मुहम्मद अल-शायबानी
अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद इब्न अल-हसन इब्न फरक़द अश-शायबानी (अरबी: أبو عبد الله محمد بن حسن بن فرقد الشيباني; 749/750–805 ईस्वी), उन्हें इमाम मुहम्मद के नाम से भी जाना जाता है, एक अरब मुस्लिम न्यायविद (फ़क़ीह) थे।उन्हें मुस्लिम अंतरराष्ट्रीय कानून (Islamic International Law) का जनक (Father) माना जाता है।
वे अबू हनीफ़ा के शिष्य थे, जो इस्लामी न्यायशास्त्र (फ़िक़्ह) के हनाफ़ी मत के संस्थापक थे। बाद में वे मालिक इब्न अनस और अबू यूसुफ से भी जुड़े रहे।

मुहम्मद इब्न अल-हसन का जन्म 750 ईस्वी में वासित (इराक) में हुआ था। कुछ समय बाद वे कूफ़ा चले गए, जो अबू हनीफ़ा का जन्मस्थान था, और वहीं उनकी परवरिश हुई।
हालाँकि उनका जन्म एक सैनिक परिवार में हुआ था, लेकिन उनका रुझान सैन्य जीवन की जगह ज्ञान और अध्ययन की ओर अधिक था।
शैबानी ने कूफ़ा में अबू हनीफ़ा के शिष्य के रूप में अध्ययन शुरू किया। लेकिन जब शैबानी की उम्र 18 वर्ष (767 ईस्वी) थी, तब अबू हनीफ़ा का निधन हो गया, और इस प्रकार शैबानी को अपने शिक्षक से केवल दो वर्षों तक ही शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला।
इसके बाद शायबानी ने अपने वरिष्ठ और अबू हनीफ़ा के प्रमुख शिष्य अबू यूसुफ से शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त करना शुरू किया। उनके अन्य प्रसिद्ध शिक्षक सूफियान अल-सौरी और अल-अवज़ाई भी थे।बाद में उन्होंने मदीना की यात्रा की और वहाँ मालिक बिन अनस (जो फ़िक़्ह के मालिकी मत के संस्थापक थे) के साथ लगभग दो से तीन वर्ष तक अध्ययन किया।इस तरह, अपनी गहरी शिक्षा और विद्वानों की संगति के कारण, अल-शायबानी बहुत कम उम्र में ही एक महान न्यायविद (फ़क़ीह) बन गए।अबू हनीफ़ा के पोते इस्माइल के अनुसार, उन्होंने लगभग बीस वर्ष की आयु में (लगभग 770 ईस्वी) कूफ़ा में पढ़ाना शुरू कर दिया था।
बगदाद में
[संपादित करें]अल-शायबानी बगदाद चले गए, जहाँ उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी। उनका इतना सम्मान किया जाता था कि खलीफा हारून अल-रशीद ने उन्हें 796 ईस्वी के बाद अपनी राजधानी रक्का (रक्का) का न्यायाधीश नियुक्त किया। अल-शायबानी को 803 में इस पद से मुक्त कर दिया गया था। वह बगदाद लौट आए और अपनी शैक्षिक गतिविधियों को फिर से शुरू किया। बे समखोन्दोआव बिथाङा गावनि गुवारसिन गोहोम खोख्लैदोंमोन। उन्होंने अपने शिष्यों में सबसे प्रतिष्ठित मुहम्मद इब्न इदरीस अश-शफी को पढ़ाया। बाद में भी, जब अश-शफी अपने शिक्षक से असहमत हुए और किताब अल-रद्-आला मुहम्मद बिन अल-हसन (मुहम्मद बिन अल हसन [अल-शायबानी] का खंडन) लिखा, तब भी उन्होंने अपने शिक्षक के लिए अपार प्रशंसा बनाए रखी।