चाहिये कि शत्रुओं को उसके विषय में किसी प्रकार का विवाद फैलाने का अवसर प्राप्त न हो सके।
  • (8) उसमें अपने देश की सरकार को किसी प्रश्न पर नीति अथवा अज्ञानता छिपाने तथा उसे दिये गये कठोर निदेर्शो को सहन करने की क्षमता होनी चाहिये, और
  • (9) उसे याद रखना चाहिये कि शक्ति प्रदर्शन के आधार पर अर्जित राजनयिक विजय अपने पीछे अपमान की भावना तथा बदले की इच्छा छोड़ जाती है। कोई भी आदर्श राजनयिक धमकी, डांट-फटकार अथवा चिड़चिड़ाहट से काम नहीं लेगा।

य़द्यपि एक राजनयिक अभिमर्त्ता की योग्यतायें राज्य के कानूनों द्वारा निश्चित की जाती है, परन्तु राजनयिक अभिकर्ता की योग्यता के सम्बन्ध में ऐसे सिद्धान्तों का निरूपण कर दिया है जो सभी देशों में राजनयिकों से अपेक्षित है। राजनय के स्वरूप तथा राजनयिकों को योग्यता के सम्बन्ध में नियमों में निरन्तर परिवर्तन होते रहते हैं, लेकिन वर्तमान युग में एक सफल व आदर्श राजदूत के गुणों को जानने के पूर्व यह उचित ही होगा कि प्राचीन व मध्यकालीन लेखकों व स्वयं राजदूतों द्वारा वर्णित आदर्श राजदूतों के गुणों का विहंगावलोकन किया जाये।

राजनयिक के कार्य[संपादित करें]

राजनयिक के मूलभूत कार्य निम्नलिखित हैं-

  • अपने देश का मेजबान देश में प्रतिनिधित्व करना
  • मेजबान देश में अपने देश तथा उसके नागरिकों के हित की रक्षा करना
  • मेजबान देश की सरकार के साथ संधिवार्ता (negotiation) करना
  • मेजबान देश के वाणिज्यिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक जीवन पर पैनी निगाह रखना और उसकी रपट देना
  • अपने देश तथा मेजबान देश के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों को बढ़ावा देना
  • स्वदेश तथा मेजबान देश के बीच वाणिज्यिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक सम्बन्धों का विकास करना
  • पारपत्र (पासपोर्ट), वीजा तथा अन्य यात्रा-सम्बन्धी प्रपत्र जारी करना

प्रसिद्ध राजनयिक[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  • राम शास्त्री : कौटिल्य अर्थशास्त्र;
  • ओपेनहाइम : इंटरनेशनल लॉ;
  • हालैंड : इंटरनेशनल ला;
  • ब्रायरले : दि लॉ ऑव नेशन्स;
  • फास्टर : दि प्रेक्टिस ऑव डिप्लोमेसी;
  • संपूर्णानंद : अंतर्राष्ट्रीय विधान

इन्हें भी देखें[संपादित करें]