मेड़तिया

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मेड़तिया राठौड़ - जोधपुर के शासक राव जोधा जी के पुत्र राव दूदा जी (राव दुधा) के वंशज मेड़ता के नाम से मेड़तिया कहलाये। राव दूदा जी का जन्म राव जोधा जी की सोनगरी राणी चाम्पा के गर्भ से 15 जूं 1440 को हुआ । राव दूदा जी ने मेड़ता को विशेष आबाद किया। इसमें उनके भाई राव बरसिँह जी  का भी साथ था। राव बरसिँह जी  व राव दूदा जी ने सांख्लों (परमार ) से चौकड़ी ,कोसाणा आदी जीते । राव बीकाजी जी द्वारा सारंगखां के विरुद्ध किये गये युद्ध में राव दूदा जी ने अद्भुत वीरता दिखाई । मल्लूखां ( सांभर का हाकिम ) ने जब मेड़ता पर अधिकार कर लिया था । राव दूदा जी, राव सांतल जी, राव सूजा जी, राव बरसिँह जी, बीसलपुर पहुंचे और मल्लूखां को पराजीत किया । मल्लूखां ने राव बरसिँह जी को अजमेर में जहर दे दिया जिससे राव बरसिँह जी की म्रत्यु हो गयी उनका पुत्र सीहा गद्धी पर बेठ और इसके बाद मेड़ता राव दूदा जी और सीहा में बंटकर आधा - आधा रह गया । राव दूदा जी


राव दूदा जी के पांच पुत्र थे - (01) वीरमदेव – मेड़ता (02) रायमल - खानवा के युद्ध में वीरगति प्राप्त हुए । (03) रायसल (04) रतनसिंह - कूड़की ठिकाने के स्वामी, खानवा के युद्ध में वीरगति प्राप्त हुए । (05) पंचायण मीराबाई रतन सिंह की पुत्री थी । रतनसिंह कूड़की ठिकाने के स्वामी थे । शरफुधीन ने 1563 ईस्वी में मेड़ता पर आक्रमण किया तब पंचायण इस युद्ध में मारे गए । राव दूदा जी के पुत्र वीरमदेव ईसवी 1515 में मेड़ता की गद्धी पर बैठे । इनका जन्म 19 नवम्बर 1477 को हुआ । वीरमदेव अपने समय के उद्भट योधा थे | 17 मार्च खानवा में बाबर व् सांगा के बीच हुए युद्ध में वीरमदेव ने राणा सांगा का साथ दिया । राणा सांगा की मूर्छित अवस्था के समय वे भी घायल थे । इस युद्ध में उनके भाई रायमल व् रतनसिंह भी मुगल सेना से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त हुए । जोधपुर के राजा मालदेव मेड़ता पर अधिकार करना चाहते थे । वीरमदेव ने 1536 ईस्वी में अजमेर पर भी अधिकार कर लिया था । मालदेव ने अजमेर लेना चाहा पर वीरमदेव ने नहीं दिया तब मालदेव ने मेड़ता पर आक्रमण कर दिया । मालदेव का मेड़ता पर अधिकार हो गया । कुछ समय बाद मालदेव का अजमेर पर भी अधिकार हो गया । तब वीरमदेव रायमल अमरसर के पास चलेगए । वीरमदेव आपने राज्य मेड़ता पर पुनः अधिकार करना चाहते थे अतः वीरमदेव रणथम्भोर की नवाब की मदद से शेरशाह के पास पहुँच गए । और मालदेव पर आक्रमण करने के लिए शेरशाह को तेयार किया । बीकानेर के राव कल्याणमल भी मालदेव द्वारा बीकानेर छीन लेने के कारन मालदेव के विरुद्ध थे । उन्होंने भी शेरशाह का साथ दिया । शेरशाह को बड़ी सेना लेकर जोधपुर की तरह बढ़ा और विक्रमी संवत 1600 ईस्वी 1544 में अजमेर के पास सुमेल स्थान पर युद्ध हुआ । मालदेव पहले हि मैदान छोड़ चूका था । जैता और कुम्पा शेरशाह के सामने डटे रहे परन्तु मालदेव की सेना को पराजीत होना पड़ा । इस युद्ध के बाद वीरमदेव ने मेड़ता पर पुनः अधिकार कर लिया । वीरमदेव ठिकाना मेड़ता इनके 10 पुत्रो के नाम इस प्रकार है:-

