भारत में दर्शनशास्त्र

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

भारत में दर्शनशास्त्र के दशा और दिशा के अध्ययन को हम दो भागों में विभक्त करके कर सकते हैं -

भारत में दर्शन : स्वातंत्र्यपूर्व[संपादित करें]

उपनिवेशकालीन भारतीय दर्शनशास्त्र अपनी प्रकृति में अधिकांशतः आदर्शवादी और प्रत्ययवादी रहा है। चूँकि वेदान्त उसका मूल-स्रोत था, इसलिए उस काल की दार्शनिक पुनर्रचनाओं को 'नव-वेदांती' कहा जा सकता है। इस काल की दार्शनिक प्रवृत्ति को पाश्चात्य विचारकों की उस आलोचना के प्रत्युत्तर में भी देखा जा सकता है जिसे अलबर्ट स्वीट्ज़र (1875-1965) ने अपनी पुस्तक 'इण्डियन थॉट ऐंड इट्स डिवेलपमेंट' (1936) में यह कहते हुए संदर्भित किया था कि भारतीय दर्शन पलायनवादी है। वस्तुतः स्वीट्ज़र का यह दृष्टिकोण शॉपेनहावर (1788- 1860) जैसे विचारकों की औपनिषदिक समझ पर आधरित है। इसका पुरजोर जवाब सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी कृति 'ईस्टर्न रिलीजन ऐंड वेस्टर्न थॉट' (1939) में दिया है। उनके अनुसार यह धारणा ऐतिहासिक रूप से स्वीकार्य नहीं हो सकती कि हिंदूचिंतन में जीवन और जगत के प्रति नकार और निराशा निहित है, जबकि ईसाई चिंतन के स्वरूप में जीवन और जगत के प्रति स्वीकार्यता और आशावाद निहित है। वास्तव में दोनों के बीच का वास्तविक विरोध धर्म और स्वायत्त-मानववादी दृष्टिकोण को लेकर है।

1916 में आमलनेर, महाराष्ट्र में श्रीमंत प्रताप सेठ के सौजन्य से इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़िलॉसफ़ी की स्थापना हुई। 1917 में इण्डियन फ़िलॉसॅफ़िकल एसोसिएशन का पहला अधिवेशन कोल्हापुर में हुआ तथा 'इण्डियन फ़िलॉसॅफ़िकल रिव्यू' नामक पत्रिका का प्रकाशन भी प्रारम्भ किया गया। 1925 में इण्डियन फ़िलॉसॅफ़िकल कांग्रेस की स्थापना हुई। यह दार्शनिकों का एक ऐसा संगठन है जो औपनिवेशिक युग से लेकर अब तक अंग्रेज़ी माध्यम से भारतीय दार्शनिक चिंतन के विकास के लिए सक्रिय रहा है। ये सभी प्रयास औपनिवेशिक युग में भारतीय दर्शन को संस्थागत स्वरूप प्रदान करने वाले साबित हुए। स्वातंत्र्यपूर्व भारत के प्रमुख विचारक श्री अरविन्द (1872-1950) मौलिक रूप से एक प्रत्ययवादी दार्शनिक थे और उन्होंने वैदिक तत्त्वदृष्टि को विकासवादी प्रारूप में देखते हुए एक ऐसा समग्र अद्वैतवादी दर्शन प्रस्तुत किया जिसमें जड़ और चेतन का अंतहीन द्वैत न हो कर दोनों एक ही वैश्विक प्रक्रिया के समान भागीदार हैं। अनन्त के तर्क और मायावाद के बदले लीलावाद पर आधारित उनका दर्शन भौतिकवादियों द्वारा किये जाने वाले संन्यास-निषेध और अध्यात्मवादियों द्वारा किये जाने वाले भौतिकवाद-निषेध जैसी दो अतियों से बचते हुए इस पृथ्वी पर दिव्य जीवन के अवतरण का दर्शन है। अपनी तत्त्वदृष्टि, इतिहास दर्शन, संस्कृति दर्शन और योगसमन्वय द्वारा उन्होंने भारतीय सभ्यता-बोध को दुनिया के समक्ष एक ब्रह्मांडीय प्रयोजनमूलकता के साथ प्रस्तुत किया है। उन्हें अपनी दार्शनिक योजना के यथार्थ पर कितना भरोसा रहा होगा कि उन्होंने भारत की स्वाधीनता को भी एक वैश्वीय भवितव्यता की अंगभूत घटना के रूप में देखा।

