मार्क्सवाद की समालोचना

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मार्क्सवाद की समालोचना विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं और अकादमिक विषयों द्वारा की गई है। इसमें आंतरिक सामंजस्य की कमी, ऐतिहासिक भौतिकवाद से संबंधित आलोचना, इसका एक प्रकार का ऐतिहासिक नियतत्ववाद होना, व्यक्तिगत अधिकारों के दमन की आवश्यकता, साम्यवाद के कार्यान्वयन के साथ-साथ आर्थिक मुद्दे, जैसे मूल्य संकेतों का विरूपण (और उनकी अनुपस्थिति) और प्रोत्साहन की कमी शामिल हैं। इसके अलावा, अनुभवजन्य और ज्ञानमीमांसा से सम्बंधित समस्याओं की अक्सर पहचान की जाती है।[1][2][3]

सामान्य आलोचना[संपादित करें]

कुछ लोकतांत्रिक समाजवादी और सामाजिक लोकतंत्र इस विचार को खारिज करते हैं कि समाज केवल वर्ग संघर्ष और सर्वहारा क्रांति के माध्यम से समाजवाद प्राप्त कर सकते हैं। कई अराजकतावादी एक क्षणिक राज्य चरण (सर्वहारा की तानाशाही) की आवश्यकता को अस्वीकार करते हैं। कुछ विचारकों ने मार्क्सवाद के मूल सिद्धांतों जैसे ऐतिहासिक भौतिकवाद और मूल्य के श्रम सिद्धांत को खारिज कर दिया है और पूंजीवाद की आलोचना और अन्य तर्कों का उपयोग करते हुए समाजवाद की वकालत की है।

मार्क्सवाद के कुछ समकालीन समर्थक मार्क्सवादी विचारधारा के कई पहलुओं को व्यवहार्य मानते हैं, लेकिन उनका तर्क है कि आर्थिक, राजनीतिक या सामाजिक सिद्धांत के कुछ पहलुओं के संबंध में यह अधूरा है या पुराना हो चुका है। इसलिए वे अन्य मार्क्सवादियों के विचारों के साथ कुछ मार्क्सवादी अवधारणाओं को जोड़ सकते हैं (जैसे कि मैक्स वेबर)- फ्रैंकफर्ट स्कूल इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण प्रदान करता है।

इतिहासकार पॉल जॉनसन ने लिखा है: "सच्चाई यह है, कि मार्क्स द्वारा किए गए सबूतों के प्रयोग की सबसे सतही स्तर की जांच भी व्यक्ति को उनके द्वारा लिखी गई हर उस चीज़ को शक़ की नज़र से देखने के लिए मजबूर करती है, जिसके लिए उन्होंने तथ्यात्मक डेटा का सहारा लिया था"। उदाहरण के लिए, जॉनसन ने कहा: "दास कैपिटल का मुख्य अध्याय आठ पूरा का पूरा जानबूझकर और व्यवस्थित ढंग से किया गया मिथ्याकरण है, जिसका प्रयोग एक ऐसी थीसिस को साबित करने के लिए किया गया है, जिसे तथ्यों की वस्तुनिष्ठ परीक्षा करने पर अप्राप्य पाया गया"।[4]

ऐतिहासिक भौतिकवाद[संपादित करें]

ऐतिहासिक भौतिकवाद मार्क्सवाद के बौद्धिक आधारों में से एक है।[5][6]

इसके अनुसार उत्पादन के साधनों में तकनीकी प्रगति अनिवार्य रूप से उत्पादन के सामाजिक संबंधों में बदलाव लाती है।[7] समाज का यह आर्थिक " आधार " वैचारिक "अधिरचना " द्वारा परिलक्षित होता है और उसे प्रभावित करता है, जिसमें संस्कृति, धर्म, राजनीति और मानवता की सामाजिक चेतना के अन्य सभी पहलू समाहित हैं।[8] इस प्रकार यह आर्थिक, तकनीकी और मानव इतिहास के विकास और परिवर्तनों के कारणों, भौतिक कारकों, साथ ही जनजातियों, सामाजिक वर्गों और राष्ट्रों के बीच भौतिक हितों के टकराव के कारणों की तलाश करता है। कानून, राजनीति, कला, साहित्य, नैतिकता और धर्म को मार्क्स द्वारा समाज के आर्थिक आधार के प्रतिबिंब के रूप में अधिरचना बनाने के लिए समझा जाता है। कई आलोचकों ने तर्क दिया है कि यह समाज की प्रकृति का निरीक्षण है और दावा करते हैं कि जिसे मार्क्स ने सुपरस्ट्रक्चर कहा जाता है, उसका प्रभाव (यानी विचार, संस्कृति और अन्य पहलुओं का प्रभाव) उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि समाज की कार्यप्रणाली में आर्थिक आधार। । हालाँकि, मार्क्सवाद यह दावा नहीं करता है कि समाज का आर्थिक आधार समाज में एकमात्र निर्धारित तत्व है जैसा कि फ्रेडरिक एंगेल्स (मार्क्स के लंबे समय तक के योगदानकर्ता) द्वारा लिखित निम्न पत्र द्वारा प्रदर्शित किया गया है-

According to the materialist conception of history, the ultimately determining element in history is the production and reproduction of real life. More than this neither Marx nor I ever asserted. Hence if somebody twists this into saying that the economic element is the only determining one he transforms that proposition into a meaningless, abstract, senseless phrase.[9]

इतिहास के भौतिकवादी गर्भाधान के अनुसार, इतिहास में अंततः निर्धारण तत्व वास्तविक जीवन का उत्पादन और प्रजनन है। इससे अधिक न तो मार्क्स और न ही मैंने कभी जोर दिया। इसलिए अगर कोई यह कहता है कि आर्थिक तत्व एकमात्र निर्धारित करने वाला है तो वह उस प्रस्ताव को एक व्यर्थ, अमूर्त, अर्थहीन वाक्यांश में बदल देता है।