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वीरमदेव की म्रत्यु फाल्गुन विक्रमी संवत 1600 को हुयी । इनके 10 पुत्र थे । (01) जयमल – बदनोर (चितोड़) (02) ईशरदास (03) करण (04) जगमाल (05) चांदा (06) बीका - बीका के पुत्र बलू को बापरी सोजत चार गाँव मिला (07) प्रथ्वीराज - इनके वंशज मेड़ता में रहे (08) प्रतापसिंह (09) सारंगदे (10) मांडण मेड़तिया राठौड़ो की खापें व ठिकानों का विवरण इस प्रकार है –

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1 - जयमलोत मेड़तिया - वीरम दुदावत के पुत्र जयमल बड़े वीर थे । इनका जन्म 17 सिप्तम्बर 1507 इ.स.1544 ( विक्रमी 1600) में मेड़ता के स्वामी बने, राव जयमल (1507-1568) मेड़ता के शासक थे। वो मीरा के भाई थे उनके पिता राव वीरमदेव के निधन के बाद वो मेड़ता के राजा बने। वो राठौड़ वंश के संस्थापक राव दुधा के पौते थे। मालदेवजी जोधपुर ने मेड़ता पर आक्रमण किया परन्तु उन्हें पराजीत होना पड़ा । मालदेव मेड़ता छीनना चाहते थे उन्हें फिर इ.1557 में मेड़ता पर आक्रमण किया और मेड़ता पर अधिकार कर लिया | उन्होंने आधा मेड़ता जयमल के भाई जगमाल को दे दिया । जयमल अकबर की सेवा में चले गए । और सहायता पाकर पुनः 1563 ई.वि.1620 में मेड़ता पर अधिकार कर लिया । इन्होने अकबर के विद्रोह सरफुधीन को शरण दी । अतः अकबर की सेना ने मेड़ता पर अधिकार कर लिया । जयमल उदयसिंह के पास चितोड़ चले गए । उदयसिंह ने इनको बदनोर का ठिकाना प्रदान किया । अकबर ने मगसिर वदी 6वि.1624 को चितोड़ का घेरा डाला । संकट की इन घड़ियों में उदयसिंह को भेजकर चितोड़ की रक्षा का भार आपने पर लिया । अकबर की सेना से लड़ते हुए यहीं इन्होने वीरगति प्राप्त की । राव दूदा जी के पुत्र राव जयमल जी

