रघुवीर सिंह (महाराज कुमार)

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डॉ रघुवीर सिंह (23 फरवरी, 1908 - 13 फरवरी, 1991 ) कुशल चित्रकार, वास्तुशास्त्री, प्रशासक, सैन्य अधिकारी, प्रबुद्ध सांसद, समर्थ इतिहासकार और सुयोग्य हिन्दी साहित्यकार थे।

परिचय[संपादित करें]

मध्यभारत में सीतामऊ राज्य के पूर्व महाराजा सर रामसिंह के ज्येष्ठ पुत्र महाराजकुमार डा. रघुबीरसिंह का जन्म 23 फरवरी, 1908 ई0 को सीतामऊ रियासत की आपातकालीन राजधानी गाँव लदूना के राजमहल में हुआ था। वर्तमान में यह स्थान मध्य प्रदेश के मन्दसौर जिले में स्थित है। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। मिडिल की पढ़ाई के लिए उन्होंने सीतामऊ में स्थित श्रीराम हाईस्कूल में प्रवेश लिया। इसके पश्चात 1920 ई0 में डेली कालेज, इन्दौर में प्रवेश लिया किन्तु कुछ समय में अस्वस्थता के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ा। हाईस्कूल की परीक्षा मुंबई विश्वविद्यालय, बडोदरा से 1924 ई0 में तथा इन्टरमीडिएट की परीक्षा 1926 ई0 में प्रायवेट विद्यार्थी के रूप में पास की। तदनन्तर इन्होंने 2 वर्ष तक श्रीराम हाईस्कूल, सीतामऊ में अध्यापन का कार्य भी किया। 1928 ई0 में बी.ए. की परीक्षा शिक्षक-विद्यार्थी के रूप में पास की। इसके पश्चात होलकर कालेज, इन्दौर में अध्ययन किया और 1930 ई0 में एल.एल.बी. की उपाधि आगरा विश्वविद्यालय से प्राप्त की।

इसके बाद उन्होने श्रीराम हाईस्कूल में अवैतनिक शिक्षक के रूप में 3 वर्ष तक अध्यापन किया। आगरा विश्वविद्यालय से ही 1933 ई0 में इतिहास में शिक्षक विद्यार्थी के रूप में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद आगरा विश्वविद्यालय से 1936 ई में प्रसिद्ध इतिहासकार डा सर जदुनाथ सरकार के निर्देशन में शोध कार्य ‘मालवा इन ट्रांजिशन’ इतिहास विषय पर उनको डी.लिट्. की उपाधि प्रदान की गई। आगरा विश्वविद्यालय से डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त करने वाले वह पहले विद्यार्थी थे।

छात्र जीवन में रघुबीरसिंह की रुचियाँ भी अद्भुत थी। फोटोग्राफी तथा खेल से उनका गहरा लगाव था। वे क्रिकेट के अच्छे खिलाड़ी थे। चित्रकला में भी उनकी रुचि थी। इसी रुचि के कारण उन्होंने मुम्बई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से डिप्लोमा भी किया। उन्होंने 1926 से 1928 ई0 के मध्य अनेक चित्रों का चित्रांकन किया। समस्त चित्रों का विषय प्रकृति या इतिहास से संबंधित है।

रघुबीरसिंह किशोरावस्था में ही शिक्षा ग्रहण करते हुए हिन्दी और अंग्रेजी में हस्तलिखित पत्रिका ‘किरण’ निकालते थे। यही पत्रिका उनकी वैचारिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनी। 1926 ई0 से वे हिन्दी भाषा की सरस्वती, माधुरी, चाँद, सुधा, क्षत्रिय तथा बालसखा जैसी सुप्रसिद्ध पत्रिकाओं में नियमित रूप से लिखने लगे।

डॉ रघुबीरसिंह के विचार प्रारम्भ से ही उदारवादी थे। उन्हें मूर्त रूप देने के लिए सीतामऊ राज्य के लिए नवीन संविधान का निर्माण किया जिसे दिसम्बर 1938 ई0 में लागू किया गया। जनता की राज्य शासन में भागीदारी के लिए इसमें राज्य परिषद की व्यवस्था की गई। साथ ही इसमें शासन समिति का भी प्रवधान था। इसमें स्वयं डा0 रघुबीरसिंह दिसम्बर 1938 से अगस्त 1941 ई0 तथा जुलाई 1945 से जून 1948 ई0 तक शासन समिति के अध्यक्ष पद पर रहे। इसी प्रकार राज्य परिषद के अध्यक्ष पद पर मई 1939 से अगस्त 1941 ई0 तथा जुलाई 1945 से जून 1946 ई0 तक रहे। साथ ही 1932 से 1941 ई0 तक सीतामऊ रियासत की उच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी रहे। इस दौरान राज्य की प्रशासनिक गतिविधियों के साथ ही प्रायमरी शिक्षा, स्वास्थ एवं ग्रामीण विकास की गतिविधियों में सलंग्न रहे।