श्री अरविंद के अतिरिक्त प्रमुख स्वातंत्र्यपूर्व भारतीय दार्शनिकों में कृष्ण चंद्र भट्टाचार्य (1876-1949) का नाम उल्लेखनीय है। वे आधुनिक भारत के ऐसे तत्त्वमीमांसक थे जिन्होंने अद्वैतवेदांत की पुनर्रचना को कांट और हीगेल की विचार-सरणि के समानांतर दुनिया के समक्ष रखा। ‘कंसेप्ट ऑफ़ फ़िलॉसफ़ी’, ‘सब्जेक्ट एज़ फ्रीडम’ और ‘द कंसेप्ट ऑफ़ एब्सोल्यूट ऐंड इट्स आल्टरनेटिव फ़ार्म्स’ जैसे निबंधों द्वारा उन्होंने अपनी दार्शनिक पुनर्रचना की प्रस्तुति की। यद्यपि उन्होंने भारतीय दर्शन के लगभग सभी सम्प्रदायों पर लेखन किया है लेकिन जैन दर्शन के अनेकान्तवाद (1925) की पुनर्व्याख्या लीक से हट कर विशेष महत्त्व की है। उन्होंने अनेकांतवाद के महत्त्व को पुनः उद्घाटित करते हुए दिखाया कि न तो तादात्म्य और न ही विरोध को तार्किक विचार-सरणी के लिए आधारभूत माना जा सकता है। वस्तुतः तादात्म्य और विरोध दोनों ही परस्पर विनियोजनीय हो सकते हैं और दोनों की ऐसी विनियोजनीयता (आल्टरेशन) ही व्यापक दार्शनिक आधार प्रस्तुत करती है। तादात्म्य और विरोध के बदले ‘सहावस्थान’ (टूगैदरनेस) तार्किक विचार-सरणी की अपेक्षाकृत अधिक आधारभूत कोटि है जिसे जैन दार्शनिकों ने ‘क्रमर्पण और सहर्पण’ के दो प्रारूपों में देखा है। कुल मिला कर अनेकांतवाद अनिर्वाच्यता का एक विशिष्ट तर्कशास्त्र है जो सप्तभंगी नय के द्वारा सत्य की वैकल्पिकता का सिद्धांत प्रस्तुत करता है।

भारत के पुनर्जागरण के परिप्रेक्ष्य में भट्टाचार्य का ‘स्वराज इन आइडियाज़’ नामक व्याख्यान भी महत्त्वपूर्ण है जिसे उन्होंने 1929 में हुगली कॉलेज, कलकत्ता के विद्यार्थियों के बीच दिया था। बाद में 1954 में इसका प्रकाशन विश्वभारती जर्नल में हुआ। उनका यह व्याख्यान अपने आप में वैचारिक स्वराज का दार्शनिक घोषणापत्र जैसा है। 1984 में पुणे से प्रकाशित इण्डियन फ़िलॉसॅफ़िकल क्वार्टरली में उनके इस व्याख्यान का पुनर्मुद्रण किया गया। दया कृष्ण, राजेंद्र प्रसाद, रामचंद्र गाँधी, एस.पी. गौतम सरीखे लोगों ने इस व्याख्यान के भाष्य किये। यद्यपि यह व्याख्यान उन्होंने अंग्रेज़ी में दिया था लेकिन वैचारिक स्वराज के मातृभाषीय राजपथ के महत्त्व और पश्चिमी विचारों के असमीक्षित पिष्टपेषण के दुष्परिणामों को उन्होंने बख़ूबी उजागर किया। इसके साथ ही उन्होंने यह भी निर्देशित किया कि भारतीय दर्शन को किस प्रकार एक सार्वभौम ज्ञान-विधा के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। वैचारिक स्वराज के आशय को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक पराधीनता साधारणतः अचेतन प्रकार की होती है और उसमें दासता प्रारम्भ से ही निहित है। भट्टाचार्य कहते हैं :

जब मैं सांस्कृतिक पराधीनता की बात करता हूँ तो मेरा अभिप्राय किसी विदेशी संस्कृति को मात्र अपना लेने से नहीं होता। इस प्रकार का अपना लेना सदैव अवांछनीय ही हो, यह आवश्यक नहीं। किसी भी परिस्थिति में उसका अर्थ स्वाधीनता की हानि नहीं होता और होना भी नहीं चाहिए। सांस्कृतिक पराभव केवल तब होता है जब व्यक्ति के अपने परम्परागत विचारों और भावनाओं को, बिना तुलनात्मक मूल्यांकन के ही, एक विदेशी संस्कृति के विचार और भावनाएँ उखाड़ फेंकते हैं और वह विदेशी संस्कृति व्यक्ति को एक भूत या प्रेत की तरह अपने वश में कर लेती है। इस प्रकार की पराधीनता आत्मा की दासता है। जब व्यक्ति अपने आप को उससे मुक्त कर लेता है तो उसे लगता है जैसे उसकी आँखें खुल गयीं। उसे एक नये जन्म की अनुभूति होती है। इसे ही मैं विचारों का स्वराज कहता हूँ।