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राव दूदा जी के पुत्र राव जयमल जी के 14 पुत्र इस प्रकार थे - (01) सुरताण - गढ़बोर गाँव, मेड़ता (02) केश्वदाश – मेड़ता, वि.सं. 1655 में बीड़ की लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुए । (03) गोयंददास (04) माधवदास (05) कल्याणदास (06) रामदास – हल्दी घाटी के युद्ध (ई.1576) में वीरगति को प्राप्त हुए । (07) बिठलदास (08) मुकंददास (09) श्यामदास (10) नारायणदास (11) नरसिंहदास (12) द्वारकादास (13) हरिदास  (14) शार्दुल बहादुरसिंह बीदासर ने अनोपसिंह नामक ऐक और पुत्र भी लिखा है। 2 - सुरतानोत मेड़तिया - वि.सं. 1624 में हुए चितोड़ के तीसरे शाके में जयमल वीरगति प्राप्त हुए । उनके बड़े पुत्र सुरताण महाराणा उदयसिंह की सेवा में उपश्थित हुए । बदनोर पर तो अकबर का अधिकार हो गया । अतः उदयसिंह ने सुरतान को गढ़बोर गाँव प्रदान किया । इसके बाद सुरतान मेड़ता प्राप्त करने के लिए अकबर के पास जा रहे । उनकी सेवाओं से प्रसन्न होकर अकबर ने उन्हें मेड़ता दे दिया । इन्ही सुरतान के वंशज सुरतानोत मेड़तिया कहलाये । राव जयमल जी के पुत्र राव सुरतान जी के 3 पुत्र इस प्रकार थे - (01) भोपत - बांवाड़ा शासक (02) भाण उग्रसेन - बांवाड़ा शासक (03) पुत्र हरिराम - डूँगरपुर मारवाड़ में सुर्तानोतों के ठिकाने प्रकार थे - लवणों (दो गाँव ) गूलर( पांच गाँव ) रोहिणी ( चार गाँव ) बाजुवास( दो गाँव )   जावलो( तीन गाँव ) जालरो ( सात गाँव ) भटवरी (पांच गाँव ) इनके अलावा जझोलो, सील भखरी,किशनपुरा आदी ऐक - ऐक गाँव के ठिकाने थे । 3 - केशवदासोत मेड़तिया - राव केश्वदाश जी राव जयमल जी के पुत्र थे । अकबर ने इन्हें आधा मेड़ता दिया । वि.सं. 1655 में गोपालदास के साथ शाही सेना के साथ पक्ष में लड़ते हुए बीड़ की लड़ाई में काम आये । बाद में मेड़ता जोधपुर के सूरसिंह को दे दिया गया । यही से मेड़ता से मेड़तियों का राज समाप्त होता है । इन्ही राव केश्वदाश जी के वंशज केशवदासोत मेड़तिया कहलाये । राव जयमल जी के पुत्र राव केश्वदाश जी के पुत्र इस प्रकार थे – (02) राव गिरधरदास जी - परवतसर का पट्टा मिला केशवदासोत मेड़तीयों के ठिकाने प्रकार थे – केशवदासोत को 22 गाँवो सहित के किद मिला । केशवदास के दुसरे पुत्र गिरधरदास को परवतसर का पट्टा मिला । परवतसर के बाद में- बदु (तेरह गाँवो का ठिकाना) इसके अतिरिक्त सबेलपुर (सात गाँव) बोडावड (चार गाँव) बुडसु (नो गाँव) कालवो (दो गाँव) मडोली तथा बरनेल, बणाग़नो, चितावो, उंचेरियों, लाडोली, आदी ऐक गाँव के ठिकाने थे । 4 - अखेसिंहोत मेड़तिया - केशवदास के बाद क्रमशः गिरधरदास ,गदाधर ,श्यामसिंह व् अखेसिंह हुए । इन्ही अखेसिंह के वंशज अखेसिंहोत मेड़तिया कहलाये । बुड़सु ,खीदरपुर कुकडदो ,तथा चाँवठिया इनके मुख्या ठिकाने थे । इनके अतिरिक्त टागलो ,खोजावास ,बीदयाद, डोडवाडो, जूसरियो, तोसीनो आदी छोटे -छोटे ठिकाने थे । चिडालिया नागौर से दो भाई देवीसिंह व् डूंगरसिंह घोड़ों पर सवार हेदराबाद पहुंचे जिसमे की देवीसिंह वहीँ पर पिछड़ गए डूंगर सिंह ने अपनी वीरता से निजाम हेदराबाद को प्रसन्न किया निजाम ने उन्हें “सर्फे खास व् नज्म” की उपाधियाँ दी । 1 हठी 100 घोड़े और 100 सिपाही रखने की इजाजत दी । राठौड़ो का बेड़ा स्थापित करने की जगह दी । वर्तमान में डूंगर सिंह के 7वे वंशज प्रेमसिंह प्रतिष्टित राठौड़ है । 5 - अमरसिहोत मेड़तिया - अखेसिंह के बड़े पुत्र अमरसिंह के वंशज । अमरसिहोत मेड़तीयों के ठिकाने प्रकार थे - मैनाणा (सात गाँवो) सात गाँवो का मुख्या ठिकाना था । रोडू विरड़ा (6गाँव)   इसके आलावा डासानो खुर्द व टांगलो ऐक ऐक गाँव के ठिकाने थे । 6 – गोयंद दासोत मेड़तिया - वीरम के पुत्र राव जयमल जी के पुत्र गोयंददास के वंशज । गोयंद दासोत मेड़तीयों के ठिकाने प्रकार थे - भावतो ( 31 गाँव इनके हिस्से में थे ) का ठिकाना था । इनके आलावा परगना मारोठ,परवतसर नागौर मेड़ता (कुछ गाँवो में )के बहुत से गाँवो में इनकी जागीरी थी । गेड़ी (मेड़ता परगने के तीन गाँव ) सरनावड़ो(मेड़ता नागौर व् परवतसर परगनों के ६ गाँव ) डोभड़ी ( मेड़ता परगने के दो गाँव ) इटावा ,लालो ,इटावा खिंचिया ,जसवंतपुरा ,दुमोई बड़ी ,दुमोई खुर्द ,पालडी राजां,डोभड़ी ,खुर्द ,रामसियो,खुडी ,रामसियो खुडी राथीगाँव ,नौरंगपूरा ,भवाद ,पोली ,बेहडवो ,झाड़ोद आदी ऐक ऐक गाँव के कई ठिकाने थे । नाथूसिहोत मेड़तिया - गोयंददास के पुत्र नाथुसिंह के नाथूसिहोत है । खरेस आदी नाथूसिहोत के ठिकाने थे । 7 - रघुनाथसिहोत मेड़तिया - गोयन्द्दास के पुत्र सांवलदास के पुत्र रघुनाथसिंह थे । रघुनाथसिंह बड़े वीर थे । ओरंगजेब के समय में इन्होने 1715 वि.