सन् 1939 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध हुआ तब ब्रिटिश सरकार ने देशी रियासतों से सहायता की अपील की। सेना, घोड़े एवं हथियार के अलावा राजकीय परिवार, जागीरदार, जमींदार के युवा लोगों से ब्रिटिश सेना में भाग लेने का दबाव डाला गया। तब राजा रामसिंह ने अपने ज्येष्ठ पुत्र रघुबीरसिंह को ब्रिटिश सेना में भर्ती होने के लिए भेजा। डा0 रघुबीरसिंह ने ओ.टी.सी. (ऑफिसर ट्रेनिंग कालेज) इन्दौर में प्रवेश लिया व इण्डियन कोर के लिए सैन्य प्रशिक्षण 1 अक्टूबर 1940 से 28 फरवरी 1941 ई0 तक प्राप्त किया। इसके पश्चात डा0 रघुबीरसिंह 1 अगस्त 1941 ई0 को रावलपिण्डी में इण्डियन आब्जर्वर कोर के केप्टन पद पर नियुक्त हुए। उसके बाद 12 सितम्बर 1941 ई0 को पश्चिमोत्तर सीमा पर स्थित क्वेटा में स्थायी रूप से इमरजेंसी कमीशण्ड ऑफिसर के रूप में नियुक्ति की गई। इसके बाद 24 अगस्त 1942 ई0 से 10 सितम्बर 1942 ई0 तक पेशावर में ऑफिसर प्रशिक्षण प्राप्त किया तत्पश्चात पेशावर व नौशेरा में नियुक्ति हुई। इसी वर्ष अक्टूबर को डा0 रघुबीरसिंह मद्रास प्रेसीडेन्सी से अतिसंवेदनशील क्षेत्र सोपनूर व कालीकट में प्रेक्षक के रूप में विशेष तौर पर भेजे गये। यहाँ पर वे 18 अक्टूबर 1942 से 10 फरवरी 1943 तक बने रहे। तत्पश्चात तीन सप्ताह के लिए विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए जूहू (बम्बई) भेजे गये। इस विशेष प्रशिक्षण को प्राप्त करने के बाद मेजर के रूप में पदोन्नत होकर मद्रास प्रेसीडेन्सी भेजे गये। यहाँ पर उनकी प्रथम नियुक्ति पल्लावराम व इसके बाद वाल्टेयर में सेना के रूप में अन्तिम समय तक बने रहे। किन्तु अप्रेल 1945 ई0 को सेना के कमीशन को त्यागपत्र देकर चले आये।

डा0 रघुबीरसिंह विद्यार्थी जीवन से ही राजनैतिक गतिविधियों में भाग लेते रहे थे। वे चेम्बर ऑफ प्रिन्सेस के सम्मेलनों एवं कार्यवाहियों में सीतामऊ रियासत के प्रतिनिधि के रूप में सक्रिय भाग लेते थे। ब्रिटिश अधिकारियों एवं राजनैतिक प्रतिनिधियों के सीतामऊ राज्य से संबंध तथा समय-समय पर उनके दबाव से वे ब्रिटिश सत्ता के प्रति मन ही मन खिन्न हो गये थे। उन्होंने भारतीय देशी रियासतों की समस्याओं पर गम्भीर अध्ययन कर इस विषय पर एक ग्रंथ ”इण्डियन स्टेट्स एण्ड द न्यू रिजीम“ लिखी, जो 1938 में प्रकाशित हुई। यह पुस्तक भारतीय विश्वविद्यालयों में पाठ्यपुस्तक के रूप में स्वीकृत की गई थी। इधर निरन्तर राजनैतिक गतिविधियों में दिन प्रतिदिन नये-नये बदलाव आ रहे थे। मालवा के छोटे-छोटे राज्यों एवं उसके आस-पास के भू-भागों को मिलाकर मालवा नामक प्रान्त का निर्माण 1945-47 में किया जा रहा था, जिसमें डा0 रघुबीरसिंह को 1946 ई0 में गठित सेन्ट्रल इण्डिया रीजन कमेटी में एक सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया। तब सेन्ट्रल इण्डिया एजेन्सी के अधीनस्थ ग्वालियर-इन्दौर व अन्य रियासतों को मिलाकर ‘मध्यभारत’ नाम से नया प्रान्त 1948 में बनाया गया।

लेखन एवं हिन्दीसेवा[संपादित करें]