स्वराज की भारतीय अवधारणा के संदर्भ में भारत रत्न से विभूषित भगवानदास (1869-1958) के उस आलेख का ज़िक्र करना प्रासंगिक है जिसे उन्होंने 1921 के बम्बई कांग्रेस अधिवेशन में एक प्रस्ताव-पत्र के रूप में प्रस्तुत किया था। यद्यपि उन दिनों स्वराज के स्वरूप को लेकर बुद्धिजीवियों के बीच मतभेद थे और इन्हीं सब को दूर करने के लिए उन्होंने इस प्रस्ताव-पत्र को तैयार किया था, लेकिन उनके इस आलेख की चर्चा अकादमिक जगत में न के बराबर होती है। भगवानदास कांग्रेस से जुड़े एक बहुमान्य बुद्धिजीवी और थियोसोफ़िकल सोसाइटी में सक्रिय थे। उनके अनुसार स्वराज मूल रूप में एक नैतिक प्रत्यय है और व्यवस्था के अर्थ में यह स्व-शासन है। जिस प्रकार एक व्यक्ति में दो तरह की आत्मा-एक उच्चतर और दूसरा निम्नतर-का निवास होता है अर्थात् व्यक्ति दैवीय और पाशविक दोनों ही प्रवृत्तियों से संचालित होता है, उसी प्रकार किसी समाज और राष्ट्र की भी उच्चतर और निम्नतर आत्मा होती है। कोई भी सरकार या शासन तभी सुशासन अथवा स्व-शासन माना जा सकता है जब वह उच्चतर आत्मा द्वारा संचालित हो। उच्चतर आत्मा से अभिप्रेरित राज-काज और नीति ही अधिकाधिक समन्वयकारी हो सकती है। इसका लोकतांत्रिक क्रियान्वयन और व्यवस्थापन केवल विवेकवान-विधायिका द्वारा ही सम्भव है जो प्रत्येक व्यक्ति में रहने वाले मैं और हम को समन्वित कर सके। प्रतिस्पर्धा और परस्पर सहयोग दोनों ही आवश्यक हैं। भगवानदास की यह अंतर्दृष्टि लोकतंत्रात्मक स्वराज की नैतिक आधरभूमि की ओर संकेत है। 'द एसेंशियल यूनिटी ऑफ़ ऑल रिलिजंस' (1939) उनकी सबसे प्रतिष्ठित कृति है।

औपनिवेशिक युग के मान्य अध्येताओं में आर.डी. रानाडे (1886-1957) का व्यक्तित्वअलग प्रकार था। उनकी प्रसिद्धि एक दार्शनिक के साथ-साथ रहस्यविद् के रूप में भी थी। 'अ कन्स्ट्रक्टिव सर्वे ऑफ़ उपनिषदिक फ़िलॉसफ़ी' (1927) उनकी बहुमान्य कृति है। इसमें उन्होंने न केवल औपनिषदिक दर्शन को उसकी सम्पूर्ण गरिमा और अंतर्वस्तु के साथ प्रस्तुत किया है बल्कि लॉर्ड रोनाल्ड्से की उस आलोचना को ख़ारिज भी किया है कि भारतीय दर्शन निराशावादी है। उनके जीवनकाल की अंतिम कृति 'भगवद्गीता एज़ ए फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ गॉड रियलाइज़ेशन' (1959) थी। मरणोपरांत उनकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृति 'वेदांत : द कल्मीनेशन ऑफ़ थॉट' (1970) शीर्षक से प्रकाशित हुई। इस ग्रंथ में ब्रह्मसूत्रकार बादरायण को उन्होंने समन्वयकारी दार्शनिक सिद्ध करते हुए प्रतिपादित किया है कि ‘स्वाराज्यम्-वैराज्यम्’ की वैदिक दृष्टि प्लेटो के 'दार्शनिक-राजा के सिद्धांत' की अपेक्षा उच्चतर आदर्श प्रस्तुत करती है। ‘स्वाराज्यम-वैराज्यम्’ की अवस्था को प्राप्त व्यक्ति ही वास्तव में देवाधिदेव अनन्याधिपति होता है। रानाडे के ही समकालीन अनुकूलचन्द्र मुखर्जी (1888-1968) थे जिन्हें 'इलाहाबाद का प्लेटो' कहा जाता है। 'द नेचर ऑफ़ सेल्फ़' (1938) एवं 'सेल्फ़, थॉट ऐंड रियलिटी' (1957) उनकी गम्भीर दार्शनिक कृतियाँ हैं जिनमें उन्होंने अद्वैतवेदांत में परम चैतन्य के स्वरूप को ब्रिटिश-नवहीगेलवादी अभिगम में उद्घाटित किया है।

