रमाशंकर यादव 'विद्रोही'

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रमाशंकर यादव 'विद्रोही' (3 दिसम्बर 1957 - 8 दिसंबर 2015) हिंदी के लोकप्रिय जनकवि हैं। प्रगतिशील परंपरा के इस कवि की रचनाओं का एकमात्र प्रकाशित संग्रह 'नई खेती' है। इसका प्रकाशन इनके जीवन के अंतिम दौर २०११ ई में हुआ। वे स्नातकोत्तर छात्र के रूप में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से जुड़े। यह जुड़ाव आजीवन बना रहा। इनका निधन ८ दिसंबर २०१५ को ५८ वर्ष की अवस्था में हो गया।

जीवन परिचय[संपादित करें]

उनका जन्म ३ दिसंबर, १९५७ को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के अंतर्गत आहिरी फिरोजपुर गांव में हुआ। उनकी आरंभिक शिक्षा गाँव में ही हुई। सुल्तानपुर में उन्होंने स्नातक किया। इसके बाद उन्होंने कमला नेहरू इंस्टीट्यूट में वकालत में दाखिला लिया। वे इसे पूरा नहीं कर सके। उन्होंने १९८० में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर में प्रवेश लिया। १९८३ में छात्र-आंदोलन के बाद उन्हें जेएनयू से निकाल दिया गया। उन्होंने १९८० में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर में प्रवेश लिया। १९८३ में छात्र-आंदोलन के बाद उन्हें जेएनयू से निकाल दिया गया। इसके बावजूद वे आजीवन जेएनयू में ही रहे। [1][2]

अंतिम समय में उन्होंने ऑक्युपाई यूजीसी] में जेएनयू के छात्रों के साथ हिस्सेदारी की। इसी दौरान ८ दिसंबर २०१५ को उनका निधन हो गया। [3]

साहित्य[संपादित करें]

विद्रोही मुख्यतः प्रगतिशील चेतना के कवि हैं। उनकी कविताएं लंबे समय तक अप्रकाशित और उनकी स्मृति में सुरक्षित रही। वे अपनी कविता सुनाने के अंदाज के कारण बहुत लोकप्रीय रहे। [4] २०११ ई॰ में इनकी रचनाओं का प्रकाशन 'नई खेती' शीर्षक संग्रह से हुआ।[5]कुछ प्रमुख पंक्तियाँ :

1.मुझे मसीहाई में कोई यकीन है ही नहीं 

मैं मानता ही नहीं कि कोई मुझसे बड़ा होगा।

2.मैं किसान हूँ

आसमान में धान बो रहा हूँ

कुछ लोग कह रहे हैं

कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता

मैं कहता हूँ पगले!

अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है

तो आसमान में धान भी जम सकता है

और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा

या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा

या आसमान में धान जमेगा।

3.न तो मैं सबल हूं,

न तो मैं निर्बल हूं,

मैं कवि हूं।

मैं ही अकबर हूं,

मैं ही बीरबल हूं।

4.तुम इसे भगवान के खिलाफ भांजोगे,

भंज जाएगी।

लेकिन तुम इसे इंसान के खिलाफ भांजोगे,

न,

नहीं भंजेगी।

कविता और लाठी में यही अंतर है।

विद्रोही की कविताओं में जिस तरह के बिंब देखने को मिलते हैं अन्यत्र हिंदी साहित्य में दुर्लभ है। जैसे विद्रोही की नानी मोहनजोदड़ो के तालाब में नहाती हैं, गाय को एवरेस्ट के खूंटे में बांधती हैं। विद्रोही हिंदी का अकेला कवि है जिसने 'निजी संपत्ति' के सारे मानकों को तोड़ फोड़कर फेंक दिया और जिंदगी भर मजलूमों की आवाज़ को कुव्वत दी।

क्षेत्रों में प्रभाव

नितिन पमनानी ने विद्रोही जी के जीवन संघर्ष पर आधारित एक वृत्तचित्र आई एम योर पोएट (मैं तुम्हारा कवि हूँ) हिंदी और अवधी में बनाया है।[6] मुंबई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में इस वृत्तचित्र ने अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धा श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र का गोल्डन कौंच पुरस्कार जीता।[7][8][9] विष्णु प्रभाकर ने विद्रोही की काव्य चेतना को ग़ालिब से भी आगे का बताया है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. आशियाने की तलाश में एक कवि : बीबीसी
  2. Poet Vidrohi, who lived on JNU campus for over 30 years, has died Dec 09, 2015
  3. "नहीं रहे जेएनयू के आदिविद्रोही कवि रमाशंकर यादव विद्रोही". आज तक. अभिगमन तिथि 12 दिसंबर 2015.
  4. Main Tumhara Kavi Hoon Trailer
  5. "नई खेती / रमाशंकर यादव 'विद्रोही'". कविता कोश. अभिगमन तिथि 12 दिसंबर 2015.
  6. I Am Your Poet - MAIN TUMHARA KAVI HOON_TRAILER यू-ट्यूब पर
  7. Documentary on poet ‘Vidrohi’ wins top honor at Miff 2012
  8. 'मैं तुम्हारा कवि हूँ' को गोल्डन कौंच
  9. विदेशी फिल्मों को एमआईआईएफ पुरस्कार