मधुबनी

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मधुबनी
—  जिला  —
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश Flag of India.svg भारत
राज्य बिहार
जिलाधिकारी
जनसंख्या
घनत्व
66,285 (2011
      कुल जनसंख्या= 4,487,379 
                   पुरुष = 2,329,313 
                  महिला = 2,158,066 तक )
• 1,020/किमी2 (2,642/मील2)
क्षेत्रफल 3,501.0 km² (1,352 sq mi)
आधिकारिक जालस्थल: [http://[4] [5]]

निर्देशांक: 26°22′N 86°05′E / 26.37°N 86.08°E / 26.37; 86.08 मधुबनी भारत के बिहार प्रान्त में दरभंगा प्रमंडल अंतर्गत एक प्रमुख शहर एवं जिला है। दरभंगा एवं मधुबनी को मिथिला संस्कृति का द्विध्रुव माना जाता है। मैथिली तथा हिंदी यहाँ की प्रमुख भाषा है। विश्वप्रसिद्ध मिथिला पेंटिंग एवं मखाना के पैदावार की वजह से मधुबनी को विश्वभर में जाना जाता है। इस जिला का गठन १९७२ में दरभंगा जिले के विभाजन के उपरांत हुआ था।मधुबनी चित्रकला मिथिलांचल क्षेत्र जैसे बिहार के दरभंगा, मधुबनी एवं नेपाल के कुछ क्षेत्रों की प्रमुख चित्रकला है। प्रारम्भ में रंगोली के रूप में रहने के बाद यह कला धीरे-धीरे आधुनिक रूप में कपड़ो, दीवारों एवं कागज पर उतर आई है। मिथिला की औरतों द्वारा शुरू की गई इस घरेलू चित्रकला को पुरुषों ने भी अपना लिया है। वर्तमान में मिथिला पेंटिंग के कलाकारों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मधुबनी व मिथिला पेंटिंग के सम्मान को और बढ़ाये जाने को लेकर तकरीबन 10,000 sq/ft में मधुबनी रेलवे स्टेशन के दीवारों को मिथिला पेंटिंग की कलाकृतियों से सरोबार किया। उनकी ये पहल निःशुल्क अर्थात श्रमदान के रूप में किया गया। श्रमदान स्वरूप किये गए इस अदभुत कलाकृतियों को विदेशी पर्यटकों व सैनानियों द्वारा खूब पसंद किया जा रहा है।

नामाकरण[संपादित करें]

मधुबनी की मुख्य भाषा मैथिली है जो सुनने में मधुर एवं सरस है। प्राचीन काल में यहाँ के वनों में मधु (शहद) अधिक पाए जाते थे इसलिए जगह का नाम मधु + वनी से मधुबनी हो गया।[1] कुछ लोगों का मानना है मधुबनी शब्द मधुर + वाणी से विकसित हुआ है।

मधुबनी जिले के प्राचीनतम ज्ञात निवासियों में किरात, भार, थारु जैसी जनजातियाँ शामिल है। वैदिक स्रोतों के मुताबिक आर्यों की विदेह शाखा ने अग्नि के संरक्षण में सरस्वती तट से पूरब में सदानीरा (गंडक) की ओर कूच किया और इस क्षेत्र में विदेह राज्य की स्थापना की। विदेह के राजा मिथि के नाम पर यह प्रदेश मिथिला कहलाने लगा। रामायणकाल में मिथिला के राजा सिरध्वज जनक की पुत्री सीता का जन्म मधुबनी की सीमा पर स्थित सीतामढी में हुआ था। विदेह की राजधानी जनकपुर, जो आधुनिक नेपाल में पड़ता है, मधुबनी के उत्तर-पश्चिमी सीमा के पास है। बेनीपट्टी के पास स्थित फुलहर के बारे में ऐसी मान्यता है कि यहाँ फुलों का बाग था जहाँ से सीता फुल लेकर गिरिजा देवी मंदिर में पूजा किया करती थी। पंडौल के बारे में यह प्रसिद्ध है कि यहाँ पांडवों ने अपने अज्ञातवाश के कुछ दिन बिताए थे। विदेह राज्य का अंत होने पर यह प्रदेश वैशाली गणराज्य का अंग बना। इसके पश्चात यह मगध के मौर्य, शुंग, कण्व और गुप्त शासकों के महान साम्राज्य का हिस्सा रहा। १३ वीं सदी में पश्चिम बंगाल के मुसलमान शासक हाजी शम्सुद्दीन इलियास के समय मिथिला एवं तिरहुत क्षेत्रों का बँटवारा हो गया। उत्तरी भाग जिसके अंतर्गत मधुबनी, दरभंगा एवं समस्तीपुर का उत्तरी हिस्सा आता था, ओईनवार राजा कामेश्वर सिंह के अधीन रहा। ओईनवार राजाओं ने मधुबनी के निकट सुगौना को अपनी पहली राजधानी बनायी। १६ वीं सदी में उन्होंने दरभंगा को अपनी राजधानी बना ली। ओईनवार शासकों को इस क्षेत्र में कला, संस्कृति और साहित्य का बढावा देने के लिए जाना जाता है। १८४६ इस्वी में ब्रिटिस सरकार ने मधुबनी को तिरहुत के अधीन अनुमंडल बनाया। १८७५ में दरभंगा के स्वतंत्र जिला बनने पर यह इसका अनुमंडल बना। स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गाँधी के खादी आन्दोलन में मधुबनी ने अपना विशेष पहचान कायम की और १९४२ में भारत छोड़ो आन्दोलन में जिले के सेनानियों ने जी जान से शिरकत की। स्वतंत्रता के पश्चात १९७२ में मधुबनी को स्वतंत्र जिला बना दिया गया।

