महानुभाव पन्थ

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महानुभाव पंथ हिन्दुओं का एक सम्प्रदाय है जिसका प्रवर्तन १२६७ ई. में श्री चक्रधर स्वामी ने किया था, वे परब्रह्म परमात्मा के अवतार है, यह शास्वत सत्य कही प्रमाणों से सिद्ध हो चुका है, भगवान श्री चक्रधर स्वामी ने यह प्रमाणित किया कि परब्रह्म का अवतार द्वापर युग में श्रीकृष्ण है,

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है, की

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः।

त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥ (4-9)

हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात निर्मल और अलौकिक हैं- इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से (सर्वशक्तिमान, सच्चिदानन्दन परमात्मा अज, अविनाशी और सर्वभूतों के परम गति तथा परम आश्रय हैं, वे केवल धर्म को स्थापन करने और संसार का उद्धार करने के लिए ही अपनी योगमाया से सगुणरूप होकर प्रकट होते हैं। इसलिए परमेश्वर के समान सुहृद्, प्रेमी और पतितपावन दूसरा कोई नहीं है, ऐसा समझकर जो पुरुष परमेश्वर का अनन्य प्रेम से निरन्तर चिन्तन करता हुआ आसक्तिरहित संसार में बर्तता है, वही उनको तत्व से जानता है।) जान लेता है, वह शरीर को त्याग कर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता हैं...

इसी कथनानुसार भगवान के अवतार हर किसी को ज्ञात नही होते, वह स्वयं भगवान अवतार धारण करके अज्ञानी मनुष्यो को जब ज्ञान देते हैं, तब उन्हें परमात्मा का साक्षात्कार होता है, वैसे ही कलियुग में परमेश्वर भगवान श्री चक्रधर स्वामी जी ने अवतार धारण करके अपना परिचय दिया और यह बताया कि, भगवान श्रीकृष्ण जिन्हें सारी दुनिया विष्णुजी का अवतार समझती है, वह वास्तव में विष्णुजी का अवतार न होकर परब्रह्म परमेश्वर का अवतार है, तथा ब्रम्हा-विष्णु-महेश तथा सारे देवी देवता सृष्टि के चक्र को चलाने के लिये कार्यरत है, तथा वो देवता है, परमेश्वर नहीं, भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में अपने परमधाम का सात बार उल्लेख किया किन्तु एक बार भी उन्होंने वैकुंठ या क्षिराब्दि का उल्लेख नही किया...

जब आप महानुभाव सम्प्रदाय के तत्वज्ञान को पढ़ेंगे तो ऐसे अनगिनत रहस्य आपको पता चलेंगे जिससे यह सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण पूर्ण परब्रह्म परमेश्वर का अवतार हैं, विष्णुजी नहीं, इसीलिए जिनको भी भगवान श्रीकृष्ण या परमात्मा तथा मोक्ष में आसक्ति है, उन्हें महानुभाव पंथ की शरण जाने की सलाह दी जाती है,

भगवान श्रीकृष्ण ने दसवें के दसवें श्लोक में कहा भी है कि


तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ⁠।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ⁠।⁠।⁠10-10।⁠।

उन निरन्तर मेरे ध्यान आदिमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजनेवाले भक्तोंको मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं....

इस श्लोक में विशेष यह है कि भजन-ध्यान तो सभी जन करते है, किन्तु निरंतर निरंतर होना चाहिए, (सततयुक्तानाम्)

भगवान को भजते तो सभी है किंतु वह भजना प्रीतिपूर्वक होना चाहिए, क्योंकि प्रेम के तीन स्तर होते है, प्रथम स्तर प्रेम है, दूसरा स्तर स्नेह और तीसरा स्तर है प्रीति, अर्थात अगर आप भगवान के प्रति प्रेम की पूर्ण निष्ठा को प्राप्त हो गए है, मतलब आप भगवान को प्रीतिपूर्वक भज रहे है, (प्रीतिपूर्वकम्)

