मानवीकरण

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मानवीकरण मनुष्य की गंभीर आवश्यकता है जिसमें व्यक्ति गैर-मानव वस्तु, घटना या संकल्पना को मानवीय गुण, विशेषता या आशय से रंग देता है। मानवीकरण या मानवत्वरोपण दैनिक जीवन के क्रिया-कलापों का महत्वपूर्ण भाग है। यह एक ऐसी मानसिक तथा सामाजिक प्रक्रिया है जो मनोविज्ञान, मानवशास्त्र, साहित्य, इतिहास और आध्यात्म के खोजकर्ताओं को मन की गहराईयों में ले जाती है।

रामायण के पात्रों द्वारा आपसी सहायता का संदेश।

मानवीकरण से भाषा, कला और संस्कृति समृद्ध होती है। व्यक्ति के जीवन काल या समाज के सांस्कृतिक विकास के साथ मानवीकृत तत्वों या कारकों में नए कथानक जुड़ते जाते हैं। कुछ अवस्थाओं में यह मानवीकृत तत्व दो तरह के मानसिक परिवर्तन लाने में सक्षम पाए गए। एक श्रेणी तंत्रिका तंत्र के विघटन द्वारा अर्धचेतन अवस्था में देवता, भूत-प्रेत, या अन्य लोकातीत अनुभव, तथा दूसरी श्रेणी उपचार और स्वास्थ्य लाभ से संबंधित है, जैसे, पराप्राकृतिक संवाद। धार्मिक अनुष्ठान तथा नैतिकता द्वारा मानवीकरण गैर-बंधुओं में आपसी मेल-जोल बनाये रखता है। वैज्ञानिक खोज, विशेषकर जंतुओं के व्यवहार, में मानवीकरण वर्जित है, पर इसने दो नए क्षेत्रों को जन्म दिया, “थ्योरी ऑफ माइंड” और “दर्पण तंत्रिका तंत्र”।

मानवीकरण[संपादित करें]

मासाशियो की कलाकृति में इसाई धर्म के पवित्र तत्व।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मानवीकरण या मानवत्वरोपण मनुष्यों की एक गंभीर आवश्यकता है, तथा यह प्रवृति मानसिक कार्यों के अनेक क्षेत्रों का संचालन करती है।[1][2][3] मानवत्वरोपण या एंथ्रोपोसेंट्रीज्म[2] और मानवीकरण या पर्सोनीफिकेशन[3] साधारणतया समानार्थक है।[4] परन्तु रत्ना रमण के अनुसार मानवत्वरोपण अधिक विस्तृत है।[5] मानवीकरण में मानवीकृत वस्तु से जुड़ाव निहित है। जबकि मानवत्वरोपण में मानवीकरण के अतिरिक्त, विशेषण का स्थानांतरण घटना को असामान्य या अप्रत्याशित बनाता है।


स्तानिस्लैव ग्रौफ़ ने मानवीकरण, तदात्मिकरण, तथा अवतार को लगभग समानार्थक रूप से प्रयोग किया है, जिसका अर्थ है “मूल सर्वभौम नियमों का मानवीकरण”।(पृष्ठ, 156) [6]


मानवीकरण दैनिक जीवन के क्रिया-कलापों से लेकर स्वर्ग तथा नरक के देवी-देवताओं के साम्राज्य को समझने की संकल्पना है।[2][7] यह मनोविज्ञान, मानवशास्त्र, साहित्य, चिकित्सा विज्ञान, इतिहास, और आध्यात्म के जिज्ञासुओं को मन की गहराईयों में ले जाती है।[8]

मनोविज्ञान की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण है, मानवीकृत तत्वों या कारकों, जैसे पराप्राकृतिक आकृतियाँ, में सांस्कृतिक विकास के साथ कथानकों का जुड़ना, और संस्थानों का बनना, जिसके उदाहरण दुनिया के सभी धर्मों में[3] तथा क्षेत्र विशेष, जैसे उत्तरी भारत[9] में मिलेंगे। इन संस्थानों में विश्वास रखने वाले लोगों में दो तरह के प्रभाव मनोवैज्ञानिकों तथा चिकित्सा शास्त्रियों के लिए चुनौती है, एक में मानवीकृत तत्व, देवी-देवता, भूत-प्रेत या किसी अन्य शक्ति द्वारा व्यक्ति की चेतना में परिवर्तन आते हैं, तथा दूसरे में, यही पराप्राकृतिक तत्व मानसिक रोगों के उपचार तथा स्वास्थ्य लाभ से जुड़े हैं।[10][11][8][6]

मानवीकरण का नया एवम् महत्वपूर्ण शोध क्षेत्र है मानवीकृत पराप्राकृतिक प्रतिमाओं और उनसे जुड़े धार्मिक संस्थानों का सकारात्मक सामाजिक व्यवहार में योगदान। इससे गैर-बंधुओं में आपसी सहायता के उद्विकास की गुत्थी सुलझी है, पराप्राकृतिक तत्वों में विश्वास सहयोग बढाता है।[12][13][14]