भौगोलिक स्थिति[संपादित करें]

मधुबनी के उत्तर में नेपाल, दक्षिण में दरभंगा, पुरब में सुपौल तथा पश्चिम में सीतामढी जिला है। कुल क्षेत्रफल ३५०१ वर्ग किलोमीटर है जो भूकंप क्षेत्र ५ में पड़ता है। नदियों का यहाँ जाल बिछा है जो बरसात के दिनों में हर साल लोगों के तबाही का कारण बनती है। वर्ष २००७ में आए भीषण बाढ में 331 पंचायत (110 पूर्ण रूप से तथा 221 आंशिक रूप से) तथा 836 गाँवों के 372599 परिवार बुरी तरह से प्रभावित हुए थे।[2] समूचा जिला एक समतल एवं उपजाऊ क्षेत्र है। औसत सालाना १२७३ मिमी वर्षा का अधिकांश मॉनसून से प्राप्त होता है।

नदियाँ: कमला, करेह, बलान, भूतही बलान, गेहुंआ, सुपेन, त्रिशुला, जीवछ, कोशी और अधवारा समूह। अधिकांश नदियाँ बरसात के दिनों में उग्र रूप धारण कर लेती है। कोशी नदी जिले की पूर्वी सीमा तथा अधवारा या छोटी बागमती पश्चिमी सीमा बनाती है।

प्रशासनिक विभाजन

यह जिला ५ अनुमंडल, २१ प्रखंडों, ३९९ पंचायतों तथा ११११ गाँवों में बँटा है। विधि व्यवस्था संचालन के लिए १८ थाने एवं २ जेल है। पूर्ण एवं आंशिक रूप से मधुबनी जिला २ संसदीय क्षेत्र एवं ११ विधान सभा क्षेत्र में विभाजित है।

  • अनुमंडल- मधुबनी, बेनीपट्टी, झंझारपुर, जयनगर एवं फुलपरास
  • प्रखंड- मधुबनी सदर (रहिका), पंडौल, बिस्फी, जयनगर, लदनिया, लौकहा, झंझारपुर, बेनीपट्टी, बासोपट्टी, राजनगर, मधेपुर, अंधराठाढ़ी, बाबूबरही, खुटौना, खजौली, घोघरडीहा, मधवापुर, हरलाखी, लौकही, लखनौर, फुलपरास, कलुआही

कृषि एवं उद्योग[संपादित करें]

मधुबनी मूलतः एक कृषि प्रधान जिला है। यहाँ की मुख्य फसलें धान, गेहूं, मक्का, मखाना आदि है। भारत में मखाना के कुल उत्पादन का ८०% मधुबनी में होता है।[3] आधारभूत संरचना का अभाव एवं निम्न शहरीकरण (मात्र 3.65%) उद्योगों के विकाश में बाधा है। अभी मधुबनी पेंटिंग की 76 पंजीकृत इकाईयाँ, फर्नीचर उद्योग की 13 पंजीकृत इकाईयाँ, 3 स्टील उद्योग, 03 प्रिंटिंग प्रेस, 03 चूरा मिल, 01 चावल मिल तथा 3000 के आसपास लघु उद्योग इकाईयाँ जिले में कार्यरत है। पशुपालन एवं डेयरी को आधार बनाकर इनपर आधारित उद्योग लगाया जा सकता है लेकिन अभी तक मात्र ३० दुग्ध समीतियाँ ही कार्यरत है। मछली, मखाना, आम, लीची तथा गन्ना जैसे कृषि उत्पाद के अलावे मधुबनी से पीतल की बरतन एवं हैंडलूम कपड़े का राज्य में तथा बाहर निर्यात किया जाता है।

शैक्षणिक संस्थान[संपादित करें]

शिक्षा के प्रसार के मामले में मधुबनी एक पिछड़ा जिला है। साक्षरता मात्र 41.97% है जिसमें स्त्रियों की साक्षरता दर महज 26.54% है। आधारभूत संरचना के अभाव को शिक्षा क्षेत्र में पिछड़ेपन का मुख्य कारण माना जाता है। जिले में शिक्षण संस्थानों की कुल संख्या इस प्रकार है:

  • प्राथमिक विद्यालयः 901
  • मध्य विद्यालयः 382
  • माध्यमिक विद्यालयः 119
  • डिग्री कॉलेजः 27

स्थिति में सुधार हेतु बिहार शिक्षा परियोजना के अधीन अभी 98 प्राथमिक विद्यालय खोले गए हैं तथा 83 प्राथमिक विद्यालयों को मध्य विद्यालय में उत्क्रमित किया जा रहा है। मधुबनी जिले के तमाम कॉलेज ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा से संवद्ध हैं जबकि आबादी को देखते हुए जिले में एक विश्वविद्यालय की सख्त आवश्यकता है। इसके अलावा यहां मेडिकल कॉलेज और अन्य इंजीनियरिंग कॉलेज भी नहीं है। मधुबनी के लोग पढ़ाई लिखाई में काफी जहीन माने जाते हैं और उन्होंने राज्य और देश के अंदर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। कम साक्षरता के बावजूद यहां के लोग बड़ी संख्या में आईएएस, आईपीएस और अन्य सेवाओं में चुनकर जाते रहे हैं। लेकिन पढ़ वहीं पाते हैं जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं और जुनूनी है साथ ही जिनका जागरुक समाजिक परिवेश है। मधुबनी में वैसे तो एक नवोदय विद्यालय है लेकिन उसकी गुणवत्ता प्रभावित हुई है। मधुबनी को कम से कम ५ डिग्री कॉलेज, एक मेडिकल कॉलेज और पांच इंजिनयरींग कॉलेजों की सख्त आवश्यकता है। यहां के बच्चे जमीन बेचकर कर्नाटक, महाराष्ट्र और अन्य सूबों में डिग्री पाने जाते हैं जिसकी गुणवत्ता भी संदिग्ध होती है साथ ही राज्य का राजस्व भी दूसरे राज्य में चला जाता है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इस जिले से इतने कद्दावर नेताओं के संसद और विधानसभा पहुंचने के बाद भी जनता को ठगने का सिलसिला जारी है और शिक्षा अभी तक राजनीतिक एजेंडे पर नहीं आ पाई है। शायद देश के अन्य हिस्सों का भी कमोवेश यहीं हाल है।

