मलिक अंबर

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Malik amber of ahmadnager

मलिक अंबर का जन्म संभवत: 1549 में एक हब्शी परिवार में हुआ। बाल्यकाल में ही उसे दास बनाकर बगदाद के बाजार में ले जाकर ख्वाजा पीर बगदाद के हाथों बेचा गया। ख्वाज़ा मलिक अंबर के साथ दक्षिण भारत गया जहाँ उसे निजामशाह प्रथम के मंत्री चंगे़ज खाँ ने खरीद लिया। मलिक अंबर की बुद्धि कुशाग्र, प्रकृति प्रतिभायुक्त और उदार थी, अत: उसे अन्य गुलामों की अपेक्षा ख्याति पाने में देर न लगी। चंगेज खाँ के संरक्षण में रहकर निज़ामशाही राजनीति तथा सैनिक प्रबंध को समझने का उसको अवसर प्राप्त हुआ। चंगेज खाँ की आकस्मिक मृत्यु होने के कारण वह कुछ समय तक इधर-उधर निजामशाही राज्य में ठोकरें खाता रहा। निजामशाही राज्य पर काले बादलों को आच्छादित होते देखकर तथा दलबंदी के संताप और मुगलों के निरंतर आक्रमणों से भयभीत होकर ख्याति पाने की आशा से वह बीजापुर और गोलकुंडा गया परंतु जब इन राज्यों में भी यथेष्ट सुअवसर प्राप्त न हुआ तक वह अन्य हब्शियों के साथ फिर अहमदनगर लौट आया। वह सेना में भरती हुआ और उसे अमँग खाँ ने 150 अश्वारोहियों का सरदार नियुक्त किया। वह अपने आश्रयदाता के साथ चुनार पहुँचा, और उसने मुगल आक्रमणकारियों को परेशान करना प्रारंभ किया। शत्रु के शिविरों पर छापा मारकर वह रसद लूट लेता था और उसके प्रदेश में घुस पड़ता था। इस प्रकार धीरे-धीरे उसकी ख्याति बढ़ने लगी।

परंतु जब अहमदनगर पर मुगलों का अधिकार हो गया, और निजामशाही राज्य अपनी अंतिम साँसें ले रहा था तब मलिक अंबर को अपने अदम्य साहस, शक्ति एवं गुणों का परिचय देने का अवसर मिला। मराठों की सहायता से उसने एक सेना का निर्माण करके निजामशाही परिवार के अली नाम के व्यक्ति को गद्दी पर बिठाकर परेंदा में नवीन राजधानी स्थापित की। ह्रासग्रस्त राज्य का पुन: संगठन करके और सुख शांति के वातावरण का प्रतिपादन करके उसने एक नवीन जाग्रति पैदा कर दी। निजामशाही राज्य पुन: प्रभुता तथा ऐश्वर्य की ओर उन्मुख हो गया। परिस्थिति उसके अनुकूल थी। राजकुमार सलीम के अकस्मात् विद्रोह के कारण मुगल सेना का दक्षिण से हटना अनिवार्य हो गया था। फलत: मलिक अंबर ने मुगलों द्वारा विजय किए हुए प्रदेशों पर अपना अधिकार करना प्रारंभ कर दिया और अहमदनगर, प्राय: समस्त दक्षिण भाग, हस्तगत कर लिया। परंतु शीघ्र ही उसको एक अन्य कठिनाई का सामना करना पड़ा। सआदत खाँ ने, जो निजामशाही सरदार था, मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। यह देखकर उसके एक अनुधर राजू ने उसके अधिकृत प्रदेश पर अपना अधिकार जमा लिया और उसने मुगलों से टक्कर लेना प्रारंभ कर दिया। वह भी परेंदा आया पर अन्य निज़ामशाही सेवकों में सम्मिलित हो गया। परंतु आशाजनक पद न पाने के कारण क्रुद्ध होकर वह अपने प्रदेश को वापस चला गया और वहाँ से निजामशाह को अंबर के विरुद्ध भड़काना प्रारंभ किया। फलस्वरूप, अंबर और राजू दोनों एक दूसरे के शत्रु हो गए। लेकिन अपने क्षेत्रों में दोनों मुगलों का मुकाबला करते रहे। इसके बावजूद 1605 तक मलिक अंबर की परिस्थिति दृढ़ ही होती गई।

