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निर्वाचित लेख

कालिंजर दुर्ग के महल
कालिंजर दुर्ग, भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश के बांदा जिला स्थित एक दुर्ग है। बुन्देलखण्ड क्षेत्र में विंध्य पर्वत पर स्थित यह दुर्ग विश्व धरोहर स्थल खजुराहो से ९७.७ किमी दूर है। इसे भारत के सबसे विशाल और अपराजेय दुर्गों में गिना जाता रहा है। इस दुर्ग में कई प्राचीन मन्दिर हैं। इनमें कई मंदिर तीसरी से पाँचवीं सदी गुप्तकाल के हैं। यहाँ के शिव मन्दिर के बारे में मान्यता है कि सागर-मन्थन से निकले कालकूट विष को पीने के बाद भगवान शिव ने यही तपस्या कर उसकी ज्वाला शांत की थी। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाला कतिकी मेला यहाँ का प्रसिद्ध सांस्कृतिक उत्सव है। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात इसकी पहचान एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर के रूप में की गयी है। वर्तमान में यह दुर्ग भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकार एवं अनुरक्षण में है। विस्तार में...

समाचार

अम्फान चक्रवात से हुआ नुक्सान
  • अम्फान चक्रवात ने पूर्वी भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका में भीषण तबाही मचाई (चित्रित)। पूर्वी भारत में 72 लोगों की मृत्यु होने की सूचना मिली है।
  • विशाखपट्नम गैस रिसाव दुर्घटना में जहरीली गैस लीक होने की वजह से 13 लोगों की मृत्यु हो गयी और 200 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया।
  • एक दिन के अंतराल में हिन्दी सिनेमा के दो वरिष्ठ अभिनेताओं इरफ़ान खान (आयु 56 वर्ष) और ऋषि कपूर (आयु 67 वर्ष) का कैंसर से निधन।


हाल के निधन: सुशांत सिंह राजपूत, योगेश गौड़, वाजिद अली, ऊषा गांगुली, गिरिराज किशोर

क्या आप जानते हैं?

काश्मीर में एक शिकारा

निर्वाचित चित्र

Shrinika performing Abhinaya (Kede Chhanda Janilu Tuhi).jpg



ओड़िसी नृत्य करती हुई बालिका।



प्रत्याशी   --   पुरालेख

आज का आलेख

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (९ सितंबर १८५०-७ जनवरी १८८५) आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। भारतेन्दु हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। इनका मूल नाम हरिश्चन्द्र था, भारतेन्दु उनकी उपाधि थी। उन्होंने रीतिकाल की विकृत सामन्ती संस्कृति की पोषक वृत्तियों को छोड़कर स्वस्थ्य परम्परा की भूमि अपनाई और नवीनता के बीज बोए। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेन्दु से माना जाता है। हिंदी पत्रकारिता, नाटक और काव्य के क्षेत्र में उनका बहुमूल्य योगदान रहा। हिंदी में नाटकों का प्रारंभ भारतेन्दु हरिश्चंद्र से माना जाता है। इनके नाटक लिखने की शुरुआत बंगला के विद्यासुंदर (१८६७) नाटक के अनुवाद से होती है। ये एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे। इसके अलावा वे लेखक, कवि, संपादक, निबंधकार, एवं कुशल वक्ता भी थे। विस्तार में...

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