माइकल कोस्टरलिट्ज़
| जे. माइकल कोस्टरलिट्ज़ | |
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| जन्म |
22 जून 1943 एबरडीन, स्कॉटलैंड |
| नागरिकता | ब्रिटिश, अमेरिकी |
| शिक्षा की जगह | कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय |
| प्रसिद्धि का कारण | कोस्टरलिट्ज़-थौलेस संक्रमण, टोपोलॉजिकल चरण संक्रमण |
| पुरस्कार | भौतिकी में नोबेल पुरस्कार (2016) |
जे. माइकल कोस्टरलिट्ज़ (जन्म 22 जून 1943) एक अत्यंत प्रख्यात और विश्वविख्यात ब्रिटिश-अमेरिकी भौतिक विज्ञानी हैं, जिन्हें ठोस अवस्था भौतिकी के क्षेत्र में उनके ऐतिहासिक अनुसंधानों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है।[1] वर्ष 2016 में उन्हें भौतिकी के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व और अत्यंत महत्वपूर्ण वैज्ञानिक योगदान के लिए डेविड थौलेस और डंकन हाल्डेन के साथ संयुक्त रूप से भौतिकी के सर्वोच्च सम्मान, नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।[2] यह महान सम्मान उन्हें पदार्थ के सांस्थितिक (टोपोलॉजिकल) चरण संक्रमण और पदार्थ की नवीन अवस्थाओं की सैद्धांतिक खोज के लिए प्रदान किया गया था।[3] उनका यह अत्यंत महत्वपूर्ण शोध आधुनिक भौतिकी, उन्नत सामग्री विज्ञान और प्रमात्रा (क्वांटम) प्रणालियों को स्पष्ट रूप से समझने में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर माना जाता है।[4]
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
[संपादित करें]उनका जन्म 22 जून 1943 को स्कॉटलैंड के एबरडीन नामक एक अत्यंत ऐतिहासिक नगर में हुआ था।[5] उनके माता-पिता जर्मन यहूदी थे, जो द्वितीय महायुद्ध की विनाशकारी नीतियों से बचने के लिए जर्मनी छोड़कर ब्रिटेन आ गए थे। उनके पिता एक बहुत बड़े और प्रख्यात जीव-रसायन विज्ञानी थे, जिसके कारण बचपन से ही उनके घर में विज्ञान और अनुसंधान का एक अत्यंत उत्कृष्ट वातावरण विद्यमान था। इसी शैक्षिक वातावरण ने उनके भीतर ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने की अत्यंत गहरी लालसा उत्पन्न की।[6]
अपनी प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा उत्कृष्ट रूप से पूर्ण करने के पश्चात, उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया।[7] इसी महान संस्थान से उन्होंने गणित और भौतिकी विषय में अपना स्नातक अत्यंत उत्कृष्ट अंकों के साथ पूर्ण किया। इसके पश्चात वे अपना अनुसंधान कार्य जारी रखने के लिए ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय चले गए। इसी प्रतिष्ठित संस्थान से उन्होंने वर्ष 1969 में उच्च ऊर्जा भौतिकी में अपनी विद्यावाचस्पति (डॉक्टरेट) की सर्वोच्च उपाधि सफलतापूर्वक प्राप्त की। यहाँ उन्होंने कण भौतिकी के अत्यंत जटिल गणितीय समीकरणों पर अपना बहुत ही महत्वपूर्ण शोध कार्य पूर्ण किया था।[8]
विशेषज्ञता
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विद्यावाचस्पति की उपाधि प्राप्त करने के पश्चात, उन्होंने अपना ध्यान उच्च ऊर्जा भौतिकी से हटाकर ठोस अवस्था भौतिकी की ओर पूरी तरह से केंद्रित कर दिया।[9] उन्होंने इटली और ब्रिटेन के कई प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों में एक शोधकर्ता के रूप में कार्य किया। बर्मिंघम विश्वविद्यालय में कार्य करते हुए उन्हें महान भौतिक विज्ञानी डेविड थौलेस के साथ कार्य करने का अत्यंत दुर्लभ और सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ। उनकी विशेषज्ञता द्वि-आयामी (दो-आयामी) प्रणालियों में परमाणुओं और इलेक्ट्रॉनों के रहस्यमयी व्यवहार को गणितीय रूप से समझने में थी। उन्होंने गणित की एक विशेष शाखा, जिसे टोपोलॉजी (सांस्थितिकी) कहा जाता है, का उपयोग करके भौतिकी की अत्यंत जटिल समस्याओं को सुलझाने में अद्भुत महारत हासिल की थी, जो उस समय के वैज्ञानिकों के लिए एक अत्यंत नवीन अवधारणा थी।[10]
शोध और सिद्धांत