डा0 रघुबीरसिंह एक प्रतिभाशाली लेखक थे। वे स्कूल के दिनों से ही हस्तलिखित पत्रिकाओं में लिखने लगे थे। 1927 ई0 से ही पत्र-पत्रिकाओं में निबंध, आलोचनात्मक समीक्षा, छोटी कहानी, ऐतिहासिक विवरण आदि लिखना आरम्भ कर दिया था। तब इन्हें हिन्दी की विशिष्ट पत्रिकाओं में प्रकाशित किया जाता था। राज्य का सामान्य काम निबटाते हुए भी उनमें राष्ट्रीय दृष्टि, राष्ट्रीय कर्तव्यबोध का जागरण हो चुका था। सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘चाँद’ के नवम्बर 1928 ई0 के ऐतिहासिक ‘फांसी अंक’ में प्रकाशित उनका लेख "फ्रांस की राज्य क्रान्ति के कुछ रक्तरंजित पृष्ठ" उनकी उसी राजनैतिक विचारधारा का प्रतिबिम्ब है। इस अंक के सम्पादक आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने महाराजकुमार डा0 रघुबीरसिंह के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा था - ‘आपकी कलम विद्या व्यसनी ही नहीं बल्कि गरीबों का मित्र क्रान्ति का समर्थक और जन समाज का एक नागरिक प्रमाणित करती है।’ चाँद का यह अंक ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया था। इस अंक में अनेक सुप्रसिद्ध लेखकों ने नकलीनाम से लेख लिखे थे, किन्तु सीतामऊ राज्य के युवा राजकुमार ने अपने ही नाम से निर्भीक होकर लेख लिखा था। जिसके फलस्वरूप वे ब्रिटिश सरकार की निगाह में आ गये थे।

भारत द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद डा0 रघुबीरसिंह का पैतृक राज्य सीतामऊ भारतीय संघ में विलय हो गया था। अब उनके लिए किसी प्रकार का बधंन नहीं था। अतः उन्होंने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रण कर राजनीति में सक्रिय होने के लिए खादी धारण कर ली। डा0 रघुबीरसिंह साहित्य एवं इतिहास के क्षेत्र में उस समय तक प्रसिद्ध हो चुके थे। अतः उन्हें तत्कालीन मध्यभारत से 13 मई 1952 ई0 को राज्यसभा का सदस्य नामांकित किया गया। वे इस पद पर 1962 ई0 तक बने रहे।

वे हिन्दी के साथ ही अंग्रेजी, मराठी तथा फारसी के भी ज्ञाता थे साथ ही अपनी क्षेत्रीय मालवी बोली के अच्छे प्रवक्ता थे। डा0 रघुबीरसिंह ने भारतीय इतिहास के शोधपरक प्रबंध एवं लेख ही नहीं लिखे वरन हिन्दी साहित्य को भी आपकी देन अमूल्य है। हिन्दी गद्य काव्य लेखन की प्रेरणा आपको रायकृष्णदास से मिली। प्रेमचंद के उपन्यासों को भी आपने पढ़ा था तथा उनसे पत्र व्यवहार भी होता था।डा0 रघुबीरसिंह ने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं पर अनेक ग्रंथ लिखे। ‘बिखरे फूल’ 1933 ई0 में प्रकाशित हुआ, इसमें 14 गद्य काव्यों का संग्रह है। ‘जीवनधूलि’ 1947 ई0 में प्रकाशित हुआ जिसमें 18 गद्य काव्यों का संग्रह है। ‘सप्तदीप’ 1938 ई0 में प्रकाशित हुआ। इसमें 6 निबंध एवं एक कहानी संग्रहीत है। ‘शेश स्मृतियाँ’ का प्रकाशन 1937 ई0 में हुआ। इस ग्रंथ का गुजराती और मलयालम में अनुवाद हो चुका है। इसमें ताज, एक स्वप्न की शेष स्मृतियाँ, अवशेष, तीन कब्रें व उजड़ा स्वर्ग आदि पाँच निबंध संग्रह है। शेष स्मृतियाँ डा0 रघुबीरसिंह की कृतियों में सबसे अधिक प्रसिद्ध निबंध संग्रह है।

उनके शोध ग्रंथ ‘मालवा इन ट्रांजिशन’ के हिन्दी संस्करण ‘मालवा में युगान्तर’ पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद द्वारा 1947 ई0 को ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ प्रदान किया गया। एक अन्य कृति ‘पूर्व आधुनिक राजस्थान’ पर उत्तरप्रदेश सरकार ने फरवरी 1955 ई0 में विशेष पुरस्कार प्रदान किया। हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद ने सितम्बर 1975 ई0 में 'साहित्य वाचस्पति' की मानद उपाधि से सम्मानित किया। उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ ने डा0 रघुबीरसिंह को आजीवन साहित्यक सेवा के लिए 1978 ई0 में विशेष रूप से सम्मानित किया था।

इतिहास लेखन[संपादित करें]

