सामग्री पर जाएँ

भिक्षु उत्तम

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
शारदा यू उत्तम

बर्मी स्वतंत्रता सेनानी तथा बौद्ध भिक्षु
जन्म पॉ तुन आंग
28 दिसंबर 1879
रूप वार्ड, सितवे, अराकान (अब म्यांमार)
मौत 9 सितंबर 1939 (आयु 59)
रंगून, बर्मा
राष्ट्रीयता बर्मी (रखाइन)
पेशा बौद्ध भिक्षु, राजनीतिज्ञ, लेखक
प्रसिद्धि का कारण बर्मा के स्वतंत्रता संग्राम के 'मशाल वाहक'

शारदा यू उत्तम ( 28 दिसम्बर, 1879 – 9 सितम्बर 1939 ) बर्मा के एक प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु, लेखक और स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे। उन्हें बर्मा के स्वतंत्रता आंदोलन का "मशाल वाहक" माना जाता है। वे आधुनिक बर्मा के पहले ऐसे राजनीतिज्ञ थे जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने राजनीतिक गतिविधियों के कारण जेल भेजा था।

उन्हें सर्वसम्मति से अप्रैल 1935 में कानपुर में आयोजित अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के 16वें अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में चुना गया था। हिन्दू महासभा के इतिहास में अध्यक्ष बनने वाले प्रथम बौद्ध थे। उनके अध्यक्ष पद की स्वीकार्यता का भारत के साथ-साथ जापान और चीन जैसे बौद्ध राष्ट्रों में भी बड़े उत्साह के साथ स्वागत किया गया था। उन्होंने महासभा के मंच से बर्मा के एक करोड़ बौद्धों की ओर से हिन्दुओं के प्रति आभार व्यक्त किया था।[1]

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

[संपादित करें]

ऊ उत्तम का जन्म 28 दिसंबर 1879 को अराकान राज्य के सितवे नगर में हुआ था। उनके बचपन का नाम 'पॉ तुन आंग' था। उनके पिता का नाम 'यू सन म्या' और माता का नाम 'डॉ आंग क्यॉ फ्यू' था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सितवे के 'श्वे सेदी' मठ में प्राप्त की। 16 वर्ष की आयु में वे एक भिक्षु बने और उन्हें 'उत्तम' नाम दिया गया। उच्च शिक्षा के लिए वे कोलकाता (भारत) आ गए, जहाँ उन्होंने अँग्रेजी और अन्य विषयों का अध्ययन किया।

शारदा ऊ उत्तम एक असाधारण विद्वान थे। वे 10 भाषाओं के ज्ञाता थे, जिनमें शामिल हैं: बर्मी और पालि, हिंदी, संस्कृत, बंगाली, तिब्बती, अँग्रेजी, फ्रांसीसी और जापानी। उन्होंने कोलकाता के नेशनल कॉलेज में पालि और बौद्ध साहित्य के अतिथि प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। साथ ही, उन्होंने जापान के टोक्यो विश्वविद्यालय में पालि और संस्कृत के प्रोफेसर के रूप में भी सेवाएँ दीं।

हिन्दू महासभा की अध्यक्षता

[संपादित करें]

ऊ उत्तम का भारत और हिन्दू संस्कृति के साथ गहरा जुड़ाव था। अप्रैल 1935 में उन्होंने अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के कानपुर अधिवेशन की अध्यक्षता की। भिक्षु उत्तम का दृढ़ विश्वास था कि भगवान बुद्ध अब तक के सबसे महान और कट्टर हिन्दुओं में से एक थे। उनका मानना था कि बुद्ध ने कभी हिन्दू धर्म का त्याग नहीं किया, बल्कि उन्होंने इसे एक नया रंग और नया जीवन दिया और भारत की सीमाओं के पार इसका विस्तार किया।

उन्होंने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की बर्मा को भारत से अलग करने की नीति का कड़ा विरोध किया। उन्होंने इस अलगाव को "धर्मविरुद्ध" (Sacrilegious) करार दिया और कहा कि यह आर्य संस्कृति और आर्य जाति को टुकड़ों में काटने जैसा कृत्य है। अधिवेशन में उन्होंने कांग्रेस की नीतियों की कड़ी निंदा की। उन्होंने कांग्रेस द्वारा हिन्दू महासभा को 'सांप्रदायिक' कहे जाने का खंडन किया और कांग्रेस की नीतियों को "मुस्लिम-परस्त" और "अराष्ट्रीय" बताया। उन्होंने हिन्दू समाज को आंतरिक रूप से संगठित करने के लिए अपने "दलित और पिछड़े भाइयों" (Depressed Classes) के प्रति अधिक दयालु और विचारशील होने का आह्वान किया। उन्होंने उनके सामाजिक स्तर और धार्मिक प्रथाओं में सुधार कर उन्हें समाज की मुख्यधारा में जोड़ने पर बल दिया।

भिक्षु उत्तम को हिन्दू-बौद्ध सांस्कृतिक समन्वय और अखंड भारत की एकता के प्रबल समर्थक के रूप में याद किया जाता है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि बौद्ध धर्म वास्तव में हिन्दू धर्म का ही एक अंग है जिसने वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति का मान बढ़ाया।

राजनीतिक संघर्ष और जेल यात्रा

[संपादित करें]

ऊ उत्तम ने बर्मा में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनमत तैयार किया। उन्होंने अँग्रेजी गवर्नर 'सर रेजिनाल्ड क्रैडॉक' को बर्मा छोड़ने की चेतावनी देते हुए खुला पत्र लिखा था, जिसने पूरे देश में क्रांति की लहर पैदा कर दी। उन्हें पहली बार 31 मार्च 1921 को धारा 124(A) (राजद्रोह) के तहत गिरफ्तार किया गया था। उसके बाद वे कई बार जेल गए (1921, 1924 और 1928)। उन्होंने बर्मा को भारत से अलग करने की ब्रिटिश नीति का विरोध किया, जिसे वे "आर्य संस्कृति का विखंडन" मानते थे।

अंतरराष्ट्रीय संबंध

[संपादित करें]

उन्होंने वैश्विक स्तर पर स्वतंत्रता आंदोलनों का समर्थन किया। उन्होंने चीन के क्रांतिकारी नेता सन यात-सेन से मुलाकात की और चीनी छात्रों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने फ्रांस, मिस्र और जापान की भी यात्रा की और वहां की प्रणालियों का अध्ययन किया।

निधन और विरासत

[संपादित करें]

लगातार जेल यात्राओं और संघर्ष के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। 9 सितंबर 1939 को 59 वर्ष की आयु में रंगून में उनका निधन हो गया। म्यांमार में 9 सितंबर को ऊ उत्तम दिवस के रूप में मनाया जाता है। सितवे में उनके सम्मान में 'ऊ उत्तम पार्क' और उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई है।

इन्हें भी देखें

[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ

[संपादित करें]
  1. A Review Of The History And Works Of The Hindu Mahasabha And The Hindu Sanghatan Movement by Indra Prakash