में गोड़ों से मारोठ का परगना छीन लिया । इनके वंशज एंव रघुनाथसिहोत मेड़तिया कहलाये । रघुनाथ सिहोत मेड़तीयों के ठिकाने प्रकार थे – मारोठ परगने में भावतो 13 गाँव) घाटवो(11 गाँव ) नरोंणपूरा (15 गाँव) नडवो (6गाँव ) वासा (7गाँव) मगलानो गढ़ों(10गाँव) झिलियो (14 गाँव) सरगोठ (13 गाँव) कुकडवाली (5 गाँ ) लिचानो (5गाँव) जव्दी नगर (7 गाँव) मीठड़ी (नवां ,परवतसर मारोठ नागौर व् मेड़ता तीनो परगनों के 15 गाँव) करोप(मेड़ता व् दौलतपुरा परगना के तीन गाँव) खारठीयो (नवां परगना दो गाँव) चालुखो(नागौर वा दौलतपुरा परगना के दो गाँव) नीबी (दौलतपुरा व् नागोर परगना के 6 गाँव) अलतवो (मेड़ता परगना के दो गाँव ) डोडीयानो (मेड़ता परगना के 6 गाँव ) पीपलाद(परबतसर परगने के4 गाँव ) लापोलाई (मेड़ता वा परबतसर परगने के3 गाँव ) भाद्लिया (मेड़ता ,दौलतपुरा और परबतसर परगना के तीन गाँव ) आछोनाइ (मेड़ता परगना के तीन गाँव ) लूणवो (मारोठ परगने के 8 गाँव ) पांचवा (मारोठ परगने के 13 गाँव ) नीबोद (दौलतपुरा वा मारोठ परगने के तीन गाँव ) आदी इनके बड़े ठिकाने थे तथा ऐक गाँव वाले काफी ठिकाने थे । 8 - श्यामसिहोत मेड़तिया - राव जयमल जी के पुत्र राव गोयंददास जी के बाद क्रमशः सांवलदास व् श्यामसिंह हुए । इन्ही श्यामसिंह के वंशज श्यामसिहोत मेड़तिया कहलाये ।   श्यामसिँहत मेड़तीयों के ठिकाने प्रकार थे – शेखावाटी (राजस्थान) के बगड़ और अव्गुणा गाँवो में निवास करते है । नागौर जिले में रेवासा, भूरणी व् नावा में है। 9 - माधोदासोत मेड़तिया - राव जयमल जी के पुत्र राव माधोदास जी बड़े वीर थे । इहोने कई युद्धों में भाग लिया और वि.सं .1656 में मुगलों से लड़ते हुए काम आये । इन्ही के वंशज माधोदासोत मेड़तिया कहलाये । माधोदासोत मेड़तीयों के ठिकाने प्रकार थे - मेड़ता परगने में इनका रीया मुख्या ठिकाना था । मेड़ता परगने में बीजाथल (तीन गाँव) चीखरणीयो बड़ो (दो गाँव) चापारुण (पांच गाँव) आलणीयावास (चार गाँव) बलोली (दो गाँव)   चानणी बड़ी (दो गाँव) धीरड (दो गाँव)   इनके अलावा जाटी मेडास, ईड्वो, धोलेराव, पोलास, गोडेतिया, नैणीयो, गोठडो, सुरियाल, भैसडो, कीतलसर, बिखरणीयो, भाडली, बुताटी, बलोली, चुई, डोभड़ी, बरसणु, लंगोड़, आदी ऐक ऐक गाँव के ठिकाने थे । बीकानेर राज्य में खारी माधोदासोतों का ऐक छोटा सा ठिकाना था । चूरू जिले के भेंसली गाँव में भी रहते है । 10 - कल्याणदासोत मेड़तिया - राव जयमल जी के पुत्र राव कल्याणदास जी को राव सुरतान जी द्वारा रायण की जागीर मिली । मोटे राजा उदयसिंह जी की और से वि.1652 में खेरवा का पट्टा मिला । कल्याणदासोत मेड़तीयों के ठिकाने प्रकार थे - कालणा, बरकाना, कला रो बास आदी इनके ठिकाने थे । 11 - बिशनदासोत मेड़तिया - कल्याणदास जयमलोत के पुत्र बिसनदास के वंशज बिशनदासोत मेड़तिया कहलाते है । बिशनदास अपने समय के प्रतिभा व्यक्ति थे ।   बिशनदासोत मेड़तीयों के ठिकाने प्रकार थे - इनके मुख्य ठिकाने में खोडखास (पांच गाँव) अमरपुर (दो गाँव) बोरुदो (दो गाँव) तथा तामडोली, बरनो ,चोसली, जगड़बास, तिलानेस, मयापुर, चुवो ,राजलियावास, मीदीयान आदी ऐक ऐक गाँव के ठिकाने थे ।    12 - रामदासोत मेड़तिया - राव जयमल जी के पुत्र रामदास हल्दीघाटी के युद्ध (ई.1576) में वीरगति को प्राप्त हुए । इनके वंशज रामदासोत मेड़तिया कहलाये है । ये मवाद क्षेत्र में है । 13 - बिट्ठलदासोत मेड़तिया - राव जयमल जी के पुत्र बिट्ठलदास के वंशज । नीबी खास इनका दो गाँवो का ठिकाना था । इनके आलावा लूणसरा, इग्योर आदी मारवाड़ में इनके ठिकाने थे । बिट्ठलदास के पुत्र मनोहरदास मवाद में जाकर रहे । मेवाड़ में दांतड़ा इनका ठिकाना था । 14 - मुकंददासोत मेड़तिया - राव जयमल जी के पुत्र मुकुंद्दास को जयमल के चितोड़ में 1624 वि.में वीरगति पाने पर उदयसिंह ने गढ़बोर की जागीरी दी और जब मुगलों का बदनोर से अधिकार हट गया तब इन्हें बदनोर का ठिकाना मिला । इन्ही के वंशज मुकुंद्दासोत मेड़तिया कहलाये । ये बड़े वीर थे । वि.सं .1663 में परवेज द्वारा मेड़ता पर आक्रमण के समय वे इसके विरुद्ध बहादुरी से लड़े और वीरगति प्राप्त की । मवाद में बदनोर के आलावा उनके वंशज रूपहेली, डाबला, नीबाहेड़ा, जगपुरा आदी इनके ठिकाने थे । 15 - नारायणदासोत मेड़तिया - राव जयमल जी के पुत्र राव नारायणदास जी के वंशज । 16 - द्वाराकदासोत मेड़तिया - राव जयमल जी के पुत्र राव द्वारकादास जी अकबर की सेवा में रहे । वि.सं.1655 में वे शाही सेना की और से लड़ते हुए दक्षिण में बीद नामक स्थान पर काम आये। इन्ही के वंशज द्वारकादासोत मेड़तिया हुए । बछवारि इनका मुख्य ठिकाना था। 17 - हरिदासोत मेड़तिया - राव जयमल जी के पुत्र हरिदास के वंशज । 18 - शार्दुलोत मेड़तिया - राव जयमल जी के पुत्र शादुर्ल के वंशज शार्दुलोत मेड़तिया कहलाये । मेवाड़ में धोली इनका ठिकाना था । 19 - अनोप्सिहोत मेड़तिया - जयमल के पुत्र अनोपसिंह के वंशज। चानोद इनका ठिकाना था । 20 - ईशरदासोत मेड़तिया - राव वीरमदेव जी के पुत्र राव ईशरदास जी बड़े वीर थे । चितोड़ के युद्ध में वे जयमल के साथ थे । अकबर के मधु नामक हठी के खांडा मारकर उसका दांत पकड़ लिया था और युद्ध करते हुए काम आये । इन्ही के वंशज ईशरदासोत मेड़तिया कहलाये । इनके वंशजों के अधिकार में बीकावास ,सुमेल ,खरवो,आदी ठिकाने । 