भोईर

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भोईर
आगरी समाज कबीला
जातीय समूह भारतीय
स्थिति महाराष्ट्र
Descended from क्षत्रिय
भाषा मराठी
धर्म हिन्दू धर्म
उपनाम भोईर


भोईर, आगरी समाज के अन्तर्गत आने वाला एक प्रमुख जातिगत समूह है।

भोईर एक कृषि, पशुपालननमक कि खेती करने वाली जाति मानी जाती है । यह मुख्यता महाराष्ट्र, में रहते हैं। इस जाति के कुछ लोग युद्ध मे भी कार्यरत रहे हैं । भोईर घराणा आगरी समाज के सोमवंशी क्षत्रियोंका घराणा है.यह घराणा सोमवंशी क्षत्रियोंके बारा कुल में से एक हैं ,जो कि मुंगी पैठण क्षेत्र से बिंब राजा के सह कोंकण में आये थे.

भोईर यह एक मराठी भाषिक घराणा हैं. महिकावतीके (माहिम) बखरमें भोईर कुळ का संदर्भ हैं, इन्हे महाराष्ट्रिक कहा गया हैं, वह इस प्रकार हैं , "विक्रम सवंत् ११३५ बिंबदेवा सवें कुळे सोमवंस २७||" इसमे प्रथम शाखा और द्वितीय शाखा अर्थात सोमवंशी क्षत्रियोंके प्रथम और द्वितीय शाखा अर्थात बारा खुमें ज्ञात, इसमे कवळी , दरणे, भोईर, पड्या, माळी, घरठी, भटयारी, सांखळे, उभार, नाईते, गाण, विर यह कुल हैं इनका गोत्र देवनाम है. इन कुलोमें कवळी, भोईर आणि माळी यह कुल सोमवंशी क्षत्रियोंनेे कोंकण में अल्लाउद्दीन के विजय के बाद शस्त्र का त्याग करके वाटिका खेत खलियान यह उदिम स्विकार किया , आगे चल के यह बारा खुमें ज्ञातीके सोमवंशी क्षत्रिय उनके नमक ,खेतीबाडी , वाटिका उत्पादित करणे के धंद्ये के बजहसे आगरी पेहचाने गये और कोळी ज्ञातीके साथ बंधुभाव के सबंध आणे के बजह से खाडीमें मत्स्य पकडणे लगे ,वैसे भोईर यह नाम कोळी ज्ञात स्विकारणे लग गये विशेषत: सोनकोळी और मल्हारकोळी. भोईर कुल कि कुलस्वामीनी तुळजापुरकी तुळजाभवानी हैं, वह छत्रपती शिवाजी महाराज के कुलकी कुलस्वामीनी है. और कुलदैवत जेजुरीके खंडोबा है, यहा छत्रपती शिवाजी महाराज और उनके पिता महाराजसाहेब शहाजी राजे कि भेट हुई थी. त्याच कार्ले गावकी एकविरा मातापर भोईर कुल कि बहुत श्रद्धा हैं. बहिरीदेव मतलब भैरव देव यह भोईर कुल के उग्र कुलदैवत हैं.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

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