कला एवं संस्कृति[संपादित करें]

मधुबनी मिथिला संस्कृति का अंग एवं केंद्र विंदु रहा है। राजा जनक और सीता का वास स्थल होने से हिंदुओं के लिए यह क्षेत्र अति पवित्र एवं महत्वपूर्ण है। मिथिला पेंटिंग के अलावे मैथिली और संस्कृत के विद्वानों ने इसे दुनिया भर में खास पहचान दी है। प्रसिद्ध लोककलाओं में सुजनी (कपडे की कई तहों पर रंगीन धागों से डिजाईन बनाना), सिक्की-मौनी (खर एवं घास से बनाई गई कलात्मक डिजाईन वाली उपयोगी वस्तु) तथा लकड़ी पर नक्काशी का काम शामिल है। सामा चकेवा एवं झिझिया मधुबनी का लोक नृत्य है। मैथिली, हिंदी तथा उर्दू यहाँ की मुख्‍य भाषा है। यह जिला महाकवि कालीदास, मैथिली कवि विद्यापति तथा वाचस्पति जैसे विद्वानों की जन्मभूमि रही है।

मधुबनी पेंटिंगः

पर्व त्योहारों या विशेष उत्सव पर यहाँ घर में पूजागृह एवं भित्ति चित्र का प्रचलन पुराना है। १७वीं शताब्दी के आस-पास आधुनिक मधुबनी कला शैली का विकास माना जाता है। मधुबनी शैली मुख्‍य रूप से जितवारपुर (ब्राह्मण बहुल) और रतनी (कायस्‍थ बहुल) गाँव में सर्वप्रथम एक व्‍यवसाय के रूप में विकसित हुआ था। यहाँ विकसित हुए पेंटिंग को इस जगह के नाम पर ही मधुबनी शैली का पेंटिग कहा जाता है। इस पेंटिग में पौधों की पत्तियों, फलों तथा फूलों से रंग निकालकर कपड़े या कागज के कैनवस पर भरा जाता है। मधुबनी पेंटिंग शैली की मुख्‍य खासियत इसके निर्माण में महिला कलाकारों की मुख्‍य भूमिका है। इन लोक कलाकारों के द्वारा तैयार किया हुआ कोहबर, शिव-पार्वती विवाह, राम-जानकी स्वयंवर, कृष्ण लीला जैसे विषयों पर बनायी गयी पेंटिंग में मिथिला संस्‍कृति की पहचान छिपी है। पर्यटकों के लिए यहाँ की कला और संस्‍कृति खासकर पेंटिंग कौतुहल का मुख्‍य विषय रहता है। मैथिली कला का व्‍यावसायिक दोहन सही मायने में १९६२ में शुरू हुआ जब एक कलाकार ने इन गाँवों का दौरा किया। इस कलाकार ने यहां की महिला कलाकारों को अपनी पेंटिंग कागज पर उतारने के लिए प्रेरित किया। यह प्रयोग व्‍यावसायिक रूप से काफी कारगर साबित हुई। आज मधुबनी कला शैली में अनेकों उत्‍पाद बनाए जा रहे हैं जिनका बाजार फैलता ही जा रहा है। वर्तमान में इन पेंटिग्‍स का उपयोग बैग और परिधानों पर किया जा रहा है। इस कला की मांग न केवल भारत के घरेलू बाजार में बढ़ रही है वरन विदेशों में भी इसकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। अन्य उत्पादों में कार्ड, परिधान, बैग, दरी आदि शामिल है।

चित्रकला[संपादित करें]

मधुबनी चित्रकला मिथिलांचल क्षेत्र जैसे बिहार के दरभंगा, मधुबनी एवं नेपाल के कुछ क्षेत्रों की प्रमुख चित्रकला है। प्रारम्भ में रंगोली के रूप में रहने के बाद यह कला धीरे-धीरे आधुनिक रूप में कपड़ो, दीवारों एवं कागज पर उतर आई है। मिथिला की औरतों द्वारा शुरू की गई इस घरेलू चित्रकला को पुरुषों ने भी अपना लिया है। वर्तमान में मिथिला पेंटिंग के कलाकारों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मधुबनी व मिथिला पेंटिंग के सम्मान को और बढ़ाये जाने को लेकर तकरीबन 10,000 sq/ft में मधुबनी रेलवे स्टेशन के दीवारों को मिथिला पेंटिंग की कलाकृतियों से सरोबार किया। उनकी ये पहल निःशुल्क अर्थात श्रमदान के रूप में किया गया। श्रमदान स्वरूप किये गए इस अदभुत कलाकृतियों को विदेशी पर्यटकों व सैनानियों द्वारा खूब पसंद किया जा रहा है।

