मित्रसेन आर्य

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चौधरी मित्रसेन आर्य (15 दिसंबर, 1931 - 27 जनवरी 2011) भारत के प्रसिद्ध उद्योगपति, समाससेवी, आर्य समाजी तथा हिन्दी दैनिक हरिभूमि के संस्थापक थे। उन्होने युवाओं को चरित्रवान व गुणवान बनाने के लिए तकनीकी व उच्च शिक्षा के लिए अनेक शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की। कैप्टन अभिमन्यु उनके ही सुपुत्र हैं।

चौधरी मित्रसेन आर्य का जन्म 15 दिसम्बर, 1931 को हिसार जिले के खांडाखेड़ी गाँव के आर्य समाजी परिवार में हुआ था। उनका परिवार स्वाधीनता संग्राम सेनानी परिवार था। उनका बचपन विकट परिस्थितियों में गुजरा, किन्तु उन्होंने अपने आशावादी दृष्टिकोण, विवेक व बुद्धि के बल पर पहाड़-सी कठिनाइयों का सामना अत्यन्त धैर्यपूर्ण ढंग से किया। उन्होने अपनी सूझ-बूझ, कठिन परिश्रम, दूरदर्शिता और सादगी के बल पर सफलता की एक ऐसी शानदार इबारत लिखी, जो एक उदहरण है।

चौधरी साहब ने उड़ीसा के बीहड़ जंगलों से लेकर घने पहाड़ों में शिक्षा की अलख जगाते हुए गुरुकुल, विद्यालयों, महाविद्यालयों, बीएड कॉलेज, इंजीनियरिंग सहित कई शिक्षण संस्थाओं का निर्माण करवाया। शिक्षा, उद्योग, मीडिया के क्षेत्रों में नया मुकाम बनाने वाले चौधरी मित्रसेन जी के जीवन पर क्रांतिकारी गतिविधियों का गहरा प्रभाव रहा। लाला लाजपत राय जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आकर चौधरी साहब ने स्वाधीनता संग्राम से जुड़ी गतिविधियों में भी बढ़-चढक़र हिस्सा लिया। उन्होंने अपने कारोबार की परवाह न करते हुए हिन्दी सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लिया और साढ़े चार माह हिसार जेल में बन्द रहे और वे हमेशा इस आन्दोलन में जुड़े रहे। सन् 1948 में लेथ मशीन से अपना कारोबार आरंभ करने वाले चौधरी मित्रसेन आर्य ने रोहतक, उदयपुर से होते हुए उड़ीसा के बड़बिल की तरफ रुख किया। वहां शुरुआती परेशानियों के बाद भी चौधरी साहब संघर्ष करते रहे और सफलता प्राप्त की। अनेक कठिनाइयों के होते हुए भी वे आत्मविश्वास के साथ सफलता की सीढिय़ां चढ़ते चले गए। कड़ी मेहनत व धैर्य के बाद चौधरी मित्रसेन आर्य ने उड़ीसा, बिहार और छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध उद्योगपतियों में न केवल अपनी अलग पहचान बनाई, बल्कि उन्होंने कर्मचारियों को अच्छा वेतन देकर जन कल्याण का नया रास्ता खोला।

भारत सरकार द्वारा ‘कृषि विशारद’ की उपाधि से सम्मानित चौधरी मित्रसेन आर्य गुजरात में आए विनाशकारी भूकम्प से तबाह हुए दो गांवों को गोद लेकर उन्हें पुनः बसाने, तीन दर्जन से अधिक शिक्षण संस्थानों को आर्थिक मदद देने, नष्ट होने के कगार पर पहुंचे मूल्यवान साहित्य को प्रकाशित करवाने में अमूल्य योगदान, गो-सेवा में सराहनीय सहयोग व समाजसेवक की अग्रणी भूमिका के चलते वे मानवता के लिए सदैव प्रेरक बन गए।

चौ. मित्रसेन आर्य को निराशा कभी छूं भी नहीं सकी। उनका जीवन किसी के लिए भी प्रेरक हो सकता है। वे गृहस्थ होते हुए भी संन्यासी की तरह रहे और उन्होंने आर्य समाज के उपदेशों को आत्मसात किया। गरीब व जरूरतमंद की सहायता को हर समय तत्पर रहने वाले मित्रसेन ने अपने परिवार में भी इन्हीं संस्कारों को रोपित किया। आज के युग में मित्रसेन का उदाहरण मिलना संभव नहीं है। वे एक व्यक्ति न होकर अपने आप में पूरी संस्था थे। वे जो दिन-रात समाज कल्याण को समर्पित रहते थे।

विराट व्यक्तित्व के धनी चौधरी मित्रसेन आर्य का 27 जनवरी 2011 को निधन हो गया।

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