21 - जगमलोत मेड़तिया - राव वीरमदेव जी के पुत्र राव जगमाल जी राव मालदेव जी को सेवा में रहे । मालदेव ने जयमल से मेड़ता लेकर आधा भाग जगमाल को दे दिया । जयमल ने फिर मेड़ता पर अधिकार कर लिया । बादशाह अकबर ने मेड़ता फिर छीन लिया और जगमाल को दे दिया इन्ही जगमाल के वंशज जगमलोत मेड़तिया हुए । ड्सानो,बड़ो ,घिरडोदो ,जेसला ,कुडली ,छापरी बड़ी ,राठील,दाउदसर ,बनवासी ,भांडासर,घिरडोदी,डडी ,माना री ढाणि आदी इनके ठिकाने थे । 22 - चांदावत मेड़तिया – मेडता के राव जयमाल कि नई -नई शादी हुई ,उस वक़्त राव चांदा जी ,जोधपुर कि तरफ से किसी युद्ध में व्यस्त थे ,जब वो वापस मेड़ता आए तो सोचा चलो नए भाभीसा से मुजरा कर आउ ,सो वो उनके महल पहुचे और दासी से कहलवाया कि राव चांदा आया है , दासी ने पटराणी सा को जाकर बताया कि परम वीर वीरवर राव चांदा जी पधारे है ,आप से मुजरा करने , चूकि नई पटराणी सा , मेवाड़ कि सेनापति नारायण सोलंकी कि बेटी थी ,सो उनको अपने पिता और राज्य का बहुत अभिमान था , सो पटराणी ने दासी से कह दिया काहे के वीर ऐसे वीर तो मेरे पिता के दरबार में बहुत सारे है ,राव चांदा ने ये बात सुन ली ,सो वह बिना मुजरा करे वहाँ से निकले और सीधे अपने डेरे पहुचे और अपने 24 सवारो के साथ मेवाड़ कूच किया ,और नारायण सोलंकी पर आक्रमण कर दिया , इस युद्ध में राव चांदा विजय हुए ,उन्होंने नारायण सोलंकी का सर काटा और वापस मेड़ता आके जयमल जी कि नयी पट-राणी सा को भेंट स्वरूप भिजवा दिया साथ में यह कहलवाया "आइंदा से कभी राठौड़ों से ऐसी चुबती बात नहीं करना !! : बलुन्दा ठिकाने के राजकवि माधवदास दडवाडिया लिखित चांदाजी री वेली " में से यह प्रसंग है राव वीरमदेव जी के पुत्र राव चांदा जी ने बाझाकुंडो की भूमि पर अधिकार कर वि.सं.1603 में बलुन्दा को आबाद किया । चांदा राव मालदेव की सेवा में रहे | मालदेव द्वारा मेड़ता पर आक्रमण करते समय चांदा उनके साथ में थे । राव मालदेव जी के भयभीत होने पर उन्होंने जोधपुर पहुँचाया । राव राव मालदेव जी ने उन्हें ऐक बार आसोप और रास का पट्टा भी दिया था । हुसेन कुलिखां द्वारा जोधपुर पर आक्रमण करने के समय राव चांदा जी चन्द्रसेन के पक्ष में लड़े । नागौर के सुबायत हुसेन अली से भी कई लड़ाइया लड़ी । नागौर के नवाब ने उन्हें धोखे से मारना चाहा । इस षड़यंत्र में चांदा तो मरे पर नवाब को भी साथ में लेकर मरे । चांदावत मेड़तीयों के ठिकाने प्रकार थे - बलुन्दा इनका मुख्या ठिकाना था । धनापो, दूदड़ास, सूदरी, कुडकी, डाभडो, खानड़ी, बडवालो, सेवरीयो, आजडाली, लाडपूरा, सुंथली, हासीयास, पूजीयास, लायी मुगधडो, देसवाल, नौखा, नोवड़ी, ओलादण, गागुरडो, मागलियास, डोगरानो, अचाखेड़ो, रेवत, रोहल, छापर बड़ी, पीड़ीयो,रो हीनो, बसी, सिराधनो, बाखलियाच, चिवली आदी ऐक ऐक गाँव के ठिकाने थे । मवाद के शाहपुर राज्य में खामोर चांदावतों का ठिकाना था । ये बलुन्दा ठिकाने से शाहपुरा गए । 23 - प्रताप्सिहोत मेड़तिया - राव वीरमदेव जी के पुत्र प्रतापसिंह महाराणा उदयसिंह चितोड़ के पास रहे । 1624 विक्रमी में अकबर ने चितोड़ पर आक्रमण किया । उस युद्ध में जयमल के साथ वीरगति हुए । इन्ही के वंशज प्रतापसिहोत मेड़तिया हुए ।   इनके तीन पुत्र गोपालदास ,भगवानदास ,हरिदास थे । गोपालदास ने हल्दी घाटी व् कुम्भलगढ़ के युद्ध्दों मे वीरता दिखाई अतः राणा ने इनको घानोराव का इलाका प्रदान किया । 24 - गोपिनाथोत मेड़तिया - वीरमदेव के पुत्र प्रतापसिंह के बाद क्रमश गोपालदास, किशनदास, दुर्जनसाल व् गोपीनाथ हुए । गोपिनाथोत मेड़तीयों के ठिकाने प्रकार थे - पिता दुर्जनशाल के बड़े पुत्र होने के कारन इन्हें घानोराव प्राप्त हुआ । घानोराव ऐक छोटा सा राज्य था । गोपीनाथ ने जयसिंह व् उनके पुत्र अमरसिंह के बीच हुए मन मुटाव को मिटाया । महाराणा ने इनको खीमेल ,नीपरड़ा ,अरसीपूरा ,राजपुरा ,खारडा ,टीपरी,वरकाणा आदी गाँव प्रदान किये । मारवाड़ में नादानो बड़ो (25 गाँव) चानोद (21गाँव) कोसेलाव (4 गाँव) बरकानो (8गाँव) फालनों (8 गाँ ) व् इनके अतिरिक्त सिदरड़ी ऐक गाँव के ठिकाने थे । 25 - मांडनोत मेड़तिया - राव वीरमदेव जी के पुत्र राव मांडण जी सोलंकियों के विरुद्ध लड़ते बरहड़ा के युद्ध में मरे गए । इन्ही के वंशज मांडनोत मेड़तिया कहलाये । 26 - रायमलोत मेड़तिया - मेड़ता राव दूदा जी के पुत्र राव रायमल जी को राव वीरमदेव जी ने रायाण का पट्टा प्रदान किया । यह इनका मुख्य ठिकाना था । विक्रमी 1583 के खानवा युद्ध में महाराणा सांगा के पक्ष में आपने भाई वीरमदेव के साथ यह भी युद्ध में लड़े और वीरगति पायी । इन्ही के वंशज रायमलोत मेड़तिया कहलाये । रायमल के ऐक पुत्र अर्जुन व् उसके भतिज रूपसी चितोद के तीसरे शाके के समय वि.सं.1624 में काम आये । रायमलोत मेड़तीयों के ठिकाने प्रकार थे - रायाणा, के अलावा ढावो , जोरोडो, पडो, जालू, बासणी, जाल, बारवलो, जनस्वास, देवालोमोसो, मीठड़ीया आदी इनके ठिकाने थे । मेड़तिया राठौड़ो का पीढी क्रम ईस प्रकार है –