[संपादित करें]वर्ष 1973 में उन्होंने डेविड थौलेस के साथ मिलकर भौतिकी की दुनिया में एक अत्यंत नवीन और क्रांतिकारी सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसे आज विज्ञान जगत में 'कोस्टरलिट्ज़-थौलेस संक्रमण' के नाम से जाना जाता है।[11] उस समय तक दुनिया भर के वैज्ञानिक यह दृढ़ता से मानते थे कि अत्यंत पतली (द्वि-आयामी) परतों में अतिचालकता या अति-तरलता जैसी चमत्कारी घटनाएं बिल्कुल भी संभव नहीं हैं, क्योंकि वहां तापीय उतार-चढ़ाव किसी भी प्रकार के क्रम को नष्ट कर देते हैं।
परंतु उनके इस ऐतिहासिक और गणितीय सिद्धांत ने यह प्रमाणित किया कि अत्यंत कम तापमान पर इन पतली परतों में कणों के 'भंवर' जोड़े में बंधे रहते हैं, और जब तापमान एक विशेष सीमा तक बढ़ाया जाता है, तो ये जोड़े टूटकर अलग हो जाते हैं, जिससे पदार्थ की अवस्था पूरी तरह से बदल जाती है।[12] यह खोज आधुनिक भौतिकी में एक बहुत बड़ी क्रांति थी, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि द्वि-आयामी प्रणालियों में भी असाधारण भौतिक गुण मौजूद हो सकते हैं।
पुरस्कार और मान्यता
[संपादित करें]विज्ञान और भौतिकी के क्षेत्र में उनके इस ऐतिहासिक और अभूतपूर्व अनुसंधान के लिए उन्हें वर्ष 2016 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया।[13] इस महान पुरस्कार ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनके द्वारा किए गए शोध को एक नई और अत्यधिक प्रतिष्ठित मान्यता प्रदान की। नोबेल पुरस्कार के अतिरिक्त उन्हें दुनिया भर के कई अत्यंत प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संगठनों द्वारा बहुत ही बड़े सम्मानों से नवाजा गया। वर्ष 1981 में उन्हें ब्रिटिश भौतिकी संस्थान द्वारा अत्यंत प्रतिष्ठित 'मैक्सवेल पदक' से अलंकृत किया गया था।[14] इसके अतिरिक्त वर्ष 2000 में उन्हें अमेरिकी भौतिकी समाज द्वारा 'लार्स ओन्सागर पुरस्कार' से भी सम्मानित किया गया। उनके ऐतिहासिक शोध कार्य के कारण ही आज प्रमात्रा संगणक (क्वांटम कंप्यूटर) और नई उन्नत सामग्रियों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ है।[15]
इन्हें भी देखें
[संपादित करें]सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ "माइकल कोस्टरलिट्ज़ की जीवनी". नोबेल पुरस्कार समिति. अभिगमन तिथि: 3 जून 2026.
- ↑ "तीन वैज्ञानिकों ने जीता भौतिकी का नोबेल पुरस्कार". द न्यूयॉर्क टाइम्स. 5 अक्टूबर 2016. अभिगमन तिथि: 3 जून 2026.
- ↑ कोस्टरलिट्ज़, माइकल (1973). "द्वि-आयामी प्रणालियों में चरण संक्रमण". भौतिकी समीक्षा पत्रिका. 6: 1181–1203.
- ↑ स्मिथ, रॉबर्ट (2018). आधुनिक भौतिकी और टोपोलॉजी. विज्ञान शिक्षा प्रकाशन.
- ↑ डेविस, पॉल (2017). कोस्टरलिट्ज़ का प्रारंभिक जीवन. भौतिकी शिक्षा प्रकाशन.
- ↑ जॉनसन, माइकल (2014). "महान भौतिक विज्ञानियों का प्रारंभिक जीवन". प्रायोगिक भौतिकी पत्रिका. 25: 112–118.
- ↑ "कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का इतिहास और नोबेल विजेता". कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय. अभिगमन तिथि: 3 जून 2026.
- ↑ "ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र". ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय विज्ञान संकाय. अभिगमन तिथि: 3 जून 2026.
- ↑ विलियम्स, जॉर्ज (2019). ठोस अवस्था भौतिकी के नए सिद्धांत. स्प्रिंगर प्रकाशन.
- ↑ एंडरसन, थॉमस (2017). "पदार्थ विज्ञान में टोपोलॉजी". विज्ञान प्रगति. 45: 200–210.
- ↑ हैरिस, स्टीवन (2015). कोस्टरलिट्ज़-थौलेस संक्रमण का रहस्य. वैश्विक विज्ञान प्रकाशन.
- ↑ टेलर, रिचर्ड (2011). "भविष्य की तकनीक और चरण संक्रमण". नेचर भौतिकी पत्रिका. 15: 78–85.
- ↑ "2016 भौतिकी नोबेल पुरस्कार का सारांश". नोबेल फाउंडेशन. अभिगमन तिथि: 3 जून 2026.
- ↑ क्लार्क, जेम्स (2018). नोबेल विजेताओं का इतिहास. ऑक्सफोर्ड विज्ञान प्रकाशन.
- ↑ "लार्स ओन्सागर पुरस्कार विजेता". अमेरिकी भौतिकी समाज. अभिगमन तिथि: 3 जून 2026.