महिषी दानवी

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महिषी दानवों में महिषासुर की बहन और रंभ की पुत्री और प्रजापति कश्यप और दनु की परपोती थी। उसका वध भगवान शिव के दूसरे पुत्र भगवान अय्यपा ने किया था।

जन्म[संपादित करें]

महिषी और महिषासुर के जन्म के विषय में एक बहुत रोचक प्रसंग है कहा जाता है कि महिषासुर और महिषी का जन्म एक महिष अर्थात भैंस से हुआ था। रंभ और करंभ नाम के दो जुड़वां दानव भाई थे करंभ को देवराज इन्द्र ने एक घड़ियाल के रूप में मार दिया जिससे रंभ दुखी हो गया। उसने उसी समय एक भैंस को देखा और उससे प्रेम कर बैठा। बाद में उसके साथ सम्भोग करने पर उससे एक नर शिशु और एक नारी शिशु का जन्म हुआ। बालक का नाम महिषासुर रखा गया और कन्या का नाम महिषी रखा गया। दोनों भाई बहन अपनी इच्छा के अनुसार जब चाहे मनुष्य का रूप ले सकते थे और जब चाहे दानव का।

महिषी की तपस्या[संपादित करें]

माता पार्वती के हाथों महिषासुर का वध होने के बाद महिषी बहुत दुखी हो गई थी। उसने पुष्कर में जाकर ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की और वर मांगा कि "मेरा वध शिव और विष्णु के पुत्र के हाथों हो। ब्रह्मा जी तथास्तु कहकर अंतर्ध्यान हो गए। ये वरदान पाकर उसने अपने आप को अजर अमर समझ लिया और स्वर्ग पर आक्रमण करके देवताओं को बन्दी बना लिया।

मृत्यु[संपादित करें]

अय्यपा की पालक माता ने एक बार एक गद्दार मंत्री के कहने पर पेट दर्द होने का बहाना बना लिया और वैद्य से भी कहलवा दिया कि केवल बाघिन के दूध से ही रानी का पेट दर्द ठीक होगा। वैद्य के कहने पर अय्यपा बाघिन को ढूंढने जंगल में चल दिए। रास्ते में महिषी ने भैंस के रूप में अय्यपा पर हमला कर दिया। अय्यपा ने भी धनुष को गदा में परिवर्तित करके महिषी के पेट पर भरपूर बल से प्रहार किया जिससे उसका रक्त संचार बिगड़ गया और आंतें भी पेट से निकल गई साथ ही पेट में से खून निकल आए और वह वही गिर पड़ी और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। ।