मोइनुद्दीन चिश्ती

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पूर्व जीवन एवं पृष्ठभूमि[संपादित करें]

यह माना जाता है कि मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म ५३६ हिज़री संवत् अर्थात ११४१ ई॰ पूर्व पर्षिया के सीस्तान क्षेत्र में हुआ।[1] अन्य खाते के अनुसार उनका जन्म ईरान के इस्फ़हान नगर में हुआ।

हज़्रत ख्वाजा गरीब नवाज़[संपादित करें]

ख़्वाजा हुसैन अजमेरी[संपादित करें]

फ़्रेम|दाएँ|मज़ार मुबारक़ ख़्वाजा हुसैन अजमेरी औलाद (वंशज) ख़्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह ख़्वाजा हुसैन अजमेरी ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह की औलाद हैं। आपके वालिद के विसाल के बाद अजमेर शरीफ़ के लोगों ने यह तय किया कि उनके तीनो भाइयों को रोज़ए ख़्वाजा पे ले चलते हैं, जिसके हाथ लगाने से दरवाजा रोज़ा शरीफ़ खुद बखुद खुल जाएगा उसी को दरगाह शरीफ़ का दीवान (सज्जादानशीन) मुक़र्रर कर दिया जाएगा। लिहाज़ा आपके दो भाइयों के हाथ से रोज़ा शरीफ़ का दरवाजा नहीं खुला। आपके हाथ लगाते ही रोज़ा शरीफ़ का दरवाज़ा खुल गया , चुनांचे आपकी मसनदे सज्जादगी पर बैठा दिया गया।

ख़्वाजा हुसैन अजमेरी का सर चाहिए[संपादित करें]

अबुल फ़ज़ल और फ़ैज़ी जो नागौर शरीफ़ से ताल्लुक़ रखते थे, बहुत तेज़ व तर्रार थे , अकबर के ख़ास लोगों में शुमार था। अकबर बादशाह से क़ुरबत हासिल करने के लिए दिन दरोग़ गोई से काम लिया। दीवान ख़्वाजा हज़रत हुसैन अजमेरी को अबुल फ़ज़ल ने अपना खालाज़ाद भाई बताया। अकबर को ख़्वाजा बुज़ुर्ग से काफी अक़ीदत थी। अकबर बहुत ज़हीन और चालाक था। एक दिन अजमेर पहुंचकर अकबर ने ख़्वाजा हुसैन अजमेरी से मालूम कर लिया की क्या अबुल फ़ज़ल आपके ख़ालाज़ाद भाई हैं। ख़्वाजा हुसैन ने फ़रमाया तमाम मुसलमान भाई हैं। अकबर ने दूसरी बार सवाल दोहराया। आपने फिर फ़रमाया तमाम मुसलमान भाई हैं। अकबर ख़ामोश हो गया। यह सवाल सुनकर अबुल फ़ज़ल की दरोग़ गोई सामने आ गई। उसी दिन से अबुल फ़ज़ल के दिल में आपके लिए दुश्मनी पैदा हो गई। एक दिन मौका पाकर अकबर को ख़्वाजा हुसैन अजमेरी के ख़िलाफ़ करना चाहा। अकबर से कहा हुज़ूर ख़्वाजा हुसैन अजमेर का इरादा है कि राजाओं का लश्कर जमा करके आप पर चढ़ाई करें और खुद देहली के बादशाह बन जाएं। अकबर ने ये बात सुनकर अबुल फ़ज़ल से कहा के से यकीन हुआ ? इस पर अबुल फ़ज़ल ने कहा तमाम राजा उन्हें सलाम करने हाज़िर होते हैं, अगर आपको सच्चाई मालूम करनी है तो बतौर इम्तेहान आप किसी एक रजा से यह कहिये कि मुझे ख़्वाजा हुसैन अजमेरी का सर चाहिए, सर उतार कर लाया जाए। चुनांचे अकबर ने राजा बीकानेर, राजा जयपुर, रजा जोधपुर, को अपने दरबार में तलब किया और हुक्म दिया कि मुझे ख़्वाजा हुसैन अजमेरी का सर चाहिए। तीनों राजा दस्त बस्ता अर्ज़ करने लगे, हुज़ूर हुक्म हो तो हम अपने मा बाप का सर काटकर ला सकतें हैं, मगर एक दरवेश सिफ़त भगत इंसान जो तमाम हिन्दू मुसलामानों कि बेलौस ख़िदमत कर रहे हैं ख़्वाजा हुसैन का सर काट कर लाना हमारे लिए नामुमकिन है। और जो कुछ हुक्म कीजिये हम तामीले हुक्म के लिए हाजिर हैं। जब रजागान दरबार से रुख़्सत हो चुके तो अबुल फ़ज़ल ने कहा देखा हुज़ूर मेने आपसे सच ही तो कहा था, अब आपको पूरा पूरा यकीन हो गया होगा। जलालुद्दीन अकबर ने फ़ौरन हुक्म दिया कि ख़्वाजा हुसैन से कह दो कि वो अजमेर से फ़ौरन निकल जाएं, मक्का मोअज़्ज़मा या मदीना शरीफ़ चले जाएं। चूंकि दीवान ख़्वाजा हुसैन अजमेरी साहब बे ताल्लुक़ मुज़र्रद आदमी थे, चंद ख़ादिमों को लेकर मक्का शरीफ़ को रवाना हो गए।

