मध्यकालीन दर्शन

मध्यकालीन दर्शन मध्य युग का दर्शन है, जो लगभग 5वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी मध्य माना जाता है। इसकी शुरुआत 8वीं शताब्दी में बगदाद और शारलेमेन के दरबार से हुई।[1] यह प्राचीन यूनान और रोम की संस्कृति की पुनर्खोज और धार्मिक समस्याओं को निवारण करने पर केंद्रित था। इसमें ईश्वर को समझना उस समय के दार्शनिकों के अध्ययन का केंद्र बिंदु था।
एतिहासिक पृष्ठभूमि
[संपादित करें]मध्यकालीन दर्शन के इतिहास को पारंपरिक रूप से दो मुख्य कालों में विभाजित किया गया है। पहला, प्रारंभिक मध्य युग के बाद 12वीं शताब्दी तक का काल, जिसे शैक्षणिक काल के नाम से जाना गया इसमें अरस्तू और प्लेटो के कार्यों की पुनर्खोज, अनुवाद और अध्ययन का विकास हुआ। दूसरा, 12वीं, 13वीं और 14वीं शताब्दी का "स्वर्ण युग," जिसमें प्राचीन दर्शन की पुनर्प्राप्ति, अरबी व्याख्याकारों का समावेश और धर्म, तर्कशास्त्र व तत्वमीमांसा इत्यादि के क्षेत्रों में विकास हुआ।[1][2]
पुनर्जागरण काल के मानवतावादियों ने मध्यकालीन दर्शन के प्रारंभिक मध्य युगीन शैक्षणिक काल को "बर्बर" कहकर अपमानजनक रूप से देखा, क्योंकि यह ग्रीक और रोमन संस्कृति के शास्त्रीय युग और पुनर्जागरण के बीच का समय था। उनके दृष्टिकोण में यह काल शास्त्रीय संस्कृति से अलग था। हालांकि, आधुनिक इतिहासकार इसे एक महत्वपूर्ण दार्शनिक विकास का युग मानते थे, क्योंकि यह काल ईसाई धर्मशास्त्र से प्रभावित था। इस युग के प्रमुख विचारकों में थॉमस एक्विनास का नाम शामिल हैं। इन्होंने शैक्षणिक काल को "बर्बर" कहकर अपमानजनक रूप से देखने वाले दार्शनिकों की आलोचना की।
इन्हें भी देखें
[संपादित करें]सन्दर्भ
[संपादित करें]- 1 2 स्पेड, पॉल विन्सेंट। (2018)। "मध्यकालीन दर्शन". स्टैनफोर्ड इनसाइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफी। संपादक: एडवर्ड एन॰ ज़ाल्टा। भाषा और सूचना के लिए अध्ययन केंद्र।
- ↑ पासनु, रोबर्ट (2010). "परिचय". मध्यकालीन दर्शन का इतिहास. कैम्ब्रिज: कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस. p. 1. ISBN 978-0-521-76216-8.