मदनलाल ‘मधु’

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मदनलाल ‘मधु’

मदनलाल 'मधु' (२२ मई, १९२५ - ७ जुलाई, २०१४) एक भारतीय कवि, लेखक और अनुवादक थे, जिन्हें हिन्दी भाषा में रूसी क्लासिक्स के अनुवाद के लिए जाना जाता है। वे हिन्दुस्तानी समाज, जो कि मॉस्को में एक भारतीय समुदाय था, के संस्थापकों में से एक थे। उन्हें 'पुश्किन-पदक' और पूर्व सोवियत संघ के 'ऑर्डर ऑफ फ्रेंडशिप' से सम्मानित किया गया था। 1991 में भारत सरकार ने उन्हें चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया।

जीवन-परिचय[संपादित करें]

मदनलाल 'मधु' का जन्म २२ मई १९२५ को पंजाब के फ़िरोज़पुर शहर में हुआ था।[1] उनकी शिक्षा-दीक्षा फ़िरोज़पुर और लाहौर में हुई। १९४७ में पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर से अर्थशास्त्र में एम॰ए॰ की शिक्षा पूरी करने के बाद मधु जी जालन्धर के डी॰ए॰वी॰ कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ाने लगे।

तत्कालीन सोवियत संघ के सांस्कृतिक मंत्रालय के निमंत्रण पर भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा चयनित भारतीय अनुवादक दल में सम्मिलित होकर मदनलाल 'मधु' २८ मार्च, १९५७ को मास्को आ गये।[2] यहाँ आकर शुरू में विदेशी भाषा प्रकाशन गृह में सम्पादक रहे। बाद में वे भी अँग्रेज़ी से अनुवाद करने लगे। जब मधु जी मास्को पहुँचे थे उस समय वहाँ के प्रकाशन-गृह अंग्रेजी के माध्यम से ही रूसी साहित्य का भारतीय भाषाओं में अनुवाद करवाते थे। उस समय वहाँ की समाजवादी व्यवस्था में गुणवत्ता की अपेक्षा मात्रा को अधिक महत्त्व दिया जाता था। मधु जी ने उल्लेख किया है कि 'जितना काम, उतने दाम' का समाजवादी सिद्धान्त हम अनुवादकों-सम्पादकों पर भी लागू होता था।... किन्तु इस कार्य'विधि का एक बुरा पक्ष यह था कि अधिक पैसा कमाने के फेर में माल या उत्पाद की गुणवत्ता की ओर कम ध्यान दिया जाता था। मधु जी का मानना था कि ललित साहित्य के मामले में मूल पाठ से ही अनुवाद करना उचित है, अभीष्ट है। इसलिए उन्होंने प्रकाशन-गृह के प्रबंधकों से आग्रह भी किया, परन्तु उन्होंने अनुवादकों को मूल भाषा (रूसी) सिखाने की दिशा में कोई पहल नहीं की। ऐसे में कुछ अन्य लोगों के साथ मधु जी ने स्वयं प्रयत्न किया और दो वर्षों के कठिन परिश्रम से उन्होंने रूसी सीख ली[3] और फिर सीधे रूसी से हिन्दी में अनुवाद करने लगे। विदेशी भाषा प्रकाशन गृह का प्रगति प्रकाशन के रूप में रूपान्तरण[4] होने पर भी वे ललित साहित्य के अनुवाद में लगे रहे। सन् १९८० में प्रगति प्रकाशन को विभाजित करके ललित साहित्य के प्रकाशन के लिए 'रादुगा (इन्द्रधनुष) प्रकाशन' की स्थापना हुई और ललित साहित्य से सम्बद्ध होने के कारण मदनलाल 'मधु' जी 'रादुगा प्रकाशन' में कार्यरत हो गये।[5]

१९७९ में मदनलाल मधु ने गोर्की और प्रेमचन्द की रचनाओं का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए शोधपत्र लिखा और मास्को विश्वविद्यालय ने उन्हें पीएच॰डी॰ की उपाधि प्रदान की।