माना जाता है ये चित्र राजा जनक ने राम-सीता के विवाह के दौरान महिला कलाकारों से बनवाए थे। पहले तो सिर्फ ऊंची जाति की महिलाओं (जैसे ब्राह्मणों) को ही इस कला को बनाने की इजाजत थी लेकिन वक्त के साथ ये सीमाएँ भी खत्म हो गईं। आज मिथिलांचल के कई गांवों की महिलाएँ इस कला में दक्ष हैं। अपने असली रूप में तो ये पेंटिंग गांवों की मिट्टी से लीपी गई झोपड़ियों में देखने को मिलती थी, लेकिन इसे अब कपड़े या फिर पेपर के कैनवास पर खूब बनाया जाता है। समय के साथ साथ चित्रकार कि इस विधा में पासवान जाति के समुदाय के लोगों द्वारा राजा शैलेश के जीवन वृतान्त का चित्रण भी किया जाने लगा। इस समुदाय के लोग राजा सैलेश को अपने देवता के रूप में पूजते भी हैं।

इस चित्र में खासतौर पर कुल देवता का भी चित्रण होता है। हिन्दू देव-देवताओं की तस्वीर, प्राकृतिक नजारे जैसे- सूर्य व चंद्रमा, धार्मिक पेड़-पौधे जैसे- तुलसी और विवाह के दृश्य देखने को मिलेंगे। मधुबनी पेंटिंग दो तरह की होतीं हैं- भित्ति चित्र और अरिपन या अल्पना।

चटख रंगों का इस्तेमाल खूब किया जाता है। जैसे गहरा लाल रंग, हरा, नीला और काला। कुछ हल्के रंगों से भी चित्र में निखार लाया जाता है, जैसे- पीला, गुलाबी और नींबू रंग। यह जानकर हैरानी होगी की इन रंगों को घरेलू चीजों से ही बनाया जाता है, जैसे- हल्दी, केले के पत्ते, लाल रंग के लिऐ पीपल की छाल प्रयोग किया जाता है। और दूध। भित्ति चित्रों के अलावा अल्पना का भी बिहार में काफी चलन है। इसे बैठक या फिर दरवाजे के बाहर बनाया जाता है। पहले इसे इसलिए बनाया जाता था ताकि खेतों में फसल की पैदावार अच्छी हो लेकिन आजकल इसे घर के शुभ कामों में बनाया जाता है। चित्र बनाने के लिए माचिस की तीली व बाँस की कलम को प्रयोग में लाया जाता है। रंग की पकड़ बनाने के लिए बबूल के वृक्ष की गोंद को मिलाया जाता है।

समय के साथ मधुबनी चित्र को बनाने के पीछे के मायने भी बदल चुके हैं, लेकिन ये कला अपने आप में इतना कुछ समेटे हुए हैं कि यह आज भी कला के कद्रदानों की चुनिन्दा पसंद में से है।

चित्रण से पूर्व हस्त नर्मित कागज को तैयार करने के लिऐ कागज पर गाय के गोबर का घोल बनाकर तथा इसमें बबूल का गोंद डाला जाता है। सूती कपड़े से गोबर के घोल को कागज पर लगाया जाता है और धूप में सुखाने के लिए रख दिया जाता है।

मधुबनी चित्रकला दीवार, केन्वास एवं हस्त निर्मित कागज पर वर्तमान समय में चित्रकारों द्वारा बनायी जाती हैं।

मधुबनी भित्ति चित्र में मिट्टी (चिकनी) व गाय के गोबर के मिश्रण में बबूल की गोंद मिलाकर दीवारों पर लिपाई की जाती है। गाय के गोबर में एक खास तरह का रसायन पदार्थ होने के कारण दीवार पर विशेष चमक आ जाती है। इसे घर की तीन खास जगहों पर ही बनाने की परंपरा है, जैसे- पूजास्थान, कोहबर कक्ष (विवाहितों के कमरे में) और शादी या किसी खास उत्सव पर घर की बाहरी दीवारों पर। मधुबनी पेंटिंग में जिन देवी-देवताओं का चित्रण किया जाता है, वे हैं- मां दुर्गा, काली, सीता-राम, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती, गौरी-गणेश और विष्णु के दस अवतार इत्यादि। इन तस्वीरों के अलावा कई प्राकृतिक और रम्य नजारों की भी पेंटिंग बनाई जाती है। पशु-पक्षी, वृक्ष, फूल-पत्ती आदि को स्वस्तिक की निशानी के साथ सजाया-संवारा जाता है।

पर्यटन स्थल[संपादित करें]

राजनगर- राजनगर मधुबनी जिले का एक एतिहासिक महत्व जगह है। यह एक जमाने में महाराज दरभंगा की उप-राजधानी हुआ करता था। यह मराराजा रामेश्वर सिंह के द्वारा बसाया गया था। उन्होंने यहां एक भव्य नौलखा महल का निर्माण करवाया लेकिन १९३४ के भूकंप में उस महल को काफी क्षति पहुंची और अभी भी यह भग्नावशेष के रूप में ही है। इस महल में एक प्रसिद्ध और जाग्रत देवी काली का मंदिर है जिसके बारे में इलाके के लोगों में काफी मान्यता और श्रद्धा है। जब इस नगर को रामेश्वर सिंह बसा रहे थे उस वक्त वे महाराजा नहीं, बल्कि परगने के मालिक थे। राजा के छोटे भाई और संबंधियों को परगना दे दिया जाता था जिसके मालिक को बाबूसाहब कहा जाता था। बाद में अपने भाई महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की मृत्यु के बाद, रामेश्वर सिंह, दरभंगा की गद्दी पर बैठे। लेकिन १९३४ के भूकंप ने राजनगर के गौरव को ध्वस्त कर दिया। हलांकि यहां का भग्नावशेष अवस्था में मौजूद राजमहल और परिसर अभी भी देखने लायक है। राजनगर, मधुबनी जिला मुख्यालय से करीब ७ किलोमीटर उत्तर में है और मधुबनी-जयनगर रेलवे लाईन यहां से होकर गुजरती है। यह मधुबनी-लौकहा रोड पर ही स्थिति है और यातायात के साधनों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। यहां प्रखंड मुख्यालय, कॉलेज, हाईस्कूल, पुलिस स्टेशन, सिनेमा हॉल आदि है। एक जमाने में नदी कमला इसके पूरव से होकर बहती थी। अब उसने अपनी धारा करीब ७ किलोमीटर पूरव खिसका ली है और भटगामा-पिपराघाट से होकर बहती है। राजनगर से उत्तर खजौली, दक्षिण मधुबनी, पूरव बाबूबरही और पश्चिम रहिका ब्लाक है। यहां से बलिराजगढ़ की दूरी २० किलोमीटर है, जो मौर्यकाल से भी पुराना ऐतिहासिक किला माना जाता है।