औपनिवेशिक युग के भारतीय दार्शनिकों में सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1888-1975) की प्रतिष्ठा ‘पूर्व और पश्चिम के प्रवक्ता’ के रूप में थी। उन्होंने मानव जीवन के सभी पक्षों की व्याख्या नव-वेदांतवादी दृष्टि से की है। नव-वेदांत की तत्त्वमीमांसा को उन्होंने परमतत्त्ववादी वैश्विक दार्शनिक चिंतन के परिप्रेक्ष्य में पुनर्व्याख्यायित करते हुए प्रतिपादित किया कि यह दृश्यमान जगत परम सत का ही आभास है लेकिन फिर भी यह भ्रम मात्र नहीं जैसा कि अद्वैत वेदांत के परम्परागत चिंतक मानते रहे हैं। वस्तुतः शंकर के मायावाद का विरोध और जगत की यथातथ्यता का स्वीकार औपनिवेशिक युग के नव-वेदांती चिंतन की प्रस्थानमूलक विशेषता रही है। राधाकृष्णन का धार्मिक अनुभूति के स्वरूप की व्याख्या और धर्म के औचित्य प्रतिपादन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान रहा है। पूरब और पश्चिम के मध्य दार्शनिक संवाद की आवश्यकता को औचित्यपूर्ण ठहराते हुए उन्होंने तुलनात्मक दर्शन को सदैव बढ़ावा दिया, इसीलिए उन्होंने हवाई विश्वविद्यालय, अमेरिका में ईस्ट-वेस्ट सेंटर की स्थापना में पहलकारी भूमिका निभायी। 'ऐन आइडियलिस्टिक व्यू ऑफ़ लाइफ़' में उन्होंने सफलतापूर्वक प्रतिपादित किया कि बुद्धि सत्य को उसकी सम्पूर्णता में नहीं जान सकती। अंतःप्रज्ञा ही मानवीय चेतना का वह आयाम है जहाँ सत्य का अपनी सम्पूर्णता में साक्षात्कार होता है। यह अंतःप्रज्ञात्मक अनुभूति धर्म, नीति और सर्वसमावेशी अद्वैत सत्ता को प्रमाणित करती है। बुद्धि केवल विश्लेषण में ही विश्रांत हो जाती है लेकिन अंतःप्रज्ञा अपने संश्लेषणात्मक व्यापार में एक समग्र बोध के साथ आदर्श जीवन की सम्भावना प्रस्तुत करती है। राधाकृष्णन ने आदर्श जीवन की अवधारणा हिंदू जीवन-दृष्टि पर लागू कर दिखाई है। अपनी एक दूसरी कृति 'द हिंदू व्यू ऑफ़ लाइफ़' में उन्होंने पश्चिम के विपरीत इस भारतीय सत्य को उजागर किया कि भारत की सांस्कृतिक-धार्मिक चेतना बहुदेववादी होते हुए भी अद्वैतवाद की विरोधी नहीं है।

यद्यपि नव्य-वेदांत की तर्कसम्मत विश्लेषणात्मक तत्त्वमीमांसा की शुरुआत औपनिवेशिक युग में कृष्ण चंद्र भट्टाचार्य से ही होती है लेकिन उसी परम्परा में रासबिहारी दास (1897-1976) भी आते हैं जिन्होंने उसे अपने तरीके से आगे बढ़ाया। कांट के परमसत् विषयक विशिष्ट संशयवाद और व्हाइटहेड के चिंतन के प्रभाव में वेदांती तत्त्वमीमांसा की पुनर्रचना को उनके दार्शनिक चिंतन का सर्वाधिक मौलिक पक्ष माना जा सकता है। उनकी अन्यान्य कृतियों में 'द इसेंशियल ऑफ़ अद्वैतिज़म' (1931), 'द फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ व्हाइटहेड' (1937) एवं 'इंट्रोक्शन टू शंकर' (1968) उल्लेखनीय हैं। दास के दार्शनिक योगदान को समझने के लिए उनके प्रकीर्ण लेखनों का संग्रह 'रासबिहारी दास : फ़िलॉसॅफ़िकल एसेज़' बहुत ही उपयोगी है।

बीसवीं सदी के दार्शनिकों में जिद्दू कृष्णमूर्ति (1895-1986) का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। क्रियात्मक मानव स्वातंत्र्य के भाष्यकार कृष्णमूर्ति अकादमिक फ़िलॉसफ़र न हो कर आत्मचेता बुद्ध-पुरुष थे। उनके व्याख्यानों का 18 भागों में संग्रह अपने आप में एक वाङ्मय है। लेकिन 'कमेंटरीज़ ऑन लिविंग', 'फ्रीडम फ़्रॉम नोन', 'फ़र्स्ट ऐंड लास्ट लिबरेशन' और 'यू आर द वर्ल्ड' में उनके मौलिक विचार व्यवस्थित रूप में प्राप्त होते है। के.सी. भट्टाचार्य के शिष्य एवं गाँधी के अनुयायी धीरेंद्र मोहन दत्त (1898-1974) की रचनाएँ 'सिक्स वेज़ ऑफ़ नोइंग' (1932), 'द फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ महात्मा गाँधी' (1953), और 'चीफ़ करेंट्स ऑफ़ कंटेम्पेरेरी फ़िलॉसफ़ी' (1950) आज भी पठन-पाठन में सर्वाधिक उपयोग की जाने वाली पुस्तकें हैं। इसी बीते हुए काल से पहले के भारतीय दर्शन का लेखा-जोखा तब तक पूर्ण नहीं माना जा सकता जब तक कि सुरेंद्रनाथ दासगुप्ता (1885-1952) द्वारा पाँच खण्डों में प्रकाशित अ हिस्ट्री ऑफ़ इण्डियन फ़िलॉसफ़ी (1922) का उल्लेख न किया जाए। 1950 में फ़िलॉसॅफ़िकल कांग्रेस ने अपना रजत जयंती अधिवेशन इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़िलॉसफ़ी (आमलनेर) के तत्त्वावधान में आयोजित किया। इस अवसर पर ‘हैज़ श्री अरविंद रिक्रयूटेड मायावाद?’ पर हुई महत्त्वपूर्ण परिचर्चा में उस समय के चार मूर्धन्य अध्येताओं ने भाग लिया। ये थे इंद्रसेन, एन.ए. निकम, हरिदास चौधरी और जी.आर. मलकानी। भारतीय दर्शन के भावी विकास की दृष्टि से इस परिचर्चा को स्वातंत्र्यपूर्व भारतीय दर्शन का निचोड़ और न्यू टेस्टामेंट जैसा कहा जा सकता है।