सन् १९८१ में दो खण्डों में हिन्दी में प्रकाशित लेव तोलस्तोय का 'आन्ना कारेनिना' वह पहला बड़ा उपन्यास था, जिसका अनुवाद डॉ॰ मधु ने मूल रूसी भाषा से किया था।[6] इसके बाद उन्होंने पूश्किन की कविताओं और गद्य रचनाओं का तथा लेव तोलस्तोय के महाकाव्यात्मक उपन्यास 'युद्ध और शान्ति' सहित अनेक पुस्तकों का अनुवाद किया।

लम्बे समय तक बीमार रहने के बाद ०७ जुलाई २०१४ को मॉस्को में मधु जी का हृदयाघात से देहान्त हो गया।

अनुवाद एवं लेखन-कार्य[संपादित करें]

डॉ॰ मदनलाल ‘मधु’ ने अलेक्सांद्र पुश्किन से लेकर लेव तोलस्तोय एवं अन्य सोवियत लेखकों की कृतियों का हिन्दी में अनुवाद किया था तथा कई भारतीय कार्यों का रूसी भाषा में अनुवाद किया था। डॉ॰ मदनलाल 'मधु' को हिन्दी साहित्य और सोवियत साहित्‍य के आधुनिक सेतु निर्माताओं में से एक माना जाता है।[7] ऐसा उनके सघन अनुवादों और शब्दकोश विषयक कार्यों के कारण कहा जाता है। मास्‍को के प्रमुख प्रकाशन-गृह प्रगति प्रकाशन एवं रादुगा प्रकाशन में लगभग चार दशकों तक संपादक-अनुवादक के पद पर रहते हुए उन्‍होंने सौ से अधिक[8] कालजयी रूसी पुस्‍तकों, जिनमें पुश्किन, मायकोवस्‍की, तुर्गेनेव, तोल्‍स्‍तोय, गोर्की, चेखव, आदि का साहित्‍य सम्मिलित है, का हिन्दी अनुवाद सुलभ कराया। प्रचुर मात्रा में रूसी लोक साहित्‍य तथा बाल साहित्‍य के लेखन-संकलन के साथ-साथ उन्होंने हिन्दी-रूसी-शब्‍दकोश का निर्माण कर हिन्दी छात्रों के लिए रूसी-सीखने का मार्ग प्रशस्‍त किया। हिन्दी के रूसी अध्‍यापकों की अनेक प्रकार से सहायता करते हुए उन्‍होंने रूसी पत्रिका के हिन्दी संस्‍करण का लंबे समय तक संपादन किया। इसके अतिरिक्त वे मॉस्‍को रेडियो से भी जुड़े रहे।[7]

रूस में बसे भारतीयों को एकजुट करने और रूस और भारत के सांस्कृतिक सम्बन्ध सुधारने के लिए मधु जी ने कुछ लोगों के साथ मिलकर 'हिन्दुस्तानी समाज' की नींव रखी और अनेक वर्षों तक अत्यधिक सक्रिय सदस्य, सचिव तथा तीस वर्षों (१९७७ से २००७) तक अध्यक्ष और उसके बाद संरक्षक रहे।[9]

अनुवाद के प्रति वैचारिक दृष्टिकोण[संपादित करें]

अनुवाद के सम्बन्ध में मधु जी का मानना था कि अन्य भाषा के माध्यम से यानी अनुवाद-दर-अनुवाद, जैसे रूसी साहित्य का अंग्रेजी के माध्यम से अनुवाद, विशेष रूप से ललित साहित्य का अनुवाद कभी अच्छा अनुवाद नहीं हो सकता क्योंकि उसमें बहुत-सी बारीकियाँ और वे विशेषताएँ छूट जाएँगी जो मौलिक पाठ में होंगी। अनुवाद के लिए अनुवादक की पृष्ठभूमि भी सर्जक की होनी चाहिए। कविता के अनुवाद के लिए अनुवादक का कवि होना या उसके निकट होना आवश्यक है। इस तरह की पृष्ठभूमि और सृजनशीलता अच्छे अनुवाद की बुनियादी शर्ते हैं।[10] विशेषतः कविता के अनुवाद के सम्बन्ध में उनकी मान्यता है :

