भारत में परमाणु उर्जा

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

भावी परिदृश्य[संपादित करें]

परमाणु ऊर्जा की भारतीय विद्युत उत्पादन एवं आपूर्ति के क्षेत्र में एक निश्चित एवं निर्णायक भूमिका है । विकासशील देश होने के कारण भारत की सम्पूर्ण विद्युत आवश्यकताओं का एक बड़ा भाग गौर पारम्परिक स्रोतों से पूरा किया जाता है क्योंकि पारम्परिक स्रोतों द्वारा बढ़ती हुई आवश्यकताओं को पूरा नहीं किया जा सकता । भारत ने नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त की है । इसका श्रेय डॉ. होमी भाभा द्वारा प्रारंभ किए गए महत्वपूर्ण प्रयासों को जाता है जिन्होंने भारतीय नाभिकीय कार्यक्रम की कल्पना करते हुए इसकी आधारशिला रखी । तब से ही परमाणु ऊर्जा विभाग परिवार के समर्पित वौज्ञानिकों तथा इंजीनियरों द्वारा बड़ी सतर्कता के साथ इसे आगे बढ़ाया गया है । किसी भी राष्ट्र के सम्पूर्ण विकास के लिए विद्युत की पर्याप्त तथा अबाधित आपूर्ति का होना आवश्यक है । विद्युत की मात्रा के संदर्भ में कहें तो किसी राष्ट्र के सामाजिक-आर्थिक विकास का पौमाना वहां प्रति व्यक्ति विद्युत खपत की दर से आंका जाता है ।

भारत के विद्युत उत्पादन का बड़ा भाग निम्नलिखित से प्राप्त होता है

  • कोयला आधारित ताप बिजलीघरों से (2002 में 58,000 मेगावाट, कुल विद्युत उत्पादन का लगभग 67%)
  • गौर पारंपारिक स्रोतों (नाभिकीय, वायु, ज्वारीय तरंगों आदि) से

भारत में प्रति व्यक्ति विद्युत की खपत लगभग 400 किलोवाट घंटा/वर्ष है जो कि विश्व की औसत खपत 2400 किलो वाट घंटा /वर्ष से काफी कम है । अत: आने वाले वर्षों में सकल राष्ट्रीय दर को बढ़ा कर उसे विश्व औसत के बराबर लाने के लिए हमें विद्युत के उत्पादन में बहुत वृद्धि करनी होगी ।

भारत में कोयले के अनुमानित भंडार 206 अरब टन हैं (यह विश्व के कुल कोयले भंडार का लगभग 6% है) तथा भारत में परम्परागत ऊर्जा स्रोतों का वितरण निम्नलिखित है :-

कोयला- 68% , भूरा कोयला-5.6 % पौट्रोलियम - 20%, प्राकृतिक गौसें- 5.6%

ऊर्जा की बढ़ती हुई माँग को देखते हुए यह पर्याप्त नहीं है और इसके अलावा भारतीय कोयले में सल्फर और राख की उच्च मात्रा होने के कारण इससे पर्यावरण समस्याएं उत्पन्न होती हैं ।

जल विद्युत उत्पादन क्षमता सीमित है और यह अनिश्चित मानसून पर निर्भर करती है ।

विद्युत उत्पादन के संदर्भ में किसी महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने में हमारे परम्परागत स्रोत अपर्याप्त हैं। समाप्त होते कोयले के भण्डार जल विद्युत की सीमित क्षमता के चलते नाभिकीय एवं अन्य गौर-परम्परागत स्रोतों के दोहन के द्वारा ही भविष्य में राष्ट्र की विद्युत आवश्यताएं पूरी की जा सकती हैं। गौर परम्परागत स्रोतों में भारी क्षमता है और हमें इनका दोहन करना चाहिए ।

अपनी प्रकृति के कारण जहाँ अन्य गौर परम्परागत स्रोत लघु विकेन्द्रित अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त हैं वहीं नाभिकीय बिजलीघर बृहत केन्द्रीय उत्पादन केन्द्रों के लिए उपयुक्त हैं ।

नाभिकीय ऊर्जा हेतु नीति[संपादित करें]