  • सौराठ: मधुबनी-जयनगर रोड पर स्थित इस गाँव में सोमनाथ महादेव का मंदिर है। यहाँ मैथिल ब्राह्मणों की प्रतिवर्ष होनेवाली सभा में विवाह तय किए जाते हैं। इस गाँव में तथा अन्यत्र रहने वाले पंजीकार इस क्षेत्र के ब्राह्मणों की वंशावली रखते हैं और विवाह तय करने में इनकी अहम भूमिका होती है।
  • कपिलेश्वरनाथ: मधुबनी से ९ किलोमीटर दूर इस स्थान पर अति पूज्य कपिलेश्वर शिव मंदिर है। प्रत्येक सोमवार तथा सावन के महीने में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जमा होती है। महाशिवरात्रि को यहाँ मेला भी लगता है।
  • कोइलख : मधुबनी जिले के राजनगर प्रखण्ड के कोइलख गाँव स्थित भद्रकाली भगवती परम सुविख्यात हैं। यहाँ भव्य मंदिर के गर्भगृह मे शक्ति विग्रह भद्रकाली के रूप मे सुन्दर रजत मुकुट धारण कर पिठिका पर भगवती विराजमान हैं। भगवती को लोग कोकिलाक्षी के रूप मे भी पूजते हैं। कोकिलाक्षी के नाम पर ही इस गाँव का नाम कोइलख पड़ा। ये अति प्राचीन काल से पूजित होती आयी हैं। इसका अपना एतिहासिक पृष्ठभूमि भी रहा है। कहा जाता है कि 11वीं शताब्दी के अंत मे राजपूत कल्चूरी सेनापति नाथ देव ने मदनपाल (गौड़वासव) पर चढ़ाई के क्रम मे वासुदेव की सिद्धभूमि वासुदेवपुर(वर्तमान कोइलख) मे छावनी बनाया। वहीं के सिद्धनाथ झा के आशिर्वाद से नाथ देव इसमे सफल हुए। उस स्थान पर सजे हुए रथ (कल्याक्ष) रखे थे इस कारण इस भूमि स्थित देवी को कोकिलाक्षी अर्थात भद्रकाली एवं वासुदेवपुर को कोइलख कहा जाने लगा।
  • बाबा मुक्तेश्वरनाथ स्थान: भगवान शिव को समर्पित श्री श्री १०८ बाबा मुक्तेश्वरनाथ (मुक्तेश्वर स्थान) शिव मंदिर एक हिन्दू धर्म - स्थल है जो बिहार राज्य के मधुबनी जिला अन्तर्गत्त अंधराठाढ़ी प्रखंड के देवहार ग्राम में स्थित है।
  • बलिराज गढ़ : यहां प्राचीन किला का एक भग्नावशेष है जो करीब ३६५ बीघे में फैला हुआ है। यह स्थान जिला मुख्यालय से करीब ३४ किलोमीटर उत्तर-पूर्व में मधुबनी-लौकहा सड़के के किनारे स्थित है। यह नजदीकी गांव खोजपुर से सड़क मार्ग से जुड़ा है जहां से इसकी दूरी १। ५ किलोमीटर के करीब है। इसके उत्तर में खोजपुर, दक्षिण में बगौल, पूरब में फुलबरिया और पश्चिम में रमणीपट्टी गांव है। इस किले की दीवार काफी मोटी है और ऐसा लगता है कि इसपर से होकर कई रथ आसानी से गुजर जाते होंगे। यह स्थान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है और यहां उसके कुछ कर्मचारी इसकी देखभाल करते हैं। पुरातत्व विभाग ने दो बार इसकी संक्षिप्त खुदाई की है और इसकी खुदाई करवाने में मधुबनी के पूर्व सीपीआई सांसद भोगेंद्र झा और स्थानीय कुदाल सेना के संयोजक सीताराम झा का नाम अहम है। यहां सलाना रामनवमी के अवसर पर चैती दुर्गा का भव्य आयोजन होता है जिसमें भारी भीड़ उमड़ती है। इसकी खुदाई में मौर्यकालीन सिक्के, मृदभांड और कई वस्तुएं बरामद हुई हैं। लेकिन पूरी खुदाई न हो सकने के कारण इसमें इतिहास का वहुमूल्य खजाना और ऐतिहासिक धरोहर छुपी हुई है। कई लोगों का मानना है कि बलिराज गढ़ मिथिला की प्राचीन राजधानी भी हो सकती है क्योंकि वर्तमान जनकपुर के बारे में कोई लोगों को इसलिए संदेह है क्योंकि वहां की इमारते काफी नई हैं। दूसरी बात ये कि रामायण अन्य विदेशी यात्रियों के विवरण से संकेत मिलता है कि मिथिला की प्राचीन राजधानी होने के पर बलिराजगढ़ का दावा काफी मजबूत है। इसके बगल से दरभंगा-लौकहा रेल लाईन भी गुजरती है और नजदीकी रेलवे हाल्ट बहहड़ा यहां से मात्र ३ किलोमीटर की दूरी पर है। इसके अगल-बगल के गांव भी ऐतिहासिक नाम लिए हुए हैं। रमणीपट्टी के बारे में लोगों की मान्यता है कि यहां राजा का रनिवास रहा होगा। फुलबरिया, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है फूलो का बाग रहा होगा। बगौल भी बिगुल से बना है जबकि कुछ ही दूरी पर नवनगर नामका गांव है। जो गरही गाँव इसके नजदीक में है। बलिराज गढ़ में हाल तक करीब ५० साल पहले तक घना जंगल हुआ करता था और पुराने स्थानीय लोग अभी भी इसे वन कहते हैं जहां पहले कभी खूंखार जानवर विचरते थे। वहां एक संत भी रहते थे जिनके शिष्य से धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने दीक्षा ली थी। कुल मिलाकर, बलिराजगढ़ अभी भी एक व्यापक खुदाई का इंतजार कर रहा है और इतिहास की कई सच्चाईयों को दुनिया के सामने खोलने के लिए बेकरार है। इस के नजदीक एक उच्च विद्यालय नवनगर में है जो इस दश किलो मिटर के अन्तर्गत एक उच्च विद्यालय है जो नवनगर में शिक्षा के लिए जाना जाता है।