आलोचकों के अनुसार, यह मार्क्सवाद के लिए एक और समस्या खड़ी करता है। यदि अधिरचना भी आधार को प्रभावित करती है तो मार्क्स को निरंतर यह दावा करने की कोई आवश्यकता नहीं थी कि समाज का इतिहास आर्थिक वर्ग संघर्ष का इतिहास है। यह एक क्लासिक मुर्ग़ी-या-अंडा का तर्क बन जाता है कि आधार पहले आता है या अधिरचना। पीटर सिंगर का प्रस्ताव है कि इस समस्या को यह समझ कर हाल किया जा सकता है कि मार्क्स ने आर्थिक आधार को अंततः मानते थे। मार्क्स का मानना था कि मानवता को परिभाषित करने वाली विशेषता उसके उत्पादन के साधन हैं। अतः, मनुष्य को स्वयं को उत्पीड़न से मुक्त करने का एकमात्र तरीका उसके लिए उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण रखना था। मार्क्स के अनुसार, यही इतिहास का लक्ष्य है और अधिरचना के तत्व इतिहास के उपकरण के रूप में कार्य करते हैं। [10]

मार्क्स ने कहा था कि भौतिक आधार और वैचारिक अधिरचना के बीच का संबंध एक निर्धारण सम्बन्ध (determination relation) था न कि एक कारण संबंध (causal relation)।[11] हालांकि, मार्क्स के कुछ आलोचकों ने जोर देकर कहा है कि मार्क्स ने दावा किया कि सुपरस्ट्रक्चर आधार के कारण होने वाला एक प्रभाव था। उदाहरण के लिए, अराजक-पूंजीवादी मरी रॉथबार्ड ने ऐतिहासिक भौतिकवाद की आलोचना करते हुए तर्क दिया कि मार्क्स ने दावा किया कि समाज का "आधार" (इसके प्रौद्योगिकी और सामाजिक संबंध) अधिरचना (सुपरस्ट्रक्चर) में अपनी "चेतना" का निर्धारण करता है। लुडविग वॉन मीज़ेज़ के तर्कों पर आधारित, रॉथबार्ड मानते हैं कि यह मानवीय चेतना है जो प्रौद्योगिकी और सामाजिक संबंधों के विकास का कारण बनता है और उन्हें आगे बढ़ाता है। मार्क्स के इस ऐतिहासिक भौतिक शक्तियों के कारण आधार के निर्मित होने के दावे को दरकिनार करते हुए, रॉथबार्ड तर्क देते हैं कि मार्क्स इस बात की अनदेखी करते हैं कि आधार उत्पन्न कैसे होता है। इससे यह तथ्य छिप जाता है कि असली कारण पथ अधिरचना से आधार की ओर होता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि मनुष्य प्रौद्योगिकी और उन सामाजिक सम्बन्धों के विकास का निर्धारण करते हैं, जिन्हें वे आगे बढ़ाने की इच्छा रखते हैं। रॉथबार्ड ने वॉन मीज़ेज़ के हवाले से कहा, "हम मार्क्सवादी सिद्धांत को इस तरह संक्षेप में प्रस्तुत कर सकते हैं: शुरुआत में 'भौतिक उत्पादक बल' यानी मानव उत्पादक प्रयासों के तकनीकी उपकरण, औज़ार और मशीनें होती हैं। उनकी उत्पत्ति से संबंधित कोई भी सवाल पूछने की इजाज़त नहीं है; वे हैं, बस; हमें यह मानना है कि ये आसमान से गिरे हैं।"[12]

ऐतिहासिक नियतत्ववाद[संपादित करें]

मार्क्स के इतिहास के सिद्धांत को ऐतिहासिक नियतत्ववाद (यह धारणा कि घटनाएँ पहले से निर्धारित हैं, या किन्हीं ताक़तों द्वारा जकड़ी हुई हैं, जिसके आधार पर कहा जाता है कि मनुष्य के कार्य स्वतंत्र नहीं होते) माना गया है।[13] सामाजिक परिवर्तन के लिए एक अंतर्जात तंत्र के रूप में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर (उस सिद्धांत की) निर्भरता से जुड़ा हुआ है।[14] मार्क्स ने लिखा:

At a certain stage of development, the material productive forces of society come into conflict with the existing relations of production or – this merely expresses the same thing in legal terms – with the property relations within the framework of which they have operated hitherto. From forms of development of the productive forces these relations turn into their fetters. Then begins an era of social revolution. The changes in the economic foundation lead sooner or later to the transformation of the whole immense superstructure.[15]

विकास के एक निश्चित चरण में, समाज की भौतिक उत्पादक शक्तियाँ उत्पादन के मौजूदा संबंधों के साथ संघर्ष में आती हैं या- यह केवल कानूनी रूप में वही बात व्यक्त करती है- संपत्ति के संबंधों के साथ, जिसके ढांचे के भीतर उन्होंने उस समय तक काम किया है। उत्पादक शक्तियों के विकास के रूपों से ये संबंध उनकी ज़ंजीरों में तब्दील हो जाते हैं। फिर शुरू होता है सामाजिक क्रांति का युग। आर्थिक नींव में होने वाले बदलाव कुछ समय बाद पूरी अपार अधिरचना के परिवर्तन का नेतृत्व करते हैं।

डायलेक्टिक (द्वंद्वात्मक तर्कपद्धति) की अवधारणा प्राचीन ग्रीक दार्शनिकों के संवादों से उभरती है। लेकिन इसे 19 वीं शताब्दी की शुरुआत में हेगेल ने ऐतिहासिक विकासवाद की (अक्सर परस्पर रूप से विरोधी) ताकतों के लिए एक वैचारिक ढांचे के रूप में सामने लाया था। ऐतिहासिक निर्धारकवाद भी अर्नाल्ड ट्वानबी और ओसवाल्ड स्पेंगलर जैसे विद्वानों के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन वर्तमान में इस वैचारिक दृष्टिकोण का प्रयोग नहीं होता।[16] इतिहास की ताकतों की समझ के लिए इस दृष्टिकोण को पुनः स्थापित करने के प्रयास में, प्रभात रंजन सरकार ने ऐतिहासिक विकास पर मार्क्स के विचारों के संकीर्ण वैचारिक आधार की आलोचना की।[17] 1978 की पुस्तक द डाउनफॉल ऑफ कैपिटलिज्म एंड कम्युनिज्म में, रवि बत्रा ने सरकार और मार्क्स के ऐतिहासिक निर्धारक दृष्टिकोणों में महत्वपूर्ण अंतर बताया।

