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यान्सनवाद

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फ़्रेंच बारोक चित्रकार और जैन्सेनिस्ट फ़िलिप द शैम्पेन की पेंटिंग द कन्वर्ज़न ऑफ़ सेंट ऑगस्टीन (लगभग 1650)

यान्सनवाद (अंग्रेज़ी: Jansenism) 17वीं और 18वीं सदी में कैथोलिक चर्च के भीतर एक ईसाई धार्मिक आंदोलन था।[1] यह डच बिशप कॉर्नेलियस यान्सन की रचनाओं, खासकर वर्ष 1640 में प्रकाशित उनकी किताब ऑगस्टिनस पर आधारित था। इसमें हिप्पो के ऑगस्टीन के सिद्धांतों का सहारा लेते हुए, मुक्ति के लिए ईश्वरीय कृपा की ज़रूरत और इंसानी इच्छा-शक्ति की सीमित भूमिका पर ज़ोर दिया गया था। यह मुख्य रूप से फ्रांस और नीदरलैंड में एक कठोरतावादी प्रतिक्रिया के रूप में उभरा। यान्सनवाद आंदोलन मुख्य रूप से सोसाइटी ऑफ जीसस से जुड़ी नैतिक और धार्मिक शिथिलता के विरुद्ध था।

यान्सनवाद ने विशेष रूप से फ्रांस में ज़बरदस्त बहसें छेड़ दी। यहाँ यान्सन के विरोधी धर्मशास्त्रियों ने पाँच सिद्धांतों (जिनमें सीमित प्रायश्चित और अनिवार्य कृपा के सिद्धांत शामिल थे) को धर्म-विरोधी घोषित कर दिया था।[2]

वर्ष 1653 में, पोप इनोसेंट दसवें ने प्रेरितों से संबंधित संविधान कम ओकासियोन (Cum occasione) में यान्सनवाद के पाँच सिद्धांतों की निंदा की, जिससे यान्सनवाद आधिकारिक तौर पर धर्म-विरोधी घोषित हो गया। यान्सनवादी फ्रांसीसी राजतंत्र के विरोध से जुड़ गए। इस वजह से वे राजा लुई चौदहवें और पोप क्लेमेंट ग्यारहवें के निशाने पर आ गए, जिन्होंने उनके खिलाफ़ कड़े कदम उठाए। वर्ष 1708 में यान्सनवादी विचारधारा के केंद्र पोर्ट-रॉयल ऐबी को बंद कर दिया गया। वर्ष 1713 में क्लेमेंट ग्यारहवें ने यूनिजेनिटस नामक आदेश-पत्र जारी किया, जिसमें यान्सनवादी शिक्षाओं की और अधिक निंदा की गई थी।[3]

परिभाषा

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यान्सनवाद को कुछ इतिहासकारों ने एक ऐतिहासिक पहेली कहा तथा दूसरों ने इसे बदलते हालात के हिसाब से खुद को ढालना कहा। यान्सनवाद का विकास 19वीं सदी तक कैथोलिक चर्च के साथ-साथ हुआ। यान्सनवाद शब्द को उन लोगों ने ही नकार दिया जिन्हें यान्सनवादी कहा जाता था। उन्होंने हमेशा कैथोलिक चर्च के साथ अपनी एकता पर ज़ोर दिया था। यान्सनवाद के समकालीन अध्ययनों के प्रस्तोता एबॉट विक्टर कैरिएर इस बारे में यह कहते हैं।

शायद यान्सनवाद से ज़्यादा पेचीदा कोई और सवाल नहीं है। शुरू से ही जिन लोगों को सही मायनों में इसका असली प्रतिनिधि माना जाता था, उनमें से कई लोगों का कहना था कि इसका कोई अस्तित्व ही नहीं है [...]। इसके अलावा चर्च की आलोचनाओं से बचने के लिए और कुछ आलोचकों को शांत करने तथा नए समर्थक बनाने के लिए, इसने हालात के हिसाब से अपने बुनियादी सिद्धांतों को कमज़ोर किया या उनमें बदलाव भी किए। इसलिए, इस पर अनगिनत रचनाएँ होने के बावजूद, जेनसेनिज़्म का पूरा इतिहास आज भी लिखा जाना बाकी है, क्योंकि दो सदियों से इस पर बहस का ही बोलबाला रहा है।[4]


इन्हें भी देखें

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सन्दर्भ

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  1. ↑ मेलिसा, पेट्रूज़ेलो. "Jansenism : Roman Catholic religious movement" [यान्सनवाद : रोमन कैथोलिक धार्मिक आंदोलन]. ब्रिटानिका (अंग्रेज़ी भाषा में). अभिगमन तिथि: 11 सितम्बर 2026.
  2. ↑ विंसेंट, कारौ. "Le jansénisme" [यान्सनवाद]. सोसाइटी डेस एमिस डे पोर्ट-रॉयल (फ़्रेंच भाषा में). मूल से से 11 नवंबर 2008 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 11 सितम्बर 2026.
  3. ↑ "Unigenitus : bull by Clement XI" [यूनिजेनिटस : क्लेमेंट ग्यारहवें का आदेश-पत्र]. ब्रिटानिका (अंग्रेज़ी भाषा में). अभिगमन तिथि: 11 सितम्बर 2026.
  4. ↑ विक्टर, कैरियरे (1934). Introduction aux études d'histoire ecclésiastique locale : Questions d'histoire générale à développer dans la cadre régional ou diocésain [स्थानीय चर्च के इतिहास के अध्ययन का परिचय : क्षेत्रीय या (धर्मप्रांत) के दायरे में विकसित किए जाने वाले सामान्य ऐतिहासिक सवाल] (फ़्रेंच भाषा में). लेटौज़ी और एने. p. 513. अभिगमन तिथि: 11 सितम्बर 2026.

बाहरी कड़ियाँ

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  • ब्लेज़ पास्कल की 'प्रोविंशियल लेटर्स' (1656)