मिलेनियम '73

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मिलेनियम '73 8 से 10 नवम्बर 1973 को अमेरिका के टेक्सास के हाउस्टन के एस्ट्रॉडम में डिवाइन लाइट मिशन द्वारा आयोजित एक तीन दिवसीय मुक्त उत्सव था। इस उत्सव में पंद्रह वर्षीय प्रेम रावत यानी गुरू महाराज जी को प्रस्तुत किया गया।[1] Organizers billed the festival as the most significant event in human history which would usher in a thousand years of peace.[2][3]

इस उत्सव की तीनों दिन संध्या में गुरू महाराज जी का प्रवचन ही इसका आकर्षण था।[4] बिग-बैंड संगीत, रॉक बैंड, संकीर्तन, कोरल कार्य, नृत्य और डिवाइन लाइट मिशन के मुख्य अतिथियों के प्रवचन भी आकर्षण के केंद्र थे। इसमें बड़ी संख्या में मीडिया ने भी हिस्सा लिया।

मिलेनियम '73 को व्यापक लोकप्रियता हासिल हुई. युद्ध-विरोधी अभियान के कार्यकर्ता रेनी डेवीस को डिवाइन लाइट मिशन ने अपना प्रवक्ता नियुक्त किया था, जिसके लोगों का व्यापक ध्यान खींचा। इस उत्सव में प्रसिद्ध पत्रकारों ने भी हिस्सा लिया। कुछ पत्रकारों ने इसे सत्तर के दशक का अहम आयोजन बताया. अमेरिका में डिवाइन लाइट मिशन के इतिहास में यह घटना सबसे अहम थी और गुरू महाराज को अद्वितीय ख्याति मिली. इस उत्सव में करीब 10,000 से 35,000, लोगों ने हिस्सा लिया, जो कि अनुमानित 100,000 से कम था। इसलिए कुछ मीडिया ने इसे निराशाजनक भी बताया. इस उत्सव की वजह से डिवाइन लाइट मिशन कर्ज से घिर गया और अपने प्रबंधन, संचरना और संदेशों में बदलाव करना पड़ा. बाद के दिनों में यह मिशन दो हिस्सों में बंट गया। पश्चिमी दुनिया का जिम्मा खुद महाराज जी ने संभाला और भारत का जिम्मा उनकी मांग और भाई सतपाल महाराज ने संभाला.

घटना से पहले[संपादित करें]

भूमिका[संपादित करें]

इन्हें भी देखें: प्रेम रावत जी की शिक्षाएं
14 जुलाई 1971, फ्रांस में गुरू महाराजजी

हंस जी महाराज ने ज्ञान नाम से ध्यान के रहस्यमय तकनीक की शिक्षा दी.[5][6] 1960 में उन्होंने भारत में डिवाइन लाइट मिशन की स्थापना की. हंसजी को "गुरू महाराज जी", भी कहा जाता है, छह साल बाद उनका निधन हो गया। इसके बाद उनका आठ वर्षीय पुत्र ने आध्यामिक गुरू की अधिसत्ता संभाली और पिता की उपाधि 'गुरू महाराज जी' ग्रहण की. चूंकि गुरू महाराज जी उस समय छोटे थे, इसलिए उनकी माता, माताजी और बड़े भाई बाल भगवान जी ने डिवाइन लाइट मिशन का प्रबंधन संभाला.[7][8] 1971 में तेरह वर्षीय गुरू महाराजजी ने ब्रिटेन और अमेरिका का दौरा किया। उस में भारत में मिशन से पचास लाख सदस्य थे। जल्द ही अमेरिका में भी इसके पचास हजार से ज्यादा सदस्य हो गए। कुल मिलाकर इसके साठ लाख सदस्य हो गए।[9] Most of the Western followers were young people from the 1960s counterculture.[10][11]

मिशन हर साल तीन उत्सव मनाता है जिसमें सबसे बड़ा 9 नवम्बर को हंसराज महाराज का जन्मदिन मनाया जाता है।[12] सत्तर के दशक में होने वाले हंस जयंती उत्सव में करीब एक लाख लोग इकट्ठा होते थे, जिनमें विदेशी भी शामिल थे।[13][14][15]माता जी और बाइस वर्षीय बाल भगवान जी ने निर्णय किया कि 1973 में हंस जयंती उत्सव अमेरिका में मनाएंगे.[16]

इस उत्सव में मिशन ने अपने सारे संसाधन झोंक दिए.[17] इस उत्सव पर करीब 1,000,000 अमेरिकी डॉलर खर्च आया[18] इसमें 75,000 डॉलर एस्ट्रॉडम का किराया और 100,000 डॉलर विज्ञापन खर्च शामिल है।[19]मिशन ने अपने अतिथियों ने फ्लाइट के खर्च चुकाए.[20]खर्च की भरपाई के लिए मिशन के सदस्यों पर दबाव था।[21][22] आयोजकों ने मीडियाकर्मियों को भी बुलाया। उन्हें लगा था कि मीडिया गुरू महाराज जी का सकारात्मक प्रचार करेगा.[23][24][25]

सहस्राब्दी संदेश[संपादित करें]

साठ और सत्तर के दशक में अमेरिका में लोग सोचते थे कि दुनिया नए दौर से गुजर रही थी। इस नए युग में शांति, प्रेम और समझदारी के रूप में देखा गया।[26][27]

  1. Larson 1982, पृष्ठ 205
  2. Galanter 1989, पृष्ठ 24
  3. Levine 1974
  4. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; And It Is Divine 1973 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  5. Melton 1992, पृष्ठ 143
  6. Rawson 1973
  7. Downton 1979, ch. 12
  8. Geaves 2006
  9. Rudin & Rudin 1980, पृष्ठ 63
  10. Downton 1979, पृष्ठ 3
  11. Melton 1992, पृष्ठ 217
  12. Melton 1986, पृष्ठ 141–145
  13. Jeremy 1974
  14. Mangalwadi 1977, पृष्ठ 219
  15. Moritz 1974, पृष्ठ 254–258
  16. Downton 1979, पृष्ठ 191
  17. Lewis 1998, पृष्ठ 84
  18. Snell 1974
  19. Kilday 1973b
  20. Messer 1976, पृष्ठ 67
  21. MacKaye 1973
  22. Collier 1978, पृष्ठ 133
  23. Goldsmith 1974
  24. Downton 1979, पृष्ठ 5
  25. Winder & Horowitz 1973
  26. Tacey 2004, पृष्ठ 256
  27. Rado & Ragni 1967