  • भगवती स्थान उचैठ: भगवती स्थान उचैठ  मधुबनी जिला के बेनीपट्टी अनुमंडल से मात्र ४ किलोमीटर की दुरी पर पश्चिम दिशा की ओर स्थित है|  यह स्थान मिथिला में एक प्रसिद्द  सिद्धपीठ के नाम से जाना जाता है | भगवती मन्दिर के गर्भगृह में माँ दुर्गा सिंह पर कमल के आसन पर विराजमान हैं | दुर्गा माँ सिर्फ कंधे तक ही दिखाई देती हैं , कंधे से उपर इनका सिर नहीं है | इसलिए इन्हें छिन्नमस्तिका दुर्गा भी कहा जाता है | माँ दुर्गा मन्दिर के पास ही एक बहुत बड़ा स्मशान है , जहां बड़ी संख्या में तन्त्र साधक आज भी साधना में लीन रहते हैं |इस स्थान पर जो साधक जिस मनोकामना से माँ दुर्गा की दर्शन करते हैं , वो वहां से खाली हाथ वापस नहीं आते हैं | कहा जाता है कि भगवान राम जनकपुर की यात्रा के समय यहाँ रुके थे |  :-महाकवि कालीदास को दिया था वरदान : कहतें हैं दुर्गा मन्दिर से पूर्व दिशा की ओर एक संस्कृत पाठशाला थी | संस्कृत पाठशाला और मंदिर के बीच एक नदी बहती थी |  कालीदास एक महामूर्ख व्यक्ति था | कालीदास का विवाह राजकुमारी विद्द्योतमा से  छल द्वारा करा दिया गया था  | विद्द्योतमा परम विदुषी महिला थी |  वह ये नहीं जानती थी कि कालीदास महामूर्ख है | जब उसे यह बात मालुम हो गयी तो उसने कालीदास का तिरस्कार किया और ये भी कह  दिया कि जब तक उन्हें  संस्कृत का ज्ञान नहीं हो जाता वापस घर ना आयें |  कालीदास अपनी पत्नी से अपमानित होकर उचैठ भगवती स्थान आ गए और वहां के आवासीय संस्कृत पाठशाला में रशोइया का कार्य करने लगे| समय बीतने लगा | कुछ दिनों के बाद वर्षा ऋतू शुरू हो गयी  | एक दिन घनघोर वर्षा होने लगी रात-दिन वर्षा होने के कारण नदी में बाढ़ आ गयी |फिर भी वर्षा रुकने का नाम नहीं ले रही थी | नदी में पानी की धारा भी तेज गति से बहने लगी | शाम भी होने वाली थी | मंदिर की साफ़ सफाई , पूजा पाठ , धुप दीप , आरती सारी  व्यबस्था पाठशाला के छात्र ही करते थे | शाम हो गयी थी | मंदिर में दिया भी जलाना था , लेकिन भयंकर वर्षा और नदी में पानी की तेज धारा के कारण वे लोग मंदिर जाने में असमर्थ हो गए थे | सभी छात्रों ने मुर्ख कालीदास  को ही मंदिर में दिया जलाने को कहने लगा , कालीदास मन्दिर जाने के लिए तैयार हो गया | छात्रों ने कालीदास से यह भी कहा कि मंदिर में दिया बाती दिखाने के बाद कोई निशान लगाना नहीं भूलना | कालीदास मंदिर जाने के लिए बिना कुछ सोचे नदी में कूद गया | किसी तरह तैरते डूबते वे मंदिर पहुंच गए | मंदिर के भीतर गए और दीप जलाए | उनहोंने मन में सोचा कि निशान लगाने के लिए तो कुछ लाये नहीं | सोच ही रहा था कि उनकी नजर दीप जलने वाली स्थान पर पड़ी | जलने वाली दीप के उपर काली स्याही उभर गयी थी | उसने सोचा इसी से ही निशान लगाउंगा | फिर उसने अपनी दाहिने हथेली को स्याही पर रगड़ा| अब वह निशान देने के लिए जगह खोजने लगा | मंदिर के चारों ओर सभी जगह काली स्याही का निशान पहले से ही लगा हुआ था | निशान लगाने के लिए कोई स्थान नहीं देख उसने सोचा क्यों न भगवती के मुखमंडल पर ही निशान लगा दिया जाय क्योंकि वहां पहले से कोई निशान नहीं लगा हुआ है | यह सोचकर जैसे ही अपना श्याही लगा हुआ दाहिना हाथ भगवती के मुखमंडल की ओर निशान लगाने के लिए बढ़ाया तो भगवती प्रकट होकर कालीदास के हाथ पकड़ कर कहने लगी अरे महामुर्ख तुझे निशान लगाने के लिए मंदिर के अंदर और कोई स्थान नहीं मिला |  हम तुम पर बहुत प्रसन्न हैं जो तुम इस विकराल समय