इंद्रसेन (1903-1994) ने अपनी प्रस्तुति में दिखाया कि श्री अरविंद के लीलावाद में प्राचीन वेदांत का मायावाद अपने आप सत्तावाद में रूपांतरित हो जाता है और इस तरह श्री अरविंद के दर्शन में उसका अपने आप खण्डन हो जाता है। अरविंद ने अपने लाइफ़ डिवाइन (1949) में एक समग्र और मर्त अद्वैत को उपस्थापित किया है जिसमें जड़ (मैटर) और चेतना (स्पिरिट) का एकान्वयन घटित होता है। अनंत के तर्क को आधार में रखते हुए उन्होंने प्रतिपादित किया है कि अतिमानस की विकासावस्था में सगुण और निर्गुण की एकता स्वयं अनुभूति के धरातल से प्रमाणित होती है। मैसूर के एन.ए निकम (1903-1974) ने शंकर के विवर्तवाद और अरविंद के आविर्भाववाद में अंतर किया। उन्होंने कहा कि अरविंद धातु से निष्पन्न माया का अर्थ मापन परिच्छेदन और भ्रम अथवा धोखा के अर्थ में लेते हैं। श्री अरविंद के अनुसार वस्तुतः मायावाद में माया शब्द दूसरे अर्थ अर्थात् भ्रम या धोखा के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। निकम के अनुसार अरविंद के दिव्य जीवन दर्शन में और अद्वैत वेदांत के मायावाद में मूलाविद्या की भूमिका एक ही जैसी है। इस तरह वास्तव में श्री अरविंद में दो प्रकार के तर्क का ऐसा द्वैधीकरण है कि अन्ततः उनके दर्शन में मायावाद अनावृत ही रह जाता है।

हरिदास चौधरी (1913-1975) स्वीकार करते हैं कि परमतत्त्व का स्वरूप ही ऐसा है कि उसमें एक गहन आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि के साथ मायावाद के लिए अवकाश रहता ही है। अतः उसे अंतिम रूप से निरस्त नहीं किया जा सकता। श्री अरविंद का दर्शन वस्तुतः मायावाद के अतिक्रमण का अज्ञान-प्रहाण का दर्शन है। तर्कसम्मत अद्वैत वेदांत के प्रबल समर्थक जी. आर. मलकानी (1892-1977) ने बेबाक कहा कि श्री अरविंद मायावाद का खण्डन नहीं करते हैं। उनके अनुसार एकात्मक अनुभव में सगुण और निर्गुण का समन्वय नहीं किया जा सकता। स्वंय शंकर के लिए और मलकानी के लिए भी सत्ता एक और अद्वैत ही है। तथाकथित अनंत का तर्क अ-विरोध के नियम को निरस्त नहीं कर सकता। वस्तुतः मायावाद ही अद्वैतवाद के सर्वथा निर्द्वंद्व और सुसंगत स्वरूप को प्रस्तुत करता है जहाँ किसी भी प्रकार के तत्त्वमीमांसीय द्वैत के लिए कोई अवकाश ही नहीं है। मलकानी का यह बेबाक विरोध शंकर के अद्वैतवाद के प्रति उनकी गहरी निष्ठा का परिचायक है। 'फ़िलासफ़ी ऑफ़ सेल्फ़' (1939) और 'मेटाफ़िजिक्स ऑफ़ अद्वैत' (1961) जैसी कृतियों से उनकी यह निष्ठा प्रमाणित भी होती है।

इस प्रकार कुल मिला कर स्वातंत्र्यपूर्व भारत में दर्शनशास्त्र की दशा और दिशा नववेदांत कहे जाने वाले दार्शनिक चिंतन के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। भारतीय नवजागरण के अग्रदूत राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, बाल गंगाधर तिलक, श्री अरविन्द, रवींद्रनाथ ठाकुर और गाँधी इत्यादि के हाथों वेदांत ही नववेदांत के रूप में पुनर्सृजित होकर भारतीय नवजागरण और स्वाधीनता आंदोलन को वैचारिक आधार प्रदान करते हुए ‘भारतीय स्वराज’ का दर्शन बन कर प्रतिष्ठित हुआ। उस काल के अकादमिक दार्शनिकों ने जीवन और जगत के प्रति मायावादी दृष्टिकोण का नकार, जगत की यथातथ्यता की स्वीकृति तथा वेदांती विश्व-दृष्टि में ही प्रगतिशील एवं रचनात्मक जीवन के लिए अधिकाधिक अवकाश निर्मित करने को अपने नववेदांती दर्शन की प्रस्थानमूलक विशिष्टता बनायी। साथ ही साथ इस काल के नववेदांती चिंतन में उन सामाजिक-सांस्कृतिक विकारों के प्रति भी एक सशक्त आत्मचेतना दिखायी पड़ी जिन्हें परम्परागत वेदांत की अद्वैती विश्व-दृष्टि से कदापि संगत नहीं ठहराया जा सकता। इस तरह स्वातंत्र्यपूर्व नववेदांतवादी चिंतन में परम्परागत वेदांत की न केवल तत्त्वमीमांसीय पुनर्रचना हुई, बल्कि भारतीय संस्कृति और समाज में आक्षिप्त विकारों के परिमार्जन का एक वैचारिक आंदोलन भी खड़ा किया गया।

