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मौलाना मज़हरुल हक़

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मौलाना मज़हरूल हक़
जन्म22 दिसम्बर 1887
मृत्यु2 जनवरी 1930(1930-01-02) (उम्र 43 वर्ष)
पेशाधर्मशास्त्री, शिक्षाविद, राजनीतिक कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी, वकील
राजनीतिक दलभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

मौलाना मज़हरूल हक़ (22 दिसम्बर 1886 – 2 जनवरी 1930), को पटना जिले के मानेर थाना के ब्रह्मपुर  में हुआ था। एक शिक्षाविद्, एक वकील, स्वतंत्रता कार्यकर्ता और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के एक स्वतंत्रता सेनानी थे। अपने पूरे कार्यकाल में मज़हरुल हक़ हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक रहे। भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने अपनी पुस्तक, इंडिया डिवाइडेड, उन्हें समर्पित की और उन्हें "एक धर्मनिष्ठ मुसलमान और भावुक देशभक्त" बताया। [1]

1981 में भारतीय डाक सेवा द्वारा उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया गया और 1998 में उनकी स्मृति में पटना में मौलाना मज़हरुल हक़ अरबी और फ़ारसी विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। [2] [3] [4] [5]

उन्होंने गांव में एक घर का निर्माण किया और इसका नाम ‘आशियाना’ रखा। 1927 में पंडित मोतीलाल नेहरु, 1928 में श्रीमती सरोजनी देवी, पं मदन मोहन मालवीय, के.एफ. नरिमन, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने फरीदपुर में इनके घर ‘आशानिया’ का दौरा किया। वह शेख अमुदुल्ला के तीन बच्चों में एकमात्र बेटे थे| उनकी बहनों के नाम में गफरुनीषा और कानीज फातमा थे। उनके पिता एक अमीर जमीनदार थे।

1891 के बाद का जीवन

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1891 में बैरिस्टर बनकर भारत लौटने पर वे न्यायिक सेवा में शामिल हो गया। 1896 में उसने वकालत शुरू की। 1906 तक उन्होंने छपरा छोड़कर पटना में वकालत शुरू कर दी थी और उसी वर्ष बिहार कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष चुना गया। [6]

1910 और 1911 में वे इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ऑफ़ इंडिया के सदस्य चुना गया। 1911 में मौलाना की अध्यक्षता में एक तीसरा "बिहार राज्य सम्मेलन" आयोजित किया गया जिसमें अलग बिहार राज्य की माँग की गई। [7]

उन्होंने 1916 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग की संधि में सक्रिय भूमिका निभाई। वे 1916 में एनी बेसेंट द्वारा शुरू किए गए होमरूल आंदोलन में शामिल हुए और 1917 में चंपारण सत्याग्रह में सक्रिय रूप से भाग लिया। महात्मा गांधी के अतिथि पटना में उनके घर "सिकंदर मंजिल" पर आए। [8]

1919 में वे खिलाफत आंदोलन में सक्रिय रहे और 1920 में गांधीजी के आह्वान पर असहयोग आंदोलन में शामिल हो गया। 1921 में गांधीजी प्रभावित हुए और उन्होंने पटना में "सदाकत आश्रम" (सत्य का निवास) की स्थापना की। इसी आश्रम से हक ने " मदरलैंड " नामक एक साप्ताहिक पत्रिका शुरू की। वे हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे। उनका कथन था, "चाहे हम हिंदू हों या मुसलमान, हम एक ही नाव पर सवार हैं। अगर हम जीतेंगे, तो डूबेंगे, हम साथ-साथ डूबेंगे।" [9]

उन्होंने 1926 में सक्रिय राजनीति से संन्यास की घोषणा की लेकिन महात्मा गांधी, मौलाना आज़ाद और नेहरू जैसे नेताओं के साथ पत्र-व्यवहार जारी रखा। 2 जनवरी 1930 को उनका निधन हो गया। सीवान में एक आवासीय कॉलोनी का नाम उनके नाम पर रखा गया है। [10]

भारतीय डाक द्वारा 1981 में जारी एक स्मारक डाक टिकट

सन्दर्भ

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  1. Raza, Syed (2013). "Mazharul Haque: An Icon of Communal Harmony". Proceedings of the Indian History Congress. 74: 555–563. जेस्टोर 44158857.
  2. "Maulana Mazharul Haque, who strongly believed in sacrificing personal interests for achieving common interests". Heritage times.com.
  3. Kumar, Abhay. "Bihar Vidyapeeth Founded by Gandhi to be revived". Deccan herald. अभिगमन तिथि: 29 September 2020.
  4. Raza, Sayed (2009–2010). "Mazharul Haque: A pioneer of Sadaqat Ashram and Bihar Vidyapith". Proceedings of the Indian History Congress. 70: 705–712. जेस्टोर 44147718. अभिगमन तिथि: 29 September 2020.
  5. Khan, MI. "With Gandhian heritage, campus in shambles, what is Bihar Vidyapeeth's future?". Firstpost.com. अभिगमन तिथि: 29 September 2020.
  6. Kumar, Nirmal (2009). Mazharul Haque. Hemkunt Press. pp. 15–25. ISBN 9788190761307.
  7. Kumar, Nirmal (2009). Mazharul Haque. Hemkunt Press. pp. 15–25. ISBN 9788190761307.
  8. Kumar, Nirmal (2009). Mazharul Haque. Hemkunt Press. pp. 15–25. ISBN 9788190761307.
  9. Kumar, Nirmal (2009). Mazharul Haque. Hemkunt Press. pp. 15–25. ISBN 9788190761307.
  10. Kumar, Nirmal (2009). Mazharul Haque. Hemkunt Press. pp. 15–25. ISBN 9788190761307.