में नदी तैर कर मंदिर में दिया जलाने के लिए आये हो | मांग कोई वर मुझसे मांग | कालीदास भगवती के  वचन को सुन सोचने लगा कि मुर्ख होने के कारण ही अपनी पत्नी से तिरस्कृत हूँ | अतः उसने भगवती से विद्द्या की याचना की | माँ ने तथास्तु कहते हुए कही कि आज रात भर में जितने भी पुस्तक को तुम छू सकते हो छू लो सभी पुस्तकें  तुम्हे याद हो जायेगी | यह कहते हुए माँ अंतर्ध्यान हो गयी | वह वापस पाठशाला आया | खाना बना कर सभी छात्रों को खिलाया | अब वह छात्रों  के नीचे वर्ग की पुस्तक से लेकर उच्च वर्ग तक सभी पुस्तकों को रात भर में स्पर्श कर  लिया | पुस्तक स्पर्श करते ही माँ की कृपा से सारा पुस्तक उन्हें कंठस्त हो गया | उन्होंने काव्य पुस्तक भी लिखी | यथा कुमार संभव , रघुवंश और मेघदूत आदि |
  • गिरिजा - शिव मंदिर : मधुबनी का प्राचीन नाम ‘मधुवन’ था |त्रेतायुग के राजा जनक जिनका राज्य काफी विस्तारित था ,की राजधानी जनकपुर के नाम से प्रसिद्ध है |कहते भी हैं - ‘मधुवन’में राम खेलत होली | जगत जननी सीता फुल लोढ़ने राजा फुलवाड़ी  गिरजा स्थान जो वर्तमान में फुलहर के नाम से प्रसिद्ध है , नित्य जाया करती थी | जनकपुर राज्य के चारों दिशाओं में चार शिवलिंग (मंदिर ) थे |पूरब में विशौल ,पश्चिम में धनुषा , उत्तर में शिवजनकं मंदिर , और दक्षिण में गिरिजा - शिव मंदिर अवस्थित था जो आज भी मौजूद है | कहा जाता है कि राम-लक्ष्मण को धनुष की शिक्षा विशौल के पास ही जंगल में दिया गया था |विशौल के ठीक १० किलोमीटर पश्चिम में गिरजा स्थान है |राम लक्ष्मण एक दिन फुलवाड़ी का दर्शन गिरजा स्थान आये जहां सीता जी की नजर राम पर और राम की नजर सीता जी पर पड़ी तो गिरजा पूजन के समय जगत-जननी जानकी जी के हाथ से पुष्प माला गिर गया वे लगाकर हंस पड़ी |तुलसी कृत रामायण में वर्णित चौपाई “खसत माल  मुड़त मुस्कानी”साक्षी है |वही राम और सीता एक दुसरे से प्रेमातुर हो गए | पति-पत्नी का मिलन युग युगांतर तक होता रहा | यह प्रमाण रामायण से मिलता है |
  • कल्याणेश्वर महादेव मंदिर : गिरिजास्थान से कुछ ही दूरी पर कल्याणेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है। महाशिवरात्रि के मौके पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां जुटते हैं।
  • डोकहर राज राजेश्वरी मंदिर : मधुबनी से १२ किलोमीटर उत्तर बहरवन बेलाही गाँव मे माता राज राजेश्वरी का मंदिर है।
  • भवानीपुर: पंडौल प्रखंड मुख्यालय से ५ किलोमीटर दूर स्थित इस गाँव में उग्रनाथ महादेव (उगना) शिव मंदिर है। बिस्फी में जन्में मैथिली के महान कवि विद्यापति से यह मंदिर जुड़ा है। मान्यताओं के अनुसार विद्यापति शिव के इतने अनन्य भक्त थे कि स्वयं शिव ने ही उगना बनकर उनकी सेवा करने लगे।
  • कोइलख - कोइलख एक प्रमुख गाँव है जो माँ काली के लिए प्रसिद्ध है यहाँ जो मनोकामना मांगी जाती है वो जरुर पूरी होती है।
  • गोसाउनी घर : मधुबनी के पुलिस लाइन के रूप में राजा माधवन सिंह का गोसाउनी घर भी मौजूद है |मधुबनी जिला मुख्यालय से 2 किलोमीटर की दुरी पर महंथ  भौड़ा  ग्राम स्थान  है |किवदंती है की राजा माधवन भगवती की पूजा अर्चना,साधना में इतने लीन रहते थे की पूजा आसनी, धरती से सवा हाथ ऊपर उठ जाया करती थी |मधुबनी जिला प्राचीन इतिहास की धरोहर है |यह राजा शिवसिंह ,लखिमा रानी विद्यापति , जयदेव् ,अयाची  वाचस्पति जैसे महा पंडितों की जन्म स्थली है | मंगरौनी ग्राम सारे विश्व में तंत्र-मन्त्र  मधुबनी  जिला मुख्यालय से एक किलोमीटर की दुरी पर अवस्थित मंगरौनी गाँव की देन है | मंगरौनी ग्राम में भगवती ‘बुढ़िया माय’का एक मंदिर आज भी मौजूद है |
  • जयदेव का जन्म कवि कोकिल विद्यापति से पूर्व जयदेव का जन्म हुआ |मैथिली एवं संस्कृत साहित्य में मिथिला की गौरवपूर्ण इतिहास की झलक मिलती है |कवि चन्दा झा का रामायण ,वाचस्पति की ‘भवमती’ टीका  प्राचीन गाथा में संस्कृत भाषा में गीत गोविन्द आदि मधुबनी के गौरवमय इतिहास को प्रमाणित करते हैं |

