माध्वी नाटक

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काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में ‘माध्वी’ का नाट्य-मंचन

Karna, one of the Kauravas, slays the Pandavas' nephew Ghatotkacha with a weapon given to him by Indra, the king of the gods, from a manuscript of the Razmnama

काशी के सांस्कृतिक गौरव की पहचान है।

‘माध्वी’ महाभारत के उद्योग पर्व से ली गई एक संवेदनशील कथा है। इसमें कथा नायिका माध्वी एक पितृसतात्मक समाज में विडंबनापूर्ण जीवन जीने को अभिशप्त है। पुरुषार्थ दंभ के प्रबल आवेग में माध्वी के खुद का कोई अस्तित्व नहीं। माध्वी अपने महत्वाकांक्षी पिता राजा ययाति द्वारा मुनिकुमार गालव को भेंट कर दी जाती है। कारण यह है कि वह मुनिकुमार गालव के 800 अश्वमेधी घोड़ों की याचना को पूरा नहीं कर पाता है। दूसरी ओर मुनिकुमार गालव ऋषि विश्वामित्र को गुरुदक्षिणा के रूप में 800 अश्वमेधी घोड़ों को देने के लिए वचनबद्ध है।

माध्वी को पाकर मुनिकुमार गालव यह सोचता है कि अब उसके पास एकमात्र माध्वी ही वह साधन है जिसके द्वारा वह अपने गुरु के वचन को पूर्ण कर सकता है। अतिसुंदर रूपवती माध्वी को नव-यौवन प्राप्ति का आशिर्वाद मिला है साथ ही यह भी कि माध्वी के गर्भ से उत्पन्न बालक भविष्य में एक प्रतापी सम्राट होगा। मुनिकुमार गालव माध्वी को लेकर आर्यावत के उन सम्राटों के पास जाता है जो माध्वी के बदले उसे 800 अश्वमेधी घोड़े प्रदान कर सके। कई राजाओं को पति रूप में स्वीकारने को विवश माध्वी हर जगह मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़ना को झेलती है। उसे अपने ममत्व और वात्सल्य का भी त्याग करना पड़ता है। सबसे कारुणिक स्थिति तब उत्पन्न होती है जब बेबस माध्वी भावहीन मुद्रा में ऋषि विश्वामित्र तक को वरण कर लेती है क्योंकि मुनिकुमार गालव माध्वी को कई राजाओं को सौंपकर भी 800 अश्वमेधी घोड़ों को नहीं जुटा पाता है। यह पूरी कहानी माध्वी के इर्द-गिर्द घूमती हुई इस सच को उजागर करती है कि हर पुरुष स्त्री देह को अपनी इच्छापूर्ति का साधन-मात्र समझता है। उसे स्त्री मन, बुद्धि, आत्मा और चेतना का ख्याल नहीं होता है। वह सौंदर्य का उपासक तो है किंतु वह स्त्री के ऊपर स्वछंद शासन की भी अदम्य इच्छा रखता है।

सन्दर्भ[संपादित करें]