राजा विष्णुसिंह

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| महाराजा विष्णुसिंह जयपुर राजघराने में आमेर के शासक और १७वीं सदी के सिद्ध-तांत्रिकशिवानन्द गोस्वामी के शिष्य और सवाई जयसिंह के पिता थे।

जन्म[संपादित करें]

रामसिंह (प्रथम) के पौत्र राजा बिशन सिंह [3] का जन्म वर्ष 1672 में हुआ। [1]]

जीवन[संपादित करें]

यदुनाथ सरकार की 'जयपुर का इतिहास' पुस्तक के अनुसार 30 अप्रैल 1688 को इन्हें आमेर के राजा के रूप में औरंगजेब से मान्यता मिली। [2] महाराजा विष्णुसिंह के बारे में जयपुर इतिहास के अनन्य विद्वान और चन्द्रमहल [सिटी पैलेस], जयपुर के 'पोथीखाने' के पुस्तकालय-प्रभारी स्व. गोपाल नारायण बहुरा ने लिखा है[3] इस दृष्टि से आमेर के शासक विष्णुसिंह को मुगल साम्राज्य के उन कृपापात्र सूर्यवंशी राजपूत राजाओं में गिना जा सकता है जिन्होंने साम्राज्य-विस्तार के लिए कई सामरिक और कूटनीतिक अभियानों में भाग लिया या उनका नेतृत्व किया। हालांकि जेम्स टॉड जैसे इतिहासकार,[4] मानते हैं कि " [[मिर्ज़ा राजा जयसिंह]] के बाद आमेर राज्य का फिर से पतन आरम्भ हुआ। इन दिनों में वहां का शासन मुग़ल बादशाह की उँगलियों पर चल रहा था।...दिल्ली दरबार में इस राज्य को जो सम्मान प्राप्त हुआ था, वह भी अब पहले जैसा न रह गया था। इसलिए महाराजा बिशन सिंह को तीन हजारी मनसब का पद मिला.

देहावसान[संपादित करें]

सन १७०० में वह (महाराजा बिशन सिंह) बहादुर शाह के साथ काबुल के युद्ध में गया था, जहाँ उसकी मृत्यु हो गयी। राजा विष्णुसिंह की मृत्यु होने पर मार्गशीर्ष सुदी ७ वि॰सं॰ १७५६, जनवरी १७०० ई॰ को सवाई जयसिंह आमेर की गद्दी पर बैठे।

स्मारक[संपादित करें]

जयपुर से आमेर रोड पर दीवार से घिरे एक मैदान में 6 बड़ी, 8 मध्यम आकार की और 12 छोटे आकार की छतरियां हैं। ये छतरियां आमेर के राजाओं, उनके परिवार के सदस्यों और वंशजों की समाधियां हैं। इनमें छह बड़ी छतरियां राजा भारमल, राजा भगवंत दास, राजा मान सिंह, राजा जय सिंह, राजा राम सिंह और राजा विष्णु सिंह की हैं। [5]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. [1]
  2. A History of Jaipur : Jadunath Sarkar: BlackSwan:2010
  3. 'जयपुर-दर्शन' प्रकाशक : 'जयपुर अढाईशती समारोह समिति' प्रधान-सम्पादक : डॉ॰ प्रभुदयाल शर्मा 'सहृदय'नाट्याचार्य वर्ष 1978 " वास्तव में भारमल से विष्णुसिंह तक आमेर के राजा अपने राज्य-विस्तार की ओर अधिक ध्यान दे कर मुग़ल साम्राज्य की सीमाएं बढ़ने और उसकी सुरक्षा में लगे रहते थे।"
  4. 'राजस्थान का इतिहास' :ले. कर्नल जेम्स टॉडखंड २ : साहित्यागार: जयपुर
  5. [2]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]