इस लेख के पहले उपभाग में मानवीकरण के कुछ सिद्धांतों का परिचय है, और इसके बाद अन्य उपभागों में उन क्षेत्रों का वर्णन है जिनमें मानवीकरण का योगदान है।


मानवीकरण के सिद्धांत[संपादित करें]

मानवीकरण या मानवत्वरोपण के मनोविज्ञान की दृष्टि से महत्पूर्ण तीन सिद्धांतों का संक्षिप्त परिचय निम्न अनुभागों में दिया गया है।

संज्ञानात्मक सिद्धांत[संपादित करें]

श्रीरामकृष्ण परमहंस चेतना की विशेष अवस्था में।

स्टीवर्ट गथरी का मानना है कि धर्म, संज्ञान के अन्य तंत्रों की तरह, विचारों एवम् क्रिया-कलापों का एक तंत्र है जो दुनिया से जुड़े प्रश्नों के उत्तर देने तथा उन्हें प्रभावशाली ढंग से नियंत्रित करने में सहायक है।[15] इस प्रयास में मानवत्वरोपण की प्रक्रिया की मुख्य भूमिका है। संज्ञान की दृष्टि से देवता समाज का मानवीकरण है, जिनकी मानव को उसके चारों ओर की वास्तविकता से जोड़ने में भूमिका है। अतः देवता और मानवत्वरोपण धर्म के दो मुख्य घटक हैं। मनुष्य, क्योकि संज्ञानात्मक रूप से जटिल है, वह घटनाओं के अनुरूप अनेक प्रकार के प्रतिरूप रचने में सक्षम है, जिनसे वह संज्ञानात्मक रूप से घटनाओं की व्याख्या तथा नियंत्रण करता आया है।

त्रि-कारक सिद्धांत[संपादित करें]

एप्ले, वैट्ज़ और कासिओप्पो ने मानवत्वरोपण को व्यक्ति की एक प्रवृति बताया जिससे वह वास्तविक या काल्पनिक गैर-मानव वस्तुओं या कर्ताओं को मानवीय गुणों, विशेषताओं या मानसिक स्थितियों से रंगता है।[2] मानवत्वरोपण के तीन मनोवैज्ञानिक निर्धारक हैं।

    • पहला, रोपित ज्ञान का संज्ञानात्मक तंत्र, जिसके तीन मुख्या कारण पाए गए,
      • अन्य हमारी तरह हैं,
      • [[मस्तिष्क] का “दर्पण तंत्रिका तंत्र”, [16] तथा
      • बच्चों को समाज की सहायता चाहिए।
    • दूसरा, प्रभाव या विपाकिता अभिप्रेरक, जिसका कार्य,
      • अनिश्चितता दूर करना,
      • अर्थ समझना, तथा
      • प्रभावोत्पादकता है।
    • तीसरा, सामाजिक अभिप्रेरक जो,
मानव मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं में संवेदना।

लोग उपरोक्त तीन कारकों के दृष्टिगत मानवत्वरोपण की ओर अग्रसर होते हैं।

संवेदी क्रम सिद्धांत[संपादित करें]

मनोविज्ञान में बाहरी जगत से आने वाली सूचनाओं के प्रक्रमण के लिए मन के दो मुख्य सिद्धांत, मस्तिष्क तथा मन दोनों का संज्ञान लेते हैं। पहला सिद्धांत डी॰ ओ॰ हेब ने 1949 में[18] तथा दूसरा एफ॰ ए॰ हायेक ने 1952 में[19] दिया। जहाँ, हेब ने एक ओर, विचार की स्मृति से जुड़ी तंत्रिका कोशिकाओं, तथा उनसे उत्पन्न चेतना के प्रवाह को समझने का प्रयास किया, वहीँ हायेक ने, दूसरी ओर, संवेदी उद्दीपनों के अर्थपूर्ण श्रेणियों में संयोजन या वर्गीकरण को महत्त्व दिया।

एफ॰ ए॰ वान हायेक, संवेदी क्रम सिद्धांत।[20]


हायेक ने संवेदी उद्दीपनों के वर्गीकरण को मस्तिष्क तथा मन की महत्वपूर्ण प्रक्रिया माना, जिसका व्यवहार तथा कल्पना, दोनों में प्रयोग होता है। वर्गीकरण की प्रक्रिया की विशेषता है कि जब भी किसी उद्दीपन द्वारा संवेदना पुनः दी जाती है, वह मस्तिष्क में पहले स्थान पर पहुँचती है, तथा स्वाभाविक रूप से वही प्रभाव छोड़ती है।


