रस निष्पत्ति

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

काव्य से रस किस प्रकार उत्पन्न होता है, यह काव्यशास्त्र का शाश्वत प्रश्न रहा है। संस्कृत काव्यशास्त्र के आद्याचार्य भरत मुनि ने अपने विख्यात रससूत्र में रस निष्पत्ति पर विचार करते हुए लिखा-

विभावानुभाव-व्यभिचारी-संयोगाद् रसनिष्पत्तिः। (नाट्यशास्त्र)
अर्थात् विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। विभाव अनुभाव और संचारी भाव तो स्पष्ट था किंतु संयोग और निष्पत्ति के अर्थ को लेकर परवर्ती आचार्यों ने अनेक मत प्रकट किए। इनमें चार मत उल्लेखनीय हैं-

भट्ट लोल्लट ने निष्पत्ति का अर्थ उत्पत्तिवाद से लिया है तथा संयोग शब्द के तीन अर्थ निकाले हैं। स्थायी भाव के साथ उत्पाद्य- उत्पादक भाव संबंध, अनुभाव के साथ गम्य-गमक भाव संबंध, तथा संचारी भावों के साथ पोष्य-पोषक संबंध।

आचार्य शंकुक ने निष्पत्ति का अर्थ अनुमिति से लिया है तथा संयोग का अर्थ लिया है अनुमाप्य-अनुमापक भाव संबंध।

भट्ट नायक ने निष्पत्ति से भुक्ति का अर्थ ग्रहण किया है तथा संयोग का भाव के लिए भोज्य-भोजक संबंध माना है।

आचार्य अभिनवगुप्त ने निष्पत्ति का अर्थ अभिव्यक्तिवाद से लेकर संयोग का अर्थ व्यंग्य-व्यंजक भाव संबंध के रूप में लिया है।

अर्थात इन चारों आचार्यो ने अपने-अपने तरह से रस निष्पति के संदर्भ व्याख्या की। भट्ट लोल्लट ने कहा कि रस पाठक के ह्रदय में विद्यमान होता है और अनुकूल कारण से उत्पन्न होता है. जैसा परिवेश उसके अनुरूप स्थायी भाव जागृत होता है. किसी स्मशान में जाकर वहा व्यक्ति की अंत यात्रा देखकर रति भाव नहीं बल्कि वहा वियोग की भावना ही उत्पन होगी। शंकुक ने अनुमति की बात कही उनका कहना था कि, बाजीराव-मस्तानी' फिल्म में रणधीर और दीपिका को देखकर हम बाजीराव-मस्तानी को उसमें देखते हैं. अर्थात पाठक यहां पर अनुमान लगता है. भट्ट नायक जी अपने भुक्तिवाद में साधारणीकरण की बात कहीं और कहा कि जब कोई रचनाकार रचना लिखता है और पाठक उसको पढ़ता है तो उस रचना में आये पात्र के साथ तादात्म्य स्थापन करता है. वह जो चरित्र को जीवन है वह उसे अपना जीवन लगता है. अर्थात यहां भावों का साधारणीकरण होता है.

इन्हें भी देखें

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]