मैत्रक राजवंश

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

बटार अथवा मैत्रक राजवंश ने ४७५ ई से ७६७ ई के मध्य गुजरात पर शासन किया। इस वंश का संस्थापक सेनापति भट्टारक था जो गुप्त साम्राज्य के अधीन सौराष्ट्र उपखण्ड का राज्यपाल था। मैत्रक एक गुर्जर वंश का नाम है।[1][2] मैत्रक का संस्कृत में अर्थ सूर्य होता है, इतिहासकारो के अनुसार मैत्रक मिहिर से बना शब्द है।[3] ये कुषाण मूल के गुर्जर थे।[4] व कुषाण गुर्जर साम्राज्य के पतन के बाद गुप्तो के अधीन राज्य किया। मैत्रको ने गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद स्वतन्त्र सत्ता प्राप्त की।[5] सम्राट हर्षवर्धन की पुत्री का विवाह गुर्जर नरेश धारासेन मैत्रक से हुआ था। गुर्जर नरेश शिलादित्य मैत्रक (तृतीय , काल लगभग 720 ई) इस वंश के सबसे प्रतापी व पराक्रमी शासक हुए । शिलादित्य ने गुजरात से लेकर दक्षिण तक राज्य का विस्तार किया।इनके समय में बेहद प्रबल अरब आक्रमण हुए। गुर्जर सैना के संख्या में कम होने के बावजूद भी अरबो की विशाल व संसाधनो से परिपूर्ण सेना को पराजित कर जीत का डंका बजा देते थे।[6] सोमनाथ मंदिर का निर्माण मैत्रक वंश के राजाओ ने किया था। जिसका बाद मे गुर्जर प्रतिहार राजा नागभट पूनर्निर्माण किया। वर्तमान मे मैत्रक (बटार) गौत्र के गूर्जर भारत और पाकिस्तान दोने देशो मे मौजूद है। भारत मे "बटार गुर्जर" जम्मु-कश्मीर, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश मे मिलते है। सहारनपुर, उत्तर प्रदेश मे बटारो (मैत्रको) के 52 गांव है।

संदर्भ[संपादित करें]

  1. विन्सेंट ए. स्मिथ, दी ऑक्सफोर्ड हिस्टरी ऑफ इंडिया, चोथा संस्करण, दिल्ली.
  2. महमूद आफॅ गजनी.
  3. रेखा चतुर्वेदी भारत में सूर्य पूजा-सरयू पार के विशेष सन्दर्भ में (लेख) जनइतिहास शोध पत्रिका, खंड-1 मेरठ, 2006.
  4. ए. कनिंघम आरकेलोजिकल सर्वे रिपोर्ट, 1864.
  5. जे.एम. कैम्पबैल, भिनमाल (लेख), बोम्बे गजेटियर, बोम्बे, 1896.
  6. .बी. एन. पुरी. हिस्ट्री ऑफ गुर्जर, 1986.