अमर सिंह प्रथम

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
(महाराणा अमर सिंह से अनुप्रेषित)
Jump to navigation Jump to search
अमर सिंह प्रथम
13वें महाराणा की मेवाड़
13th महाराणा के मेवाड़
शासनावधि23 January 1597 – 26जनवरी 1620
राज्याभिषेक23 January 1597 उदयपुर, राजस्थान, भारत
पूर्ववर्तीमहाराणा प्रताप
उत्तरवर्तीकरण सिंह द्वितीय
जन्म16 मार्च 1559
चित्तौड़गढ़ दुर्ग, राजस्थान
निधन26 जनवरी 1620(1620-01-26) (उम्र 60)
उदयपुर, राजस्थान
संतानकरण सिंह द्वितीय
सूरजमल
(2/7 अन्य)
घरानासिसोदिया
पितामहाराणा प्रताप
माताअजबदे पंवार
धर्महिंदू धर्म
मेवाड़ के सिसोदिया राजपूत
(1326–1884)
राणा हम्मीर सिंह (1326–1364)
राणा क्षेत्र सिंह (1364–1382)
राणा लखा (1382–1421)
राणा मोकल (1421–1433)
राणा कुम्भ (1433–1468)
उदयसिंह प्रथम (1468–1473)
राणा रायमल (1473–1508)
राणा सांगा (1508–1527)
रतन सिंह द्वितीय (1528–1531)
राणा विक्रमादित्य सिंह (1531–1536)
बनवीर सिंह (1536–1540)
उदयसिंह द्वितीय (1540–1572)
महाराणा प्रताप (1572–1597)
अमर सिंह प्रथम (1597–1620)
करण सिंह द्वितीय (1620–1628)
जगत सिंह प्रथम (1628–1652)
राज सिंह प्रथम (1652–1680)
जय सिंह (1680–1698)
अमर सिंह द्वितीय (1698–1710)
संग्राम सिंह द्वितीय (1710–1734)
जगत सिंह द्वितीय (1734–1751)
प्रताप सिंह द्वितीय (1751–1754)
राज सिंह द्वितीय (1754–1762)
अरी सिंह द्वितीय (1762–1772)
हम्मीर सिंह द्वितीय (1772–1778)
भीम सिंह (1778–1828)
जवान सिंह (1828–1838)
सरदार सिंह (1828–1842)
स्वरूप सिंह (1842–1861)
शम्भू सिंह (1861–1874)
उदयपुर के सज्जन सिंह (1874–1884)
फतेह सिंह (1884–1930)
भूपाल सिंह (1930–1947)

राणा अमर सिंह (1597 – 1620 ई० ) मेवाड के शिशोदिया राजवंश के शासक थे। वे महाराणा प्रताप के पुत्र तथा महाराणा उदयसिंह के पौत्र थे।[1] राणा अमर सिंह भी महाराणा प्रताप जैसे वीर थे। इन्होंने मुगलों से 18 बार युद्ध लड़ा। इन्होंने दिबेर के युद्ध में अकबर के सेनापति सुल्तान खां की छाती के आर पार भाला उतार दिया था, जिसमें महाराणा प्रताप की जीत हुई।ये अपने पिता की तरह प्रतापी थे। 1597 में प्रताप के बाद ये अगले शासक बने। प्रारम्भ में मुगल सेना के आक्रमण न होने से अमर सिंह ने राज्य में सुव्यवस्था बनाया। जहांगीर के द्वारा करवाये गयें कई आक्रमण विफल किये। अंत में खुर्रम ने मेवाड़ अधिकार कर लिया। हारकर बाद में इन्होने संधि की। वे मेवाड़ के अंतिम स्वतन्त्र शासक थे।

राणा अमर सिंह प्रजा भक्त थे। इनको गुलामी में रहना अच्छा नहीं लगा, अतः इन्होंने आपना राज्य आपने पुत्र को दे कर ख़ुद एक कुटिया में रहने लग गए।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Sharma, Sri Ram (1971). Maharana Raj Singh and his Times. पृ॰ 14. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 8120823982.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]