(तम्) 'वह' शब्द के प्रयोग से भगवान ने अपने तत्वज्ञान की विशेषता दिखलायी है,

जैसे दो अलग अलग बातें होती तभी हम 'यह' और 'वह' इन दो शब्दों का प्रयोग करते है, भगवान ने भी (तम्) 'वह' शब्द का प्रयोग करके यह भाव दिखलाया है कि, जो भक्त मुझे उपर्युक्त प्रकार से प्रेम और प्रीतिपूर्वक निरंतर नही भजते उनको वह ज्ञान प्राप्त नहीं होता, जो मेरा तत्वज्ञान है, मैं वह ज्ञान सिर्फ उनको ही देता हूं, जो मुझसे प्रेम करते है, जिससे वो मुझे ही प्राप्त कर लेंगे...

इसीसे यह सिद्ध होता है कि, ज्ञान दो प्रकार का होता है, एक अध्यात्म ज्ञान और दूसरा तत्वज्ञान जिसे भगवान ने 'बुद्धियोगम्' कहा है, साधारण जो भक्त है उनको सिर्फ अध्यात्म ज्ञान की प्राप्ति होती है किन्तु जो भगवान को प्रीतिपूर्वक भजते है, भगवान उनपर विशेष अनुग्रहित होकर अपना विशेष तत्वज्ञान प्रदान करते है, जिससे वो उनको ही प्राप्त हो जाते है, यहाँ दो ज्ञान है, एक भगवान की प्राप्ति कराने वाला तत्वज्ञान, और दूसरा अधात्मज्ञान... इसी बात को स्पष्ट करने के लिए भगवान ने (तम्) 'वह' शब्द का प्रयोग किया है...


जिस प्रकार प्रेमी प्रेमिका अपने सारे रहस्य अपने प्रेमी को बता देते है उसी प्रकार भगवान अपने प्रेमी भक्तो को अपना रहस्य बताते है... इसी प्रकार के अनेक गुह्य तत्वज्ञान महानुभाव पंथ की विशेषता है... महानुभाव पंथ को महाराष्ट्र के अलावा उत्तरभारत में जय कृष्णि सम्प्रदाय के नाम से जाना जाता है...

महानुभाव पंथ तथा जय कृष्णी पंथ स्थापना


महानुभाव पंथ (जय क्रिष्णी पंथ) की स्थापना

भगवान श्री चक्रधर स्वामी ने इ. स. १२६७ की, समाज के विशेष कर पिछ्डे वर्ग को जीवन का अंतिम सत्य एवं मोक्षं प्राप्ती के राह दिखाये, भगवान श्री चक्रधर स्वामीजी का अवतार धारण करना समाज के लिये बहोत ही उपयुक्त रहा, उन्होने अपने अनुयायीओको सत्य, अहिंसा, प्रेमदान एवं क्षमादान की मार्ग पर चलने के मार्ग दिखाये, प्रभू ने पंच अवतार की संकल्पना बहुत ही सुचारू ढंग से समाज को बतलाकर जीवन सफल किया...

वह मराठी भाषा के जन्मदाता हैं, मराठी भाषा की पहली कवयित्री महदंबा उनकी शिष्या थीं, मराठी के आद्यग्रंथ लीलाचरित्र में श्री चक्रधर स्वामी की जीवनी समाविष्ट है...


भगवान श्री चक्रधर स्वामीजी ने अपने भक्तोको कहा, "प्रभू चारो युगोमे अवतार धारण करते है"

जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र मे अर्जुन से कहा था,

"धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे"

ठीक उसी प्रकार ऐसा कोई युग नही, जहा भगवान का वास न हो...

भगवान श्री चक्रधर स्वामीजी ने समाज को पांच अवतारो का दर्शन कराया जिसमे, भगवान श्रीकृष्ण महाराज

एवं श्री दत्तात्रेय महाराज, स्वयं स्वयंभू अवतार है, श्री चक्रपाणी महाराज, श्री गोविँद प्रभु,