भारत ने विद्युत उत्पादन के लिए नाभिकीय ऊर्जा के प्रयोग के संबंध में सावधानीपूर्वक कदम आगे बढाए हैं । इसके लिए परमाणु ऊर्जा अधिनियम बनाकर उसका क्रियान्वयन किया गया । इसके अंतर्गत निर्धारित उद्देश्यों में प्राकृतिक रुप से उपलब्ध तथा उच्च सम्भावना वाले तत्वों यूरेनियम एवं थोरियम का उपयोग भारतीय नाभिकीय विद्युत रिएक्टरों में नाभिकीय ईंधन के रूप में करना है । भारत में इन दोनों तत्वों के अनुमानित प्राकृतिक भण्डार इस प्रकार हैं :-

प्राकृतिक यूरेनियम भंडार - लगभग 70,000 टन

थोरियम भंडार - लगभग 3,60,000 टन

भारतीय नाभिकीय विद्युत उत्पादन कार्यक्रम के अंतर्गत एक तीन चरणीय कार्यक्रम (चरण 1,चरण 2, चरण 3 ) का समावेश है

BARC nuclear reactor

पहला चरण - दाबित भारी पानी रिएक्टर[संपादित करें]

जिसमें निम्नलिखित का उपयोग होता है :

  • ईंधन मौट्रिक्स के रूप में प्राकृतिक यूरेनियम डाई-ऑक्साइड
  • मंदक एवं शीतलक के रूप में भारी पानी

प्राकृतिक यूरेनियम आईसोटोप का संयोजन इस प्रकार है - 0.7% विखण्डन U-235 और बाकी U-238

  • U-235 (n, f) अनेक रेडियो सक्रिय विखंडन उत्पाद + ऊर्जा की बड़ी मात्रा
  • U-238 (n, γ, -) Pu- 239

पहले दो संयंत्र क्वथन जल रिएक्टर थे जो कि आयातित प्रौद्योगिकी पर आधारित थे। बाद वाले संयंत्र स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास प्रयासों द्वारा बनाए गये PHWR प्रकार के हैं । भारत ने इस प्रौद्योगिकी में पूर्ण आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली है और कार्यक्रम का यह चरण औद्योगिक डोमेन में है ।

भावी योजना में निम्नलिखित का समावेश है -
  • विद्युत उत्पादन बढ़ाने हेतु रूसी प्रौद्योगिकी पर आधारित VVER प्रकार के संयंत्रों का स्थापन प्रगति पर है ।
  • मॉक्स ईंधन (मिश्रित आक्साइड) का विकास किया गया है और तारापुर में ईंधन के संरक्षण तथा नई ईंधन प्रौद्योगिकी विकसित

करने हेतु इसका प्रयोग किया गया है ।

भुक्तशेष ईंधन का पुनर्संसाधन => विवृत्त अथवा संवृत चक्र की विधि द्वारा

विवृत चक्र का संदर्भ अपशिष्ट उपचार के बाद सम्पूर्ण अपशिष्ट निपटान से है । इसके परिणामस्वरुप यूरेनियम की ऊर्जा क्षमता का बृहत् उपयोग दिखाई पड़ता है । (लगभग 2% का उपयोग होता है )

संवृत चक्र का संदर्भ U-238 एवं Pu-239 के रासायनिक पृथक्करण और आगे पुनश्चक्रण से जबकि अन्य रेडियो सक्रिय विखण्डन पदार्थों का उनकी अर्धायु एवं सक्रियता के अनुसार पृथक्करण किया गया तथा छंटाई की गई तथा उनकी न्यूनतम पर्यावरणीय असामान्यताओं का समुचित प्रकार से निपटान किया गया ।

  • दोनों प्रकार के विकल्प प्रयोग में लाये जाते हैं ।
  • दीर्घकालीन ऊर्जा नीति के एक भाग के रूप में, जापान और फ्रांस ने संवृत चक्र को चुना है ।
  • भारत में संवृत चक्र विधि पसन्द की गई है द्वितीय और तृतीय चरणों के माध्यम से नाभिकीय विद्युत उत्पादन के चरणबद्ध विस्तार कार्यक्रम को देखते हुए संसाधन एवं अपशिष्ट प्रबंधन हेतु स्वदेशी प्रौद्योगिकियों का विकास तथा पुनर्संसाधन संयंत्रों का स्थापन किया गया है । ये संयंत्र प्रचालनरत हैं तथा इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भरता प्राप्त हुई है ।

