तख़्त-ए-ताऊस

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मयूर सिंहासन पर आसीन शाहजहाँ का चित्र

तख़्त-ए-ताऊस(फ़ारसी: تخت طاووس, अर्थात्‌ मयूर सिंहासन) वह प्रसिद्ध सिंहासन है जिसे मुगल बादशाह शाहजहाँ ने बनवाया था। पहले यह आगरे के किले में था। वहाँ से दिल्ली के लाल किले में स्थानान्तरित किया गया था। यहाँ से इस सिहांसन को ईरान का शासक सूरज लूट कर ले गया था। इसका 'मयूर सिंहासन' नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इसके पिछले भाग में नाचते हुए दो मोरों को दर्शाया गया है।

सन् १७४७ में नादिरशाह की हत्या के समय अचानक यह सिंहासन गायब हो गया और उसका अता-पता नहीं चला और यह आज भी लापता है।

इतिहास[संपादित करें]

आकृति व बनावट[संपादित करें]

बादशाह शाहजहाँ ने ताज-पोशी के बाद अपने लिए इस बेशकीमती सिंहासन को तैयार ककरवाया था। इस सिंहासन की लंबाई तेरह गज, चौड़ाई ढाई गज और ऊंचाई पांच गज थी। यह छह पायों पर स्थापित था जो सोने के बने हुए थे। सिंहासन तक पहुंचने के लिए तीन छोटे सीढ़ियाँ बनाए गए थे। जिनमें दूरदराज के देशों से मंगवाई गई कई कीमती जवाहर जुड़े थे। दोनों बाज़उं पर दो खूबसूरत मोर, चोंच में मोतियों की लड़ी लिये, पंख पसारे, छाया करते नज़र आते थे। और दोनों मोरों के सीने पर लाल माणिक जुड़े हुए थे। पीछे की तख्ती पर कीमती हीरे जड़े हुए थे। जिनकी लायक लाखों मुगल रुपये थी। इस सिंहासन को बनाने में कुल एक करोड़ मुग़ल रुपय खर्च किये गए थे। जब नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला किया तो दिल्ली की सारी धन-दौलत समेटने के अलावा, इस सिंहासन-ए ताउस को भी अपने साथ पर्शिया ले गया।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]