मुंबई डब्बावाला

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'Dabawala's' competing in 'Mumbai Cyclothon-2010'

डब्बावाला या डब्बेवाले ऐसे लोगोंॱ का एक समूह है जो भारत मेंॱ ज्यादातर मुंबई शहर मेॱ काम कर रहे सरकारी और गैर-सरकारी कर्मचारियों को दोपहर का खाना कार्यस्थल पर पहुँचाने का काम करता है।

मुंबई डब्बावाला से जुड़ी खास जानकारी[संपादित करें]

  • 1890 में मुंबई डब्बावाला की शुरुआत
  • 2 लाख लोगों को खाने की सप्लाई
  • तीन घंटे के अंदर खाना घर से लेकर दफ्तर तक पहुंचता है
  • हर रोज 60 से 70 किलोमीटर तक का सफर तय
  • खाने की सप्लाई के लिए 600 रुपये महीना खर्च
  • खाने की सप्लाई में साइकिल और मुंबई की लोकल ट्रेन की मदत होती है
  • काम में जुड़े प्रत्येक कर्मचारी को 9 से 10 हजार रुपये मासिक मिलता है
  • साल में एक महीने का अतिरिक्त वेतन बोनस की तोर पर लेते है.
  • नियम तोड़ने पर एक हजार फाइन लगता है
  • मुंबई डबावाला असोशिएशन के विद्यमान अध्यक्ष भाऊसाहेब तथा शांताराम करवंदे और प्रवक्ता सुभाष गंगाराम तलेकर है.
  • डबेवाले संघटन के जनरल सेक्रेटरी स्व.गंगाराम तलेकर के कार्यकाल मे डबेवाला संघटन को अनेक पुरस्कार मिले. जिसमे सिक्स सिग्मा, आय,एस,ओ,प्रमाणपत्र है. स्व.गंगाराम तलेकर के पिताजी स्व.लक्ष्मण तलेकर डबावाला असोशिएशन के फांऊडर मेंबर मे से एक थे और स्व.गंगाराम तलेकर के बेटे सुभाष तलेकर डबेवाला असोशिएशन के प्रवक्ता है.याने की “थर्ड जनरेशन ईन दिस बिजनेस”

तलेकर फॅमिली जैसी डबेवालो मे और भी बहुत फॅमिली है जो थर्ड जनरेशन मे काम करती है.


मुंबई डब्बावाला के नियम[संपादित करें]

    • काम के समय कोई व्यक्ति नशा नहीं करेगा
    • हमेशा सफेद टोपी पहननी होगी
    • बिना पूर्व सूचना दिए कोई छुट्टी नहीं मिलेगी
    • हमेशा अपने साथ आई कार्ड रखना होगा[1]

समय की पाबंदी[संपादित करें]

बई में करीब पांच हजार डब्बवाले रोजाना दो लाख टिफिन की डिलीवरी करते हैं। इस सेवा की सबसे बड़ी खासियत है, समय पर डिलीवरी। डब्बावाले कभी लेट नहीं होते। आप ट्रेन की देरी या फिर किसी वजह से ऑफिस में लेट हो सकते हैं, पर डब्बावाला हमेशा समय पर आपका टिफिन लेकर हाजिर हो जाता है। डब्बावाले हर दिन दो लाख टिफिन की डिलीवरी करते हैं, पर टिफिन की पहचान में कभी कोई गड़बड़ी नहीं होती है। टिफिन पर इस तरह कोडिंग की जाती है कि जिसका टिफिन है, उसे ही मिलता है। डिलीवरी करने वाले डब्बावाले बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं, किंतु टिफिन डिलीवरी में किसी तरह की गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं होती।[2]


अन्ना हज़ारे का समर्थन[संपादित करें]

नूतन डब्बावाला ट्रस्ट के सचिव किरण गवांडे ने कहा कि अगत २०११ के एक शुक्रवार को टिफिन न पहुंचाकर संस्था ने अपनी 120 साल पुरानी परम्परा को पहली बार तोड़ चुकी हैं और इसका कारण यह है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना के प्रयासों और भूक हड़तालों के प्रति समर्थन जताने की छोटी सी कोशिश है।[3]


सन्दर्भ[संपादित करें]