मुगलों की संपूर्ण अहमदनगर राज्य से निकालकर उसने परेंदा को छोड़ दिया, और जुन्नार में नई राजधानी बनाई। राजू को परास्त कर उसने बंदी बना लिया, और फिर मौत के घाट उतार दिया, तथा उसकी जागीर पर भी अधिकार कर लिया। मुगलों से टक्कर लेते लेते उसने खानेखाना को लोहे के चने चबवा दिए। अपने सेनाध्यक्ष खानेखाना की असफलता पर जहाँगीर को क्रोध आया और इसका कारण जानने के हेतु खानेखाना को दरबार में बुलाया गया। आगरा पहुँचकर खानेखाना ने विषम परिस्थिति का ब्योरा दिया, अतएव मलिक अंबर की बढ़ती हुई सत्ता का दमन करने के अभिप्राय से वह पुन: दक्षिण भेजा गया।

अब मलिक अंबर ने बीजापुर और गोलकुंडा से सहायता ली और मुगलों पर टूट पड़ा। उसने खानेखाना की योजना को असफल कर दिया। विवश होकर सम्राट् ने राजकुमार और आसफ खाँ को एक बड़ी सेना के साथ दक्षिण भेजा पर उसे भी कोई सफलता न मिली। मलिक अंबर की शक्ति दिन-प्रति-दिन बढ़ती गई और 1610 में समस्या इतनी गंभीर हो गई कि आसफ खाँ ने सम्राट् से अनुरोध किया कि वह स्वयं ही पधारें। जहाँगीर ने इस सुझाव पर विचार किया और दक्षिण प्रस्थान करने की बात सोची परंतु अन्य अमीरों ने इसका समर्थन न किया। अब दक्षिण की समस्या के हल का उत्तरदायित्व खानेजहाँ को सौंपा गया। परंतु इसके पूर्व कि वह वहाँ पहुँचे खानेखाना ने, अपने बेटों की मदद से वर्षा ऋतु में मलिक अंबर पर अचानक हमले की योजना बनाकर उसपर हमला कर दिया। मलिक अंबर तो तैयार ही बैठा था। उसने मुगलों के छक्के छुड़ा दिए और खानेखाना को बुरहानपुर लौटने पर बाध्य कर दिया। उसको एक संधि पर हस्ताक्षर भी करने पड़े। तत्पश्चात् मलिक अंबर ने अहमदनगर के निकटवर्ती प्रदेशों पर अधिकार करके उसके किले पर घेरा ढाला और उसको भी छीन लिया। बरार और वालाकाट के कुछ भागों को छोड़कर लगभग संपूर्ण निजामशाही राज्य, जिसपर मुगलों ने 1600-1601 में अपना अधिकार जमा लिया था, अब मलिक अंबर ने उनके हाथों से छीन लिया और निजामशाही वंश के राज्य को पुनर्जीवन प्रदान किया।