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सुरताण - राव जयमल जी – राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी - राव जोधा जी केशवदास - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी राव गिरधरदास जी - केशवदास - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी अखेसिंह - श्यामसिंह - गदाधर - गिरधरदास – केशवदास - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी अमरसिंह - अखेसिंह - श्यामसिंह - गदाधर - गिरधरदास – केशवदास - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी राव गोयंददास जी - राव जयमल जी – राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी नाथुसिंह - राव गोयंददास जी - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी राव रघुनाथ सिंह जी - राव सांवलदास जी - राव गोयंददास जी - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी श्यामसिंह - राव सांवलदास जी - राव गोयंददास जी - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी राव माधोदास जी - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी राव कल्याणदास जी - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी बिसनदास - राव कल्याणदास जी - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी राव रामदास जी - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी राव रामदास जी - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी राव मुकंददास जी - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी राव नारायणदास जी - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी - राव जोधा जी राव द्वारकादास जी - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी राव हरिदास जी - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी राव शादुर्ल जी - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी राव अनोपसिँह जी - राव जयमल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी राव ईशरदास जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी राव जगमाल जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी राव चांदा जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी प्रतापसिंह - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी गोपालदास - प्रतापसिंह - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी भगवानदास - प्रतापसिंह - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी हरिदास - प्रतापसिंह - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी गोपीनाथ - दुर्जन साल - किशनदास - गोपालदास - प्रतापसिंह - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी राव मांडण जी - राव वीरमदेव जी - राव दूदा जी - राव जोधा जी राव रायमल जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी अर्जुन - राव रायमल जी - राव दूदा जी- राव जोधा जी - राव रणमल जी (राव रिङमाल जी) मेड़तिया राठौड़ो की ख्यात अनुसार पीढी क्रम ईस

