मैं तुलसी तेरे आँगन की
| मैं तुलसी तेरे आँगन की | |
|---|---|
| निर्देशक | राज खोसला |
| पटकथा |
राज भारती जीबी कामत सूरज सनीम राही मासूम रज़ा (संवाद) |
| आधारित |
चंद्रकांत काकोडकर द्वारा आशी तुझी प्रीत |
| निर्माता | राज खोसला |
| अभिनेता |
नूतन विनोद खन्ना आशा पारेख विजय आनन्द देब मुखर्जी |
| छायाकार | प्रताप सिन्हा |
| संपादक | वामन भोंसले |
| संगीतकार | लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल |
निर्माण कंपनियां |
महबूब स्टूडियोज फ़िल्मिस्तान श्टूडियोज |
| वितरक | राज खोसला फ़िल्म्स |
प्रदर्शन तिथियाँ |
|
| देश | भारत |
| भाषा | हिन्दी |
मैं तुलसी तेरे आँगन की राज खोसला और सुदेश ईस्सर निर्देशित सन् 1978 की हिन्दी भाषा की भारतीय नाटक फ़िल्म है। यह फ़िल्म चंद्रकांत काकोडकर के मराठी उपन्यास आशी तुझी प्रीत पर आधारित है। इस फ़िल्म में अपने अभिनय के लिए नूतन ने 5वें फ़िल्मफेयर अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीता। बॉक्स ऑफ़िस पर यह फ़िल्म सफल रही।[1]
कथानक
[संपादित करें]मैं तुलसी तेरे आँगन की एक कुलीन व्यक्ति ठाकुर राजनाथ सिंह चौहान के बारे में है। वो अपनी प्रेमिका तुलसी से प्यार करता है लेकिन उसे संजुक्ता नामक कुलीन महिला के साथ विवाह करने के लिए मजबूर किया जाता है। तुलसी और राजनाथ के प्यार के परिणामस्वरूप तुलसी राजनाथ के बेटे अजय को जन्म देने के कुछ समय बाद ही मर जाती है क्योंकि वो चाहती है कि संजुक्ता अपने पति को पूरी तरह से अपने पास रखे। अजय को नाजायज़ संतान होने के कलंक से बचाने के लिए राजनाथ और संजुक्ता उसे बोर्डिंग विद्यालय में भेज देते हैं। संजुक्ता और राजनाथ का एक बेटा प्रताप होता है। राजनाथ की घुड़सवारी के दौरान दुर्घटना में मौत हो जाती है। संजुक्ता नियमित रूप से बोर्डिंग विद्यालय में जाती है और अजय से मिलती है। जब वो बड़ा हो जाता है तो उसे घर अले आती है। अजय नैनी से मिलता है और कुछ गलतफहमियों के बाद उसे प्यार करने लगता है। संजुक्ता अजय को न केवल एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति बनाती है बल्कि हर बार उसकी रक्षा भी करती है। संजुक्ता लोगों के सामने यह भी कबूल करती है कि अजय उसके पति का पहला बेटा है अतः सम्मान का हक़दार है। हालांकि उसका अपना पुत्र प्रताप अपमानित महसूस करता है और स्वच्छंद हो जाता है। उनके आस-पास के कुछ लोग भी दोनों भाइयों के बीच संबंधों को और खराब करने की कोशिश करते हैं। हालांकि छोटे भाई के हर पाप के लिए अजय उसे बचाता है और दोष अपने ऊपर ले लेता है। वास्तविक स्थिति को न जानते हुए संजुक्ता परेशान हो जाती है। प्रताप गीता को बहकाता है और उसे गर्भवती कर देता है और उसके पिता राणा के जरिए अजय को दोषी ठहराता है। एक स्तर पर वह अजय को हर गलत काम के लिए दोषी ठहराती है जो वास्तव में उसके अपने बेटे ने किया होता है। अजय घर छोड़ देता है। लेकिन इसके तुरंत बाद, स्थिति बदल जाती है क्योंकि राणा प्रताप के समर्थन में खड़ा होता है। उसे धोखा महसूस होता है क्योंकि वह उसकी बेटी को स्वीकार करने से इनकार करके उसे निराश करता है। चरमोत्कर्ष में ये लोग पोलो मैच में प्रताप को मारने की कोशिश करते हैं, लेकिन अजय इस योजना के बारे में जान जाता है। वह अपने भाई को बचा लेता है। तब प्रताप को अपने सौतेले भाई की दयालुता का एहसास होता है।
कलाकार
[संपादित करें]- नूतन – संजुक्ता चौहान
- विनोद खन्ना – अजय चौहान
- आशा पारेख – तुलसी
- विजय आनन्द – ठाकुर राजनाथ सिंह चौहान
- देब मुखर्जी – प्रताप चौहान
- नीता मेहता – नैनी
- जगदीश राज – अग्रवाल
- चन्द्रशेखर दुबे – सुब्रमण्यम (लेखाकार)
- पूर्णिमा – राजनाथ की माँ
- गीता बहल – गीता
- त्रिलोक कपूर
- असित सेन – नैनी के पिता
- भगवान – भीमसिंह (नैनी का नौकर)
- गोगा कपूर – ठाकुअर अजमेर सिंह
- हीना कौसर – वेश्या
- प्रवीण पॉल – लीलाबाई
संगीत
[संपादित करें]फ़िल्म का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने दिया और बोल आनंद बख्शी ने लिखे हैं।
| क्र॰ | शीर्षक | गायक | अवधि |
|---|---|---|---|
| 1. | " छाप तिलक सब छीनी रे" | लता मंगेशकर, आशा भोसले | 5:09 |
| 2. | "नथनिया जो डाली" | अनुराधा पौडवाल, हेमलता | 4:44 |
| 3. | "ये खिड़की जो बंद रहती है" | मोहम्मद रफ़ी | 4:28 |
| 4. | "सैयां रूठ गये" | शोभा गुर्टू | 3:23 |
| 5. | "मैं तुलसी तेरे आँगन की" | लता मंगेशकर | 4:53 |
| 6. | "मैं तेरा क्या ले जाऊँगी" | लता मंगेशकर | 1:35 |
| 7. | "मत रो बहना" | लता मंगेशकर | 1:34 |
| कुल अवधि: | 25:53 | ||
नामांकन और पुरस्कार
[संपादित करें]सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ "BoxOffice India.com". boxofficeindia.com. मूल से से 2009-02-02 को पुरालेखित।.