Sarkar's main concern with the human element is what imparts universality to his thesis. Thus while social evolution according to Marx is governed chiefly by economic conditions, to Sarkar this dynamic is propelled by forces varying with time and space: sometimes physical prowess and high-spiritedness, sometimes intellect applied to dogmas and sometimes intellect applied to the accumulation of capital (p. 38). [...] The main line of defence of the Sarkarian hypothesis is that unlike the dogmas now in disrepute, it does not emphasise one particular point to the exclusion of all others: it is based on the sum total of human experience – the totality of human nature. Whenever a single factor, however important and fundamental, is called upon to illuminate the entire past and by implication the future, it simply invites disbelief, and after closer inspection, rejection. Marx committed that folly, and to some extent so did Toynbee. They both offered an easy prey to the critics, and the result is that today historical determinism is regarded by most scholars as an idea so bankrupt that it can never be solvent again.[18]

सरकार की थीसिस को सार्वभौमिकता इस कारण से मिलती है कि उनका चिंतन मानवीय तत्व पर मुख्य रूप से आधारित है। इस प्रकार, जहाँ मार्क्स के अनुसार सामाजिक विकास मुख्य रूप से आर्थिक परिस्थितियों द्वारा शासित होता है, सरकार के लिए यह गतिशील समय और स्थान के साथ बदलते बलों द्वारा प्रेरित किया जाता है: कभी-कभी शारीरिक कौशल और उच्च-उत्साह, कभी-कभी हठधर्मिता में लगाई गई बुद्धि, और कभी-कभी पूंजी के संचय के लिए लागू की जाने वाली बुद्धि (पृष्ठ 38)। [...] सरकार की परिकल्पना को बचाने वाली मुख्य पंक्ति यह है कि वर्तमान में विवादित हठधर्मिताओँ के विपरीत, यह विशेष बिंदु पर जोर देकर अन्य सभी का बहिष्कार नहीं करता है: यह मानव अनुभव के कुल योग पर आधारित है - मानव प्रकृति की समग्रता पर। जब भी किसी एक कारक, चाहे वह कितना भी महत्वपूर्ण और मौलिक हो, से पूरे अतीत (और इसी प्रकार, भविष्य पर) पर प्रकाश डालने की कोशिश की जाती है, तो इससे मन में बस अविश्वास उत्पन्न होता है, और क़रीबी निरीक्षण के बाद, अस्वीकृति। मार्क्स ने यही मूर्खता की, और कुछ हद तक तो ट्वानबी ने भी। उन दोनों ने आलोचकों को एक आसान शिकार दे दिया, और इसका नतीजा यह है कि आज ऐतिहासिक नियतत्ववाद को अधिकांश विद्वानों ने एक विचार के रूप में इतना दिवालिया माना है कि जो कभी उबर न पाएगा।

टेरी ईगलटन लिखते हैं कि मार्क्स के लेखन "का अर्थ यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि जो कुछ भी हुआ है वह वर्ग संघर्ष का परिणाम है। इसका मतलब यह है कि, वर्ग संघर्ष मानव इतिहास के लिए सबसे अधिक मौलिक है "।[19]

व्यक्तिगत अधिकारों का दमन[संपादित करें]

माओत्से तुंग और जोसेफ स्टालिन, दोनों की यह आलोचना की गई है कि उन्होंने तानाशाही स्थापित कर व्यक्तिगत अधिकारों का दमन किया।

विभिन्न विचारकों ने तर्क दिया है कि एक कम्युनिस्ट राज्य अपने स्वभाव से ही अपने नागरिकों के अधिकारों का हनन करेगा, जो कि सर्वहारा वर्ग की हिंसक क्रांति और तानाशाही, उसके समूहवादी (न कि व्यक्तिवादी) स्वभाव, लोगों के बजाय "जनसाधारण" पर निर्भरता, ऐतिहासिक नियतत्ववाद और केन्द्रिय नियोजित अर्थव्यवस्था के कारण है।

अमेरिकी नवशास्त्रीय अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने तर्क दिया कि समाजवाद के तहत एक मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था की अनुपस्थिति अनिवार्य रूप से एक सत्तावादी राजनीतिक शासन (तानाशाही) को जन्म देगी। फ्रीडमैन के दृष्टिकोण से फ़्रीड्रिक हायक भी सहमत थे। वे मानते थे कि किसी देश में स्वतंत्रता पनपने के लिए पूंजीवाद का पहले से होना ज़रूरी है।[20][21] कुछ उदारवादी सिद्धांतकारों का तर्क है कि संपत्ति का किसी भी प्रकार से किया जाने वाला पुनर्वितरण एक तरह का ज़ुल्म है।[22]

अराजकतावादियों ने यह भी तर्क दिया है कि केंद्रीकृत साम्यवाद अनिवार्य रूप से जबरदस्ती और राज्य के वर्चस्व को बढ़ावा देता है। मिखाइल बाकुनिनका मानना था कि मार्क्सवादी शासन "एक नए और अल्प-संख्यक अभिजात वर्ग द्वारा आबादी के निरंकुश नियंत्रण" के लिए नेतृत्व करेंगे।[23] भले ही इस नए अभिजात वर्ग की उत्पत्ति सर्वहारा वर्ग के बीच से हुई हो, लेकिन बाकुनिन ने तर्क दिया कि उनकी नव-प्राप्त शक्ति मौलिक रूप से उनका समाज के बारे में दृष्टिकोण को बदल देगी और वे "सीधी-सादी कामगार जनता को तुच्छ दृष्टि से देखेंगे"।[23]

आर्थिक[संपादित करें]

कई कारणों से मार्क्सवादी अर्थशास्त्र की आलोचना की गई है। कुछ आलोचक पूँजीवाद के मार्क्सवादी विश्लेषण की ओर इशारा करते हैं जबकि अन्य लोग तर्क देते हैं कि मार्क्सवाद द्वारा प्रस्तावित आर्थिक प्रणाली असाध्य है। [24] [25] [26] [27]

यह भी संदेह है कि पूंजीवाद में लाभ की दर मार्क्स की भविष्यवाणी के अनुसार गिर जाएगी। 1961 में, मार्क्सवादी अर्थशास्त्री नोबुओ ओकिशियो ने यह दिखाते हुए एक प्रमेय ( ओकिशियो का प्रमेय ) दिया कि यदि पूंजीपति लागत में कटौती की तकनीक का अनुसरण करते हैं और यदि वास्तविक मजदूरी वेतन नहीं बढ़ता है, तो लाभ की दर में वृद्धि होनी चाहिए। [28]

