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मेदिनी राय (राजपूत राजा)

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मेदिनी राय , मेदिनी राय से अलग हैं जो पलामू के राजा थे।


मेदिनी राय खंगार (मृत्यु 1528) चंदेरी राज्य का राजपूत शासक था। वह राणा सांगा के सबसे प्रतिष्ठित सेनानायकों में से एक था।

अपने शुरुआती वर्षों में, मेदिनी राय ने मालवा के सुल्तान नसीरुद्दीन ख़िलजी की सेवा की और उसे अपने शासन को मजबूत करने में मदद की। नसीरुद्दीन की मृत्यु 1511 ईस्वी में हो गई । महमूद द्वितीय मालवा का सुल्तान बना लेकिन उसके चाचा साहिब खां ने महमूद को हटाकर सिंहासन अधिकृत कर लिया। महमूद सहायतार्थ गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह के पास चला गया तथा साहिब खा, मोदिनीराय को मंत्री पद हेतु रोक लेता है। 1517 में साहिब खां की मृत्यु हो जाती है। 1518ईस्वी में महमूद द्वितीय,गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर के साथ मालवा पर आक्रमण कर देता है तथा मालवा पर पुनः अपना अधिकार कर लेता है मोदिनीराय, राणा सांगा को सहायता हेतु अनुरोध पर सांगा मालवा की ओर प्रस्थान करते है लेकिन मालवा के दुर्ग के पतन के समाचार सुन कर वे गागरोन दुर्ग पर आक्रमण कर उसे मोदिनीराय को सौंप देते है। मोदिनीराय की शक्ति समाप्त करने हेतु महमूद द्वितीय गागरोन पर आक्रमण कर देता है सांगा पुनः मोदिनीराय की सहायतार्थ महमूद से युद्ध करते है इस युद्ध में सांगा को निर्णायक विजय प्राप्त होती है मोदिनीराय ने राणा के साथ मिलकर उन्होंने मालवा-गुजरात सेनाओं को हराया और राणा साँगा के अधिपत्य के तहत चन्देरी सहित पूर्वी मालवा के राजा बन गए। राजपूतों ने महमूद को पकड़ कर अपने सरदारों के संमुख उपस्थित किया। छः महीने बाद राणा सांगा ने वंशानुगत राजपूतोचित दयालुता के कारण महमूद को क्षमा कर दिया तथा मेदिनी राय की सहमति से उसका राज्य उसे वापस लौटा दिया।

चंदेरी पर कब्जा करने से दिल्ली के शासकों को झटका लगा क्योंकि वे राजपूतों से मालवा पर आक्रमण करने की उम्मीद नहीं कर रहे थे। इसके कारण लोदी साम्राज्य और मेवाड़ साम्राज्य के बीच कई झड़पों और लड़ाईयों की शृंखला शुरू हुई। मेदिनी राय ने राणा साँगा को इन लड़ाइयों में सक्रिय रूप से मदद की और उन्हें विजयी होने में मदद की। युद्ध के बाद राणा साँगा का प्रभाव आगरा के बाहरी इलाके में एक नदी पिलिया खार तक फैल गया। मेदिनी राय ने भारत के सुल्तानों के खिलाफ कई अभियानों में राणा साँगा की सहायता की।

सन् 1528 मे मेदिनी राय और बाबर के बीच चंदेरी का युद्ध लड़ा गया। इसमें बाबर विजयी रहा और मेदिनी राय को मार दिया गया।

सन्दर्भ

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    पुस्तक आग और सुहाग पं. श्रवण कुमार त्रिपाठी

    इन्हें भी देखें

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