मेनसियस (पुस्तक)
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| भाषा | शास्त्रीय चीनी |
|---|---|
| विषय | चीनी दर्शन, कन्फ्यूशीवाद, नैतिकता, राजनीतिक सिद्धांत |
| शैली | दार्शनिक ग्रंथ |
| प्रकाशन स्थान | चीन (प्राचीन झोउ राजवंश) |
| पृष्ठ | 7 अध्याय (प्रत्येक दो भागों में विभाजित) |
मेनसियस (अंग्रेज़ी: Mencius, चीनी: 孟子; पिनयिन: Mèngzǐ - मेंगज़ी) प्राचीन चीन के 'युद्धरत राज्यों के काल' (लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व) का एक मौलिक दार्शनिक ग्रंथ है। यह कन्फ्यूशियस के बाद सबसे महान कन्फ्यूशियाई दार्शनिक माने जाने वाले मेनसियस (मेंग के) की बातचीत, उपाख्यानों और साक्षात्कारों का एक संग्रह है। यह पुस्तक न केवल व्यक्तिगत नैतिकता का मार्गदर्शन करती है, बल्कि यह सुशासन और शासक के नैतिक कर्तव्यों का भी एक विस्तृत खाका प्रस्तुत करती है। नव-कन्फ्यूशीवाद के उदय के बाद, इसे चीनी दर्शन की प्रसिद्ध "चार पुस्तकों" में से एक का दर्जा दिया गया।
मेनसियस का सबसे प्रसिद्ध और क्रांतिकारी दार्शनिक योगदान उनका यह सिद्धांत है कि मानव स्वभाव जन्म से ही अच्छा होता है। मेनसियस तर्क देते हैं कि जिस प्रकार पानी स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार मनुष्य स्वाभाविक रूप से अच्छाई की ओर प्रवृत्त होता है।[1]
वे "चार शुरुआत" की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार, हर मनुष्य में जन्म से ही चार नैतिक भावनाएँ होती हैं, जिन्हें यदि उचित पोषण (शिक्षा और आत्म-चिंतन) मिले, तो वे सर्वोच्च सद्गुणों में विकसित हो जाती हैं:
- करुणा: जो परोपकार में विकसित होती है।
- शर्म और तिरस्कार: जो धार्मिकता या न्याय (Yi / 義) में विकसित होती है।
- सम्मान और शिष्टाचार: जो मर्यादा या कर्मकांड (Li / 禮) में विकसित होती है।
- सही और गलत की समझ: जो ज्ञान या बुद्धिमत्ता (Zhi / 智) में विकसित होती है।
मेनसियस "कुएं में गिरते हुए बच्चे" का प्रसिद्ध उदाहरण देते हैं: कोई भी व्यक्ति जो किसी बच्चे को कुएं में गिरता हुआ देखेगा, वह तुरंत खतरे और करुणा की भावना महसूस करेगा, न कि किसी इनाम के लालच में या अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए। यह साबित करता है कि अच्छाई इंसान के भीतर सहज है।[2]
राजनीतिक दर्शन: मानवीय शासन
[संपादित करें]पुस्तक का एक बड़ा हिस्सा मेनसियस और उस समय के विभिन्न राजाओं के बीच संवादों से भरा है। मेनसियस ने क्रूरता और युद्धों की कड़ी निंदा की और 'मानवीय शासन' की वकालत की।
- जनता की सर्वोच्चता: मेनसियस ने घोषित किया कि एक राष्ट्र में, "जनता सबसे महत्वपूर्ण है; राज्य दूसरे स्थान पर है; और शासक सबसे कम महत्वपूर्ण है।"
- स्वर्ग का जनादेश: मेनसियस के अनुसार, एक राजा को शासन करने का अधिकार 'स्वर्ग' से मिलता है, लेकिन यह अधिकार स्थायी नहीं है। यह अधिकार शासक की नैतिकता और जनता की भलाई पर निर्भर करता है।
- विद्रोह का अधिकार: यदि कोई शासक अत्याचारी बन जाता है और अपनी जनता को पीड़ित करता है, तो वह 'स्वर्ग का जनादेश' खो देता है। मेनसियस का यह तर्क कि एक अत्याचारी राजा वास्तव में राजा नहीं, बल्कि एक "सामान्य अपराधी" बन जाता है, जनता को उसे उखाड़ फेंकने (विद्रोह करने) का नैतिक अधिकार देता है। यह प्राचीन विश्व के सबसे साहसिक राजनीतिक सिद्धांतों में से एक था।[3]
ऐतिहासिक महत्व और विरासत
[संपादित करें]अपने जीवनकाल में, मेनसियस के विचारों को तत्कालीन राजाओं ने अत्यधिक आदर्शवादी मानकर खारिज कर दिया था। हालाँकि, सोंग राजवंश (11वीं शताब्दी) के दौरान, दार्शनिक झू शी ने 'मेनसियस' को "चार पुस्तकों" में शामिल किया। इसके बाद, यह पुस्तक चीनी सिविल सेवा परीक्षाओं का मुख्य आधार बन गई। 14वीं से 20वीं सदी की शुरुआत तक, चीन के हर शिक्षित व्यक्ति के लिए 'मेनसियस' का अध्ययन करना अनिवार्य था, जिसने इसके विचारों को पूर्वी एशियाई संस्कृति के मूल ताने-बाने में गहराई से बुन दिया।[4][5][6]
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ Behuniak, James :10.1353/pew.2011.0045
- ↑ Ivanhoe, Philip J. (2000). Confucian Moral Self Cultivation. Hackett Publishing. pp. 15-22. ISBN 978-0872205086.
- ↑ Lau, D. C. (2004). Mencius (Penguin Classics Translation). Penguin Books. pp. xx-xxx (Introduction). ISBN 978-0140449716.
- ↑ Graham, A. C. (1989). Disputers of the Tao: Philosophical Argument in Ancient China. Open Court. pp. 111-132. ISBN 978-0812690873.
- ↑ Van Norden, Bryan W. (2011). Introduction to Classical Chinese Philosophy. Hackett Publishing. pp. 83-98. ISBN 978-1603844680.
- ↑ "Mencius and an Ethics of the New Century"