एवं स्वयं

श्री चक्रधर स्वामी, इस तरह से महानुभाव पंथ के पांच अवतार है, श्री दत्तात्रेय प्रभू महाराज का अवतार चातुर्युगी है, प्रभू का वास आज भी मृत्युलोक में प्रस्थापित है, गुरु परंपरा जिस तरह भगवान श्री कृष्ण महाराज एवं श्री दत्तात्रेय प्रभू महाराज स्वयं स्वयंभू अवतार है, ठीक उसप्रकार श्री दत्तात्रेय प्रभू, श्री चक्रपाणी महाराज के गुरु है श्री चक्रपाणी महाराज, श्री गोविंद प्रभू एवं भगवान श्री चक्रधर स्वामीजी के गुरु है, श्री गोविंद प्रभू, भगवान श्री चक्रधर स्वामीजी के गुरु है,

पंच नाम कि महिमा भगवान श्री चक्रधर स्वामीजी ने अपने अनुयायीयो मोक्षं प्राप्ती का सरल मार्ग बतलाया, नाम स्मरण एकमात्र उपाय है, जो मानव को मोक्षं की राह दिखलाता है, पंच नाम का नित्य स्मरण करना मनुष्य अपने जीवन में मोक्षं पा सकता है, जो आप की कृपा से बहुत प्रसिद्ध हुआ हैं...


भगवान श्रीकृष्ण ने "गिता" मे "ज्ञान" के महीमा वर्णन करते हुये कहा हैं,

इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है ॥4-38॥

उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं ॥10-10॥

हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ ॥10-11॥

उसी प्रकार कलीयुग मे भी

भगवान सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी ने भी श्रीक्षेत्र डोमेग्राम (जिला - अहमदनगर,MH) मेँ म्हइंभट्ट को निम्मत बना कर तत्वज्ञानरुप योग दिया,

स्वामीजी का ठहराव डोमेग्राम मे था । एक दिन की बात है जब म्हइंभट्ट नामक एक ब्राम्हण अपने शास्त्रज्ञान से अहंकार से चुर थे । उन्होने सभी शास्त्रोका अभ्यास कर लेने का अहंकार था । एक दिन म्हइंभट्ट और गणपत आपयो शास्त्र चर्चा कर रहे थे और उन्होने ही म्हइंभट्ट को श्रीचक्रधर स्वामी के बारे मेँ समझाया की उनके पास आप हर सवाल का जवाब हैँ, पर अहंकार मेँ चुर म्हइंभट्टजी ने स्वामीजी को साधारण एक संत समझ लिया । तथा चल पडे डोमेग्राम की ओर, रास्ते मेँ वे सोचने लगे की उनसे मैँ ये सवाल पुछुंगा, ओ सवाल पुछुंगा, उन्हे इस प्रकार हराऊंगा आदी, यह सभी बाते भगवानजी डोमेग्राम मेँ बैठे बैठे सर्वज्ञ रुप देख रहे थे ।

म्हइंभट्ट ने स्वामीजी को कायाप्रणीत नमस्कार किया और म्हइंभट्ट कोई सवाल पुछे उसके पहले ही स्वामीने उनसे पुछा -

"अत्यंतीक संसृती छेद होए ऐसी काइ प्रतीती आत ?"

अर्थात की जिवत्मा जन्ममृत्यूरुप बंधनो से छुटता है, ऐसी कोई प्रतीती (साधन) आपको पता है क्या ?

इस पर म्हइंभट्ट ने कहा "आप मुझे पुछते है तो साधु होकर क्या करते है ?

म्हइंभट्ट के इस कथन पर भगवान ने उन्हे फिर वही सवाल पुछा ।

इस बार म्हइंभट्ट ने जवाब दिया की "कर्म करना चाहिये, कर्म करने से अंतःकरण शुध्द होता है, शुध्द अंतःकरण से वैराग्य उत्पन्न होता है, तथा वैराग्य से ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञान से मोक्ष मिलता है"

इस पर श्रीस्वामी सर्वज्ञजी ने कहा " कर्मोमे से नित्य कर्म तो प्रतिदिनके चरितार्थ के चलाने के लिये जो हिंसा होती है, उसके दुःखो के प्ररिहारार्थी मे चले, गये तथा कामिक कर्म तो जिस कामना द्वारा कि गयी उसमे चले गये, तो फिर कौन से कर्म बचे ? तो फिर अंतःकरण शुध्द कैसे होगा ? और वैराग्य कैसे उत्पन्न होगा ? तथा ज्ञान कैसे उत्पन्न होगा ? और मोक्ष कैसे प्राप्त होगा ? और अविद्या जनित विकार से मनुष्यो को मोक्ष कैसे मिल सकता हैँ ?

