भारत में बढ़ता ध्वनि प्रदूषण

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शहरों की भीड़-भाड़ में कान पड़ी आवाज़ नहीं सुनाई देती

प्रदूषण भारत के शहरी जीवन का एक हिस्सा बनता जा रहा है और उससे निबटने के उपायों की बार बार चर्चा होती रहती है।

वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण पर तो बार बार नज़र जाती है लेकिन एक और तरह का प्रदूषण भी इनसे कम ख़तरनाक नहीं है और वह है ध्वनि प्रदूषण.

सड़कों की भीड़-भाड़, वाहनों का शोर, तेज़ी से बजते हॉर्न की आवाज़ें, लगता है कान फट जाएंगे.

और यही नहीं, कारख़ानों के सायरन, मशीनों की कर्कश ध्वनि और लाउड स्पीकर्स पर ज़ोर-ज़ोर से बजते फ़िल्मी गीत यह सब मिल कर ध्वनि प्रदूषण में अपना पूरा योगदान देते हैं।


मैं इसी शोर के कारण ऊँचा सुनने लगा हूँ. लोग कहते कुछ हैं और मैं सुनता कुछ हूँ"


बत्तल् कहीं कहीं यह भी देखा गया है कि तेज़ शोर के कारण सुनने की शक्ति भी प्रभावित हुई है।

विनोद् 1976 से दिल्ली की सड़कों पर ऑटो-रिक्शा चलाते हैं और उनका कहना है, "मैं इसी शोर के कारण ऊँचा सुनने लगा हूँ."

"लोग कहते कुछ हैं और मैं सुनता कुछ हूँ."

दो तरह के प्रभाव

ध्वनि प्रदूषण के और क्या कुप्रभाव हो सकते हैं इसके बारे में मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज के नाक, कान, गला विशेषज्ञ डॉक्टर गौतम खन्ना कहते हैं कि इन्हें दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है।

एक- वह जिनका असर कान पर पड़ता है और बहरापन आ सकता है।

और दूसरी- लोग झल्लाहट महसूस करते हैं। बात बात पर तुनकमिज़ाजी और चिड़चिड़ाहट उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन जाती है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग-अलग मानदंड निर्धारित किए हैं।

रिहायशी इलाक़ों के लिए दिन में 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल ध्वनि की सीमा निर्धारित की गई है।

और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए दिन में 75 और रात में 70 डेसिबल की सीमा निर्धारित है।

लेकिन देखा गया है कि इसका अतिक्रमण ही होता है।

ध्वनि प्रदूषण पर क़ाबू पाना सभी की संयुक्त ज़िम्मेदारी है।

इसके लिए अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में झांकना होगा जहाँ पूजा-पाठ, जन्मदिन से लेकर विवाह तक हर मौक़े पर ख़ुशी का इज़हार गाजे-बाज़े और शोर-शराबे के साथ किया जाता है।