यशोवर्मन्

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यशोवर्मन नाम से निम्नलिखित व्यक्ति प्रसिद्ध हैं :

यशोवर्मन्‌ (१)[संपादित करें]

यशोवर्मन का राज्यकाल ७०० से ७४० ई० के बीच में रखा जा सकता है। कन्नौज उसकी राजधानी थी। कान्यकुब्ज (कन्नौज) पर इसके पहले हर्ष का शासन था जो बिना उत्तराधिकारी छोड़े ही मर गये जिससे शक्ति का 'निर्वात' पैदा हुआ।

यशोवर्मन् या लक्षवर्मन[संपादित करें]

मध्यकालीन चंदेल वंश के हर्ष का पुत्र यशोवर्मन् लक्षवर्मन्‌ के नाम से भी प्रसिद्ध है। उसका राज्यकाल दसवी शताब्दी का द्वितीय चरण था। प्रतिहारों की प्रभुता को बिना छोड़े ही उसने स्वतंत्र शासक की भाँति कार्य किया। चंदेलों के गौरव का वास्तविक आरंभ उसी ने किया और उन्हें उत्तरी भारत की प्रमुख शक्तियों में से एक के रूप में प्रतिष्ठापित किया।

उसका सबसे उल्लेखनीय कार्य कालंजर की विजय थी। कालंजर पर अधिकार के लिये प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों में संघर्ष चल रहा था। यशोवर्मन्‌ ने इसे संभवत: राष्ट्रकूटों के मित्र कलचुरि लोगों से अपने अधिपति प्रतिहारों के लिये छीना हो किंतु उसपर अपना ही अधिकार स्थापित किया हो। धंग के खजुराहों अभिलेख में गौड, खष, कोशल, कश्मीर, मिथिला, मालव, चेदि, कुरू और गुर्जरों के विरूद्ध उसकी सफलता का उल्लेख है। उल्लेख की आलंकारिक भाषा के कारण इन विजयों की ऐतिहासिकता में कुछ संदेह होता है। खजुराहों अभिलेख में उल्लेख है कि अपने अभियानों में उसने यमुना और गंगा को केलिसर बना लिया था। देवपाल, जिससे उसे एक बहुमूल्य विष्णुप्रतिमा प्राप्त हुई थी, सम्भवत: उसका प्रतिहार वंशी अधिपति ही था। कुरू प्रदेश प्रतिहारों के अधीन होने के कारण उसपर यशोवर्मन्‌ का आक्रमण प्रतिहारों के विरूद्ध रहा होगा। उसने गौड़ पर भी आक्रमण किया। इसी प्रसंग में उसने मिथिला पर विजय प्राप्त की जो इस समय संभवत: एक स्वतंत्र छोटा राज्य बन गया था। उसने कलचुरी नरेश को भी पराजित किया और अपने राज्य की दक्षिणी सीमा को चेदि राज्य की सीमा तक पहुँचा दिया। उसने अपने राज्य की कोशल को भी पराजित किया था। इसी प्रकार उसने अनने राज्य की सीमा मालवा तक पहुँचाई और परमारों की शक्ति को आगे बढ़ने से रोका।

यशोवर्मन् ने एक तड़ाग बनवाया था। विष्णु की प्रतिमा के लिये जो मंदिर उसने बनवाया था वह खजुराहों का चतुर्भुज मंदिर की है। विष्णु के साथ ही उसने शिव और सूर्य के प्रति भी आदर व्यक्त किया है।

चंदेल वेश में एक द्वितीय यशेवर्मन्‌ भी हुआ। वह मदनवर्मन्‌ का पुत्र ओर परकर्दिदेव का पिता था। मदनवर्मन्‌ और परमर्दिदेव के राज्यकाल के बीच (११३३-११६४ ई०) उसने कुछ समय तक राज्य किया। उसका शासनकाल महत्वपूर्ण नहीं हैं।

परमाल वर्मन्‌ के बाद उसका पुत्र यशोवर्मन्‌ ११३३ ई० में सिंहासन पर बैठा। उससे पूर्व ही गुजरात के चोलुक्यों के साथ संघर्ष के फलस्वरूप परमारों की शक्ति को गहरी क्षति पहुँची थी। यशोवर्मन्‌ में उन गुणों का अभाव था जो ऐसी स्थिति में अपेक्षित होते हैं। इसी कारण परमारों को शक्ति का और भी अधिक ह्रास हुआ।

मालवा चालुक्य साम्राज्य में मिला लिया गया। संभवत: बाद में यशोंवर्मन्‌ को सामंत के रूप में मालवा के किसी भाग पर राज्य करने का अधिकार मिल गया था।

अन्य[संपादित करें]

पूर्वमध्यकाल में यशोवर्मन्‌ नाम के शासक कुछ दूसरे राजवंशों में भी हुए थे। गुहिलों में शक्तिवर्मन्‌ के पाँचवें पुत्र कीर्तिवर्मन्‌ का भी नाम यशोवर्मन्‌ था। कल्याण के उत्तरकालीन चालुक्य नरेश तैल द्वितीय के द्वितीय पुत्र दश्वर्मन्‌ का भी नाम यशोवर्मन्‌ था। अपने पिता के राज्यकाल में वह प्रांतपाल था। संभवत: उसकी मृत्यु अपने ज्येष्ठ भाई सत्याश्रय के राज्यकाल ही में हो गई थी। सत्याश्रय की मृत्यु के बाद सिंहासन दशवर्मन्‌ या यशोंवर्मन्‌ के ही पुत्रों को प्राप्त हुआ।

भारतेतर देशों में[संपादित करें]

यशोवर्मन्‌ नाम भारत के बाहर भी प्रसिद्ध हुआ। प्राचीन कंबुज (कंबोडिया) में यशोवर्मन्‌ नाम के दो नरेश हुए:

इन्हें भी देखें[संपादित करें]