दूसरा चरण - तीव्र प्रजनक रिएक्टर[संपादित करें]

Kudankulam NPP

भारत के नाभिकीय विद्युत उत्पादन के द्वितीय चरण में रिएक्टर प्रचालन के प्रथम चरण से प्राप्त Pu-239 का मुख्य ईंधन के रूप में तीव्र प्रजनक रिएक्टर (EBR) में उपयोग करने पर विचार किया गया है ।

  • FBR में Pu-239 मुख्य विखण्ड¶ तत्व के रूप में कार्य करता है ।
  • ईंधन कोर के चारों ओर U-238 के समाच्छद से नाभिकीय तत्वांतरण के कारण नये Pu-239 पौदा होंगेतथा प्रचालन के दौरान

अधिक से अधिक Pu-239 की खपत होगी ।

  • इसके अलावा एफबीआर के चारो ओर उपस्थित Th-232 का समाच्छद भी न्यूट्रानग्राही अभिक्रिया करेगा जिससे U-233 का

निर्माण होगा U-233 भारत के नाभिकीय विद्युत कार्यक्रम के तृतीय चरण के लिए नाभिकीय रिएक्टर ईंधन हैं ।

  • तकनीकी रूप से FBR से सतत रूप से 420 GWe ऊर्जा का उत्पादन करना संभव है ।
  • 500 MWe विद्युत उत्पादन Pu-239 ईंधन से चालित तीव्र प्रजनक रिएक्टर का स्थापन कार्य प्रगति पर है । इसके साथ-साथ प्रगत भारी पानी रिएक्टरों में प्लूटोनियम - आधारित ईंधन के थोड़ी मात्रा में निवेश के साथ थोरियम आधारित ईंधन के उपयोग का प्रस्ताव है । आशा की जाती है कि प्रगत भारी पानी रिएक्टरों से थोरियम के बृहत् उपयोग वाले चरण तक पहुंचने में लगने वाली अवधि में कमी आयेगी ।

तृतीय चरण - प्रजनक रिएक्टर[संपादित करें]

भारत के नाभिकीय विद्युत उत्पादन कार्यक्रम के तृतीय चरण में प्रजनक रिएक्टरों में U-233 ईंधन का प्रयोग किया जाना है । भारत में थोरियम के विशाल भंडारों को देखते हुए U-233 ईंधन के प्रयोग से संचालित होने वाले प्रजनक रिएक्टरों का अभिकल्पन एवं प्रचालन संभव है ।

  • U- 233 को Th-232 जिसका उपयोग द्वितीय चरण वाले Pu- 239 ईंधन द्वारा चालित तीव्र प्रजनक रिएक्टर में समाच्छद के रूप में होता है, के नाभिकीय तत्वांतरण से प्राप्त किया जाता है ।
  • इसके अलावा U-233 ईंधन से संचालित प्रजनक रिएक्टरों में U-233 रिएक्टर के चारों ओर Th-232 का समाच्छद होता है जिससे रिएक्टर के प्रचालन के समय के दौरान और अधिक U-233 उत्पादित होते हैं । इससे लम्बे समय तक विद्युत उत्पादन हेतु ईंधन की आवश्यकता पूरी होती रहती है ।
  • U-233/Th-232 आधारित प्रजनक रिएक्टर विकासाधीन हैं और भारत के नाभिकीय कार्यक्रम के थोरियम के उपयोग वाले अंतिम चरण में इन्हीं की प्रधानता रहेगी । भारत का वर्तमान ज्ञात थोरियम भंडार 3,58,000 GWe-yr विद्युत ऊर्जा देने की क्षमता रखता है तथा इससे बड़ी आसानी के साथ अगली सदी या और उससे आगे की ऊर्जा आवश्यकतायें पूरी की जा सकती हैं।

दाबित भारी पानी रिएक्टर अभिकल्पन का विकास[संपादित करें]

भारत के नाभिकीय कार्यक्रम का प्रथम चरण पीएचडब्ल्यूआर प्रौद्योगिकी पर आधारित था जिसके निम्नलिखित लाभ हैं :-