मूल्य का श्रम सिद्धांत[संपादित करें]

मूल्य का श्रम सिद्धांत (labour theory of value) मार्क्सवाद के सबसे अधिक आलोचनात्मक मूल सिद्धांतों में से एक है। [29] [30] [31] [32] [33]

ऑस्ट्रियन स्कूल का तर्क है कि शास्त्रीय अर्थशास्त्र का यह मौलिक सिद्धांत गलत है और कार्ल मेन्जर द्वारा अपनी पुस्तक प्रिंसिपल्स ऑफ इकोनॉमिक्समें दिए गए आधुनिक व्यक्तिनिष्ठ मूल्य सिद्धान्त को प्राथमिकता देता है। मूल्य के श्रम सिद्धांत में मार्क्सवादी और शास्त्रीय विश्वास की आलोचना करने में ऑस्ट्रियाई स्कूल अकेला नहीं था।

अर्थशास्त्री अल्फ्रेड मार्शल (Alfred Marshall) ने मार्क्स पर हमला करते हुए कहा: "यह सच नहीं है कि एक कारखाने में सूत की कताई [...] परिचालकों के श्रम का उत्पाद है। यह नियोक्ता और अधीनस्थ प्रबंधकों के साथ, और नियोजित पूंजी के साथ, उनके श्रम का उत्पाद है। [34] मार्शल दिखाते हैं कि जिस धन का उपयोग पूंजीपति अभी कर सकता है, उसे वह व्यापार में निवेश के रूप में लगाता है, जो अंततः कर्म पैदा करता है।[34] इस तर्क के अनुसार, पूंजीपति का कारखाने के कर्म और उत्पादकता में योगदान होता है क्योंकि निवेश के कारण वह विलम्ब परितोषण (delaying gratification) करता है। [34]

आपूर्ति और मांग के कानून के माध्यम से, मार्शल ने मूल्य के मार्क्सियन सिद्धांत पर हमला किया। मार्शल के अनुसार, मूल्य (value) या क़ीमत (price) केवल आपूर्ति से नहीं, बल्कि उपभोक्ता की मांग से निर्धारित होता है।[34] श्रम लागत में योगदान भले ही देता हो, लेकिन लागत उपभोक्ताओं की ज़रूरतों और इच्छाओं पर भी निर्भर करती है। जब श्रम को मूल्यांकन के स्त्रोत के रूप में देखने के बजाय फ़ोकस व्यक्तिपरक मूल्यांकन से सारे मूल्य के निर्माण पर दिया जाता है, तो मार्क्स के आर्थिक निष्कर्ष और कुछ सामाजिक सिद्धांतों निरर्थक हो जाते हैं।[35]

शिमशोन बिक्लर और जोनाथन निट्ज़ैन (Shimshon Bichler and Jonathan Nitzan) का तर्क है कि मूल्य के श्रम सिद्धांत के अनुभवजन्य साक्ष्य को दर्शाने के लिए किए जाने वाले अधिकांश अध्ययन अक्सर कई आर्थिक क्षेत्रों की कुल क़ीमत की कुल श्रम मूल्य की तुलना करके पद्धतिगत त्रुटियां करते हैं। इसके परिणामस्वरूप एक मजबूत समग्र सहसंबंध तो प्राप्त हो जाता है लेकिन यह एक सांख्यिकीय अतिशयोक्ति ही है। लेखकों का तर्क है कि प्रत्येक क्षेत्र में श्रम मूल्य और क़ीमत के बीच संबंध अक्सर बहुत कम अथवा महत्वहीन होता है। बाइक्लर और निट्ज़ैन का यह भी तर्क है कि चूँकि श्रम को मापने का एक तरीका निर्धारित करना मुश्किल है, इसलिए शोधकर्ता धारणाएँ बनाने के लिए मजबूर होते हैं।[36][37]

हालांकि, बिक्लर और निट्ज़ैन का तर्क है कि इन धारणाओं में परिपत्र तर्क (circular reasoning) शामिल हैं-

The most important of these assumptions are that the value of labour power is proportionate to the actual wage rate, that the ratio of variable capital to surplus value is given by the price ratio of wages to profit, and occasionally also that the value of the depreciated constant capital is equal to a fraction of the capital’s money price. In other words, the researcher assumes precisely what the labour theory of value is supposed to demonstrate.[38]

इन धारणाओं में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि श्रम शक्ति का मूल्य वास्तविक मजदूरी दर के अनुपात में होता है, कि परिवर्तनशील पूंजी का अधिशेष मूल्य से अनुपात लाभ और मजदूरी के मूल्य के अनुपात द्वारा दिया जाता है, और कभी-कभी यह भी कि मूल्यह्रास स्थिर पूंजी (depreciated constant capital) का मूल्य पूंजी के पैसे की कीमत के एक अंश (fraction of the capital’s money price) के बराबर है। दूसरे शब्दों में, शोधकर्ता वही मान कर अध्ययन शुरू करता है, जो (मूल्य के श्रम सिद्धांत से) उसे सिद्ध करना है।

विकृत या अनुपस्थित मूल्य संकेत[संपादित करें]

यहाँ समस्या यह है कि अर्थव्यवस्था में संसाधनों को तर्कसंगत रूप से कैसे वितरित किया जाए। मुक्त बाजार (free market) मूल्य तंत्र (price mechanism) पर निर्भर करता है। इसमें संसाधनों का वितरण इस आधार पर किया जाता है कि लोग व्यक्तिगत रूप से विशिष्ट वस्तुओं या सेवाओं ख़रीदने के लिए कितने पैसे देने को तैयार हैं। मूल्य में संसाधनों की प्रचुरता के साथ-साथ उनकी वांछनीयता (आपूर्ति और मांग) के बारे में जानकारी समाहित होती है। इस जानकारी से व्यक्तिगत सहमति से लिए गए निर्णयों के आधार पर ऐसे सुधार किए जा सकते हैं जो कमी और अधिशेष बनने से रोकते हैं। मीज़ेज़ और हायक ने तर्क दिया कि क़ीमतें तय करने का यही एकमात्र संभव समाधान है। बाजार की कीमतों द्वारा प्रदान की गई जानकारी के बिना समाजवाद में तर्कसंगत रूप से संसाधनों को आवंटित करने के लिए कोई विधि नहीं है। जो लोग इस आलोचना से सहमत हैं, उनका तर्क है कि यह समाजवाद का खंडन है और यह दर्शाता है कि समाजवादी नियोजित अर्थव्यवस्था कभी काम नहीं कर सकती। 1920 और 1930 के दशक में इस पर बहस छिड़ गई और बहस के उस विशिष्ट दौर को आर्थिक इतिहासकारों ने "समाजवादी गणना बहस" के रूप में जाना। [39]