"कविता के अनुवाद में तो विशेष रूप से मूल पाठ को आधार बनाना आवश्यक होता है। मूल पाठ को पढ़कर ही हम न केवल कवि के भावों, उपमाओं, बिम्बों, अभिव्यंजना की विशेषताओं को समझ सकते हैं, बल्कि उसके छन्द-विधान, उसकी लय, संगीत, तुकांत या अतुकांत काव्य-रूप को भी ठीक तरह से अनुभव कर सकते हैं। किसी दूसरी भाषा में अनूदित काव्य के अनुवाद-दर-अनुवाद में तो मूल काव्य का बहुत कुछ लुप्त हो जाता है। मेरा मानना है कि मूल काव्य के अनुरूप ही अनुवाद भी होना चाहिए। मतलब यह कि यदि मूल काव्य अतुकांत है, मुक्त छन्द में है या छन्द मुक्त है तो अनुवाद भी ऐसे ही किया जाना चाहिए और यदि वह तुकान्त और छन्दबद्ध है तो अनुवाद भी इसी ढंग से करना चाहिए तथा जहाँ तक सम्भव हो छन्द भी मूल के अधिकतम सामान्य और निकटतम ढूँढ़ना चाहिए।"[11]

प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ[संपादित करें]

प्रमुख अनूदित कृतियाँ[संपादित करें]