  • सीमित यूरेनियम स्रोतों का सर्वोत्तम उपयोग
  • द्वितीय चरण ईंधन हेतु उच्चतर प्लूटोनियम का उत्पादन
  • स्वदेशी प्रौद्योगिकी की उपलब्धता
  • पीएचडब्ल्यूआर अभिकल्पन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषताएं निम्नलिखित हैं
  • बृहत् दाब वाहिका की बजाय बहुल दाब नलिका संगरुपण

पहले दो रिएक्टर कनाडा के सहयोग से राजस्थान में कोटा के निकट रावतभाटा में बनाये गये थे। बाद में मद्रास के निकट कलपक्कम में दो इकाइयाँ बनाई गयीं जिनकी डिजाइन समान थी परन्तु उनमें स्वदेशी प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया गया। बाद में, नरोरा में स्थित रिएक्टरों द्वारा हमारे इंजीनियरों को प्रथम बार यह अवसर मिला कि वे अपने प्रचालन अनुभवों तथा अन्य आवश्यकताओं जौसे - कठोर संरक्षा मानकों एवं भूकंपरोधी डिजाइन का उपयोग करते हुए स्वदेशी डिजाइन तौयार करें। विकास की प्रक्रिया का अगला कदम 500 MWe पीएचडब्ल्यूआर का अभिकल्पन करना है और इस अभिकल्पन पर आधारित दो इकाइयाँ तारापुर में स्थापित की जा रही हैं । विभिन्न घटकों एवं उपकरणों के निर्माण हेतु प्रौद्योगिकी अब अच्छी तरह स्थापित हो चुकी है और यह परमाणु ऊर्जा विभाग एवं उद्योगों के मध्य सक्रिय सहयोग द्वारा और विकसित हो रही है । पऊवि में स्वगृहीय प्रयासों के अतिरिक्त पीएचडब्ल्यूआर प्रौद्योगिकी के विकास में अनेक विश्वविद्यालयों एवं राष्ट्रीय संस्थानों ने भी भाग लिया है । प्राप्त अनुभवों तथा निष्णांत प्रौद्योगिकी के उपयोग द्वारा हमारे संयंत्रों के कार्य निष्पादन में सुधार हो रहा है ।

तीव्र प्रजनक रिएक्टर[संपादित करें]

भारत का प्रथम 40 मेगावाटवाला तीव्र प्रजनक परीक्षण रिएक्टर (एफबीटीआर) 18 अक्तूबर 1985 को क्रांतिक हुआ । अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और तत्कालीन यूएसएसआर के अलावा भारत छठवाँ देश हुआ जिसके पास एफ बी टी आर के निर्माण तथा प्रचालन की प्रौद्योगिकी है ।

भारतीय एफबीटीआर की अद्वितीय विशेषताएँ इस प्रकार हैं :-

  • प्लूटोनियम समृद्ध स्वदेश में विकसित U-Pu कार्बाइड ईंधन है ।
  • भारतीय वौज्ञानिकों द्वारा उद्योग क्षेत्र से घनिष्ठ संबंध रखते हुए सभी मशीनरी, बाह्य इकाइयों और सामग्री का

अभिकल्पन, विकास तथा निर्माण कार्य ।

स्थिति : परिचालन की प्रारंभिक समस्याओं को दूर कर लिया गया है और रिएक्टर को 10.5 मेगावाट के स्थिर ऊर्जा स्तर पर आसानी से प्रचालित किया जा रहा है जो कि इसकी छोटी कोर को देखते हुए अधिकतम संभव विद्युत उत्पादन है ।

भावी योजनाएँ : एफबीटीआर के अभिकल्पन, स्थापना और प्रचालन द्वारा भरपूर अनुभव और द्रव धातु शीतलित तीव्र प्रजनक रिएक्टर की प्रौद्योगिकी के संबंध में असीम जानकारी प्राप्त हुई है तथा इससे कल्पाक्कम में निर्मित किए जानेवाले एक 500 मेगावॉट के प्रोटोटाइप तीव्र प्रजनक रिएक्टर का अभिकल्पन कार्य प्रारंभ करने के लिए आत्मविश्वास भी मिला ।