रिचर्ड एबेलिंग के अनुसार, "समाजवाद के खिलाफ मीज़ेज़ का तर्क यह है कि सरकार द्वारा केंद्रीय योजना प्रतिस्पर्धी रूप से गठित बाजार मूल्य को नष्ट कर देती है, जो समाज में लोगों के तर्कसंगत आर्थिक निर्णय लेने के लिए आवश्यक उपकरण है।[40][41]

प्रोत्साहन की कमी[संपादित करें]

समाजवाद के कुछ आलोचकों का तर्क है कि आय का बंटवारा करने से काम करने के लिए व्यक्तिगत प्रोत्साहन कम हो जाते हैं और इसलिए आय को अधिक से अधिक व्यक्तिगत ही किया जाना चाहिए। [42]

उन्होंने तर्क दिया है कि जिस समाज में हर कोई बराबर धन रखता है (जो कि उनका मानना है कि यह समाजवाद का परिणाम है), वहाँ काम करने के लिए कोई भौतिक प्रोत्साहन नहीं हो सकता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि किसी को अच्छी तरह से किए गए कार्य के लिए पुरस्कार नहीं मिलता है। वे आगे तर्क देते हैं कि प्रोत्साहन से सभी लोगों की उत्पादकता बढ़ती है, और इसके बिना ठहराव आ जाता है।[42]

इसके अतिरिक्त, अर्थशास्त्री जॉन केनेथ गैलब्रेथ ने समाजवाद के सांप्रदायिक रूपों की आलोचना की है जो मानव प्रेरणा के बारे में अपनी मान्यताओं में मजदूरी या मुआवजे के रूप में समतावाद को बढ़ावा देते हैं। उनका मानना है कि इस प्रकार की विचारधाराएँ सही ढंग से यह नहीं भाँप पातीं कि इंसान को कार्य करने की प्रेरणा कहाँ से मिलती है:

This hope [that egalitarian reward would lead to a higher level of motivation], one that spread far beyond Marx, has been shown by both history and human experience to be irrelevant. For better or worse, human beings do not rise to such heights. Generations of socialists and socially oriented leaders have learned this to their disappointment and more often to their sorrow. The basic fact is clear: the good society must accept men and women as they are.[43]

यह आशा [कि समतावादी इनाम प्रेरणा के उच्च स्तर तक ले जाएगा], जो कि मार्क्स से परे फैल चुका है, इसे इतिहास और मानव अनुभव दोनों ने व्यर्थ सिद्ध किया है। चाहे यह अच्छा हो या बुरा, मनुष्य ऐसी ऊंचाइयों तक नहीं पहुँचता है। समाजवादियों और सामाजिक रूप से उन्मुख नेताओं ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी निराश होकर और अक्सर दुखी होकर यह सीखा है। मूल तथ्य स्पष्ट है- एक अच्छे समाज को पुरुषों और महिलाओं को वैसे स्वीकार करना चाहिए जैसे वे हैं।

असंगति[संपादित करें]

1898 में व्लादिमीर करपोविच दिमित्रिक[44][45] ने लेडिसलस वॉन बॉर्टिकविज़ लेखन और बाद के आलोचकों ने आरोप लगाया है कि कार्ल मार्क्स के मूल्य सिद्धांत और पतन की दर की प्रवृत्ति के कानून आंतरिक रूप से असंगत हैं। दूसरे शब्दों में, आलोचकों का आरोप है कि मार्क्स ने ऐसे निष्कर्ष निकाले जो वास्तव में उनके स्वयं के सैद्धांतिक परिसर से नहीं आते हैं। एक बार उन त्रुटियों को ठीक करने के बाद, मार्क्स का निष्कर्ष (कि कुल मूल्य और लाभ कुल मूल्य और अधिशेष मूल्य के बराबर होते हैं और उन्हीं के द्वारा निर्धारित होते हैं निर्धारण किया जाता है) ग़लत साबित होता है। चूँकि मार्क्स का यह निष्कर्ष ग़लत है, परिणामस्वरूप उनका यह सिद्धांत, कि श्रमिकों का शोषण ही लाभ का एकमात्र स्रोत है, भी संदेहास्पद है। [46]

1970 के दशक से असंगतता के आरोप मार्क्सवादी अर्थशास्त्र की बहस की प्रमुख विशेषता रहे हैं।[47] एंड्रयू क्लिमन का तर्क है कि चूँकि आंतरिक रूप से असंगत सिद्धांतों का सही होना सम्भव नहीं है, इससे मार्क्स की राजनीतिक अर्थव्यवस्था की समालोचना और उस पर आधारित वर्तमान अनुसंधान के साथ-साथ मार्क्स की कथित विसंगतियों के सुधार के प्रयास भी कमज़ोर पड़े हैं। [48]

कई पूर्व और वर्तमान मार्क्सियन और / या श्राफियन अर्थशास्त्रियों ने भी असंगति के आरोप लगाए हैं, जैसे पॉल स्वेज़ी, [49] नोबुओ ओकिशियो, [50]इयान स्टैडमैन, [51] जॉन रोमर, [52] गैरी मोंगडियोवी [53] और डेविड लाइबमैन, [54] जो प्रस्तावित करते हैं कि मूल रूप में मार्क्स की राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना के बजाय उनके अर्थशास्त्र के सही संस्करणों के आधार पर विषय तैयार किया जाना चाहिए, उस मूल रूप में जिसे उन्होंने उन्होंने दास कैपिटल में प्रस्तुत और विकसित किया। [55]

अप्रासंगिकता[संपादित करें]

