मन्नन द्विवेदी गजपुरी

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मन्नन द्विवेदी गजपुरी (1844-1921 ई.) हिंदी साहित्यकार।

जीवनी[संपादित करें]

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के 'गजपुर' नामक स्थान सन,1885 में जन्म। शिक्षा जुबिली स्कूल, गोरखपुर, क्वींस कालेज, काशी और म्योर कालेज, इलाहाबाद। शिक्षा के अनंतर सरकारी पद पर आसीन हुए और तहसीलदार रहे। बहुमुखी प्रतिभा के साहित्यकार थे। गद्य और पद्य दोनों में उनकी समान गति थी। उनकी भाषा शैली नवीनता की दृष्टि से अपने युग से कहीं आगे थी। उन्हें कविताओं में प्रकृतिप्रेम और देशप्रेम की अभिव्यक्ति जिस शैली में हुई है, वह भी अपने युग की सीमाओं का अतिक्रमण करती हुई है। प.मन्नन द्विवेदी गजपुरी, बी.ए. एक प्रेमचंद कालीन प्रख्यात हिन्दी साहित्यकार थे। मुंशी प्रेमचन्द जी और द्विवेदी जी घनिष्ठ मित्र एवं गुरू भी थे। प.मन्नन द्विवेदी गजपुरी, भारत के पहले बालकवि और बालसाहित्यकार थे। मन्नन जी के सानिध्य में आने से पूर्व प्रेमचन्द की रचनाओं का मूल भाषा माध्यम उर्दू था। मन्नन जी के मार्गदर्शन में पहली बार उन्होने हिन्दी भाषा में मुंशी प्रेमचन्द नें 'प्रेम-पचीसी'नामक लघु कथा संग्रह लिखा.इस समय प्रेमचन्द बस्ती गोरख्पुर में अपनी इंटरमीडिएट की परीक्षा की तैयारी कर रहे थें.

हिन्दी में प्रेमचंद का प्रथम कहानी संग्रह सप्तसरोज 1917 ई० में हिन्दी पुस्तक एजेंसी, कलकत्ता से प्रकाशित हुआ। किंतु इस संग्रह की ‘सौत’ कहानी को छोड़कर शेष 6 कहानियाँ उर्दू मूल से रूपांतरित की गयी थीं। यह रूपंतार्ण मन्नन द्विवेदी गजपुरी की सहायता से किया गया था। संग्रह की भूमिका में गजपुरी ने प्रेमचंद को उर्दू और हिन्दी के प्रसिद्ध गल्प लेखक के रूप में परिचित कराया था, जबकि इस संग्रह से पूर्व हिन्दी पाठकों के मध्य प्रेमचंद मात्र तीन कहानियों सौत, सज्जनता का दण्ड और पंचपर्मेश्वर के लेखक थे और उन्हें अभी उल्लेख्य ख्याति नहीं मिल पाई थी।

मन्नन जी ने ना केवल स्वयं की रचनाधर्मिता से साहित्य जगत को प्रकाशित किया, बल्कि अपने समकालीन अनेकों नव लेखकों के लिए प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक बने. मन्नन जी की पीढ़ी में उनके प्रपौत्र आकाश पाण्डेय [1] ने उनकी लेखन परम्परा को आगे बढ़ाया है वो लेखक, कवि, नाटककार, अभिनेता एवं चित्रकार है।

रचनाएँ[संपादित करें]

आपकी रचनाए हैं- प्रेम (खंडकाव्य), विनोद (बालोपयोगी काव्य), रामलाल और कल्याणी (उपन्यास), मुसलमानी राज्य का इतिहास; भीषण ह्रास, आर्य ललना (निबंध)।

मन्नन द्विवेदी ‘गजपुरी’ की कविताएँ ग्राम्य जीवन की स्वस्थ, पुष्ट कल्पनाओं से भरी हुई हैं। उत्तर प्रदेश के गजपुरी गाँव (जि. गोरखपुर) में जन्में मन्नन द्विवेदी ‘गजपुरी’ के यहाँ सुन्दरता का अर्थ जीवन का भरपूर आस्वाद है। सो इन हरे–लाल, पके–पके आमों को देखकर वह उचित ही लुभा गए हैं :

पके–पके क्या आम रसीले, हरे–लाल हैं नीले–पीले।
आँधी अगर कभी आ जाती, आम हजारों पीट गिराती।
इनको लेकर चलो ताल पर, वहाँ खूब पानी से धोकर।
सौ–पचास तक खाएँगे हम, आज न भोजन पाएँगे हम।

मन्नन द्विवेदी ‘गजपुरी’ की यह विनती भी बच्चे खूब दोहराते आए हैं –

विनती सुन लो हे भगवान, हम सब बालक हैं नादान।
विद्या बुद्धि नहीं है पास, हमें बना लो अपना दास।
पैदा तुमने किया सभी को, रुपया पैसा दिया सभी को।
हाथ जोड़कर खड़े हुए हैं, पैरो पर हम पड़े हुए हैं।
बुरे काम से हमें बचाना, खूब पढ़ाना खूब लिखाना।
बड़ा बड़ा पद पावैगे हम, मिनहत कर दिखलावैगे हम।
कितना भी बढ़ जावैगे हम, तुमे नहीं बिसरावैगे हम।
हमें सहारा देते रहना, खबर हमारी लेते रहना।
लो फिर शीस नवाते हैं हम, विद्या पढ़ने जाते हैं हम।

भगवान श्रीकृष्ण

पाप से सद्धर्म छिप जाता जगत में जब कभी, ईश सब सन्ताप हरने को प्रकट होता तभी।

धर्म-रक्षा हेतु करके दुर्जनों का सर्वनाश, दूर कर संसार का तम सत्य का करता विकाश।

इस तरह अवतार लेता विश्व में विश्वेश है, शेष रहता फिर कहाँ आपत्ति का लवलेश है।

कंस ने उत्पात भारी जब मचाया था यहाँ, द्यूतकारी मद्यपी धन लूटता पाता जहाँ।

डर उसे था हर घड़ी श्रीकृष्ण के अवतार का, देवती को दुख मिला पतियुक्त कारागार का।

भाद्र की कृष्णाष्टमी सब ओर छाया अंधकार, चञ्चला घनघोरमाला में चमकती बार बार।

ज्योति निर्मल देवकी के गर्भ में हो भासमान, विश्वपति शिशुरूप में लाया गया गोकुल निदान।

नन्द ने अपना समझ कर प्रेम से पाला उसे, इसलिए संसार कहता नन्द का लाला उसे।

कृष्ण वंशी को बजा गायें चराता था कभी, दूध माखन चोर कर मन को चुराता था कभी।

पूतना केशी तथा कंसादि का संहार कर, द्वारिका जाके बसाया देवद्विज का कष्ट हर।

बात ही उलटी हुई हा! अब मुरारी हैं नहीं, अब हमारे बीच में व्रज का विहारी है नहीं।

किन्तु उसका रूप सुन्दर है नहीं दिल से हटा, याद आती हाय! अब भी साँवली सुन्दर छटा।

है मुझे विश्वास, फिर भी श्याम आवेगा कभी, मोहनेवाली मधुर बंशी बजावेगा कभी।

पाप-तापों से हमें वह फिर छुड़ावेगा कभी, सर्व दु:खों को दयामय फिर मिटावेगा कभी।