पीएफबीआर के अभिकल्पन हेतु आवश्यक है :-

  • बाष्प-द्रवचालन कार्यविधि का विस्तृत और पूरा ज्ञान ।
  • विसर्पण, विसर्पण-श्रांति की पारस्परिक क्रिया तथा बकलिंग और अभिकल्पन इष्टतमीकरण हेतु द्रव-संरचना की अंतर्क्रिरया और संरचनात्मक सुस्वस्थता का मूल्यांकन ।
  • बाष्प-द्रवचालन और संरचनात्मक यांत्रिकी के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कोडों का निर्माण ।
  • कोडों को प्रयोगात्मक आँकडों या अन्तर्राष्ट्रीय बेंचमार्क परीक्षणों द्वारा वौधीकृत किया गया।
आर एण्ड डी इंजीनियरी
  • अनुरूपी प्रयोगों और उपकरणों के विकास के माध्यम से तीव्र प्रजनक रिएक्टर कार्यक्रम हेतु ।
  • विश्लेषणात्मक कोडों और निष्पादन मूल्यांकन कोडों के वौधीकरण हेतु प्रयोगात्मक आँकड़े ।
  • वायु, जल तथा सोडियम के पर्यावरण में इन प्रयोगों को करने की सुविधा ।
  • कार्य विधियों हेतु विशेषज्ञता, आदर्श प्रवाह, कंपन आदि के फ्लो पौटर्न के मापन हेतु विशेष यंत्रीकरण ।
  • उच्च तापीय सोडियम सुविधाओं की स्थापना और उनके सुरक्षित प्रचालन की क्षमता ।
  • 8330 K तक के तापमान पर सोडियम में रिएक्टर उपकरणों के परीक्षण हेतु बड़े कंपोनेन्ट वाली जांच की रिग

सुविधा ।

भारी पानी[संपादित करें]

पीएचडब्ल्यूआर में मंदक और प्राथमिक शीतलक के रूप में काम करने के लिए उच्च शुद्धता वाले भारी पानी का प्रयोग किया जाता है ।

  • भारत में प्रथम भारी पानी संयंत्र वर्ष 1962 में नांगल में स्थापित किया गया था ।
  • अन्य भारी पानी संयंत्र बड़ौदा, तूतीकोरिन, कोटा, थल, हजीरा और मणुगूरु में हैं ।
  • कोटा और मणुगूरु स्थित संयंत्रों में उपयोग में लाई गई हाइड्रोजन सल्फाइड - पानी प्रक्रिया स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास द्वारा विकसित विशेषज्ञता पर आधारित है ।
  • भारी पानी के उन्नयन हेतु प्रौद्योगिकी का विकास भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र में किया गया था ।
  • भारी पानी के उत्पादन के लिए वर्तमान में किया जा रहा अनुसंधान कार्य वौकल्पिक तथा अधिक किफायती प्रौद्योगिकियों के विकास की ओर केन्द्रित है, यथा-हाइड्रोजन-जल विनिमय प्रक्रिया

नाभिकीय ईंधन एवं संरचनात्मक घटक[संपादित करें]

देश के संपूर्ण परमाणु विद्युत कार्यक्रम हेतु नाभिकीय ईंधन के संयोजन और महत्वपूर्ण संरचनात्मक घटकों के निर्माण हेतु नाभिकीय ईंधन सम्मिश्र (एन एफ सी) की स्थापना हैदराबाद में 70 के दशक के प्रारंभ में की गई थी । एन एफ सी के क्रियाकलापों का विवरण निम्नलिखित है :-

  • बिहार और केरल से प्राप्त यूरेनियम अयस्क सांद्रित्र तथा धातु जिर्कोन रेत का स्वदेश में विकसित श्रंखलाबद्ध रासायनिक और धात्विक प्रक्रियाओं द्वारा संसाधन।
  • ऊष्ण बहिर्वेधन एवं शीतल पिलगरिंग प्रक्रिया द्वारा स्टैनलेस स्टील, कार्बन स्टील, टिटैनियम तथा निकेल, मौग्नीशियम की अन्य मिश्र धातुओं की सीवनहीन ट्र्यूबों का निर्माण ।
  • 180 मिली मीटर व्यास वाली उष्ण बहिर्वेधन ट्यूबों और 4.5 मिलीमीटर पतली दीवार वाली शीतल पिलगर्ड ट्यूबों