शनित्ज़र और पेडरीरा के अनुसार, हेब और हायेक दोनों, तंत्रिका कोशिकाओं या न्यूरांस के आपसी जोड़ों को, बाहरी घटनाओं के आपसी संबंधों, का प्रतिरूप मानते थे।[21] इस परिकल्पना को आगे बढ़ाते हुए, शनित्ज़र और पेडरीरा ने सुझाव दिया कि भाषा में रूपक जहाँ दो भिन्न श्रेणी की वस्तुओं में संबंध बनाते हैं, रूपक का यह प्रभाव मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं में भी जोड़ बनाने में सहायक होगा। अर्थात, भाषा का रूपकात्मक प्रयोग तंत्रिका जाल बनाने में सहायता करता है।


हायेक के अनुसार, संवेदी क्रम, जो तंत्रिका स्तर पर बनता है, दो तरह की व्यवस्था स्थापित करता है, व्यक्ति के अन्दर मन में, तथा व्यक्ति बाहर समाज में।[19][22] इस व्यवस्था के प्रारूप के दो स्रोत हैं, जन्म-जात, तथा सीखना। हायेक इन दोनों क्रमों या व्यवस्थाओं को धर्म के क्षेत्र में ले गए, [23] मुख्यतः प्रकृति के मानवीकरण[3] के क्षेत्र में। मानवीकरण में व्यक्ति अमूर्त वस्तुओं में मानव के गुणों का रोपण करता है, जैसे, पत्थर या धातू की एक विशेष आकृति में शिव या नटराज का आभास, नीचे चित्र देखें।



मानवीकृत पराप्राकृतिक कारक और स्वास्थ्य[संपादित करें]

सी॰ जी॰ जुंग, व्यक्तित्व के अध्ययन में मानवीकरण।

अन्ना नील ने आधुनिक साहित्य और विक्टोरियन मनोविज्ञान के क्षेत्रों से चेतना की विशेष अवस्थाओं, ड्रीमी स्टेट्स या अर्द्धचेतन मन में होने वाले अनुभवों का विस्तार से विश्लेषण किया है।[8] दो श्रेणियों के परिवर्तन महत्वपूर्ण हैं। एक प्रकार के मानसिक परिवर्तन शारीरिक मनोविज्ञान तथा उद्विकास के अनुसार तंत्रिका तंत्र का विघटन हैं, जिसमें व्यक्ति को अर्धचेतन अवस्था में देवता, भूत या अन्य लोकातीत अनुभव होते हैं। दूसरी श्रेणी में वह मानसिक परिवर्तन आते हैं जो स्वास्थ्य लाभ और उपचार से संबंधित हैं।

मनोविज्ञान इन अर्धचेतन अवस्थाओं में होने वाले अनुभवों, देवता, भूत तथा अन्य प्रकार के आभास, को मानवीकृत तत्वों या कारकों के कथानक के रूप में देखता है।[24] इसका प्रमुख उदाहरण स्वयं मनोवैज्ञानिक जुंग के काल्पनिक आकृतियों, ‘द रैड वन”, अमोनियस, और फिलेमन, आदि से संवाद है। इन मानवीकृत आकृतियों से हुए जुंग के संवाद पुस्तक में छपे हैं, तथा इनसे संवादी मनोचिकित्सा का उदय हुआ।

संवादी प्रक्रिया[संपादित करें]

एच जे॰ एम॰ हरमांस ने उपरोक्त विचारों से मेल खाता “संवादी सिद्धांत” प्रतिपादित किया।[10][25] उनका मानना है कि हमारे मन में अनेक प्रकार की काल्पनिक प्रतिमाएं उभरती हैं, जिनसे हम सदैव संवाद करते हैं। इन में पराप्राकृतिक आकृतियाँ, आदर्श पुरुष, पाश्विक आकृतियाँ, दिव्य शक्तियां, दानव या अन्य मानवीकृत तत्व आते हैं। एक प्रकार से यह प्रतिमाएं आतंरिक आवाज़ों के रूप में व्यक्ति या आत्म से संवाद करती हैं। साधारणतया इससे व्यक्ति के दैनिक जीवन में कोई बाधा नहीं आती, परन्तु कोई प्रतिमा मानवीकरण से व्यक्ति के आत्म पर प्रभावी हो जाती है, जिससे लगता है कि यह वह व्यक्ति नहीं, अपितु कोई अन्य उसके अन्दर से बोल रहा है। हरमांस ने इन विचारों को संवादी सिद्धांत या डायजिकल थ्योरी के रूप में मनोवैज्ञानिकों के सामने रखा, जिसका साहित्य में पात्रों के संवाद समझने, तथा निदानात्मक मनोविज्ञान में भूतावेश को समझने में प्रयोग हुआ।

बहु-व्यक्तित्व[संपादित करें]