भारत में दर्शनशास्त्र : स्वातंत्र्योत्तर[संपादित करें]

भारतीय दर्शन का औपनिवेशिक युग किस तरह स्वातंत्र्योत्तर युग में रूपांतरित होता है और नये युग में वह क्या स्वरूप ग्रहण करता है, इसकी एक झलक हमें 'कंटेम्पारेरी फ़िलॉसफ़ी' नामक ग्रंथ के दूसरे परिवर्द्धित संस्करण में देखने को मिलती है। राधाकृष्णन और म्योरहेड ने 1952 में इसका सम्पादन किया था। यह ग्रंथ आज़ादी से पहले और बाद के भारतीय दर्शन की दशा-दिशा को प्रस्तुत करने वाला प्राथमिक और प्रामाणिक प्रयास था। इसके प्रथम संस्करण में (1936) गाँधी, रवींद्रनाथ, स्वामी अभेदानंद, कृष्ण चंद्र भट्टाचार्य, जी.सी. चटर्जी, आनंद कुमारस्वामी, भगवानदास, सुरेंद्र नाथ दासगुप्ता, हीरालाल हलधर, एम. हिरियन्ना, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, आर.डी. रानाडे, बी. सुब्रह्मण्यम अय्यर और आर. वाडिया जैसे दार्शनिकों के आलेख सम्मिलित किये गये थे। इसके दूसरे संस्करण में हरिदास भट्टाचार्य, एन.जी. दामले, रासबिहारी दास, डी.एम दत्ता, हुमायूँ कबीर, एस.के मैत्रा, जी.आर. मलकानी, ए.सी. मुखर्जी, टी.आर.वी मूर्ति, पीटी. राजू और एम.एम शरीफ़ के लेखों को प्रातिनिधिक दार्शनिक लेखन के रूप में शामिल किया गया।

ग्रंथ के दोनों भागों में जिन दार्शनिकों के आलेखों को तत्कालीन दार्शनिक अध्यवसाय के नमूने के तौर पर सम्मिलित किया गया, उसे दो वर्गों में बाँटा जा सकता है। पहले वर्ग के दार्शनिकों ने वैदिक परम्परा के दर्शनों की समझ को प्रस्तुत किया है। दूसरे वर्ग के आलेखों की अंतर्वस्तु तो परम्परागत भारतीय दर्शनों से ही ली गयी है, लेकिन उनकी व्याख्या, विश्लेषण और तुलना पाश्चात्य दर्शन और उसकी आधुनिक समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में की गयी है। इस प्रसंग में यहाँ अखिल भारतीय दर्शन परिषद् की स्थापना का उल्लेख भी आवश्यक है। यह परिषद् वास्तव में स्वातंत्र्योत्तर भारतीय दर्शन का एक नया और महत्त्वपूर्ण अध्याय है। इसकी स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका यशदेव शल्य की रही। मुखपत्र के रूप में 'दार्शनिक' त्रैमासिक पत्रिका का परिषद् की स्थापना के साथ ही 1954 से प्रकाशन प्रारम्भ किया गया और परिषद् का प्रथम वार्षिक अधिवेशन 1956 में इलाहाबाद में हुआ। हिंदी माध्यम से स्वातंत्र्योत्तर भारत में दार्शनिक अध्यवसाय को प्रतिनिधित्व देते हुए परिषद् ने दो दर्जन से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन किया है जिसमें के. सच्चिदानंद मूर्ति द्वारा 'समकालीन भारतीय दर्शन' (1962) विशेष रूप से उल्लेखनीय है। राधाकृष्णन और म्योरहेड के ही तर्ज़ पर इस पुस्तक में सम्पूर्णानंद, एन.एस. द्रविड़, बी.जी. तिवारी, एस.एल. पाण्डेय, राजेंद्र प्रसाद, आर.के. त्रिपाठी, एस.एस. बारलिंगे, जे.आर.एल.एस. नारायण मूर्ति, चन्द्रशेखर राव और के.एस. मूर्ति के आलेख सम्मिलित किये गये थे। परिषद् के तत्त्वावधान में स्वातंत्र्योत्तर दार्शनिक प्रकरण के अंतर्गत अम्बिकादत्त शर्मा द्वारा सम्पादित 'समेकित दार्शनिक विमर्श' (2005), 'समेकित अद्वैत विमर्श' (2005), 'भारतीय दर्शन के 50 वर्ष' (2006) और 'समेकित पाश्चात्य दर्शन समीक्षा' (2012) भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

