मार्क्सवादी अंतर्राष्ट्रीय संबंध सिद्धांत

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मार्क्सवादी और नव-मार्क्सवादी अंतर्राष्ट्रीय संबंध सिद्धांत (अंग्रेज़ी: Marxist and neo-Marxist international relations theories) ऐसे प्रतिमान हैं जो राज्य संघर्ष या सहयोग के वास्तविक / उदारतावादी दृष्टिकोण को अस्वीकार कर आर्थिक और भौतिक पहलुओं को सर्वाधिक महत्त्व देते हैं। यहाँ यह उजागर करने का प्रयास होता है कि कैसे अर्थव्यवस्था अन्य कारकों से अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। इसी तथ्य के आधार पर इस सिद्धांत का अध्ययन आर्थिक वर्ग (class) पर आधरित होता है।

मार्क्सवाद[संपादित करें]

19वीं शताब्दी में, कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने लिखा था कि अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली में अस्थिरता का मुख्य स्रोत पूंजीवादी वैश्वीकरण होगा, विशेष रूप से दो वर्गों के बीच संघर्ष: राष्ट्रीय पूंजीपति और महानगरीय सर्वहारा वर्गऐतिहासिक भौतिकवाद घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों मामलों में प्रक्रियाओं को समझने के लिए मार्क्सवाद की मार्गदर्शिका बनने जा रहा था। इस प्रकार, मार्क्स के लिए मानव इतिहास भौतिक जरूरतों को पूरा करने, और वर्ग वर्चस्व और उसपर आधारित शोषण का विरोध करने के लिए एक संघर्ष रहा है। इसकी वैचारिक आलोचना के बावजूद, मार्क्सवाद के पक्ष में मजबूत साक्ष्य और फायदे हैं। सबसे पहले, इसका अन्याय और असमानता पर जोर देना हर काल के लिए बहुत प्रासंगिक है, क्योंकि मानव समाज की ये दो विफलताएं कभी अनुपस्थित नहीं रही हैं। नवयथार्थवाद की तरह ही मार्क्सवाद भी एक संरचनात्मक सिद्धांत है, लेकिन यह सैन्य-राजनीतिक क्षेत्र के बजाय आर्थिक ढाँचे पर केंद्रित है। इसका विश्लेषण आधार (उत्पादन के तरीके) और अधिरचना (राजनीतिक संस्थानों) के बीच के संबंध को दर्शाता है। संरचनात्मक प्रभावों का स्रोत अराजकता नहीं, बल्कि उत्पादन का पूंजीवादी तरीका है जो अन्यायपूर्ण राजनीतिक संस्थानों और राज्य संबंधों को परिभाषित करता है।[1]

इस आर्थिक कमी को इस सिद्धांत का मुख्य दोष भी माना जाता है। इसके समाधान के रूप में, नव-ग्रामशीवादी स्कूल ने एक और प्रस्ताव दिया। वैश्विक पूंजीवाद, राज्य संरचना और राजनीतिक-आर्थिक संस्थानों को मिलाकर, यह वैश्विक आधिपत्य (वैचारिक वर्चस्व) का एक सिद्धांत बनाने में कामयाब रहा। इस सिद्धांत के अनुसार, विश्व प्रणाली के मुख्य क्षेत्रों के अंदर और बाहर शक्तिशाली कुलीनों के बीच घनिष्ठ सहयोग के माध्यम से आधिपत्य बनाए रखा जाता है। वैश्विक शासन का गठन राजनीतिक और आर्थिक संस्थानों द्वारा किया जाता है जो कम विकसित और अस्थिर परिधीय देशों पर दबाव डालते हैं।

कालानुक्रमिक दृष्टिकोण से, मार्क्सवाद ने समालोचनात्मक सिद्धांत (Critical theory) के लिए नींव तैयार की और यह एंग्लो-अमेरिकन अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रमुख दृष्टिकोणों की समस्याएँ सुलझाने में बेहतर साबित होता है। किसी भी अन्य समालोचनात्मक सिद्धांत की तरह, मार्क्सवाद भी इस बात पर ज़ोर देता है कि कैसे सामाजिक परिवर्तन की संभावनाओं की पहचान हो पाए, और यह कि सिद्धांत का शक्ति के लिए क्या महत्व है। यही कारण है कि मार्क्स ने सामाजिक ताकतों में दिलचस्पी रखते हुए पूंजीवाद के बारे में लिखा, यह उम्मीद करते हुए कि इससे पूंजीवाद का पतन होगा और मानवता शोषण से मुक्त हो सकेगी। कई अन्य विचारक (विशेष रूप से यथार्थवादी) इसे राजनीति से प्रेरित (politically motivated) मानते हैं और यह कि इसका नज़रिया उद्देश्यपूर्ण और पक्षपाती है। मार्क्सवाद का मानक नुकसान यह है कि यूरोपीय ज्ञानोदय के ब्रह्मांडवाद (cosmopolitanism) मूल्य से प्रेरित होने के कारण इसे यूरोकेन्द्रीय रूप में देखा जा सकता है। [2]

निर्भरता सिद्धांत[संपादित करें]

निर्भरता सिद्धांत मार्क्सवादी सिद्धान्तों के साथ जुड़ा हुआ एक है, जो तर्क देता है कि शक्ति की खोज में विकसित देश, राजनीतिक सलाहकारों, मिशनरियों, विशेषज्ञों और बहु-राष्ट्रीय निगमों (MNCs) के माध्यम से विकासशील देशों में उपयुक्त प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करने के लिए पूंजीवादी व्यवस्था में उन्हें एकीकृत करते हैं।

इससे एक आर्थिक पैटर्न उभरकर आता है, जहाँ विकासशील देश कच्चा माल निर्यात करके संसाधित माल आयात करते हैं, जिससे वे विकसित देशों पर निर्भर हो जाते हैं।

आलोचनाएँ[संपादित करें]

यथार्थवादी और उदारतावादी दोनों ही इस दर्शन को राजनीति से प्रेरित (politically motivated) मानते हैं और कहते हैं कि यह कि इसका नज़रिया उद्देश्यपूर्ण और पक्षपाती है। मार्क्सवाद का मानक नुकसान यह है कि यूरोपीय ज्ञानोदय के ब्रह्मांडवाद (cosmopolitanism) मूल्य से प्रेरित होने के कारण इसे यूरोकेन्द्रीय रूप में देखा जा सकता है।[2]

उत्तर-प्रत्यक्षवादी इस मान्यता से असहमत हैं कि वर्ग संघर्ष मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण भाग है, जिसके आधार पर समूचा मानव इतिहास और बर्ताव समझा जा सकता है।

यह सभी देखें[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. Sonda, Claudiu. "Guide to International Relations II: Marxism and Constructivism". World Reporter. मूल से 22 अक्तूबर 2015 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 23 October 2015.
  2. Paul, Kegan. "Journal of Politics". Cambridge Library. मूल से 6 मार्च 2016 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 23 October 2015.