मोमिन खान मोमिन

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मुहम्मद मोमिन खाँ (1800-1851) भारत के उर्दू कवि थे। उन्होने गजलें लिखीं हैं।

कश्मीरी थे पर वे दिल्ली में आ बसे थे। उस समय शाह आलम बादशाह थे और इनके पितामह शाही हकीमों में नियत हो गए। अँग्रेजी राज्य में पेंशन मिलने लगा, जो मोमिन को भी मिलती थी।

इनका जन्म दिल्ली में सन्‌ 1800 ई. में हुआ। फारसी -अरबी की शिक्षा ग्रहण कर हकीमी और मजूम में अच्छी योग्यता प्राप्त कर ली। छोटेपन ही से यह कविता करने लगे। तारीख कहने में यह बड़े निपुण थे। अपनी मृत्यु की तारीख इन्होंने कही थी-दस्तों बाजू बशिकस्त। इससे सन्‌ 1852 ई. निकलता है और इसी वर्ष यह कोठे से गिरकर मर गए। इनमें अहंकार की मात्रा अधिक थी, इसी से जब राजा कपूरथला ने इन्हें तीन सौ रुपए मासिक पर अपने यहाँ बुलाया तब यह केवल इस कारण वहाँ नहीं गए कि उतना ही वेतन एक गवैए को भी मिलता था।

मोमिन बड़े सुंदर, प्रेमी, मनमौजी तथा शौकीन प्रकृति के थे। सुंदर वस्त्रों तथा सुगंध से प्रेम था। इनकी कविता में इनकी इस प्रकृति तथा सौंदर्य का प्रभाव लक्षित होता है। इसमें तत्सामयिक दिल्ली का रंग तथा विशेषताएँ भी हैं अर्थात्‌ इसमें अत्यंत सरल, रंगीन शेर भी हैं और क्लिष्ट उलझे हुए भी। इनकी गजलें भी लोकप्रिय हुई। इन्होंने बहुत से अच्छे वासोख्त भी लिखे हैं। वासोख्त लंबी कविता होती है जिसमें प्रेमी अपने प्रेमिका की निन्दा और शिकायत बड़े कठोर शब्दों में करता है।

मोमिन जिनका पेशा हकीमी था,फारसी काव्यशास्त्र के वेत्ता थे । संगीत तथा शतरंज में उनकी रुचि थी । इसका प्रभाव उनकी शायरी में भी दिखाई देता है । फारसी गद्य एवं पद्य दोनों में उनकी रचनाएँ उपलब्ध हैं । उनकी काव्य रचनाओं में ग़ज़ल मसनवी तथा क़सीदे सभी रूपसम्मिलित हैं । ग़ज़ल और मसनवी में श्रृंगार एवं प्रेम रस की भरमार है । कहा जाता है कि वे जवानी में प्रेम तरंगों में खूब झूले थे । यदा कदा भावों में अश्लीलता भी दिखाई देती है लेकिन भावों में गहराई एवं दूर तक ले जाने वाली कल्पना मोमिन की ही शायरी में उपलब्ध है । उनका यह शेर देखिये : "तुम मेरे पास होते हो गोया जब कोई दूसरा नहीं होता ।"

यह शेर दूरस्थ कल्पना का घोतक माना जाता है । मोमिन की विषय संरचना को कुछ आलोचकों ने इसे भाव की जटिलता तथा भाषा की किलष्टता का नाम दिया है ।