रतनपुर और रायपुर राज्य

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रतनपुर राज और रायपुर राज क्रमशः शिवनाथ के उत्तर तथा दक्षिण में स्थित थे। प्रत्येक राज में स्पष्ट और निश्चित रूप अठारह-अठारह ही गढ़ होते थे। गढ़ों की संख्या अठारह ही क्यों रखी गई थी इसका निश्चित् पता तो नहीं है किन्तु रतनपुर में सन् 1114 में प्राप्त एक उल्लेख के अनुसार चेदि के हैहय वंशी राजा कोकल्लदेव के अठारह पुत्र थे और उन्होंने अपने राज्य को अठारह हिस्सों में बाँट कर अपने पुत्रों को दिया था। सम्भवतः उसी वंश परंपरा की स्मृति बनाये रखने के लिये राज को अठारह गढ़ों में बाँटा जाता रहा हो।

प्रत्येक गढ़ में सात ताल्लुका और प्रत्येक ताल्लुका में कम से कम बारह गाँव होते थे। इस प्रकार प्रत्येक गढ़ में कम से कम चौरासी गाँव होना अनिवार्य था। ताल्लुका में गाँवों की संख्या चौरासी से अधिक तो हो सकती थी किन्तु चौरासी से कम कदापि नहीं हो सकती थी। चूँकि राज्य सूर्यवंशियों का था अतः सूर्य की साता किरणों तथा बारह राशियों को ध्यान में रख कर ताल्लुकों और गाँवों की संख्या क्रमशः सात और कम से कम बारह रखी गईं थी। इस प्रकार सर्वत्र सूर्य देवता का प्रताप झलकता था।

राज्यों के गढ़ व गाँव[संपादित करें]

नीचे ब्रिटिश शासन काल में छत्तीसगढ़ में पदस्थ सेटलमेंट आफीसर सी.यू. विल्स के द्वारा, चिशोलम के सैटिलमेंट रिपोर्ट तथा बिलासपुर गज़ेटियर के आधार पर बनाई गई एक तालिका दी जा रही है जिसमें गढ़ों में गाँवों की संख्या दर्शायी गई है।

रतनपुर और रायपुर राज्य
रतनपुर के गढ़ गाँव रायपुर के गढ़ गाँव
रतनपुर 360 रायपुर 640
मारो 354 पाटन 152
बिजयपुर 326 सिमगा 84
खरोद 145 सिंगारपुर अज्ञात
कोटागढ़ 84 लवन 252
नवागढ़ 84 अमेरा 84
सोंथी 84 दुर्ग 84
मल्हारगढ़ अज्ञात सारडा अज्ञात
मुंगेली सहित पँडरभट्ठा 324 सिरसा 84
सेमरिया 84 मोहदी 84
चाँपा 153 खल्लारी 84
बाफा 200 सिरपुर 84
छुरी 220 फिंगेश्वर 84
केण्डा 84 राजिम 84
मातिन 84 सिंगनगढ़ 84
उपरौरा 84 सुअरमाल 84
पेण्ड्रा 84 टेंगनागढ़ 84
कुरकुट्टी 700 अकल वारा 84

प्रशासनिक व्यवस्था[संपादित करें]

राजा पूरे अठारह गढ़ों का स्वामी होता था। पूरा राज उसके अधीन रहता था। राजा के सलाहकार उसके मंत्री और राजपुरोहित होते थे। राजवंश के लोगों को तथा राजा के सम्बन्धी लोगों को गढ़ के शासक रूप में नियुक्त किया जाता था। ये सभी 'गढ़पति' (यद्यपि अंग्रेजों ने इन्हें दीवान लिखा है) कहलाते थे और राजा के अधीन होते थे। कालान्तर में ये 'जमींदार' कहलाने लगे। वास्तव में ये अपने अपने गढ़ के राजा होते थे। इनके अधीन सात-सात 'ताल्लुकेदार' या 'तालुद्दार' होते थे (जन साधारण की भाषा में ये 'दाऊ' कहलाते थे) जो कि अपने अपने ताल्लुके के शासक होते थे। हर ताल्लुकेदार के अधीन गाँवों के स्वामी होते थे जो 'गउँटिया' कहलाते थे।

यद्यपि उपरोक्त व्यस्था राजतंत्रीय थी तो भी यह इतनी लचीली थी कि उसे लोकतंत्र का राजतंत्रीय रूप कहना अनुचित नहीं होगा। गाँव का गउँटिया, ताल्लुका का दाऊ, गढ़ का जमींदार केवल वंशानुगत शासक ही नहीं होते थे वरन वे समाज के मार्गदर्शक नेता भी होते थे। जहाँ शान्ति काल में ये प्रजा से कर वसूल वरते थे वहीं युद्ध के समय उनकी रक्षा करने के लिये प्राणोत्सर्ग करने से भी नहीं चूकते थे।

सामान्य रूप से ऊँचे अधिकारी नीचे वाले अधिकारियों के काम और प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं करते थे। गाँव के प्रकरणों का न्याय 'पचायतों', जिसका सरपंच गउँटिया हुआ करता था, में ही कर लिया जाता था। शासक धार्मिक तथा उदार प्रवृति के होते थे। छत्तीसगढ़ के अनेक स्थानों में प्राप्त ताम्रपत्रों में उनके द्वारा दिये गए दान का उल्लेख मिलता है। रायपुर का पुराना डी.के. अस्पताल दाउ कल्याण सिंह की उदारता का आधुनिक उदाहरण है।

मध्ययुगीन छत्तीसगढ़ सुखी, सम्पन्न और शेष भारत से अलग पहचान वाला क्षेत्र था। तभी तो अंग्रेजो को कहना पड़ा कि "छत्तीसगढ़ की अपनी अलग विशेषता है। उसका राजनैतिक इतिहास स्वतंत्र रूप से विकसित हुआ है।"

इन्हें भी देखें[संपादित करें]