भूल भुलैया (2007 फ़िल्म)

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भूल भुलैया
भूल भुलैया (2007 फ़िल्म).jpg
भूल भुलैया का पोस्टर
निर्देशक प्रियदर्शन
निर्माता भूषण कुमार
किशन कुमार
पटकथा नीरज वोरा
कहानी मधु मुट्टम
अभिनेता शाइनी आहूजा,
अक्षय कुमार,
विद्या बालन,
परेश रावल,
अमीशा पटेल,
राजपाल यादव,
असरानी
संगीतकार प्रीतम
छायाकार तिर्रू
संपादक एन. गोपालकृष्णन
अरुण कुमार
वितरक टी-सीरीज़,
एरोस इंटर्नेशनल
प्रदर्शन तिथि(याँ)
  • 12 अक्टूबर 2007 (2007-10-12)
समय सीमा 159 मिनट
देश भारत
भाषा हिंदी
बांग्ला
कुल कारोबार 840 मिलियन (US$12.26 मिलियन)

भूल भुलैया 2007 में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है। इस फिल्म का निर्देशन प्रियदर्शन ने और निर्माण भूषण कुमार व किशन कुमार ने किया है। इस फिल्म में शाइनी आहूजा, अक्षय कुमार, विद्या बालन और अमीशा पटेल मुख्य किरदार में हैं। इस फिल्म को 12 अक्टूबर 2007 को सिनेमाघरों में दिखाया गया।

कहानी[संपादित करें]

सिद्धार्थ चतुर्वेदी (शाइनी आहूजा) कई सालों के बाद अमेरिका से वापस लौटता है। उसके आने की खबर से सभी खुश हो जाते हैं। उसकी शादी बहुत पहले ही राधा (अमीशा पटेल) से तय हो चुकी थी, और इस कारण वो भी बहुत खुश हो जाती है।

लेकिन जब सिद्धार्थ आता है, तो परिवार वालों को पता चलता है कि उसकी शादी अवनी (विद्या बालन) से हो चुकी है। इस खबर से राधा का दिल टूट जाता है और परिवार वाले भी दुःखी हो जाते हैं। अवनी और सिद्धार्थ वहाँ एक महल में रहने का फैसला करते हैं। पर परिवार वाले उसके इस फैसले का विरोध करते हैं, क्योंकि उन्हें वो भुतिया महल लगता है। लेकिन सिद्धार्थ इन बातों को नहीं मानता और उसकी उस महल में सुरक्षा हो, इस कारण पूरा परिवार उस महल में रहने चले जाता है।

अवनी को अपने महल में एक ताला लगा कमरा दिखता है, वो उसकी चाबी बनवाने को किसी से कहती है। चाबी मिलते ही वो दरवाजे को खोल कर अंदर चले जाती है। वहाँ उसे मंजूलिका का सामान आदि दिखता है। लेकिन जब वो वापस आती है तो परिवार वाले उससे कहते हैं कि उसने दरवाजा खोल कर गलत किया है। उसके दरवाजा खोजने से शैतानी आत्मा अब उन सब को नहीं छोड़ेगी।

इसके बाद से अचानक महल में कई अजीब घटनाएँ होने लगती हैं। सिद्धार्थ को लगता है कि राधा मानसिक रूप से ठीक नहीं है और वो अमेरिका में अपने दोस्त आदित्य (अक्षय कुमार) को फोन कर बुला लेता है। जब घर वालों को पता चलता है कि आदित्य दिमाग का डॉक्टर है और राधा को ठीक करने के लिए सिद्धार्थ ने बुलाया है तो वे लोग उससे कहते हैं कि राधा बीमार नहीं है।

एक दिन अचानक आदित्य को दिखता है कि रसोई घर में गैस स्टोव के आसपास और चाय के बर्तन में जहर छिड़का हुआ था और पास में ही जहर की बोतल भी थी। उसे पता चलता है कि सिद्धार्थ उस चाय को पीने वाला है और वो दौड़ कर उसके चाय के कप को गिरा देता है और चाय बनाने वाले के ऊपर जहर देने का आरोप लगता है। उसे पता चलता है कि चाय और किसी ने नहीं, बल्कि राधा ने ही बनाया है। वो उसे मानसिक रोगी बता कर कमरे में बंद कर देता है।

