महर्षि मेंहीं

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{{सत्संग योग के लेखक|नाम=सदगुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज|उपनाम=रामानुग्रहलाल|जन्मतारीख़=विक्रमी संवत् १९४२ के वैसाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तदनुसार 28 अप्रैल, सन् 1885 ई. मंगलवार )|जन्मस्थान=पूर्णिया, (हाल में मधेपुरा, बिहार; भारत)|निर्वाण=8 जून, सन 1986 ई. रविवार|निर्वाणस्थल=कुप्पाघाट, भागलपुर, बिहार भारत|कार्यक्षेत्र=कवि, भक्त, संन्यासी, बांस और केले की खेतीकर स्वावलंबी जीवन बिताते हुए सत्संग ध्यान का प्रचार करना|राष्ट्रीयता=हिंदु|भाषा=हिन्दी, मैथिली|काल=भक्ति काल|विधा=कविता, लेख, टीकाकरण आदि|विषय=सामाजिक, आध्यात्मिक|आन्दोलन=भक्ति आंदोलन|प्रमुख कृति=सत्संग योग, रामचरितमानस सार सटीक, श्री गीता योग प्रकाश "साखी , शब्द, गद्य, टीका, टिप्पणी"|प्रभाव=सिद्ध, प्रभावित=डाक्टर, भक्त,संतसेवी जी महाराज, शाही स्वामी जी महाराज|हस्ताक्षर= (०)}}'सदगुरु मेंहीं या सदगुरु महर्षि मेंहीं 19वीं सदी के भारतीय रहस्यवादी कवि और संत थे। वे हिन्दी साहित्य के भक्तिकालीन युग में ज्ञानाश्रयी-निर्गुण शाखा की काव्यधारा के प्रवर्तक थे। इनकी रचनाओं ने हिन्दी प्रदेश के भक्ति आंदोलन को गहरे स्तर तक प्रभावित किया। उनके लेखन आधुनिक विद्वानों के साहित्यों मेंं मिला करता है।<ref>यह मिल जुलकर उपासना में विश्वास रखते थे। उन्होंने सामाजिक अंधविश्वास की निंदा की और सामाजिक बुराइयों की सख़्त आलोचना की, गीता में फैले भ्रामक विचारों पर इन्होंने बहुत प्रकाश डाला है।