कनौज में राठौड़ वंश का इतिहास

कनौज मेँ राठौङ वंश का इतिहासजयचंद्र - विजय चंद्रहरीश चन्द्र - जय चन्द्र - विजय चन्द्र - गोविन्द चन्द्र - मदनपाल - चन्द्र देव – जयचंद्र (1170 - 94 ई॰) कन्नौज के राज्य की देख-रेख का उत्तराधिकारी उसके पिता विजय चंद्र ने अपने जीवन-काल में ही बना दिया था। विजय चंद्र की मृत्यु के बाद वह कन्नौज का विधिवत राजा हुआ। वह बड़ा वीर, प्रतापी और विद्धानों का आश्रयदाता था। उसने अपनी वीरता और बुद्धिमत्ता से कन्नौज राज्य का काफ़ी विस्तार किया था। जयचंद्र दिल्ली के राजा अनंगपाल की पुत्री से उत्पन्न हुआ था। जयचंद्र चंदेल राजा मदनवर्मदेव को पराजित किया था। जयचंद्र के समय में गाहडवाल साम्राज्य बहुत विस्तृत हो गया। इब्न असीर नाम लेखक ने तो उसके राज्य का विस्तार चीन साम्राज्य की सीमा से लेकर मालवा तक लिखा है। अंत में वह मुसलमान आक्रमणकारी मुहम्मद शहाबुदीन गौरी से पराजित होकर चँद॔वार की लड़ाई (इटावा के पास) में (वि.सं.1251) मारा गये थे उनकी मृत्यु के तुरंत बाद कन्नौज तुर्कों के कब्जे में चला गया। यह कन्नौज केराठौङ वंश के अंतिम महत्वपूर्ण शासक थे।सहदेव - ब्रहद्रथ - वसु - जरासंध – यल्ज्क्सहदेव का वध द्रोणाचार्य…