यह आलोचना भी की गई है कि मार्क्सवाद अप्रासंगिक हो चुका है। कई अर्थशास्त्रियों ने इसके मूल सिद्धांतों और मान्यताओं को खारिज कर दिया है।[56][57][58]

जॉन मेनार्ड कीन्स ने कैपिटल को "एक अप्रचलित पाठ्यपुस्तक" के रूप में संदर्भित किया है "जिसे मैं न केवल वैज्ञानिक रूप से त्रुटिपूर्ण लेकिन आधुनिक दुनिया के लिए अरुचिकर या उपयोगहीन मानता हूँ"।[59]

जॉर्ज स्टिगलर के अनुसार, "मार्क्सवादी-श्राफियन परंपरा में काम करने वाले अर्थशास्त्री आधुनिक अर्थशास्त्रियों के एक छोटे से अल्पसंख्यक दल का प्रतिनिधित्व करते हैं", और यह कि "उनके लेखन का प्रमुख अंग्रेजी भाषा के विश्वविद्यालयों में अधिकांश अर्थशास्त्रियों के पेशेवर काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है"।[60] द न्यू पालग्रेव डिक्शनरी ऑफ इकोनॉमिक्स के पहले संस्करण की समीक्षा में, रॉबर्ट सोलो ने आधुनिक अर्थशास्त्र में मार्क्सवाद को अत्यधिक महत्व देने के लिए इसकी आलोचना की-

Marx was an important and influential thinker, and Marxism has been a doctrine with intellectual and practical influence. The fact is, however, that most serious English-speaking economists regard Marxist economics as an irrelevant dead end.[61]

मार्क्स एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली विचारक थे और मार्क्सवाद बौद्धिक और व्यावहारिक प्रभाव वाला सिद्धांत रहा है। हालांकि, तथ्य यह है कि अधिकांश अंग्रेजी बोलने वाले गंभीर अर्थशास्त्री मार्क्सवादी अर्थशास्त्र को एक अप्रासंगिक मृत अंत मानते हैं।

अमेरिकी प्रोफेसरों के 2006 के राष्ट्रीय प्रतिनिधि सर्वेक्षण में पाया गया कि उनमें से केवल 3% मार्क्सवादी थे। यह हिस्सा मानविकी में 5% तक बढ़ जाता है और सामाजिक वैज्ञानिकों के बीच लगभग 18% है।[62]

सामाजिक[संपादित करें]

सामाजिक आलोचना इस दावे पर आधारित है कि समाज की मार्क्सवादी अवधारणा मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण है।[63][64]

इतिहास के मार्क्सवादी चरणों, वर्ग विश्लेषण और सामाजिक विकास के सिद्धांत की आलोचना की गई है। ज्यां-पाल सार्त्र ने निष्कर्ष निकाला कि "वर्ग" एक समरूप इकाई नहीं थी और वह कभी भी क्रांति नहीं ला सकती थी, लेकिन फिर भी वे मार्क्सवादी मान्यताओं की वकालत करते रहे।[65]मार्क्स ने स्वयं स्वीकार किया था कि उनका सिद्धांत एशियाई सामाजिक प्रणाली (जो उन्होंने मुख्यतः भारत को साक्ष्य में रखकर समझी थी) के आंतरिक विकास की व्याख्या नहीं कर सकता है, जहां दुनिया की ज़्यादातर आबादी हजारों वर्षों से रहती आई थी।[66]

ज्ञानमीमांसीय[संपादित करें]

मार्क्सवाद के खिलाफ तर्क अक्सर ज्ञानमीमांसीय (epistemological) तर्क पर आधारित होते हैं।[67] विशेष रूप से, विभिन्न आलोचकों ने तर्क दिया है कि मार्क्स या उनके अनुयायियों के पास एपिस्टेमोलॉजी के लिए एक त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण है।

लेसज़ेक कोलाकोव्स्की के अनुसार, द्वंद्वात्मकता के नियम (जो मार्क्सवाद का मूल आधार हैं) मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण हैं। इनमें से कुछ "स्वयंसिद्ध सत्य (truism) हैं, जिनमें कोई विशिष्ट मार्क्सवादी सामग्री नहीं है"। बाक़ी कुछ "दार्शनिक हठधर्मिताएँ हैं जिन्हें वैज्ञानिक आधार पर साबित नहीं किया जा सकता", और कुछ अन्य हैं जो कि "निरर्थक" हैं। कुछ मार्क्सवादी "क़ानून" अस्पष्ट हैं और उनकी व्याख्या अलग-अलग तरीके से की जा सकती है, लेकिन ये व्याख्याएँ भी आम तौर पर खामियों की उपरोक्त श्रेणियों में ही आती हैं।[68]

हालांकि, मार्क्सवादी राल्फ़ मिलिबैंड ने यह कहकर कोलाकोव्स्की के तर्क को ख़ारिज कर दिया कि उन्हें मार्क्सवाद और लेनिनवाद और स्टालिनवाद के संबंध के बारे में गलत समझ थी।[69]

अर्थशास्त्री थॉमस सोवेल ने 1985 में लिखा था-

What Marx accomplished was to produce such a comprehensive, dramatic, and fascinating vision that it could withstand innumerable empirical contradictions, logical refutations, and moral revulsions at its effects. The Marxian vision took the overwhelming complexity of the real world and made the parts fall into place, in a way that was intellectually exhilarating and conferred such a sense of moral superiority that opponents could be simply labelled and dismissed as moral lepers or blind reactionaries. Marxism was – and remains – a mighty instrument for the acquisition and maintenance of political power.[70]

मार्क्स ने जो कुछ किया, वह इतना व्यापक, नाटकीय और आकर्षक नज़रिया पैदा करने के लिए था कि वह असंख्य अनुभवजन्य अंतर्विरोधों, तार्किक प्रतिशोधों और घृणात्मक नैतिक प्रभावों का सामना कर सके। मार्क्सवादी दृष्टि ने वास्तविक दुनिया की व्यापक जटिलता को लिया और उसके हिस्सों को सही जगह पर स्थापित किया, एक ऐसे ढंग से जो बौद्धिक रूप से प्राणपोषक था और नैतिक श्रेष्ठता की ऐसी भावना प्रदान करने वाला था कि विरोधियों को आसानी से नैतिक रूप से कोढ़ी या अंधे प्रतिक्रियावादियों के रूप में तमग़ा देकर और खारिज किया जा सके। मार्क्सवाद राजनीतिक शक्ति के अधिग्रहण और रखरखाव के लिए एक शक्तिशाली साधन था- और है।