अकबर बादशाह

आपका विसाल[संपादित करें]

आपका विसाल 1029 हिजरी में हुआ। यही तारीख़ मालूम हो सकी। गुम्बद की तामीर बादशाह शाहजहाँ के दौर में 1047 में हुई।

अकबरी मस्जिद दरगाह अजमेर[संपादित करें]

अकबरी मस्जिद इस मस्जिद को अकबर बादशाह ने दीवान सज्जादानशीन सैयद ख़्वाजा हुसैन अजमेर की हवेली को मस्मार करके 977 हिजरी में तामीर कराया।

चिश्तिया तरीका - पुनस्थापना[संपादित करें]

चिश्तिया तरीका अबू इसहाक़ शामी ने ईरान के शहर "चश्त" में शुरू किया था, इस लिए इस तरीक़े को "चश्तिया" या चिश्तिया तरीका नाम पड गया। लैकिन वह भारत उपखन्ड तक नहीं पहुन्चा था। मोईनुद्दीन चिश्ती साहब ने इस सूफ़ी तरीक़े को भारत उप महाद्वीप या उपखन्ड में स्थापित और प्रचार किया। यह तत्व या तरीक़ा आध्यात्मिक था, भारत भी एक आध्यात्म्कि देश होने के नाते, इस तरीक़े को समझा, स्वागत किया और अपनाया। धार्मिक रूप से यह तरीका बहुत ही शान्तिपूर्वक और धार्मिक विग्नान से भरा होने के कारण भारतीय समाज में इन्के सिश्यगण अधिक हुवे। इन्की चर्चा दूर दूर तक फैली और लोग दूर दूर से इनके दरबार में हाजिर होते, और धार्मिक ग्यान पाते।

अजमेर में उनका प्रवेश[संपादित करें]

अजमेर में जब वे धार्मिक प्रचार करते तो चिश्ती तरीके से करते थे। इस तरीके में ईश्वर गान पद्य रूप में गायन के माध्यम से लोगों तक पहुँचाया जाता था। मतलब ये कि, क़व्वाली, समाख्वानी, और उपन्यासों द्वारा लोगों को ईश्वर के बारे में बताना और मुक्ति मार्ग दर्शन करवाना। स्थानीय हिन्दू राजाओं से भी कई मतभेद हुए परन्तु वह सब मतभेद स्वल्पकालीन थे। स्थानीय राजा भी मोईनुद्दीन साहब के प्रवचनों से मुग्ध हुए और उनपर कोई कष्ट या आपदा आने नहीं दिया।

इस तरह स्थानीय लोगों के ह्रुदय भी जीत लिये, और लोग भी इनके मुरीद (शिष्य) होने लगे।

उनके आखरी पल[संपादित करें]

मोईनुद्दीन चिश्ती दरगाह, अजमेर।

६३३ हिज़री के आते ही उन्हें पता था कि यह उनका आखरी वर्श है, जब वे अजमेर के जुम्मा मस्जिद में अपने प्रशंसको के साथ बैठे थे, तो उनहोंने शेख अली संगल (र अ) से कहा कि वे हज़रत बख्तियार काकी (र अ) को पत्र लिखकर आने के लिये कहें। ख्वाजा साहेब के बाद क़ुरान-ए-पाक, उनका गालिचा और उनके चप्पल काकी (र अ) को दिया गया और कहा "यह विशवास मुहम्म्द (स अ व्) का है, जो मुझे मेरे पीर-ओ-मुर्शिद से मिला हैं, मैं आप पर विशवास करके आप को दे रहा हुँ और उसके बाद उनका हाथ लिया और नभ की ओर देखा और कहा "मैंने तुम्हें अल्लाह पर न्यास्त किया है और तुम्हें यह मौका दिया है उस आदर और सम्मान प्राप्त करने के लिए।" उस के बाद ५ और ६ रजब को ख्वाजा साहेब अपने कमरे के अंदर गए और क़ुरान-ए-पाक पढने लगे, रात भर उनकी आवाज़ सुनाई दी, लेकिन सुबह को आवाज़ सुनाई नहीं दी। जब कमरा खोल कर देखा गया, तब वे स्वर्ग चले गये थे, उनके माथे पर सिर्फ यह पंक्ति चमक रही थी "वे अल्लाह के मित्र थे और इस संसार को अल्लाह का प्रेम पाने के लिए छोड दिया।" उसी रात को काकी (र अ) को मुहम्मद (स अ व्) स्वपन में आए थे और कहा "ख्वाजा साहेब अल्लाह के मित्र हैं और मैं उनहें लेने के लिये आया हुँ। उनकी जनाज़े की नमाज़ उन के बडे पुत्र ख्वाजा फ़क्रुद्दीन (र अ) ने पढाई। हर साल हज़रत के यहाँ उनका उर्स बडे पैमाने पर होता है।