का नियमित रूप से निर्माण कार्य ।

  • एन.एफ.सी. द्वारा अपनी अर्जित विशेषज्ञता का लाभ भारतीय नौसेना, हिंदुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड तथा अन्य

रक्षा संगठनों तथा रसायनिक, खाद और यांत्रिक बॉल बियरिंग का निर्माण करनेवाले उद्योगों तथा अन्य अनेक रासायनिक उपकरण विनिर्माताओं को प्रदान किया जाता है ।

  • एन.एफ.सी. के अन्य उत्पादनों में टैन्टलम, नियोबियम, रजत और ग्राहकों के विनिर्देशों के अनुसार विभिन्न उच्च

शुद्धता वाली सामग्री शामिल हैं ।

  • भारतीय बाजार में अपने उत्पादकों की आपूर्ति करने के अलावा एन.एफ.सी. ने हाल ही में अपने कुछ उत्पादों

उदाहरणार्थ : जर्कोनियम छडों और एनहाइड्रस मौग्नीशियम क्लोराइड का निर्यात भी किया है ।

नाभिकीय ईंधन चक्र का पश्च्यंत[संपादित करें]

नाभिकीय विद्युत उत्पादन कार्यक्रम - नाभिकीय ईंधन चक्र का अग्रांत

यूरेनियम का खनन, पृथक्करण, रसायनिक शुद्धीकरण, उपयुक्त रूप में परिवर्तन और ईंधन छड़ का निर्माण

नाभिकीय विद्युत उत्पादन कार्यक्रम - नाभिकीय ईंधन चक्र का पश्च्यंत

भुक्तशेष ईंधन का पुनर्संसाधन, विखण्ड्य उर्वर घटकों का पृथक्करण, उचित उपचार क्रिया के बाद विकिरण सक्रिय अपशिष्ट का निरापद निपटान ।

नाभिकीय ईंधन चक्र का पश्च्यंत उसकी संवेदनशीतला और सुरक्षा दोनों ही दृष्टियों से एक महत्वपूर्ण क्रिया है । पूर्ण रूप से स्वदेश में किए गए अनुसंधान एवं विकास प्रयासों द्वारा ही ईंधन पुनर्संसाधन प्रौद्योगिकी का विकास और मानकीकरण किया गया था । भुक्तशेष ईंधन से प्लूटोनियम निकालने के लिए तीन पुनर्संसाधन संयंत्रों का क्रमश: ट्राम्बे, तारापुर और कल्पाक्कम में शीत कमीशनन किया गया था ।

कल्पाक्कम संयंत्र मे अनेक नवीन प्रक्रियाएं समाविष्ट की गई हैं जैसे :

  • सर्वो-परिचालकों के प्रयोग द्वारा उष्म कोशिकाओं में हाइब्रिड अनुरक्षण की अवधारणा ।
  • संयंत्र की आयु बढ़ाने के लिए प्रावधान किए गए। यह संयंत्र एम.ए.पी.एस. तथा एफ.बी.टी.आर. से प्राप्त ईंधन के पुनर्संसाधन संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा ।

प्रक्रिया कार्य के इस हिस्से में ईंधन चक्र में उत्पादित अत्यंत रेडियो एक्टिव अपशिष्ट की सुदक्ष हैंडलिंग, सुरक्षित प्रबंधन तथा उपयुक्त निपटान कार्य को उच्च प्राथमिकता दी जाती है ।

  • अपशिष्ट को सुरक्षित हैंडलिंग एवं निपटान के लिए स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास कार्य द्वारा विकसित प्रौद्योगिकी कड़े नियामक मानकों पर आधारित है ।
  • सभी नाभिकीय बिजली संयंत्र स्थलों पर स्थापित अपशिष्ट संसाधन संयंत्र प्रचालनरत हैं ।

अपशिष्ट प्रबंधन हेतु निम्नलिखित अनुसार दीर्घ-कालिक कार्य योजना प्रतिपादित की गई है :-

