रागदरबारी

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search
रागदरबारी  
200px
राग दरबारी
लेखक श्रीलाल शुक्ल
देश भारत
भाषा हिन्दी
विषय व्यंग्य
प्रकाशन तिथि 1968
पृष्ठ 330
आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-267-0478-0

रागदरबारी विख्यात हिन्दी साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल की प्रसिद्ध व्यंग्य रचना है जिसके लिये उन्हें सन् 1970 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह ऐसा उपन्यास है जो गाँव की कथा के माध्यम से आधुनिक भारतीय जीवन की मूल्यहीनता को सहजता और निर्ममता से अनावृत करता है। शुरू से अन्त तक इतने निस्संग और सोद्देश्य व्यंग्य के साथ लिखा गया हिंदी का शायद यह पहला वृहत् उपन्यास है।

‘राग दरबारी’ का लेखन 1964 के अन्त में शुरू हुआ और अपने अन्तिम रूप में 1967 में समाप्त हुआ। 1968 में इसका प्रकाशन हुआ और 1969 में इस पर श्रीलाल शुक्ल को साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला। 1986 में एक दूरदर्शन-धारावाहिक के रूप में इसे लाखों दर्शकों की सराहना प्राप्त हुई।

राग दरबारी व्यंग्य-कथा नहीं है। इसमें श्रीलाल शुक्ल जी ने स्वतंत्रता के बाद के भारत के ग्रामीण जीवन की मूल्यहीनता को परत-दर-परत उघाड़ कर रख दिया है। राग दरबारी की कथा भूमि एक बड़े नगर से कुछ दूर बसे गाँव शिवपालगंज की है जहाँ की जिन्दगी प्रगति और विकास के समस्त नारों के बावजूद, निहित स्वार्थों और अनेक अवांछनीय तत्वों के आघातों के सामने घिसट रही है। शिवपालगंज की पंचायत, कॉलेज की प्रबन्ध समिति और कोआपरेटिव सोसाइटी के सूत्रधार वैद्यजी साक्षात वह राजनीतिक संस्कृति हैं जो प्रजातन्त्र और लोकहित के नाम पर हमारे चारों ओर फल फूल रही हैं।

पात्र[संपादित करें]

  • वैद्यजी: वह सभी गांवों की राजनीति के पीछे का मास्टरमाइंड है अपने वाक्य तैयार करने और उसके शब्दों को चुनने में बहुत स्पष्ट, वैद्यजी भी आधिकारिक तौर पर स्थानीय कॉलेज के प्रबंधक हैं।
  • रुप्पन बाबू: वैद्यजी के छोटे बेटे और कॉलेज के छात्रों के नेता, रुप्पन बाबू पिछले कई सालों से 10 वीं कक्षा में रहे हैं, उसी कॉलेज में, जहां उनके पिता प्रबंधक हैं रुप्पन सक्रिय रूप से सभी गांवों की राजनीति में शामिल है और गांव समुदाय द्वारा उनके शानदार गणिता के कारण उनका सम्मान किया जाता है। उपन्यास के अंत में, उसके व्यवहार में एक क्रमिक परिवर्तन देखा जा सकता है।
  • बद्री अग्रवाल: रुपपान बाबू के बड़े भाई बद्री अपने पिता की सहभागिता से दूर रहती है और खुद को शरीर-निर्माण के अभ्यास में व्यस्त रखती है और अपने आश्रय की देखभाल करती है।
  • रंगनाथ: इतिहास में एम.ए., रंगनाथ वैद्य जी के भतीजे हैं। वह लगभग 5-6 महीने के लिए छुट्टी पर शिवलगंज आ गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक शिक्षित व्यक्ति की आंखों के माध्यम से गांवों में दयनीय स्थिति को देखते हुए देखना चाहता है।
  • छोटा पहलवान: गांव की राजनीति में एक सक्रिय पार्टनर बद्री अग्रवाल के एक, गांव की राजनीति में एक सक्रिय सहभागिता है और वैद्यजी द्वारा बुलाए गए बैठकों में लगातार सहभागिता है।
  • प्रिंसिपल साहिब: जैसा कि नाम का अर्थ है, प्रिंसिपल साहिब, छांमल विद्यालय इंटर कॉलेज का प्राचार्य है। कॉलेज में कर्मचारियों के अन्य सदस्यों के साथ उनका संबंध साजिश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
  • जोगनाथ: स्थानीय गुंडे, लगभग हमेशा नशे में वह प्रत्येक 2 सिलेबल्स के बीच "एफ" ध्वनि डालने से एक अनूठी भाषा बोलती है
  • सनीचर : उनका असली नाम मंगलदास है, लेकिन लोग उसे सनीचर कहते हैं। वह वैद्ययाजी का नौकर है और बाद में वैद्यजी द्वारा राजनीतिक रणनीति के उपयोग के साथ गांव की कठपुतली प्रधान (नेता) बनाया गया था।
  • लंगड़ : वह अस्थायी आम आदमी का प्रतिनिधि है जो भ्रष्ट व्यवस्था के सामने झुकाता है, यहां तक ​​कि छोटी-सी चीजें भी करने के लिए।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कडियाँ[संपादित करें]

श्रीलाल शुक्ल का प्रकाशित पुस्तकें
उपन्यास: सूनी घाटी का सूरज · अज्ञातवास · रागदरबारी · आदमी का ज़हर · सीमाएँ टूटती हैं · मकान · पहला पड़ाव · विश्रामपुर का सन्त · अंगद का पाँव · यहाँ से वहाँ · उमरावनगर में कुछ दिन
कहानी संग्रह: यह घर मेरा नहीं है · सुरक्षा तथा अन्य कहानियां · इस उम्र में
व्यंग्य संग्रह: अंगद का पांव · यहां से वहां · मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनायें · उमरावनगर में कुछ दिन · कुछ जमीन पर कुछ हवा में · आओ बैठ लें कुछ देर
आलोचना: अज्ञेय: कुछ राग और कुछ रंग
विनिबन्ध: भगवती चरण वर्मा · अम्रतलाल नागर
बाल साहित्य: बढबर सिंह और उसके साथी