भारतीय दर्शन के स्वातंत्र्योत्तर प्रकरण में टी.आर.वी. मूर्ति (1902-1986) के अध्यवसाय को परम्परा और आधुनिकता का सेतुबंध कहा जा सकता है। उनकी विशेष अभिरुचि माध्यमिक दर्शन, कांट और भाषा दर्शन में रही, लेकिन अपने दार्शनिक अध्यवसाय को उन्होंने माध्यमिक दर्शन की पुनर्रचना में चरितार्थ किया। 1955 में प्रकाशित उनकी कृति 'द सेंट्रल फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ बुद्धिज़म' के माध्यम से दार्शनिक विचारों के विश्व-इतिहास में नागार्जुन को प्रतिष्ठा मिली है। मूर्ति के लिए माध्यमिक दर्शन का आंतरिक मूल्य बौद्ध दर्शन के एक सम्प्रदाय के रूप में नहीं बल्कि ‘क्रिटीक ऑफ़ ऑल फ़िलॉसफ़ीज’ के रूप में है। वैसे तो उन्होंने कांट के दर्शन को लक्ष्य करके कुछ नहीं लिखा लेकिन 'अज्ञान' नामक पुस्तक (1933), जो जी.आर. मलकानी और रासबिहारी दास के साथ मिल कर लिखी गयी थी, में अद्वैत वेदांत सम्मत अविद्या की अवधारणा को उद्घाटित करते समय उन पर कांट के प्रभाव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसी तरह अद्वैतवादी दर्शनों के वैकल्पिक प्रारूपों की गवेषणा भी मूर्ति के दार्शनिक अध्यवसाय का महत्त्वपूर्ण बिंदु रहा है। भाषा दर्शन के क्षेत्र में उनका एक आलेख ‘द फिलॉसफ़ी ऑफ़ लेंग्वेज़ इन कांटेक्स्ट’ (1963) उन्हें भाषा-दार्शनिक के रूप में भी प्रतिष्ठित करता है।

दर्शन के क्षेत्र में हुमायूँ कबीर (1906-1969) के प्रयासों की अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने अपने चिंतन से परम्परा और नवोन्मेषी प्रगतिशीलता के बीच सामंजस्य की स्थापना करने वाला अवदान दिया। इसी तरह पी.टी. राजू पारम्परिक भारतीय दार्शनिक चिंतन की आधुनिकोन्मुखी व्याख्या करने वालों में अग्रणी थे। इस प्रकार की व्याख्या का मानक रूप 'आइडियलिस्टिक थॉट ऑफ़ इण्डिया' (1953), 'थॉट ऐंड रियलिटी' (1957) और 'आइडियलिज़म ऐंड मॉडर्न चैलेंजेज़' (1961) नामक उनकी कृतियों में देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त पी.टी. राजू को तुलनात्मक दर्शन की स्वतंत्र विद्या के प्रणेता के रूप में कुछ इने-गिने व्यक्तियों में रखा जा सकता है। उनकी 'इंट्रोडक्शन टू कॅम्परेटिव फ़िलॉसफ़ी' (1962) इस विधा की प्राथमिक संस्थापक कृतियों में एक है।

कालिदास भट्टाचार्य (1911-1964) विलक्षण दार्शनिक प्रतिभा वाले अध्येता थे। इनकी दार्शनिक चेतना किसी वाद या सम्प्रदाय से प्रतिबद्ध न होकर इस अर्थ में स्वतंत्र थी कि उन्होंने मनुष्य की चेतना में निहित तत्त्वमीमांसीय प्रवृत्तियों की वैकल्पिकता का दार्शनिकीकरण करते हुए एक तरह से उसकी ही तत्त्वमीमांसा प्रस्तुत की है। इसका बीज उन्हें अपने पिता कृष्ण चंद्र भट्टाचार्य के 'एब्सोल्यूट ऐंड इट्स आल्टरनेटिव स्टैंडपाइंट' में प्राप्त हुआ था लेकिन उसे इन्होंने 'आल्टरनेटिव स्टैंडपाइंट इन फ़िलॉसफ़ी' (1953) के रूप में विकसित किया है। कालिदास भट्टाचार्य ने मनुष्य की स्वतंत्रता और उसकी धार्मिक वैज्ञानिक चेतना के संबंध में भी मौलिक विचार प्रस्तुत किये हैं। भट्टाचार्य की बहुविध रचनाओं में 'प्रीसपोज़िशन ऑफ़ साइंस ऐंड अदर एसेज़' (1974), 'पॉसिबिलिटी ऑफ़ डिफ़रेंट टाइप्स ऑफ़ रिलीजन' (1975), 'द कंसेप्ट ऑफ़ मैन' (1982) तथा बांग्ला में 'भारतीय सस्कृति ओ अनेकांत वेदांत' (1982) प्रमुखतम हैं।