  1. आन्ना कारेनिना - १९८१ (मूल लेखक- लेव तोलस्तोय; पहले प्रगति प्रकाशन, मास्को से; पुनः रादुगा प्रकाशन, मॉस्को से और अब राजकमल प्रकाशन प्रा॰ लि॰, नयी दिल्ली से दो खण्डों में प्रकाशित)
  2. अलेक्सान्द्र पुश्किन : चुनी हुई रचनाएँ, खण्ड-१ (कविताएँ) -१९८२ (प्रगति प्रकाशन, मॉस्को से प्रकाशित)
  3. अलेक्सान्द्र पुश्किन : चुनी हुई रचनाएँ, खण्ड-२ (गद्य) -१९८२ (प्रगति प्रकाशन, मॉस्को से प्रकाशित)
  4. दरिद्रनारायण•रजत रातें -१९८४ (मूल लेखक - फ्योदोर दोस्तोएव्स्की, रादुगा प्रकाशन, मॉस्को से प्रकाशित एवं पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस प्रा॰ लिमिटेड, नयी दिल्ली से वितरित; नवीन संस्करण- कामगार प्रकाशन, दिल्ली-२०२१)
  5. मक्सिम गोर्की : तीन नाटक -१९८५ (रादुगा प्रकाशन, मॉस्को से प्रकाशित एवं पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस प्रा॰ लिमिटेड, नयी दिल्ली से वितरित)
  6. अन्तोन चेख़ोव : नाटक -१९८५ (रादुगा प्रकाशन, मॉस्को से प्रकाशित एवं पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस प्रा॰ लिमिटेड, नयी दिल्ली से वितरित)
  7. रुदिन -१९८६ (मूल लेखक- इवान तुर्गेनेव, रादुगा प्रकाशन, मॉस्को से प्रकाशित एवं पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस प्रा॰ लिमिटेड, नयी दिल्ली से वितरित; नवीन संस्करण- कामगार प्रकाशन, दिल्ली-२०२१)
  8. मक्सिम गोर्की : चुनी हुई रचनाएँ (बीसवीं शताब्दी का साहित्य, भाग-2) -१९८७ (रादुगा प्रकाशन, मॉस्को एवं साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली से प्रकाशित)
  9. युद्ध और शान्ति (चार खण्डों में) -१९८७-१९८९ (मूल लेखक- लेव तोलस्तोय, रादुगा प्रकाशन, मॉस्को से प्रकाशित एवं पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस प्रा॰ लिमिटेड, नयी दिल्ली तथा राजस्थान पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस प्रा॰ लि॰, जयपुर द्वारा वितरित; नवीन संस्करण- अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली-२०२१)
  10. इंसान का नसीबा (मूल लेखक- मिखाइल शोलोख़ोव, रादुगा प्रकाशन, मॉस्को एवं साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली से प्रकाशित बीसवीं शताब्दी का साहित्य-३ में संकलित)
  11. पिता और पुत्र -१९९० (मूल लेखक- इवान तुर्गेनेव, रादुगा प्रकाशन, मॉस्को से प्रकाशित एवं पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस प्रा॰ लिमिटेड, नयी दिल्ली से वितरित; नवीन संस्करण- कामगार प्रकाशन, दिल्ली-२०२१)
  12. मेरे विश्वविद्यालय (मूल लेखक- मक्सिम गोर्की, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस प्रा॰ लिमिटेड, नयी दिल्ली)
  13. श्रेष्ठ कथा संचयन : कुप्रिन (मेधा बुक्स, नवीन शाहदरा, दिल्ली से प्रकाशित)
  14. मेरा दाग़िस्तान - १९८८ (मूल लेखक- रसूल हमज़ातोव, रादुगा प्रकाशन, मॉस्को से प्रकाशित; नवीन संस्करण वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से प्रकाशित)
  15. जादुई घोड़ा - २०१० (सोवियत लोक कथाएँ; शब्द-कलश, एम-५५, प्रताप नगर, दिल्ली-७ से प्रकाशित एवं मेधा बुक्स, नवीन शाहदरा, दिल्ली से वितरित। 'हीरे-मोती' नाम से पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस प्रा॰ लिमिटेड, नयी दिल्ली से भी प्रकाशित।)
  16. तीन मोटे (मूल लेखक- यूरी ओलेशा; रादुगा प्रकाशन, मॉस्को से प्रकाशित।)

मौलिक कृतियाँ[संपादित करें]

  1. उन्माद (काव्य-संग्रह) - १९५१[12]
  2. शून्य (काव्य-संग्रह)
  3. गीत-अगीत (काव्य-संग्रह, मेधा बुक्स, नवीन शाहदरा, दिल्ली से प्रकाशित)
  4. गोर्की और प्रेमचन्द : दो अमर प्रतिभाएँ - १९८० (प्रगति प्रकाशन,मास्को से प्रकाशित; सन् १९८७ में रादुगा प्रकाशन, मॉस्को से द्वितीय संस्करण प्रकाशित एवं पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस प्रा॰ लिमिटेड, नयी दिल्ली से वितरित)[13]
  5. यादों के धुँधले-उजले चेहरे (दो भागों में) - २०११ एवं २०१२ (संस्मरण; मेधा बुक्स, नवीन शाहदरा, दिल्ली से प्रकाशित)
  6. एक दो तीन (बाल साहित्य; वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली)
  7. ऐसे लड़के भी होते हैं (बाल साहित्य; वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली)
  8. कसरती हंस (बाल साहित्य; वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली)
  9. खरहे ने चाहा सोना (बाल साहित्य; वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली)
  10. अमर हैं दयालु देवता

सम्मान[संपादित करें]