आवागमन[संपादित करें]

सड़क मार्ग

मधुबनी बिहार के सभी मुख्य शहरों से राजमार्गों द्वारा जुड़ा हुआ है। यहाँ से वर्तमान में तीन राष्ट्रीय राजमार्ग तथा दो राजकीय राजमार्ग गुजरती हैं। मुजफ्फरपुर से फारबिसगंज होते हुए पूर्णिया जानेवाला राष्ट्रीय राजमार्ग ५७ मधुबनी जिला होते हुए जाती है। यह सड़क स्वर्णिम चतुर्भुज योजना का अगल चरण है जिसे ईस्ट-वेस्ट कॉरीडोर कहा जाता है। इसकी योजना वाजपेयी सरकार के वक्त बनी थी। इस सड़क के बन जाने से मधुबनी, दरभंगा बल्कि पूरे मिथिला क्षेत्र की ही तकदीर बदल जाएगी। इस सड़क के तहत कोसी पर बनने वाले पुल की लंबाई (संभवत:इसके साथ रेल पुल भी बनाई जाएगी) करीब २२ किलोमीटर होने की संभावना है जिसमें कोसी के पाट के अलावा उसके पूरव और पश्चिम में निचली जमीन के ऊपर कई-कई किलोमीटर तक वो पुल फैली हुई होगी। यह सड़क चार लेन की बन रही है और इसके बनने से मधुबनी का संपर्क सहरसा, सुपौल, पूर्णिया और मिथिला के पूर्वी इलाके से एक बार फिर जुड़ जाएगा जो सन १९३४ के भूंकंप से पहले कायम था। पूरा इलाका समाजिक और आर्थिक रूप से एक इकाई में बदल जाएगा। इस पुल के महज बनने मात्र से इस इलाके की राजनीतिक चेतना किस मोड़ लेगी इसका अंदाज लगाना मुश्किल है। कुछ लोगों की राय में इस पुल के बनने से एक अखिल मिथिला राज्य की मांग जोड़ पकड़ सकती है जिसका आन्दोलन अभी खंडित अवस्था में है।

मधुबनी से गुजरने वाली दूसरी सड़क ५५ किलोमीटर लंबी राष्ट्रीय राजमार्ग १०५ है जो दरभंगा को मधुबनी के जयनगर से जोड़ता है। राजधानी पटना से सड़क मार्ग के माध्‍यम से अच्‍छी तरह से जुड़ा हुआ है।

रेल मार्ग

मधुबनी भारतीय रेल के पूर्व मध्य रेलवे क्षेत्र के समस्तीपुर मंडल में पड़ता है। दिल्ली-गुवाहाटी रूट पर स्थित समस्तीपुर जंक्शन से बड़ी गेज की एक लाईन मधुबनी होते हुए नेपाल सीमा पर झंझारपुर को जाती है। मधुबनी से गुजरने वाली एक अन्य रेल लाईन सकरी से घोघरडिहा होते हुए फॉरबिसगंज को जोड़ती है। १९९६ के बाद रेल अमान परिवर्तन होने से दरभंगा होते हुए दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, अमृतसर, गुवाहाटी तथा अन्य महत्वपूर्ण शहरों के लिए यहाँ से सीधी ट्रेनें उपलब्ध है। इसके अलावा एक रेललाईन दरभंगा से सकरी और झंझारपुर होते हुए लौकहा तक नेपाल की सीमा को जोड़ती है। जिले में सकरी और झंझारपुर दो रेल के जंक्शन हैं। लौकरा रेलवे लाईन के निर्माण में कांग्रेस के वरिष्ट नेता ललित नारायण मिश्र का अहम योगदान है जिनका कार्यक्षेत्र मधुबनी ही था। वे झंझारपुर से सांसद हुआ करते थे।

हवाई मार्ग

यहाँ से सबसे नजदीकी नागरिक हवाई अड्डा 146 कि॰मी॰ दूर राजधानी पटना में स्थित है। लोकनायक जयप्रकाश हवाई क्षेत्र पटना (IATA कोड- PAT) से अंतर्देशीय तथा सीमित अन्तर्राष्ट्रीय उड़ाने उपलब्ध है। इंडियन, किंगफिशर, जेट एयर, स्पाइस जेट तथा इंडिगो की उडानें दिल्ली, कोलकाता और राँची के लिए उपलब्ध हैं।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. [1] ब्रिटैनिका इन्साक्लोपीडिया पर मधुबनी
  2. [2] विजन पत्र २०२० में मधुबनी की प्राकृतिक आपदा
  3. [3] मधुबनी जिले का विजन २०२०

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]