महाराजा अनूपसिंह

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महाराजा अनूपसिंह (1638 - 1698)[1] बीकानेर के वीर, कूटनीतिज्ञ और विद्यानुरागी शासक थे।

जन्म[संपादित करें]

पारिवारिक-पृष्ठभूमि[संपादित करें]

मुग़ल-काल में बीकानेर[संपादित करें]

बीकानेर के तत्कालीन महाराजा महाराजा अनूपसिंह (1669-1698 ई.) को औरंगजेब ने औरंगाबाद का शासक नियुक्त किया था।

विद्यानुराग एवं कला प्रेम[संपादित करें]

वीर होने के साथ-साथ वह स्वयं विद्वान व संगीतज्ञ भी थे और बड़े पुस्तक-प्रेमी थे। उन के दरबार में भाव भट्ट जैसे संगीतज्ञ और कई विद्वान आश्रय पाते थे। इनके आश्रय में रहकर तत्कालीन चित्रकारों ने एक मौलिक किंतु स्थानीय परिमार्जित चित्रशैली बीकानेर कलम को जन्म दिया। द्वारा अपने संकलन की पांडुलिपियों और निजी पुस्तकालय की पुस्तकों से आरम्भ किया गया लालगढ़ पेलेस, बीकानेर में अवस्थित एक अनूठा पुस्तक-केंद्र, जिसमें अनेकानेक ग्रंथों और पांडुलिपियों का व्यवस्थित संकलन है।

उन्होने अनूपविवेक, कामप्रबोध, श्राद्धप्रयोग चिन्तामणि और गीतगोविन्द पर 'अनूपोदय' टीका लिखी थी। उन्हें संगीत से प्रेम था। उसने दक्षिण में रहते हुए अनेक ग्रंथों को नष्ट होने से बचाया और उन्हें खरीदकर अपने पुस्तकालय के लिए ले आये। कुम्भा के संगीत ग्रन्थों का पूरा संग्रह भी उन्होने एकत्र करवाया था। आज अनूप पुस्तकालय (बीकानेर) अलभ्य पुस्तकों का भण्डार है, जिसका श्रेय अनूपसिंह के विद्यानुराग का है। दक्षिण में रहते हुये उन्होने अनेक मूर्तियों का संग्रह किया और उन्हें नष्ट होने से बचाया। यह मर्तियों का संग्रह बीकानेर के तैतीस करोड़ दवताओं के मदिर में सुरक्षित है।

निधन[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]