कार्ल पॉपर, डेविड प्राइचिटको, रॉबर्ट सी॰ एलन और फ्रांसिस फुकुयामा जैसे कई उल्लेखनीय शिक्षाविदों का तर्क है कि मार्क्स की कई भविष्यवाणियां विफल रही हैं।[71][72][73] मार्क्स ने भविष्यवाणी की कि मजदूरी वेतन कम होता जाएगा और पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाएँ आर्थिक संकटों से जूझेंगीं जिनसे उथल-पुथल मचेगी, बद से बदतर होते हालात के कारण पूँजीवादी व्यवस्था को अंततः उखाड़ फेंका जाएगा। समाजवादी क्रांति सबसे उन्नत पूंजीवादी राष्ट्रों में पहले होगी और एक बार सामूहिक स्वामित्व स्थापित हो जाने के बाद, वर्ग संघर्ष के सभी स्रोत गायब हो जाएंगे। मार्क्स की भविष्यवाणियों के उलट, कम्युनिस्ट क्रांतियाँ संयुक्त राज्य अमेरिका या यूनाइटेड किंगडम जैसे औद्योगिक देशों के बजाय लैटिन अमेरिका और एशिया में अविकसित क्षेत्रों में हुईं। पॉपर ने तर्क दिया है कि मार्क्स की ऐतिहासिक पद्धति की अवधारणा के साथ-साथ इसके अनुप्रयोग दोनों ही अमिथ्यापनीय हैं- इन्हें सही या गलत साबित नहीं किया जा सकता है।[74] दूसरे शब्दों में, मार्क्स ने इन सिद्धांतों को "वैज्ञानिक" बताकर यह कहने की कोशिश की है कि इन्हें झुठलाया नहीं जा सकता, जबकि वास्तविकता में मिथ्यापनीयता वैज्ञानिक सिद्धांतों की विशेषता होती है। विज्ञान में जब कोई घटना किसी सिद्धांत के उलट होती है, तो उस सिद्धांत को नकार दिया जाता है। इस तरह से देखा जाए, तो मार्क्सवाद एक छद्म विज्ञान (pseudoscience) है।

The Marxist theory of history, in spite of the serious efforts of some of its founders and followers, ultimately adopted this soothsaying practice. In some of its earlier formulations (for example in Marx's analysis of the character of the 'coming social revolution') their predictions were testable, and in fact falsified. Yet instead of accepting the refutations the followers of Marx re-interpreted both the theory and the evidence in order to make them agree. In this way they rescued the theory from refutation; but they did so at the price of adopting a device which made it irrefutable. They thus gave a 'conventionalist twist' to the theory; and by this stratagem they destroyed its much advertised claim to scientific status.[75]

इतिहास के मार्क्सवादी सिद्धांत ने, इसके कुछ संस्थापकों और अनुयायियों के गंभीर प्रयासों के बावजूद, अंततः यह भविष्यवाणी करने की आदत डाल ली। इसके कुछ पुराने योगों में (उदाहरण के लिए मार्क्स के "आने वाली सामाजिक क्रांति" के चरित्र के विश्लेषण में) उनकी भविष्यवाणियां परीक्षण योग्य थीं, और वास्तव में ग़लत साबित हुईं। फिर भी प्रतिवादों को स्वीकार करने के बजाय मार्क्स के अनुयायियों ने सिद्धांत और साक्ष्य दोनों की फिर से व्याख्या की, ताकि वे उन्हें आपस में सहमत करा सकें। इस तरह से उन्होंने इस सिद्धांत को प्रतिनियुक्ति से तो बचा लिया; लेकिन यह उन्होंने एक ऐसा उपकरण अपनाने की कीमत पर किया, जिसने इसे अकाट्य बना दिया। उन्होंने इस प्रकार सिद्धांत को एक 'परंपरावादी मोड़' दिया; और ऐसा करके उन्होंने अपने वैज्ञानिक होने के बहु-विज्ञापित दावे को नष्ट कर दिया।

पॉपर का मानना था कि मार्क्सवाद शुरू में वैज्ञानिक था, कि मार्क्स ने एक ऐसा सिद्धांत प्रतिपादित किया था जो वास्तव में भविष्य बता सकता था। जब मार्क्स की भविष्यवाणियां ग़लत साबित होने लगीं, तो पॉपर का तर्क है कि सिद्धांत को तदर्थ परिकल्पनाओं (ad-hoc hypotheses) का प्रयोग करके मिथ्याकरण से बचाया गया, ताकि इसे तथ्य-संगत बनाया जा सके। इस माध्यम से, एक सिद्धांत जो शुरू में वास्तविक रूप से वैज्ञानिक था, उसे छद्म वैज्ञानिक हठ में तब्दील कर दिया गया।[76] पॉपर इस बात से सहमत थे कि सामाजिक विज्ञान सामान्य तौर पर अमिथ्यापनीय होते हैं, लेकिन इसके बजाय उन्होंने इसे केंद्रीय योजना और सार्वभौमिक इतिहासकारी विचारधाराओं के खिलाफ एक तर्क के रूप में इस्तेमाल किया।[76] पॉपर ने मार्क्सवादी विचार के बचाव में द्वंद्वात्मकता (dialectic) के प्रयोग बहुत ध्यान दिया। पॉपर की आलोचनाओं के खिलाफ मार्क्सवाद का बचाव करने में वीए लेक्टोर्स्की ने भी इसी रणनीति का प्रयोग किया। पॉपर के निष्कर्षों में से एक यह था कि मार्क्सवादी द्वंद्वात्मकता का प्रयोग आलोचनाओं से बचने और उन्हें दरकिनार करने के लिए करते थे, न कि उनका प्रत्युत्तर देने या उन्हें सम्बोधित करने में- [77]

Hegel thought that philosophy develops; yet his own system was to remain the last and highest stage of this development and could not be superseded. The Marxists adopted the same attitude towards the Marxian system. Hence, Marx's anti-dogmatic attitude exists only in the theory and not in the practice of orthodox Marxism, and dialectic is used by Marxists, following the example of Engels' Anti-Dühring, mainly for the purposes of apologetics – to defend the Marxist system against criticism. As a rule critics are denounced for their failure to understand the dialectic, or proletarian science, or for being traitors. Thanks to dialectic the anti-dogmatic attitude has disappeared, and Marxism has established itself as a dogmatism which is elastic enough, by using its dialectic method, to evade any further attack. It has thus become what I have called reinforced dogmatism.[78]