  • ग्लास मौट्रिक्स में काचन द्वारा अचलीकृत किए गए उच्च स्तरीय अपशिष्ट को संक्षारणरोधी कनिस्तरों में उनके डबल एनकैपसुलेशन के बाद उसे इंजीनियरीकृत भण्डारण सुविधा में पृथक रूप से भंडारित किया जाता है जिसमें 20-30 वर्षों तक लगातार शीतलन की सुविधा उपलब्ध रहती है । इसके बाद अंतिम निपटान अतिरिक्त संरक्षण अवरोधकों के साथ भूमि के अन्दर गहराई में किया जाता है ।
  • मध्यम स्तर के अपशिष्टों को उचित उपयुक्त मौट्रिक्स में ठोस रूप में परिवर्तित करने के बाद रिसावरहित पात्रों में भण्डारित किया जाता है और उन्हें पर्याप्त सुरक्षाकवर वाले जलरोधी कंक्रीट टाइल से बने विवरों में दफन किया जाता है ।
Rajasthan NPP 2011-1

अनुसंधान एवं विकास[संपादित करें]

नाभिकीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता एवं स्वीकृति प्राप्त है । भारत द्वारा सबलतापूर्वक अपनाये गये उत्कृष्ट अवसंरचनात्मक एवं वर्षों के समर्पित अनुसंधान एवं विकास कार्यों से नाभिकीय विद्युत उत्पादन एवं सहायक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति के साथ-साथ वौज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय क्षेत्रों में स्वावलंबन भी हासिल किया गया है । परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा नाभिकीय ऊर्जा एवं रिएक्टर प्रौद्योगिकियों, आइसोटोप अनुप्रयोगों एवं विकिरण प्रौद्योगिकियों, त्वरक एवं लेसर प्रौद्योगिकी कार्यक्रम, विकिरण संबंधी स्वास्थ्य एवं संरक्षा के क्षेत्रों में सर्वांगीण एवं व्यापक अनुसंधान तथा विकास संबंधी अध्ययन कार्य अपने चार अनुसंधान एवं विकास केंद्रों यथा भापअ केंद्र, आईजीसीएआर, वीईसीसी एवं कैट, इंदौर में संचालित किये जाते हैं । विज्ञान एवं इंजीनियरी के अनेक महत्वपूर्ण विषयों में मूलभूत एवं अनुप्रयोगात्मक अनुसंधान कार्यों पर बल देने के कारण इन संस्थानों में प्रौद्योगिकी एवं मूलभूत अनुसंधान कार्यों के विकास में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है जिससे न केवल परमाणु ऊर्जा बल्कि अन्य अनेक क्षेत्रों में लाभ मिला है ।

विद्युत उत्पादन के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में प्राप्त कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियां निम्नलिखित रही हैं :

  • विकिरण प्रेरित उत्परिवर्तन के माध्यम से 22 विविध उच्च उत्पादन किस्म के बीजों का विकास । (दालें 10, मूंगफली 8, राई 2, चावल 1और पटसन 1)
  • रेडियोआइसोटोपों के चिकित्सीय अनुप्रयोगों के अंतर्गत प्रतिवर्ष लगभग छ: लाख रोगियों का नौदानिक परीक्षण किया जाता है एवं 15-20 लाख रोगी प्रतिवर्ष समर्पित एवं संबद्ध केंद्रों के माध्यम से विकिरण उपचार ले रहे हैं ।
  • रेडियोआइसोटोपों के औद्योगिक अनुप्रयोगों में ~1000 औद्योगिक रेडियोग्राफी कैमरे नेमी प्रयोग में लाये जा रहे हैं । जल विज्ञान एवं अनुरेखी अनुप्रयोगों द्वारा भूगर्भीय रिसावों के संसूचन, बन्दरगाहों में गाद संचलन के अध्ययन और भूजल स्रोतों तथा उनके बहाव मार्गों के मानचित्रण आदि कार्यों में महत्वपूर्ण प्रगति की गई है । अनेक नये अनुप्रयोग भी जुड़ रहे हैं ।

अनुसंधान रिएक्टर : अनेक विषयों में मूलभूत एवं अनुप्रयुक्त अनुसंधान हेतु आदर्श आधार उपलब्ध कराते हैं ।

अनुसंधान रिएक्टरों का प्रयोग -

  • नाभिकीय ईंधन के परीक्षणात्मक किरणन, रिएक्टरों के लिए निर्माण में लगनेवाली सामग्री तथा घटकों के विकास कार्य एवं विद्युत केंद्रो को प्रचालित करने हेतु आवश्यक कार्मिकों के प्रशिक्षण के लिए किया जाता है।
  • विखंडन भौतिकी, ठोस अवस्था भौतिकी एवं विकिरण रसायनिकी में विस्तृत अनुसंधान के लिए किया जाता है ।