भूत-प्रेत के अपसारण का प्रदर्शन।

हरमांस ने लिखा कि लोगों के मन में काल्पनिक या मानवीकृत प्रतिमाओं की बाहुल्यता तथा “बहु-व्यक्तित्व” में अंतर है।[10] सामान्य व्यक्ति में कई प्रतिमाएं एक साथ संवाद करती है, और कोई समस्या नहीं होती। बहु-व्यक्तित्व में वही मानवीकृत प्रतिमाएं हो सकती हैं, किन्तु उनमें आपस में संवाद नहीं होता, कभी एक प्रतिमा व्यक्ति के आत्म पर हावी होती है, तो कभी दूसरी। यही मानसिक रोग है। जब आत्म या स्व पर कोई अन्य पराप्राकृतिक प्रतिमा हावी हो जाती है, उसे विछिन्न व्यक्तित्व विकार कहते हैं, और मनोचिकित्सा में इस मनोरोग के बारे में कोई एक मत नहीं है।[26]

पराप्राकृतिक या मानवीकृत आकृतियों से पराप्राकृतिक संवाद स्थापित करना लोगों के दैनिक जीवन में आने वाली अनेक समस्याओं के समाधान से जुड़ा है।[27][28][29] जैसे, गुर या चेले द्वारा किसी देवी-देवता, भूत-प्रेत, या मृत-आत्मा से संवाद स्थापित करना। लोगों में विश्वास है कि कोई पराप्राकृतिक तत्व या शक्ति व्यक्ति में प्रवेश कर उसकी चेतना, व्यवहार तथा शरीर में अस्थायी परिवर्तन लाती है।[30] इसका निदान समुदाय में ज़रूरी समझा जाता है, तथा हर समुदाय के अपने तरीके हैं।[31]

खोज कर्ताओं को एक अनोखी बात देखने को मिली है, लगभग चार वर्ष के आस-पास बच्चे अनेक प्रकार की काल्पनिक या मानवीकृत प्रतिमाओं को अपना साथी बना लेते हैं, और उनसे संवाद करते हैं।[32] [33] यह प्रतिमाएँ एक कारक या कर्ता का रूप ले सकती हैं, जिसे बच्चा वस्तुओं में क्रिया उत्पन्न करने में सक्षम समझता है। इन गैर-मानव प्रतिमाओं में दानव, गोरिल्ला, भूत या भगवान होते हैं।[34]

लोकातीत अनुभव[संपादित करें]

कृत्रिम रसायन एलएसडी

स्तानिस्लैव ग्रौफ़ ने लोकातीत अनुभवों या “वीज़ंस” या “स्पिरिचुअल इमरजेंसीज़” के विस्तृत वर्गिकरण एकत्र किये हैं, जो लोगों की जीवनियों, [6] और एलएसडी के प्रभावों, [35] पर आधारित हैं। ग्रौफ़ लिखते हैं, मिथकों और अद्यप्रारूपों की इनमें मुख्य भूमिका है, जैसे, जुंग के तीन मुख्य अद्यप्रारूपों में, एनिमा नारीत्व, एनिमस पुरूषत्व, तथा शैडो दमित इच्छाओं, के सर्वभौम नियमों का मानवीकरण है।[6] ग्रौफ़ ने देवताओं को अद्यप्रारूप माना जिनकी देव और असुर, दो श्रेणियों हैं। और देवता अन्य उच्च मानवीकरण के नियमों का परिणाम है। हालाँकि देवी-देवता अलग-अलग समुदायों और सांस्कृतिक संस्थानों से जुड़े हैं, लेकिन एक जाति के लोगों को दूसरी जाति के देवी-देवताओं से तदात्मिकरण का अनुभव हो सकता है, जैसे, अमेरिकी नारी को हिन्दुओं की देवी काली, या भारतियों को क्रिस्ट का।

ग्रौफ़ ने लोकातीत अनुभवों का मनश्चिकित्सा तथा अन्य निदानात्मक पद्धतियों में विशेष रूप से वर्णन किया है, जैसे एक रसायन एलएसडी का प्रभाव।[35]

शाहर और लेरमान ने मानवीकरण का शारीरिक रोगों के नियंत्रण में अध्ययन किया।[4] उनकी परिकल्पना है कि मानवीकरण दीर्घकालिक रोगों जैसे तनाव, मधुमेह, आदि, में दोधारी तलवार की तरह है। पहले व्यक्ति मानवीकरण से भौतिक/शारीरिक रोग को संज्ञान के क्षेत्र में ले जाता है, जिससे उसकी परेशानी और बढ़ जाती है। किन्तु मनोचिकित्सक की देख-रेख में वही व्यक्ति मानवीकरण से एक योद्धा के रूप में रोग से उत्पन्न तनाव में कमी लाता है।