साधारण संस्क्रुती में[संपादित करें]

हुसैन इब्न अली के पाशस्त में इन्हों ने यह कविता लिखी, जो दुनियां भर में मशहूर हुई।

शाह अस्त हुसैन, बादशाह अस्त हुसैन
शाह हैं हुसैन, बादशाह हैं हुसैन

दीन अस्त हुसैन, दीनपनाह अस्त हुसैन
धर्म हैं हुसैन, धर्मरक्षक हैं हुसैन

सरदाद न दाद दस्त दर दस्त ए यज़ीद
अपना सर पेश किया, मगर हाथ नहीं पेश किया आगे यज़ीद के

हक़्क़ाक़-ए बिना-ए ला इलाह अस्त हुसैन
सत्य है कि हुसैन ने शहादा की बुनियाद रखी

चिश्ती तरीक़े के सूफ़ीया[संपादित करें]

मोइनुद्दीन साहब के तक्रीबन एक हज़ार खलीफ़ा और लाखों मुरीद थे। कयी पन्थों के सूफ़ी भी इनसे आकर मिल्ते और चिश्तिया तरीके से जुड जाते। इन्के शिश्यगणों में प्रमुख ; क़ुत्बुद्दीन बख्तियार काकी, बाबा फ़रीद्, निज़ामुद्दीन औलिया, हज़रत अह्मद अलाउद्दीन साबिर कलियरी, अमीर खुस्रो, नसीरुद्दीन चिराग दहलवी, बन्दे नवाज़, अश्रफ़ जहांगीर सिम्नानी और अता हुसैन फ़ानी.

आज कल, हज़ारो भक्तगण जिन में मुस्लिम, हिन्दू, सिख, ईसाई व अन्य धर्मों के लोग उर्स के मोके पर हाज़िरी देने आते हैं।

मक़्बरे का बाहरी मन्ज़र

आध्यात्मिक परंपरा[संपादित करें]

  1. हसन अल बस्री
  2. अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद
  3. फ़ुदैल बिन ल्याद
  4. इब्राहीम बिन अदहम
  5. हुदैफ़ा अल-मराशी
  6. अमीनुद्दीन अबू हुबैरा अल बस्री
  7. मुम्शाद दिन्वारी

चिश्ती तरीक़े का आरम्भ:

  1. अदुल इसहाक़ शामी चिश्ती
  2. अबू मुहम्मद अब्दाल चिश्ती
  3. अबू मुहम्मद चिश्ती
  4. अबू यूसुफ़ बिन समआन हुसेनी
  5. मौदूद चिश्ती
  6. शरीफ़ ज़न्दानी
  7. उस्मान हारूनी
  8. मुनीरुद्दीन हाजी चिश्ती
  9. यूसुफ़ चिश्ती
  10. मोईनुद्दीन चिश्ती

इनके भक्तगण और भक्तजन[संपादित करें]

भारत उपमहाद्वीप के हर हिस्से में इन्के चाह्ने वाले मिलेंगे। जब इनका उर्स होता है तो देश विदेशों से अक़ीदतमन्द लोग इन्के दर्गाह पर हाज़री देते हैं और दुआयें कर्ते हैं। इस उर्स के मोक़े पर भारत सर्कार और दीगर राज्य सर्कारें अनेक सुविधायें करती हैं। जैसे, स्पेशल रैल गाडियां लगाना, सर्कारी तोर पर उर्स के निर्वाहण के लिये सुविधायें कर्ना, सर्कारी यंत्रांग तायेनात करना। भारत सर्कार और राजस्थान राज्य सरकार की तरफ़ से चादर भी चढाई जाती है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

मीडिया में[संपादित करें]

इनके करामात पर कयी हिन्दी अथवा उर्दू फिल्में बनीं। और इन के जीवन पर कयी गीत भी लिखे गये और गाये भी गये।

भारत उपमहाद्वीप में जहां कहीं भी क़व्वाली होती है, तो उन क़व्वालियों में इनके बारे में "मनक़बत" (वलियों की प्रशंसा करते हुए गीत या पद्य) गाना एक आम परंपरा है।

  • उर्दू फ़िल्म - मेरे गरीब नवाज़
  • उर्दू फ़िल्म - सुल्तान-ए-हिन्द

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कडियां[संपादित करें]

Official website of Dargah, Ajmer