महोबिया

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महोबिया, बनाफर क्षत्रिय का गोत्र है,जो की चंद्रवंशी क्षत्रिय है। इस गोत्र वाले बनाफर क्षत्रियों का उद्गम महोबा गाँव से है। महोबा ठिकाना होने का कारण वहाँ के जो क्षत्रीय हैं,वो थे -"बनाफ़र क्षत्रीय" और "चंदेल क्षत्रिय" जो कि दोनों क्षत्रीय लोग महोबिया को सर्नेम की तरह इस्तेमाल किया करते थे। परंतु जैसे-जैसे समय गुज़रता गया। महोबिया क्षत्रिय जितने थे वो जब पलायन किए अपने ठिकाने महोबा से जब वहाँ मुसलमानों का आतंक बढ़ गया था तब , महोबिया क्षत्रिय लोगों के महाराज और सेनापति वीरगति को प्राप्त हो गए थे जब पृथ्वीराज की सेना को हारते हुए। फिर उसे लड़ाई के बाद जितने महोबिया क्षत्रिय सरदार थे । उन्हें कोई सेनापति और महाराज का उत्तराधिकारी नहीं प्राप्त हुआ तब , सारे सरदार क्षत्रियों अपने सारे क्षत्रीय परिवारों को लेके अपने ठिकाने से पलायन कर लिया था । और कई परिवार मुस्लिमों से अपने परिवारों को बचाने के लिए कुछ लोग - "महाकौशल" जबलपुर के क्षेत्र और कुछ क्षत्रीय नरसिंहपुर और मालवा और कुछ क्षत्रिय जो अपने परिवारों को बचाने मैं सक्षम हुए । तो वो बुंदेलखंड की ही सीमा पर रह गए । कुछ परिवार जो क्षत्रीय लोगों के थे । जब क्षत्रीय परिवार पलायन किए "महोबा" से तो क्षत्रीय परिवारों के साथ कुछ और भी समूह के जाती के लोग साथ के क़ाफ़िले म चले । जिसका नेतृत्व "महोबिया" क्षत्रीय कर रहे थे । वो समूह पहले तो "छतरपुर" के पास कुछ दिन ठहरा । परंतु उनका कोई साथी क्षत्रिय मित्र नहि मिला जिसके साथ वो "मुग़लों" की विशाल सेना का सामना कर पाते और अपने परिवारों की रक्षा कर सकते । परंतु उनको किसी का भी साथ ना मिल पाया, क्यूँकि वहाँ जितने पड़ोसी क्षत्रीय थे । जैसे की -"परमार , परिहार , सोलंकी , चौहान ,बुंदेला ,चंदेल ,आदि । क्षत्रीय पहले ही या तो - मुग़लों की आधीनता को स्वीकार कर लिए है । या तो वहाँ से पलायन कर दूसरे ठिकानों पर चले गए थे, परंतु जो महोबिया क्षत्रीय थे । उनका सिर्फ़ महोबा ही ठिकाना था ,वो लोग कहाँ जाते । क्यूँकि चारों ओर जिधर भी देखो मुग़ल ही मुग़ल थे। ऐसे में आपने परिवारों को सुरक्षित करने का सिर्फ़ एक ही उपाय -और राज्य समझ आया उन्हें वो था । मुग़लों का नज़दीकी दुश्मन -----"""गोंडवाना साम्राज्य """ जिसकी महारानी दुर्गावती थी । वो समर्थ और बहुत सूज-भूज का उदाहरण थीं । उनकी जैसी वीरांगना कभी इस धरती पर ना हुई है, ना हो गी। जब महोबिया क्षत्रीय गोंडवाना की सीमा के नज़दीक आ गाए थे । तभी उन्होंने जल्द ही महारानी-सा से मिलकर सारी बात सुनाई । वैसे ही महारानी दुर्गावती महोबा राज्य से ही थी, तो महोबिया क्षत्रिय लोग तो उनके प्रियाजन ही थे । उन्होंने भी महोबिया क्षत्रियों की संघर्ष परिस्तिथि को जाना और परखा फिर उन्होंने उस विशाल महोबिया क्षत्रिय समूह को अपने गोंडवाना राज्य में ही नया ठिकाना बनाने को कहा जिसमें कुछ क्षत्रिय समूह परिवार और कुछ अन्य छोटी जाति के लोग महोबिया क्षत्रियों के छाया में रहने लगे । परंतु मुस्लिम आतंक के बड़ने के कारण कुछ महोबिया क्षत्रियों को अपना कुल-जाती,गोत्र आदि, सब कुछ बदलना पड़ा था, परंतु कुछ क्षत्रीय लोगों ने मुस्लिमों से डटकर लडाई लड़ी और मुस्लिमों से अपने परिवारों की रक्षा की परंतु , समय के बहाव का साथ इतना दुर्भावनापूर्वक रहा कि लोग अपना अस्तित्व ही भूल गए , महोबिया क्षत्रीय लोगों के नाम का ग़लत उपयोग करने लगे और आज ऐसी समस्या हो गयी है की , असली "महोबिया क्षत्रियों" का मिलना कुछ ही जगह सम्भव है। ।।।

मूल[संपादित करें]

दक्षराज और वत्सराज महोबा के  प्रसिद्ध योद्धा थे। उन्होंने राजा परमल के सांथ कई लड़ाइयां लड़ी और सामराज्य को बढाया। सिरसा युध के बाद राजा परमल ने वत्सराज को सिरसा का राजपल नियुक्त किया और दक्षराज को महोबा का सेनापति [1]। दक्षराज महोबा में वीर महोबिया के नाम से  प्रसिद्ध हुए, इसलिए  दक्षराज के वंशज महोबिया कहलाये।

References[संपादित करें]