भाषा, कला, और संस्कृति[संपादित करें]

जेम्स फ्रेज़र के अनुसार, व्यक्ति के नश्वर दैनिक जीवन के क्रिया-कलापों से लेकर स्वर्ग में देवी-देवता के अमर साम्राज्य को जोड़ने वाला मानसिक कारक प्रकृति का मानवीकरण है।[3] फ्रेज़र ने पूरी दुनिया के मानव समुदायों की मानवीकृत आकृतियों, कर्ताओं और उनके संस्थानों के बारे में एकत्र की गई जानकारी से निष्कर्ष निकाला कि यह कारक समाज को विश्वास, नैतिक मूल्यों, तथा व्यवस्था द्वारा प्रभावित करते हैं। विंकलमान का मानना है कि मानवीकृत पराप्राकृतिक कारकों के प्रतीक मानसिक तथा वाह्य जगत के विकास में महत्वपूर्ण कड़ी हैं।[36] यही नहीं, इन मानवीकृत पराप्राकृतिक तत्वों के चारों तरफ मानव सभ्यता के केंद्र भी विकसित हुए, जो ज्ञान का स्रोत बने।[3][37]

सूफी दरवेशों का चेतना की विशेष अवस्था में नृत्य।

भाषा, कला, और संस्कृति के क्षेत्रों में मानवीकरण का योगदान संक्षेप में निम्न तीन अनुभागों में दिया गया है।

भाषा[संपादित करें]

संस्कृत में, 1400 ईसा पूर्व, पराप्राकृतिक तत्वों से संबंधित शब्द रचना मानवीकरण का अनोखा उदाहरण है।[38][39] रत्ना रमण के अनुसार मानवत्व के प्रतिरूप जिनका रोपण गैर-मानव या अन्य अमूर्त रूपों में होता है, मानव मन का कार्य है, और भाषा इसका लेखा-जोखा रखती है।[5] मानवत्वरोपण के दो रूप हैं, विशेषण का स्थानांतरण जो असामान्य प्रक्रिया का द्योतक है, तथा मानवीकरण जिसमें अन्य वस्तुओं के जुड़ाव की भावना निहित है। संज्ञानात्मक-भाषाविज्ञान की दृष्टि में मानवीकरण रूपात्मक अभिव्यक्ति का विषय है।[4]

रामचंद्रन और हब्बार्ड ने सह-संवेदन या सिनेस्थेसिया के अध्ययनों से इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण तथ्य प्रकाश में लाये।[40] सह-संवेदी लोगों के मस्तिष्क में संवेदना ले जाने वाली तंत्रिकाएं एक-दूसरे के क्षेत्र में सूचनाएं ले जाती हैं, जैसे सुनने की संवेदना रंग क्षेत्र में, तथा रंग की संवेदना वाली तंत्रिकाएं श्रवण क्षेत्र में, अतः ऐसे व्यक्ति में ध्वनी का रंग के रूप में, और रंग का ध्वनी के रूप में प्रत्यक्षण होगा। उन्होंने यह भी देखा कि सह-संवेदना सर्जनशील लोगों में सामान्य से सात गुना अधिक होती है, जैसे, कवि, उपन्यासकार तथा चित्रकार। इसके साथ-साथ इन लोगों में रूपक का प्रयोग करने की क्षमता भी अधिक थी। रामचंद्रन और हब्बार्ड कहते हैं की संभवतः सह-संवेदन भाषा में नए जोड़ बनाने, रूपक के प्रयोग, तथा नयी सोच को बढ़ावा देते हैं।

सह-संवेदी मानवीकरण[संपादित करें]

सह-संवेदी लोगों में विचित्र संवेदनाओं का प्रत्यक्षण पाया गया है।[41] हालाँकि भाषाओँ में लिंग को वस्तुओं से जोड़ने में भिन्नता है, सह-संवेदी लोग जो अजीब मानवीकरण का अनुभव करते हैं, अक्षरों या अंकों को मानवीय गुणों, पारिवारिक संबंधों और मानसिक स्थितियों से रंग देते हैं, जैसे, क्रमशः B शर्मिला; B तो A का बेटा है; और, K जानता है कब नहीं कहना है।

मानवीकरण जाल[संपादित करें]

कुछ खोजकर्ताओं ने वस्तु-व्यक्तित्व सह-संवेदना के लिए मानव मस्तिष्क में “मानवीकरण जाल” की परिकल्पना की है।[42] इनका मानना है कि इस मानवीकरण जाल में मस्तिष्क के कई भाग हिस्सा लेते हैं, उनमें तंत्रिका कोशिकाओं के आपसी जोड़ों में वृद्धि होती है, या, जोड़ हैं तो उनमें संवेदना के प्रवाह में रूकावट में कम हो जायेगी।

कला[संपादित करें]