खानजहाँ लोदी ने प्रदेश में पहुँचकर वहाँ के वातावरण से परिचित होने का प्रयास किया। उसने सम्राट् को यह सुझाव दिया कि खानेखाना को हटाकर सेनापति पद का भार उसको ही सौंपा जाए। उसने वचन दिया कि यदि उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया तो वह अहमदनगर तथा बीजापुर के राज्यों पर मुगल सत्ता दो वर्षों के भीतर ही स्थापित कर देगा। जहाँगीर ने उसकी बातें मान लीं, और उसे प्रचुर धन और सेना दी। फिर भी जब वह मलिक अंबर के विरुद्ध मैदान में उतरा, तब उसे यह प्रतीत हुआ कि यद्यपि शत्रु की तलवार उसकी तलवार से भारी नहीं, तथापि उसके लड़ने का ढंग अवश्य ही निराला है। कहने का तात्पर्य यह कि उसे भी मलिक अंबर के सामने झुकना पड़ा और उसका गर्व चूर चूर हो गया। मलिक अंबर को परास्त करने के अभिप्राय से सम्राट् ने एक विशाल योजना बनाई जिसका यह उद्देश्य था कि अहमदनगर पर तीन दिशाओं से एक साथ सैनिक अभियान करके मलिक अंबर को घेरकर उसकी सत्ता को नष्ट भ्रष्ट कर दिया जाए। परंतु यह योजना भी असफल सिद्ध हुई और शाही सेना अस्तव्यस्त होकर भाग खड़ी हुई। खोई प्रतिष्ठा को पुन: प्राप्त करने के उद्देश्य से खानेखाना को फिर दक्षिण क्षेत्र में भेजा गया। वह वहाँ 1612 ईदृ में पहुँचा। उसका यह सौभाग्य था कि इस समय निजामशाह के दरबार में आंतरिक फूट फैली थी। इस परिस्थिति से लाभान्वित होकर उसने अनेक दक्षिणी सरदारों को घूस देकर अपने पक्ष में कर लिया। यद्यपि मलिक अंबर को बीजापुर और गोलकुंडा का सहयोग प्राप्त था, तिसपर भी कूटनीति और सबल सेना के सामने उसकी कुछ न चली। 1616 ईदृ के युद्ध में उसे हार खानी पड़ी। विजेताओं ने किर्की को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। यद्यपि खानेखाना ने मुगल प्रतिष्ठा को एक सीमा तक फिर से स्थापित कर दिया था, परंतु उसपर घूसखोरी के आरोप लगते ही रहे। इसीलिए सम्राट् ने राजकुमार खुर्रम को एक विशाल सेना के साथ दक्षिण क्षेत्र में भेजा। राजकुमार के आगमन से दक्षिणी राज्यों में खलबली मच गई। शीघ्र ही बीजापुर तथा गोलकुंडा के नरेशों ने मुगलों से संधि कर ली। ऐसी दशा में जबकि मलिक अंबर मित्रहीन हो गया, उसके समक्ष सर झुकाने के अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं रह गया। अतएव विवश होकर उसने बालाघाट का क्षेत्र और अहमदनगर के दुर्ग की कुंजी मुगलों को सौंप दी और इस प्रकार निजामशाही राज्य को लोप होने से बचा लिया।

अगले दो वर्षों तक वह चुपचाप अपने साधनों को जुटाने में लगा रहा। इधर मुगल सेना में विद्वेष की प्रचंड अग्नि प्रवाहित हो गई। अत: मलिक अंबर ने पुन: गोलकुंडा और बीजापुर को मिलाकर मुगल विरोधी संघ स्थापित कर लिया। दो वर्ष पूर्व हुई संधि की धाराओं का उल्लंघन कर वह मुगल अधिकृत क्षेत्रों पर टूट पड़ा और तीन मास की लघु अवधि में ही उसने मुगलाई अहमदनगर के अधिकांश भाग और बरार को हस्तगत कर लिया। उसने न केवल बालापुर को लूटा ही बल्कि उसपर घेरा भी डाला। बुरहानपुर की दिशा में पीछे हटती हुई मुगल सेनाओं पर निरंतर वार करता हुआ वह बुरहानपुर तक बढ़ गया। नगर के बाहर घेरा डाला और निकटवर्ती प्रदेश को खूब लूटा। इतना ही नहीं, उसने मालवा में प्रवेश करके मांडू पर भी छापा मारा। इससे नर्मदा के उत्तर और दक्षिण क्षेत्रों में मुगलों की ख्याति को बहुत धक्का लगा।

