मुचुकुन्द

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मुचुकुन्द त्रेता युग के इक्ष्वाकु (सूर्यवंश) कुल के राजा थे, जिस कुल में श्री राम, राजा दिलीप, राजा हरिश्चन्द्र, रघु, इत्यादि महारथी हुए। उनके भाई अम्बरीष उनके समान ही शूरवीर थे।

इतिहास[संपादित करें]

मुचुकुन्द श्री राम के पूर्वज थे। असुरो के खिलाफ देवों की सहायता करने के फल स्वरूप वे अत्यन्त थक गए थे इसलिए उन्हें चिरनिद्रा का वरदान दिया गया था। देवों के कार्यों में सहायता के लिए इंद्रदेव ने उन्हें मुक्ति के सिवाय कोई भी वर मांगने को कहा। उन्होंने बिन-अवरोध निद्रा मांगी, और यह भी अन्तर्गत किया गया कि उनकी निद्रा भंग करने वाला तुरंत भस्म हो जाएगा।

कालयवन संहार[संपादित करें]

कालयवन, जो यवन महारथी थे, उनका संहार मुचुकुन्द की दृष्टि के प्रकोप से हुआ। दैविक आशीर्वाद के कारण, कालयवन को पराजित करना असंभव था। उसे पता चला कि सिर्फ श्री कृष्ण ही उनको पराजित कर सकते हैं। इस कारण कालयवन ने द्वारिका पर आक्रमण कर दिया। कालयवन के आशीर्वाद की वजह से उसे पराजित करना कठिन था। श्री कृष्ण ने युक्ति लगाकर रण छोड़ दिया। इस कारण उन्हें रणछोड़दास का नाम मिला। श्री कृष्ण मुचुकुन्द की गुफा में घुस गए, उन पर अपने वस्त्र डाल दिये। इस कारण कालयवन को लगा की श्री कृष्ण वहां आकर सो गए हैं। अँधेरे में बिना देखे मुचुकुन्द को ललकार कर जगाया, और इसका परिणाम यह हुआ कि कालयवन भस्म हो गया।

परिशिष्ट भाग[संपादित करें]

श्री कृष्ण ने मुचुकुन्द को आशीष दिए, और मुक्ति की ओर मार्ग दर्शन कराए। जब मुचुकुन्द गुफा से बाहर निकले तो उन्होंने देखा की लोग और अन्य प्राणी छोटे छोटे हो गए हैं। क्योंकि वह श्री राम के पूर्वज थे (त्रेता युग) और तब से निद्रावस्था में थे,द्वापर युग तक सृष्टि में काफी परिवर्तन हुआ था ऐसा ज्ञात कर सकते हैं।

पुस्तक[संपादित करें]

  • Pictorial Stories for Children Volume 15 - श्रि रामक्रिश्न माथ, चेन्नै - ISBN ८१-७१२०-८४२-८