नटराज, मानवीकरण के कथानकों के प्रतीक।

कला-इतिहासकार बी॰ एन॰ गोस्वामी के अनुसार भगवत पुराण की सचित्र पोथी या मुद्रित पुस्तक, पाठक को एक दूसरे संसार में ले जाती है।[43] गोस्वामी अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि रस की संकल्पना, जिस प्रकार भरत ने नाट्यशास्त्र में की है उसमें सभी कलाएं सम्मिलित हैं।[44] गोस्वामी ने 101 कलाकृतियों के विश्लेषण से निष्कर्ष निकाला कि हिंदु-बौद्ध-जैन रस की अभिव्यक्ति में, इस्लामी मुग़लों से, अधिक परिचित जान पड़ते हैं। रस का भाव से संबंध है। कलाकार की कलाकृति रसिक में उत्साह पैदा करती है। उन्होंने 101 कलाकृतियों को कई श्रेणियों में बांटा, इन मेंसे एक श्रेणी अंतर्दृष्टि है, जिसमें कलाकार प्रकृति के मानवीकरण से रसिक को संसार की गहराईओं से परिचय कराता लगता है।

कला की इन गहराईओं से परिचय कराते, तंत्रिकविज्ञानी वी॰ एस॰ रामचंद्रन लिखते हैं, सरस्वती, एक मानवीकृत पराप्राकृतिक प्रतिमा, पूरे भारत में कला एवम् संगीत की देवी के रूप में पूजी जाती है।[45] रामचंद्रन ने अपनी पुस्तक के दो अध्यायों में कला के नौ सर्वभौम नियमों का उद्विकास, तंत्रिकाविज्ञान तथा सांस्कृतिक दृष्टिकोणों से वर्णन किया है। भाषा की तरह कला में भी रूपक का विशेष योगदान है, जिसे रामचंद्रन ने पृष्ठ 238 से 241 तक नटराज, शिव के विराट रूप, की कलाकृति द्वारा समझाया।

कला के इन सर्वर्भौम नियमों को सराहते हुए प्रख्यात तंत्रिका विज्ञानी ई॰ आर॰ केंडल, कला को मस्तिष्क की कार्यप्रणालियों तथा कला की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, क्षेत्रीय, एवम् व्यक्तिगत शैलियों को महत्त्व देते हैं।[46] जैसे इतालवी संस्कृति में इसाई धर्म के सार्वभौम सत्य के विचार मासाशियो की 1427-28 की कलाकृति—द ट्रिनिटी—में मिलेंगे (पृष्ठ 105)। जब कला का आधुनिक युग आया तो क्षेत्र विशेष, जैसे ऑस्ट्रिया में प्रचलित एक शैली, तथा कलाकार की वैचारिक दृष्टि कला में दिखाई देगी। केंडल ने इन आधुनिक कलाकारों, जैसे कोकोकशा की कलाकृतियों का वर्णन करते लिखा कि, वह उस समय के मनोविश्लेषणवाद से प्रभावित थे, तथा उसने इन विचारों का मानवीकरण अपनी विशय-वस्तु में किया।

संस्कृति[संपादित करें]

स्नेह सिद्धान्त, श्री कृष्ण द्वारा सुरक्षित आवास।

धार्मिक स्थलों पर मानवीकृत देवी-देवताओं की आकृतियाँ, कुशल कारीगरों द्वारा नाना प्रकार से उकेरी गयीं, संस्कृति का ऐतिहासिक परिचय देती है। रोमीला थापर ने लिखा है कि यह एक पहेली है कि कोई स्थल जिसमें मूर्तिकार अपनी सर्जनशीलता से मानवीकृत देवी या देवता की आकृति तैयार करता है, धार्मिक अनुष्ठान के बाद कुछ लोगों के लिए शक्ति का पवित्र स्रोत बन जाता है।[37] आशीस नंदी ने भारत के ३३ करोड़ देवी-देवताओं को, इतिहास और धर्म से हटकर, व्यक्ति एवम् समाज की चेतना, तथा मनोवैज्ञानिकों के लिए विशेष चुनौती बताया।[47] यह भारत के देहाती समाज में मानवीकरण की प्रक्रिया द्वारा सर्जित मानस के क्रिया-कलापों की अनूठी विविधता है।

पराप्राकृतिक विश्वास, जो एक प्रकार से प्रकृति का मानवीकरण है, धर्म और संस्कृति के स्रोत हैं।[48][49][45] वित्ज़ेल के अनुसार, शमन या ओझा का पुनःनिर्मित इतिहास दर्शाता है कि पराप्राकृतिक विश्वास लगभग 65,000 वर्षों से लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहे हैं।[50] सभ्यता के विकास के साथ-साथ पराप्राकृतिक विश्वास ने धर्म का रूप लिया, और साहित्य, कला और समाज को प्रभावित किया।[46] अनुमान है कि पूरे विश्व में लगभग 10,00 धर्म होंगे, और प्रत्येक का अपना मानवीकृत तत्वों का संसार।[2]