परिस्थिति को निरंतर गंभीर होते हुए देखकर खानेखाना ने सैनिक सहायता की बार बार याचना की। सम्राट् ने राजकुमार शाहजहाँ को यह आदेश दिया वह सेना सहित दक्षिण को प्रस्थान करे। उसके वहाँ पहुँचते ही वातावरण शीघ्रता से बदलने लगा। उसकी सेना आँधी के समान शत्रु के देश पर आच्छादित हो गई। मराठे मांडू से भाग खड़े हुए और शत्रु को बुरहानपुर को दुर्ग भी खाली करना पड़ा। मुगलों ने अब किर्की पर धावा बोल दिया। संभवत: निज़ामशाह अपने परिवार सहित आक्रमणकारियों के हाथ पड़ जाता परंतु मलिक अंबर ने उन लोगों को दौलताबाद भेज दिया था। किर्की से चलकर मुगल सेना अहमदनगर पहुँची और उसको घेरे से मुक्त किया। मलिक अंबर दौलताबाद के दुर्ग से अपने दुर्भाग्य की गतिविधि को देख रहा था।

कुछ विपरीत परिस्थितियों के कारण शाहजहाँ इस युद्ध को आगे बढ़ाना नहीं चाहता था। इसलिए उसने संधि करना ही उचित समझा। मलिक अंबर ने उस समस्त क्षेत्र को वापस कर दिया जो उसने गत दो वर्षों में मुगलों से छीन लिया था। इसके अतिरिक्त 14 कोस निकटवर्ती भूमि भी दी। तीनों दक्षिणी रियासतों ने 50 लाख रुपया कर के रूप में देने का वचन दिया 20 लाख गोलकुंडा ने और शेष 12 लाख अहमदनगर ने। इस प्रकार बड़े चातुर्य से मलिक अंबर ने निजामशाही राज्य को काल के मुँह से पुन: निकाल लिया। परंतु उसकी विपत्तियों का अंत न हुआ। फिर भी उसके साहस में कमी न आई।

शाहजहाँ ने अपने पिता के प्रति विद्रोह करके मुगल साम्राज्य में राजनीतिक भूकंप पैदा कर दिया। अतएव जब उत्तर में परास्त होकर वह दक्षिण प्रदेश में पहुँचा और उसने मलिक अंबर से सहायता की याचना की, तब सम्राट् की शत्रुता मोल लेने के भय से मलिक अंबर ने इनकार कर दिया। परंतु इसके पीछे नीति भी थी। शोलापुर को लेकर निजामशाह और आदिलशाह में झगड़ा चल रहा था। उसमें उसको मुगलों की सहानुभूति प्राप्त करने की आशा थी। अतएव जब महावत खाँ शाहजहाँ का पीछा करते हुए दक्षिण प्रदेश में पहुँचा, तब आदिलशाह और मलिक अंबर दोनों ने ही मुगलाई सहायता के लिए याचना की। कुछ समय तक तो महावत खाँ ने दोनों को द्विविधा में रखा, परंतु तब शाहजहाँ बंगाल की ओर भाग गया तब मुगल सेनापति ने आदिलशाह को सहायता देने का वचन दिया। परंतु शीघ्र ही उसे बंगाल की ओर जाना पड़ा।