हेगेल ने सोचा कि दर्शन विकसित होता है; लेकिन उनकी खुद की प्रणाली इस विकास का अंतिम और उच्चतम स्तर है और इससे आगे नहीं जाया जा सकता। मार्क्सवादियों ने मार्क्सवादी व्यवस्था के प्रति यही रवैया अपनाया। इसलिए, मार्क्स का हठधर्मिता-विरोधी रवैया केवल सिद्धांत में ही मौजूद है, न कि रूढ़िवादी मार्क्सवाद के चलन में, और डायलेक्टिक का उपयोग मार्क्सवादियों द्वारा मार्क्सवादी प्रणाली का बचाव करने या आलोचना के खिलाफ किया जाता है, जैसा कि एंगेल्स के एंटी-ड्यूरिंग के उदाहरण में देखा जा सकता है, यह मुख्य रूप से बचाव-कर्ताओं के लिए ही है। एक नियम बन चुका है कि आलोचकों को यह कहकर नकार दिया जाए कि यह उनकी डायलेक्टिक या सर्वहारा विज्ञान को समझने की विफलता है, या वे उन्हें ग़द्दार क़रार कर दिया जाता है। द्वंद्वात्मकता के कारण, हठधर्मिता-विरोधी रवैया गायब हो गया है, और मार्क्सवाद ने खुद को एक ऐसी दृढ़ोक्ति के रूप में स्थापित किया है, जो कि पर्याप्त रूप से लचीली है, और अपनी द्वंद्वात्मक पद्धति का उपयोग करके किसी भी हमले से बचने में समर्थ है। इस प्रकार यह वह बन गया है जिसे मैंने प्रबलित दृढ़ोक्ति कहा है।

बर्ट्रेंड रसेल ने प्रगति को सार्वभौमिक कानून मानने में मार्क्स के विश्वास को अवैज्ञानिक बताकर उसकी आलोचना की है। रसेल ने कहा: "मार्क्स ने स्वयं को नास्तिक बताया, लेकिन एक ऐसा ब्रह्मांडीय आशावाद बनाए रखा जिसे केवल आस्तिकता ही सही ठहरा सकती है"। [79] थॉमस रिगिन्स जैसे मार्क्सवादियों ने दावा किया है कि रसेल ने मार्क्स के विचारों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया।[80]

यह सभी देखें[संपादित करें]

  • अराजकतावाद और मार्क्सवाद
  • कम्युनिस्ट पार्टी के शासन की आलोचना
  • समाजवाद की आलोचना
  • परिवर्तन की समस्या

संदर्भ[संपादित करें]

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  48. Kliman states that "Marx’s value theory would be necessarily wrong if it were internally inconsistent. Internally inconsistent theories may be appealing, intuitively plausible and even obvious, and consistent with all available empirical evidence – but they cannot be right. It is necessary to reject them or correct them. Thus the alleged proofs of inconsistency trump all other considerations, disqualifying Marx’s theory at the starting gate. By doing so, they provide the principal justification for the suppression of this theory as well as the suppression of, and the denial of resources needed to carry out, present-day research based upon it. This greatly inhibits its further development. So does the very charge of inconsistency. What person of intellectual integrity would want to join a research program founded on (what he believes to be) a theory that is internally inconsistent and therefore false?" (Andrew Kliman, Reclaiming Marx's "Capital": A Refutation of the Myth of Inconsistency, Lanham, MD: Lexington Books, 2007, p. 3, emphasis in original). The connection between the inconsistency allegations and the lack of study of Marx’s theories was argued further by John Cassidy ("The Return of Karl Marx," The New Yorker, 20–27 October 1997, p. 252): "His mathematical model of the economy, which depended on the idea that labor is the source of all value, was riven with internal inconsistencies and is rarely studied these days."
  49. "Only one conclusion is possible, namely, that the Marxian method of transformation [of commodity values into prices of production] is logically unsatisfactory." Paul M. Sweezy, 1970 (1942), The Theory of Capitalist Development, p. 15. New York: Modern Reader Paperbacks.
  50. Nobuo Okishio, 1961, "Technical Changes and the Rate of Profit," Kobe University Economic Review 7, pp. 85–99.
  51. "[P]hysical quantities ... suffice to determine the rate of profit (and the associated prices of production) .... [I]t follows that value magnitudes are, at best, redundant in the determination of the rate of profit (and prices of production)." "Marx’s value reasoning – hardly a peripheral aspect of his work – must therefore be abandoned, in the interest of developing a coherent materialist theory of capitalism." Ian Steedman, 1977, Marx after Sraffa, pp. 202, 207. London: New Left Books
  52. "[The falling-rate-of-profit] position is rebutted in Chapter 5 by a theorem which states that ... competitive innovations result in a rising rate of profit. There seems to be no hope for a theory of the falling rate of profit within the strict confines of the environment that Marx suggested as relevant." John Roemer, Analytical Foundations of Marxian Economic Theory, p. 12. Cambridge: Cambridge Univ. Press, 1981.
  53. Vulgar Economy in Marxian Garb: A Critique of Temporal Single System Marxism, Gary Mongiovi, 2002, Review of Radical Political Economics 34:4, p. 393. "Marx did make a number of errors in elaborating his theory of value and the profit rate .... [H]is would-be Temporal Single System defenders ... camouflage Marx’s errors." "Marx’s value analysis does indeed contain errors." (abstract)
  54. "An Error II is an inconsistency, whose removal through development of the theory leaves the foundations of the theory intact. Now I believe that Marx left us with a few Errors II." David Laibman, "Rhetoric and Substance in Value Theory" in Alan Freeman, Andrew Kliman and Julian Wells (eds.), The New Value Controversy and the Foundations of Economics, Cheltenham, UK: Edward Elgar, 2004, p. 17
  55. See Andrew Kliman, Reclaiming Marx's "Capital": A Refutation of the Myth of Inconsistency, esp. pp. 210–11.
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बाहरी संबंध[संपादित करें]