पिछले कुछ दशकों में हुई खोजों के अनुसार मानवीकृत पराप्राकृतिक तत्वों से जुड़े विश्वास लोगों में आपसी स्नेह और मेल-जोल बनाने में सहायक है।[13] मनोविज्ञान और इससे जुड़े दूसरे विशयों के संयुक्त प्रयास से, मन तथा व्यवहार पर देव आस्था का प्रभाव जानने के नए प्रयोग हुए हैं।[51] इन मेंसे बहुत सी खोजों का आधार, जॉन बाल्बी[52] के स्नेह सिद्धान्त को अलौकिक तत्वों के प्रति आस्था से जोड़ना रहा है।[53]

धार्मिक अनुष्ठान एक व्यनुकूली व्यवहार[संपादित करें]

थाईपुसम, हिन्दुओं के त्यौहार में एक भक्त।

प्रकृति का मानवीकरण विश्व के मानव समुदायों ने अलग-अलग तरह से से किया है।[3][9] डार्विन के उद्विकास के १५०वें वर्ष में ‘नेचर’ पत्रिका में स्वतंत्र पत्रकार दान जोन्स ने जानना चाहा कि क्या लोगों के दिव्य शक्तियों में विश्वासों एवम् क्रिया-कलापों का कोई सामान्य संज्ञानात्मक आधार है? [54] इस प्रश्न के सन्दर्भ में हुई खोजों का सारांश दो श्रेणियों, धार्मिक अनुष्ठान और नैतिकता, में इस प्रकार है।

धार्मिक अनुष्ठान[संपादित करें]

सौसिस ने विश्व के कुछ समुदायों में पराप्राकृतिक तत्वों के धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़े व्यवहारों का अध्ययन किया, अपने प्रयोगों में उन्होंने समूह में सहयोग के लिए इन व्यवहारों को आवश्यक पाया।[55] जॉन्सन और क्रूगर का कहना है कि इतिहास में जहाँ तक हमारी नज़र जाती है विश्व के मानव समुदायों में भगवन और अन्य पराप्राकृतिक शक्तियों का भय लोगों को आपसी सहायता के लिए प्रेरित करता आया है।[12] मुख्यतः इसके दो रूप हैं, धार्मिक संगठनों में “मंहगे अनुष्ठान”, तथा “दंड का विधान”। जॉन्सन और बेरिंग ने पराप्राकृतिक तत्वों द्वारा दंड के चार लाभ बताये—दंड पर आने वाले व्यय की समस्या नहीं, किसी को निगरानी की आवश्यकता नहीं, आपसी सहायता न देने वाले को भगवान द्वारा पकड़ना, तथा, इससे भागने वाले को पकड़े जाने का डर।[56]

हेनरिक और उनके साथियों ने विश्व के कई समुदायों पर अपने प्रयोगों में पाया कि आपसी सहायता के सन्दर्भ में पराप्राकृतिक तत्वों द्वारा दंड देने की भावना संज्ञानात्मक रूप से विद्यमान है।[57] पुरज्येस्की और सौसिस के अनुसार इन पराप्राकृतिक कारकों का आधार लोगों द्वारा सांसारिक वास्तु या अन्य सत्ता को मानवीय गुणों से रंगना है।[58] यदि पराप्राकृतिक कारक का कोई अन्य अस्तित्व भी मान लिया जाए, लोग उस कारक या अमूर्त रूप को मानवीकृत रूप देते हैं। भिन्न–भिन्न संस्कृतियों में इन मानवीकृत रूपों अनोखी विविधता है—अनेक प्रकार के देवता, भूतों के कई रूप, जंतुओं की आत्माएं, तथा अनेकों तरह के पराप्राकृतिक विश्वास।

ज़ायगलातस और उनके साथियों ने धार्मिक अनुष्ठानों की तीव्रता या मंहगाई के आपसी सहायता के साथ संबंध पर कुछ प्रमाण इकट्ठे किये, उनका निष्कर्ष है कि हिन्दुओं में थाईपुसम के त्यौहार में इस तरह के अनुष्ठान किये जाते हैं जो अत्यंत कठिन हैं, चित्र देखें।[59]

नेतिकता[संपादित करें]

पराप्राकृतिक कारकों के बारे में लोगों का विश्वास है कि यह नैतिकता का उलंघन करने वालों का अनुश्रवण करते हैं, तथा उन्हें दंड देते हैं, और मर्यदारक्षक कहलाते हैं।[12][51] इससे समूह में आपसी सहायता बनी रहती है। हेद्त के अनुसार लगभग सभी धर्मों में सांस्कृतिक विकास से ऐसे रिवाज़, मूल्य तथा कथानक विकसित होते हैं जो स्वार्थ को कम करते हैं, तथा लोगों को अपने से परे, दूसरों से जोड़ते हैं।[60]