इस सुअवसर से मलिक अंबर ने पूरा लाभ उठाया। सुरक्षा हेतु निजामशाह को तो उसने सपरिवार दौलताबाद भेज दिया और स्वयं सेना लेकर गोलकुंडा की सीमा की ओर बढ़ा। कुतुबशाह से धन लेकर संधि करके वह आदिलशाही प्रदेश पर टूट पड़ा। वांछित स्थानों पर अधिकार करके वह बीजापुर की ओर लूटता हुआ अग्रसर होने लगा। आदिलशाह ने मुगलों से सहायता माँगी। भाटवाड़ी की लड़ाई में मुगल आदिलशाही सेना ने मलिक अंबर का डटकर सामना किया। परंतु 15 जून, 1625 को मलिक अंबर ने उन्हें बुरी तरह हराया। इस सफलता ने उसके यश और कीर्ति में वृद्धि की। अब वह कुशल सेनापति, राजनीतिज्ञ और प्रबंधकर्ता समझा जाने लगा। उसके साहस और साधनों में भी उन्नति हुई। फलस्वरूप अहमदनगर व शोलापुर पर उसने फिर से अपना आधिपत्य जमा लिया और उसके सेनापति, याकूत खान ने बुरहानपुर के किले पर घेरा डाल दिया। इसी समय महावत खाँ, शाहजहाँ का पीछा करते करते पुन: दक्षिण आ पहुँचा। याकूत खाँ ने बुरहानपुर से अपनी सेना हटा ली। मलिक अंबर इस बार शाहजहाँ को सरंक्षण देने में बिल्कुल न हिचकिचाया। दोनों संयुक्त सेनाओं ने बुरहानपुर पर घेरा डाला, परंतु कोई सफलता प्राप्त न हुई। थोड़े समय बाद शाहजहाँ ने हथियार डाल दिए और अपने को समर्पित कर दिया। ऐसी परिस्थिति में मलिक अंबर के लिए मुगलों का सामना करना कठिन था। अतएव उसने बुरहानपुर के दुर्ग से सेना हटा ली। अगले वर्ष उसे मुगलों से टक्कर लेने का अवसर प्राप्त हुआ। इस समय जहाँगीर रोगग्रस्त था। नूरजहाँ की गुटबंदी ने महावत खाँ को विद्रोह करने पर विवश कर दिया था, तथा संपूर्ण शाही सेनाएँ महावत खाँ का विद्रोह दमन करने में लगी हुई थीं। दक्षिण में कोई भी कुशल सेनापति न रह गया था। इससे पहले कि वह अपनी सेनाओं की गतिविधि मुगलों के विरुद्ध या आदिलशाह के विरुद्ध संचालित करे, मृत्यु ने उसकी आँखें मई 14, 1615 को अस्सी वर्ष की आयु में बंद कर दीं।

1601 से 1626 तक, मलिक अंबर ने अपनी प्रतिभा, अदम्य साहस, कार्यकुशलता, और सैन्य चातुर्य का परिचय दिया। भारतीय इतिहास में ऐसा बिरला ही उदाहरण मिलेगा जब किसी उजड़े हुए राज्य को एक साधारण श्रेणी के व्यक्ति ने नवजीवन प्रदान किया हो। मलिक अंबर की प्रतिभा बहुमुखी थी। वह सुयोग्य सेनापति तो था ही, इसके साथ साथ कुशल नीतिज्ञ और चतुर शासक भी था। उसने मराठों की सैनिक मनोवृत्ति का ठीक मूल्यांकन करके एक नवीन सैनिक प्रणाली का आविष्कार किया। टोडरमल की भूमिकर व्यवस्था को अपने राज्य में प्रचलन करके उसने न केवल रिक्त कोष को ही समृद्धिशाली बनाया बल्कि जनता को भी सुख प्रदान किया। किर्की में उसने अपनी राजधानी बसाई और यहाँ उसने अनेक मस्जिदों, महलों का निर्माण कराया तथा उद्यान लगवाए। सिंचाई के लिए नहरें भी खुदवाईं। महवल दर्रा, दरवाजा नाखुदा महल, काला चबुतरा दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास, जो आज खंडहरों के रूप में दिखाई देते हैं उसकी भावनाओं को प्रमाणित करते हैं। उसने ज्ञान तथा विद्वानों दोनों को सरंक्षण प्रदान किया। अरब से बहुत विद्वान् आए और उसने उन्हें प्रोत्साहन दिया। उनमें से एक अली हैदर था, जिसने 11वीं शताब्दी हिजरी के प्रसिद्ध संतों की जीवनियों पर "इक्व अल जवहार" ग्रंथ की रचना की। फारस से आए हुए विद्वानों को भी उसने आश्रय दिया। उसने किर्की में चितखाना की स्थापना की जहाँ बहुत से हिंदू और मुसलमान विद्वान् ज्ञान की विभिन्न शाखाओं का गंभीर अध्ययन करते थे।

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