  1. पद्मश्री - १९९१ (भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा)
  2. पुश्किन स्‍वर्ण पदक - १९९९ (पुश्किन द्विशताब्दी के अवसर पर अंतरराष्ट्रीय समारोह समिति द्वारा)
  3. मैत्री तथा शान्ति पदक - २००१ (रूस के राष्ट्रपति पुतिन द्वारा)
  4. हिन्द रत्न - २००३ (प्रवासी कल्याण-समाज द्वारा)
  5. श्रेष्ठ प्रवासी - २००४ (प्रवासी संस्थान द्वारा)[1]
  6. पद्मभूषण डॉ॰ मो‍टूरि सत्‍यनारायण पुरस्‍कार - २०१० (केन्द्रीय हिन्दी संस्थान द्वारा)[14]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. डॉ॰ मदनलाल, 'मधु' (२०११). यादों के धुँधले-उजले चेहरे (प्रथम संस्करण). नवीन शाहदरा, दिल्ली: मेधा बुक्स. पृ॰ अंतिम आवरण।. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-8166-381-8.
  2. डॉ॰ मदनलाल, 'मधु' (२०१२). यादों के धुँधले-उजले चेहरे (भाग-२) (प्रथम संस्करण). नवीन शाहदरा, दिल्ली: मेधा बुक्स. पपृ॰ 13, 184. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-8166-449-5.
  3. डॉ॰ मदनलाल, 'मधु' (२०१२). यादों के धुँधले-उजले चेहरे (भाग-२) (प्रथम संस्करण). नवीन शाहदरा, दिल्ली: मेधा बुक्स. पपृ॰ 15, 16, 18. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-8166-449-5.
  4. डॉ॰ मदनलाल, 'मधु' (२०१२). यादों के धुँधले-उजले चेहरे (भाग-२) (प्रथम संस्करण). नवीन शाहदरा, दिल्ली: मेधा बुक्स. पृ॰ १९२. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-8166-449-5.
  5. डॉ॰ मदनलाल, 'मधु' (२०१२). यादों के धुँधले-उजले चेहरे (भाग-२) (प्रथम संस्करण). नवीन शाहदरा, दिल्ली: मेधा बुक्स. पपृ॰ 197, 198. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-8166-449-5.
  6. डॉ॰ मदनलाल, 'मधु' (अनुवादक) (१९८१). आन्ना कारेनिना (खण्ड-१) (प्रथम संस्करण). मास्को: प्रगति प्रकाशन. पृ॰ ९.
  7. हिन्दी और रूसी साहित्य के सेतु डॉ॰ मदनलाल 'मधु'।
  8. डॉ॰ मदनलाल, 'मधु' (१९८७). गोर्की और प्रेमचन्द (द्वितीय संस्करण). मास्को: रादुगा प्रकाशन. पृ॰ प्रथम आवरण फ्लैप पर. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 5-05-001506-5.
  9. डॉ॰ मदनलाल, 'मधु' (२०१२). यादों के धुँधले-उजले चेहरे (भाग-२) (प्रथम संस्करण). नवीन शाहदरा, दिल्ली: मेधा बुक्स. पृ॰ 117. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-8166-449-5.
  10. दोआबा, सं॰ जाबिर हुसैन, वर्ष-1, अंक-2, जून 2007, डॉ॰ मदनलाल 'मधु' से अरुण नारायण की बातचीत, पृष्ठ-253.
  11. डॉ॰ मदनलाल, 'मधु' (२०१२). यादों के धुँधले-उजले चेहरे (भाग-२) (प्रथम संस्करण). नवीन शाहदरा, दिल्ली: मेधा बुक्स. पृ॰ 19. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-8166-449-5.
  12. डॉ॰ मदनलाल, 'मधु' (२०१२). यादों के धुँधले-उजले चेहरे (भाग-२) (प्रथम संस्करण). नवीन शाहदरा, दिल्ली: मेधा बुक्स. पृ॰ १०५. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-8166-449-5.
  13. डॉ॰ मदनलाल, 'मधु' (१९८७). गोर्की और प्रेमचन्द (द्वितीय संस्करण). मास्को: रादुगा प्रकाशन. पपृ॰ 1, 2. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 5-05-001506-5.
  14. केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा द्वारा पुरस्कृत।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]