पुरज्येस्की और उनके साथियों ने पराप्राकृतिक कारकों द्वारा दंड विधान और मानव समाजिकता के विकास पर एक महत्पूर्ण शोध किया है। [14] उनका मानना है कि समय के साथ-साथ मानवीकरण से लोगों के संज्ञान में स्थापित देवता की छवि एक मर्यादारक्षक के रूप में उभरती है, जो सर्वज्ञानी हैं और दोषियों को दंड देते हैं। उन्होंने विश्व में कई जगह छोटे-छोटे समुदायों पर प्रयोगों से निष्कर्ष निकाला कि लगभग सभी धर्मों के मानने वाले अपने साथी अनुयायों के प्रति नैतिक व्यवहार तथा सहयोग में विश्वास रखते हैं।

जंतुओं का व्यवहार और मानवत्वरोपण[संपादित करें]

कानरेड लारेंज़, इथाल्जी के प्रणेता।[61]

अनेक विशयों के चिंतकों ने वैज्ञानिक शोध में जंतुओं और वस्तुओं को मानव के रंग में रंगना अवैज्ञानिक माना।[2] यह समस्या तुलनात्मक मनोविज्ञान तथा ईथाल्जी में प्रमुख रूप से पायी गयी, जहाँ खोजकर्ता जंतुओं के व्यवहार का अध्ययन कर रहे थे। मानवत्वरोपण से भरे जंतुओं के व्यवहार के वर्णन नकारात्मक दृष्टि से देखे जाते।[62] अतः मानवत्वरोपण जंतुओं के व्यवहार के वर्णन में जितना कम किया जा सके, उसे सराहा गया।[63] परन्तु वैज्ञानिकों ने पाया कि जंतुओं, जैसे चिम्पांजी, की आतंरिक संवेदनाओं को जानने के लिए, जो व्यवहार में नहीं दिखाई देती, मानवत्वरोपण उपयोगी था।[64]


पछले कुछ वषों में “थ्योरी ऑफ़ माइंड” या दूसरे के मन की बात या उसके संवेगों और अभिप्रायों का आभास, मनोविज्ञान में एक नया क्षेत्र उभरा है। इस परिकल्पना का उदय चिम्पांजी के व्यवहार के अध्ययन के प्रयोगों में हुआ।[65][46]

इसी प्रकार कुछ वर्ष पहले वैज्ञानिकों को बंदरों के मस्तिष्क में कुछ तंत्रिका कोशिकाएं मिली जिसमें दूसरों के आशयों को समझने का आधार छिपा रहता है।[66][16] बंदर मेज़ पर रखे फल के एक टुकड़े को जैसे ही मूहं की ओर ले जाता है, मस्तिष्क के एक हिस्से की तंत्रिका कोशिकाओं में जोर की हलचल होती है। वही बंदर जब प्रयोगकर्ता को यह कार्य करते, किसी चीज को मूहं की ओर ले जाते, देखता है तो बंदर के मस्तिष्क की उन्हीं तंत्रिका कोशिकाओं में जोर की हलचल होती है। इन तंत्रिका कोशिकाओं को वैज्ञानिकों ने “दर्पण तंत्रिका कोशिका” या “मिरर न्यूरांस” कहा, अर्थात यह तंत्रिका तंत्र दूसरों के व्यवहार का अभिप्राय या आशय समझने में सहायक है।

मानवीकरण के संज्ञानात्मक सिद्धांत के अनुसार, ऊपर देखें, लोग दूसरों को अपने आशयों से रंग देते हैं, इसका एक कारण दूसरों के बारे में ज्ञान एकत्र करना है। इस प्रक्रिया में मनोवैज्ञानिकों की परिकल्पना है कि “दर्पण तंत्रिका तंत्र” सहायक है।[2]

धार्मिक अनुष्ठान के महंगे संकेत सिद्धांत का वर्णन करते हुए रिचर्ड सौस ने इथाल्जिस्टों (जैसे कानरेड लारेंज़) द्वारा जंतुओं के व्यवहार खोजे गए “रिचुअल” या अनुष्ठानिक व्यवहारों का वर्णन किया है।[55] उन्होंने कहा कि, जहाँ एक ओर, जंतु अनुष्ठानिक व्यवहार के प्रदर्शन से अपने को खतरे में डालता है, अर्थात यह उसके लिए महंगा है, दूसरी ओर, उसे इसका लाभ भी होता है। इसी आधार पर धार्मिक अनुष्ठान जहाँ महंगे होते हैं, वहीँ आपसी सहायता बढ़ाने में इनका योगदान भी है।


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सन्दर्भ[संपादित करें]

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