डा0 रघुबीरसिंह एक महान इतिहासवेत्ता भी थे। मध्यकालीन व उत्तर मध्यकालीन भारत के इतिहास में उनका विशेष योगदान ही नहीं रहा अपितु भावी शोधकर्त्ताओं के लिए वे आधार स्तम्भ एवं प्रेरणादायक भी रहे हैं। राजस्थान के इतिहास को समग्र रूप से देखने का सर्वप्रथम एवं सफल प्रयास डा0 रघुबीरसिंह ने ही किया। डा0 रघुबीरसिंह ने राजस्थान इतिहास विषय पर अनेक ग्रंथ लिखे परन्तु उनकी महत्वपूर्ण कृति, 'पूर्व आधुनिक राजस्थान' है। रघुबीरसिंह ने 'दुर्गादास की जीवनी' लिखी जिसे जीवनी के बजाय समकालीन भारतीय इतिहास कहना अधिक उपयुक्त होगा। मुगल इतिहास के लिए यह ग्रंथ बहुत उपयोगी है। इसी प्रकार महाराणा प्रताप पर लिखा गया ग्रंथ की प्रमाणिकता पर कोई उंगली नहीं उठा सकता।

'रतलाम का प्रथम राज्य', 'मालवा इन ट्रांजिशन' तथा इसका हिन्दी अनुवाद 'मालवा में युगान्तर' डा0 रघुबीरसिंह के ऐसे ग्रंथ हैं जिनका सीधा मालवा के इतिहास से संबंध है किन्तु फिर भी इन ग्रंथों में राजस्थानी शासकों की गतिविधियों, उनका मालवा से संबंध, मुगल राजपूत संबंध, राजस्थानी शासकों की मालवा नीति, उनका मुगल तथा मराठों से संबंध मालवा में मराठों का सत्यनिष्ठ सुन्दर और सम्यक इतिहास लिखकर मील का पत्थर गाड़ दिया।नवीनतम खोजों पर आधारित 'पूर्व मध्यकालीन भारत' डा0 रघुबीरसिंह द्वारा लिखित ऐसा ग्रंथ है जिसमें दिल्ली की तत्कालीन मुसलमानी सल्तनत के उत्थान, विकास और पतन का सर्वथा नये ढंग से लिखा गया क्रमबद्ध आलोचनात्मक इतिहास है। 'मालवा के महान विद्रोहकालीन अभिलेख' डा0 रघुबीरसिंह द्वारा सम्पादित ऐसा ग्रंथ है जो 1857 के महान विद्रोह के समय सीतामऊ राज्य का वकील इन्दौर स्थित एजेन्ट टू दि गवर्नर जनरल के यहाँ नियुक्त था उसके द्वारा भेजे गये पत्र 1857-58 ई0 की घटनाओं पर प्रकाश डालते है।

ऐतिहासिक ग्रंथों की रचना के साथ ही ऐतिहासिक आधार स्त्रोतों का व्यापक स्तर पर संकलन, सम्पादन एवं अनुवाद करने का कार्य भी डा0 रघुबीरसिंह ने किया है। उनका इस क्षेत्र में योगदान मौलिक ग्रंथों के प्रणयन से कम नहीं है। उनके सम्पादित ग्रंथों में शाहजहाँनामा, जहाँगीरनामा, फुतूहात-इ-आलमगीरी, हिस्ट्री ऑफ़ जयपुर, रतनरासो और वचनिका आदि अनेक ग्रंथ, 'ए शार्ट हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब' का हिन्दी अनुवाद ‘औरंगजेब’ एवं विभिन्न शोध पत्रों अकबरकालीन विभिन्न केशवदास, रायसेन का शासक सलहदी तंवर, मध्यकालीन मन्दसौर में हुई भारतीय इतिहास की कुछ निर्णायक घटनाएँ, मराठा शासकों, सेनानायकों और अधिकारियों के हिन्दी पत्र-सनदें, रामपुरा क्षेत्र वहाँ का चन्द्रावत राजवंश, झाबुआ राज्य और बोलिया (बुले) बखर, होलकर का नमक हराम बख्शी भवानीशंकर, पेशवा राज्य की सम्पर्क भाषा हिन्दी, मुहम्मद तुगलक का राजधानी परिवर्तन, धरमाट का युद्ध और महेशदास कृत बिन्हैरासो, अहमदनगर का किला और उसकी विभिन्न भूमिकाएँ, भारतवर्ष के इतिहास की कुछ गलतियाँ, कीर्तिस्तम्भ आदि विभिन्न शोध पत्रों और ग्रंथों से डा0 रघुबीरसिंह ने लुप्त कड़ियों को जोड़ा और नूतन जानकारी प्रस्तुत की।

सन्दर्भ[संपादित करें]

उपरोक्त विचार मुख्यतः डा. रघुबीरसिंह से लिये गये हैं।