ध्रुव : भापअ केंद्र स्थित ध्रुवा रिएक्टर का अभिकल्पन, निर्माण एवं कमीशनन भारतीय इंजीनियरों एवं वौज्ञानिकों द्वारा किया गया । इसमें ईंधन के रूप में प्राकृतिक यूरेनियम मंदक एवं शीतलक के रूप में भारी पानी का प्रयोग किया जाता है । इस रिएक्टर के द्वारा भारत को रेडियोआइसोटोपों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त हुई है ।

कामिनी : यह कल्पाक्कम स्थित इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र में 30 kWt क्षमतावाला रिएक्टर है। यह रिएक्टर अक्तूबर 1996 में क्रांतिक हुआ जो न्यूट्रान रेडियोग्राफी सुविधाएं उपलब्ध कराता है । हमारे विस्तृत थोरियम भंडार के उपयोग की दिशा में यह एक छोटी परंतु महत्वपूर्ण उपलब्धि है । यह विश्व का एक मात्र रिएक्टर है जिसमें यूरेनियम - 233 ईंधन का प्रयोग होता है । परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा निर्मित कुछ बड़ी सुविधाएं अब पऊवि सुविधाओं हेतु अंतर विश्वविद्यालय संघ के माध्यम से विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के उपयोग के लिए उपलब्ध हैं ।

अपने अनुसंधान केंद्रों में अनुसंधान कार्य के अतिरिक्त परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा निम्नलिखित सात सहायताप्राप्त संस्थाओं को पूर्ण सहायता दी जाती है

  • टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान, मुंबई
  • टाटा स्मारक केंद्र, मुंबई
  • भौतिकी संस्थान, भुवनेश्वर
  • साहा भौतिकी संस्थान, कोलकाता
  • मेहता गणित एवं गणितीय भौतिकी अनुसंधान संस्थान, इलाहाबाद
  • गणित विज्ञान संस्थान, चेन्नई
  • प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान, गांधीनगर

अंतत:[संपादित करें]

परमाणु ऊर्जा के शांतिमय उपयोग के कार्यों में, नाभिकीय ऊर्जा पर आधारित विद्युत उत्पादन का सर्वप्रथम स्थान है एवं भारत ने इस क्षेत्र में कई उपलब्धियां प्राप्त की है । देश की भविष्य की आवश्यकताओं हेतु अधिक विद्युत उत्पादन क्षमता एवं उपलब्ध स्रोतों को ध्यान में रखते हुए विद्युत उत्पादन में वृद्धि के लिए परमाणु ऊर्जा के दोहन हेतु एक सुनियोजित कार्यक्रम का क्रियान्वयन किया जा रहा है । अनुसंधान एवं विकास कार्यों का एक सुदृढ़ ढांचा तौयार किया गया है जो अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों के सुचारू नियोजन तथा उसके द्वारा परमाणु ऊर्जा विभाग को दिए गए दायित्व को पूरा करने में एक आधार भूमिका का निर्वाह कर रहा है । विकासात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अनेक सामरिक रूप से महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में निपुणता प्राप्त की गई है । ईंधन पुनर्संसाधन, समृद्धिकरण, विशेष पदार्थों का उत्पादन, कंप्यूटर, लेसर, त्वरक, आदि के क्षेत्रों में स्वदेशी प्रौद्योगिकी का विकास हमारे भविष्य की ऊर्जा मांगों की पूर्ति हेतु हमारे ऊर्जा स्रोतों के दोहन से संबंधित संचालित हमारी संपूर्ण गतिविधियों का चित्रण करती हैं । विकिरण प्रौद्योगिकी एवं आइसोटोप अनुप्रयोग ऐसे अन्य प्रमुख क्षेत्र हैं जहां परमाणु ऊर्जा का स्वास्थ्य संरक्षण, कृषि, उद्योग, जलविज्ञान एवं खाद्य परिरक्षण के लिए शांतिमय उपयोग किया जाता है तथा जहां हमें आत्मनिर्भरता प्राप्त हुई है ।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]