तब म्हइंभट्ट ने विंनती की, की मुझ इस बारे में कुछ पता नहीँ है, क्रिपा करके मुझे आप ही बताईए ।

तब भगवान सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामीजी ने तत्वज्ञानरुप योग प्रदान किया । भगवान श्रीकृष्ण जो ज्ञान अर्जुन को नही बता पाये वह ज्ञान कलीयुग अवतार लेकर बताया उसी को ब्रम्हविद्या कहते हैँ ।

भगवान म्हइंभट्ट को कहते हैँ की

"सपुर्ण सृष्टि मे से ऐसी कौन है, जो जीवोंकी अविद्या छेद करके उसे मोक्ष दे सके ? सिर्फ एक परमेश्वर । वही निर्वेव निराकार परमेश्वर । परंतु वह परमेश्वर कृपा करता है, और साकार रुप मे प्रकट होता और लोगो के समुख्ख अवतरीत होता है तथा अपने सन्निधान देता है,  उन्ही के दास्य (सेवा) करने से हमेँ मोक्ष मिल सकता है। [गिता 4-6,7,8,]

फिर म्हइंभट्ट ने पुछा -

म्हइंभट्ट :- "तो फिर दास्य किसके करने चाहिये ? "

स्वामी :- "जैसे द्वापारी श्रीकृष्णचक्रवर्ती गोसावीयांचे चरण शरण : "

म्हइंभट्ट : - "उन्होने तो द्वापर युग के अंत मेँ ही परमधाम को प्रस्थान किया था तो फिर दास्य किसके करने चाहियेँ ? "

स्वामी :- "जैसे सह्याद्रीँ श्रीदत्तात्रेय प्रभु गोसावीयांचे चरण शरण : "

म्हइंभट्ट : - उनका दर्शन तो अमोघ हैँ, और वे अपना दर्शन ऐसे ही नहीँ देते, तो फिर दास्य किसके करने चाहियेँ ? "

स्वामी :- "जैसे द्वारावतीए श्रीचांगदेव राऊळ गोसावीयांचे चरण शरण : "

म्हइंभट्ट : - उन्होने तो कामाख्या के निम्मित देह त्याग किया हैँ, तो फिर दास्य किसके करने चाहियेँ ? "

स्वामी :- "जैसे ऋध्दपुरी श्रीगुंडम राऊळ गोसावीयांचे चरण शरण : "

म्हइंभट्ट : - वे तो किसी को अपनी सेवा दास्य नहीँ करने देते और वे क्या मुझे अपनी सेवा करने देगेँ ? तो फिर दास्य किसके करने चाहियेँ ? "

स्वामी :- (भगवान ने अपनी मांडी पर करकमल थपटकर कहा) " जैसे हे,प्रतिष्ठानीं श्रीचांगदेव राऊळ गोसावीयांचे चरण शरण : "

उसी वक्त

प्रतिष्ठानी (पैठण,MH) जैसे हे, यह सुनकर म्हइंभट्ट को यह एहसास हो गया की स्वामी ही परमेश्वर का अवतार हैँ । स्वामीजी का मुक्काम डोमेग्राम दस माह तक था पर स्वामीजी ने प्रतिष्ठान अर्थात पैठण का ही नाम क्यो लिया बल्की डोमेग्राम का नाम भी ले सकते थे और डोमेग्रामी कह सकते थे ?

परंतु भगवान सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी ने यह बात पहले जान ली थी की, 'म्हइंभट्ट ने शास्त्र मेँ पहले ही पढ लिया था की आगे चल कर पैठण मेँ परमेश्वर अवतार लेने वाले हैँ ।'

इसलिये, म्हइंभट्ट को यह एहसास कराने के लिये भगवान ने प्रतिष्ठान कहा हैँ ।


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