नंदिनी और शरद के शादी के दिन शरद के कपड़े पर अवनी खाना गिरा देती है और उसे साफ करने के बहाने से उसे दूर ले जाती है। अवनी के कहीं न दिखने के कारण सिद्धार्थ और आदित्य उसे ढूंढने लगते हैं और उन्हें अवनी और शरद दिख जाते हैं। सिद्धार्थ को लगता है कि शरद उसकी पत्नी के साथ जबर्दस्ती करने की कोशिश कर रहा है, और वो उसे मारने लगता है। आदित्य उसे रोकता है और अवनी को उसके कमरे में ले जाने बोलता है। सिद्धार्थ अपना गुस्सा शरद पर निकालने ही वाला होता है कि आदित्य उसे समझाता है कि अवनी को दोहरे व्यक्तित्व वाली बीमारी है। वो उसे बताता है कि वो अवनी के घर गया था, वहाँ उसे पता चला कि उसे किस्से कहानियों का बचपन से बहुत शौक था, उसकी दादी उसे हर दिन कहानी सुनाती थी, पर उनके मरने के बाद वो अपने पिता के साथ अमेरिका चले गई, पर उसके दादी के जाने से उसके मन में बहुत बड़ा आघात हुआ था।

जब अवनी इस महल में आई तो उसने मंजूलिका के बारे में जानकारी लेनी शुरू कर दी। उसे पता चला कि किस प्रकार राजा विभूति नारायण को एक नाचने वाली, मंजूलिका से प्यार हो जाता है। लेकिन मंजूलिका अपने साथ नाचने वाले शशीधर से प्यार करती है। जब राजा को उन दोनों के प्यार के बारे में पता चलता है तो दुर्गाष्टमी के दिन वो शशीधर को मंजूलिका के सामने ही मार देता है और उसे कमरे में बंद कर देता है। राजा से शादी करने से पहले ही वो फांसी में लटक कर अपनी जान दे देती है और ये भी वादा करती है कि वो महल में किसी भी राजा को नहीं छोड़ेगी।

इस कहानी को जान कर अवनी अपने आप को मंजूलिका समझने लगी है और सिद्धार्थ को राजा विभूति मान कर मारने का प्रयास कर रही है। उसे लगता है कि शरद ही उसका शशीधर है, इस कारण उसने नंदिनी और शरद की शादी तोड़ने के लिए शरद को बाहर बुलाया था और ऐसा दिखाने की कोशिश कर रही थी कि शरद उसके साथ जबर्दस्ती कर रहा है।

सिद्धार्थ उस पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर पाता है, और उसे भरोसा हो, इस कारण वो सिद्धार्थ को बोलता है कि वो अवनी से उकसाने की कोशिश करे। जब सिद्धार्थ अवनी को उकसाता है तो वो मंजूलिका की तरह बोलने लगती है, जिससे सिद्धार्थ डर जाता है, उसके चिल्ला कर अवनी कहते ही वो सामान्य हो जाती है।

वो सिद्धार्थ को अवनी को ठीक करने का तरीका बताता है। दुर्गाष्टमी के दिन वो किसी तरह अवनी के मंजूलिका बनने के बाद उससे वादा ले लेता है कि वो अगर राजा को मार देगी तो वो अवनि का शरीर हमेशा के लिए छोड़ देगी, और अवनी, जो मंजूलिका बनी है, वो वादा कर लेती है। आदित्य ये दिखाता है कि उसने सिद्धार्थ को मार दिया है, और उसके मौत के बाद अवनी के मन में बसी मंजूलिका हमेशा के लिए चले जाती है। अवनी के पूरी तरह ठीक होने के बाद आदित्य, राधा से कहता है कि यदि उसे उसके साथ शादी करने में रुचि है तो वो अपने माता-पिता को शादी की बात करने के लिए ले आएगा। ये बात सुन कर राधा खुश हो जाती है और उसकी खुशी को देख कर आदित्य उसका जवाब समझ लेता है।

कलाकार[संपादित करें]

भूल भुलैया और बड़े इमामबाड़े का इतिहास नवाब असफ उद दौला बड़े ही दरियादिल इंसान थे उनके बारे में कहावत थी के ‘ जिसको ना दे मौला , उसको दे असफ उद दौला ‘. 1784 में लखनऊ में भयंकर अकाल पड़ा, पूरा अवध दाने दाने का मोहताज हो गया तो लोग मदद मांगने नवाब के पास गये, तब नवाब साहब को उनके वजीरो में सलाह दी के वो खजाने में जमा राशि गरीबो में बाँट दे. मगर नवाब साहब का मानना था के ऐसे खैरात में धन बांटने से लोगो को हराम का खाने की आदत पड़ जाएगी. इसलिए उन्होंने रोजगार देने के लिए एक इमारत का निर्माण कार्य शुरू करवाया जिसको बाद में बड़ा इमामबाड़ा नाम दिया गया.