भगवान श्री राम से लेकर कनौज तक राठौड़ वंश का इतिहास

भगवान श्री राम से लेकर कनौज तक राठौङ वंश का इतिहासइस प्रकार भगवान श्री राम का जन्म मनु की चालिसवीँ पिढी मेँ और इकतालिसवीँ पिढी मेँ लव व कुश का जन्म हुआ। भगवान श्री राम के दो पुत्र थे –    01 - लव    02 - कुशरामायण कालीन महर्षि वाल्मिकी की महान धरा एवं माता सीता के पुत्र लव-कुश का जन्म स्थल कहे जाने वाला धार्मिक स्थल तुरतुरिया है।भरत के दो पुत्र थे -    01 - तार्क्ष     02 - पुष्कर।लक्ष्मण के दो पुत्र थे –    01 - चित्रांगद     02 - चन्द्रकेतुशत्रुघ्न के क दो पुत्र थे –    01 - सुबाहु और          02 - शूरसेन थे। (मथुरा का नाम पहले शूरसेन था)- लव और कुश राम तथा सीता के जुड़वां बेटे थे। जब राम ने वानप्रस्थ लेने का निश्चय कर भरत का राज्याभिषेक करना चाहा तो भरत नहीं माने। अत: दक्षिण कोसल प्रदेश (छत्तीसगढ़) में कुश और उत्तर कोसल में लव का अभिषेक किया गया।- राम के काल में भी कोशल राज्य उत्तर कोशल और दक्षिण कोशल में विभाजित था। कालिदास के रघुवंश अनुसार राम ने अपने पुत्र लव को शरावती का और कुश को कुशावती का राज्य दिया था। शरावती को श्रावस्ती मानें तो निश्चय ही लव का राज्य उत्तर भारत में था और …

कुछ मंदिर प्रसिद्ध मेड़तिया राठौड़[संपादित करें]

इतिहास और पूर्वज[संपादित करें]

1. महाराजराजा यशोविग्रह जी (कन्नौज राज्य के राजा)

2. महाराजराजा महीचंद्र जी

3. महाराज राजा चन्द्रदेव जी

4. महाराजराजा मदनपाल जी (1154)

5. महाराज राजा गोविन्द्र जी

6. महाराज राजा विजयचन्द्र जी जी (1162)

7. महाराज राजा जयचन्द जी (कन्नौज उत्तर प्रदेश 1193)

8. राव राजा सेतराम जी

9. राव राजा सीहा जी (बिट्टू गांव पाली, राजस्थान 1273)

10. राव राजा अस्थान जी (1292)

11. राव राजा दूहड़ जी (1309)

12. राव राजा रायपाल जी (1313)

13. राव राजा कान्हापाल जी (1323)

14. राव राजा जलमसी जी (1328)

15. राव राजा चड़ा जी (1344)

16. राव राजा तिडा जी (1357)

17. राव राजा सलखा जी (1374)

18.राव राजा विरमदेव जी (1383)

19.राव राजा चूण्डा जी (1422)

20. राव राजा रणमल जी (1438) ---. >>>

21.राव जोधा जी (1438-1488) जोधपुर के संस्थापक

22. राव दूदाजी (1461-1504) मेड़ता राज्य नागौर के संस्थापक [7]

== मेड़तिया राठौड़ो के मुख्य ठिकाने =चुवा ढुंढिया, लुणसरा (नागौर), बरसाना (जायल)बरसाना, सबलपुर,बोरुंदा, रानी गाँव(मकराना), अलनियावास, बदनौर, घाणेराव, राजपुरा ,जिलिया, रिया, माईदास , बलुन्दा, मसूदा, कुचामन ,गेलासर,बेड़वा, खरेश,[{सिंगरावट खुर्द,डीडवाना}] चाणौद, वरकाणा, रूवाँ सिन्दरली, रोडू,घीराडोदा, जैसलान ,बाकलिया, ध्यावा (लाडनूँ)[8], फलना गाव और गुजरात में जामला,दौलतगढ और धनौली , मध्य प्रदेश में मकरवान , चिराला जालोर मैं मेड़तिया के ठीकाणा जीवाणा व थलवाड़,गुडा रामजी,बोलगुडा (रानी, ​​पाली) आदि [9][10]

सन्दर्भ[संपादित करें]

[1]