इमामबाड़ा बनवाने से पहले नवाब साहब ने इसके नक़्शे को बनवाने के लिए एक मुकाबला करवाया था जिसे दिल्ली के एक मशहूर वास्तुकार किफ़ायत उल्लाह ने जीता था. उनके बनाये नक़्शे के तहत 14 साल में बनकर तैयार हुए इमामबाड़े के परिसर में एक असफी मस्जिद, बावड़ी और भूलभुलैया भी मौजूद है. इमाबाड़े के निर्माण के दौरान लघभघ पुरे लखनऊ के बाशिंदे काम करने आते थे, और ऐसा माना जाता है की गरीब लोग दिन में इमारत को बनाते थे और अमीर ऊँचे ओहदे के लोग रात में उसे तोड़ देते थे. परिसर में मौजूद शाही बावड़ी और अस्फी मस्जिद का डिजाईन भी किफायत उल्ला ने तैयार किया था. ऐसी धारणा है की इस बावड़ी के कुँए में गोमती नदी से एक गुप्त रास्ते से पानी आता था और उसी पानी में खजाने का नक्शा और चाबी भी फेकीं गई थी.

भूलभुलैया क्यों बनवाई गई थी ? भूलभुलैया बनाना बड़े इमामबाड़े के निर्माण के दौरान वास्तुकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी . क्यूंकि नवाब साहब इमामबाड़े के मुख्य कक्ष को बड़ा ( 170 x 55 फीट ) बनवाना चाहते थे वो भी बिना किसी स्तंभ ( PILLAR ) के ताकि उसमे ज्यादा से ज्यादा लोग इकट्ठे होकर प्रार्थना कर सके. अब चुनौती ये थी के बिना स्तम्भ के भारी भरकम छत्त और गुम्बद का वजन ये इमारत कैसे झेल पाएगी ?

कई हफ्तों तक विचार करने के बाद फैसला लिया गया के छत्त को खोखला बनाया जाएगा जिस से छत्त का आधा वजन कम हो जाएगा जो की इमारत की दीवारे बिना सहारे के झेल लेंगी . तब जाकर छत्त पर सैंकड़ो दरवाजे बनाये गये जो आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए है और इस अद्भुत रचना को नाम दिया गया भूलभुलैया . सच बताऊं तो मैंने पहली बार भूलभुलैया देखी थी इसलिए थोडा डर लग रहा था क्यूंकि बचपन में किस्से सुनते थे की जो कोई इनमे जाता है वो खो जाता है , हमारे हरियाणा में नारनौल में एक भूलभुलैया है जहाँ एक पूरी बारात के खो जाने की कहानी काफी प्रचलित है. लेकिन लखनऊ में ऐसा कुछ नहीं लगा, दरवाजे आपस में जुड़े हुए है, बीच बीच में झरोखे भी है इसलिए कुछ देर मशक्कत करने के बाद भूलभुलैया से बाहर आ सकते है.

खैर मै गाइड के साथ था और आपको भी सलाह दूंगा आप भी अकेले न जाए गाइड के साथ ही जाएँ, उनसे कुछ झूठी और कुछ सच्ची कहानिया भी सुनने को मिलेंगी. यहाँ एक और मजेदार उदाहरण देखने को मिलता है, वो मुहावरा सुना होगा की दीवारों के भी कान होते है ? उसका उदाहरण है बड़े इमामबाड़े के अंदर का परिसर जहाँ माचिस की तिल्ली के जलने की आवाज भी एक कोने से दुसरे कोने में सुनाई देती है .

दीवारों को देखने पर अंदाजा होता है की पर्यटन विभाग भूलभुलैया को भूल गया है , कई जगह चूना झड रहा है, पत्थर उखड रहे है और जहाँ दीवार जर्जर नहीं थोड़ी सही हालत में है वहां कुछ आशिको ने इबारते लिख रखी है. कुल मिला कर 1024 में से कुछ दरवाजे जर्जर होके बंद हो चुके है और धीरे धीरे बाकी का हिस्सा भी उसी कगार पर है.

अन्य जरूरी जानकारी टिकट- 25 रुपए भारतीय नागरिक

समय- 06 am to 09 pm

अगर पूरा इतिहास जानना है और इमामबाड़ा की भूलभुलैया अच्छे से देखनी है तो गाइड ले सकते है , गाइड की कोई एक कीमत तय नहीं है निर्भर करता है आपके ऊपर की आप कितने में मना लेते है. चारबाग से बड़ा इमामबाडा 4 km दूर है लेकिन शहर में ola/ uber की सेवा अच्छी है. लखनऊ हवाई , रेल और सड़क तीनो मार्ग से आसपास के बड़े छोटे शहरो से जुड़ा हुआ है इसलिए आने जाने में कोई परेशानी नहीं होगी फिर भी सबसे बढ़िया मार्ग रेल मार्ग है अन्यथा सड़क मार्ग कई जगह अच्छी हालत में नहीं है.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]