टी.एम.पी. महादेवन (1911-1983) वेदांत दर्शन में पांरगत थे। उन्होंने मद्रास स्कूल ऑफ़ वेदांत स्टडीज़ की स्थापना की। 'गौडपाद : ए स्टडी इन अर्ली अद्वैत' (1954) के माध्यम से उन्होंने विधुशेखर भट्टाचार्य सरीखे व्यक्तियों द्वारा फैलायी गयी इस भ्रांति का भंजन किया है कि शंकराचार्य के दादागुरु गौडपाद द्वारा प्रयुक्त पदावलियाँ बौद्ध परम्परा की एकल सम्पत्ति नहीं बल्कि परम्परा की सम्पदा हैं जिस पर किसी का एकाधिकार नहीं। 'द फ़िलासफ़ी ऑफ़ अद्वैत' (1957), 'आउटलाइंस ऑफ़ हिंदुइज़म' (1956) और 'टाइम ऐंड टाइमलेस' इत्यादि उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। सम्प्रति इस परम्परा की निरंतरता को आर. सुब्रह्मण्यम बनाये हुए हैं। मण्डन मिश्र की ब्रह्मसिद्धि पर आधारित उनकी कृति ‘अद्वैत वेदांत’ और ‘नैष्कर्म्यसिद्धि’ अंग्रेज़ी माध्यम से किये गये प्रसादक अध्ययन हैं।

स्वातंत्र्योत्तर युग में नंद किशोर देवराज (1917-1999) सर्जनात्मक मानववाद के प्रतिष्ठापक माने जाते हैं। भुवनेश्वर के गणेश्वर मिश्र (1917-1985) अपने समय के जाने-माने अध्येता थे। ए.जे. एयर के शिष्य के रूप में इन्होंने 'सोर्स ऑफ़ मोनोइज़म इन शंकर ऐंड ब्रैडले' विषय पर अनुसंधान किया था। पाश्चात्य विश्लेषणात्मक दर्शन की पद्धति का भरपूर उपयोग करने वाली उनकी रचना 'स्टडीज़ इन अद्वैत वेदांत' (1976) एक प्रसिद्ध कृति है।

आर. के. त्रिपाठी (1918-1981) का झुकाव वेदांत दर्शन और उसमें भी शांकर वेदांत की ओर सर्वाधिक था। दर्शन की आधुनिक समस्याओं पर अद्वैत वेदांत का पक्ष मज़बूती से रखने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। उनके लिए अद्वैत वेदांत की विचार-प्रक्रिया दर्शन की अवधारणा का पर्याय जैसी थी। 'प्रॉब्लम्स ऑफ़ फ़िलॉसफ़ी ऐंड रिलीजन' (1971) नामक ग्रंथ में यह सब कुछ प्रांजल सम्प्रत्ययात्मक स्पष्टता के साथ देखा जा सकता है। आर.के. त्रिपाठी का पहला महत्त्वपूर्ण कार्य 'स्पिनोज़ा इन द लाइट ऑफ़ वेदांत' (1958) काशी हिंदू विश्वविद्यालय से प्रकाशित हुआ था।

सुरेंद्र सदाशिव बारलिंगे (1919-1997) ने पुणे विश्वविद्यालय से सम्बद्ध रहते हुए अंग्रेज़ी, हिंदी और मराठी तीनों ही भाषाओं में आधुनिकोन्मुख दार्शनिक लेखन द्वारा भारतीय दर्शन को बढ़ावा दिया है। 'अ मॉडर्न इंट्रोडक्शन टू लॉजिक' (1955) नामक पुस्तक में उन्होंने भारतीय तर्कविद्या को आकारिक तर्कशास्त्र की पदावली और तौर-तरीके से प्रस्तुत किया है। इसी तरह भारतीय दर्शन को आधुनिक पदावली में प्रस्तुत करने वाले उनका ग्रंथ 'अ मॉडर्न इंट्रोडक्शन टू फ़िलॉसफ़ी' (1998) है। बारलिंगे उन शुरुआती विद्वानों में रहे हैं जिन्हें भारतीय सौंदर्यशास्त्र की पहली रूपरेखा प्रस्तुत करने का श्रेय जाता है।

चन्द्रधर शर्मा (1920-2004) भारतीय परम्परा के अद्वैतवादी दर्शनों के सिद्धस्थ व्याख्याकार थे। उनकी अंग्रेज़ी रचना 'अ क्रिटिकल सर्वे ऑफ़ फ़िलॉसफ़ी' (1952) और बाद में उसी का परिवर्तित हिंदी संस्करण (1990) आज भी भारत के विद्यार्थियों के द्वारा सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला ग्रंथ है। 'डायलेक्टिक ऑफ़ बुद्धिज़म ऐंड वेदांत' तथा 'द अद्वैतिक ट्रेडिशन ऑफ़ फ़िलॉसफ़ी' (1996) नामक ग्रंथ उनके अद्वैतवादी अध्यवसाय के प्रांजल पक्ष को प्रस्तुत करते हैं।

नागपुर विश्वविद्यालय से सम्बद्ध नारायण शास्त्री द्रविड़ (1923-2010) का भारतीय तर्कशास्त्र और प्रमाणशास्त्र की समस्याओं की विशिष्टता को पाश्चात्य ज्ञानमीमांसा और तर्कशास्त्र के समक्ष उपस्थिापित करने वालों में कोई सानी नहीं था। उन्होंने भारतीय प्रमाणशास्त्र के प्रगत स्वरूप को मराठी भाषा में प्रस्तुत किया है। उन्होंने न्यायकुसुमांजली और आत्मतत्त्वविवेक का अंग्रेज़ी में मानक अनुवाद भी किया है। 'भारतीय दर्शन की मूलगामी समस्याएँ' (2009) शीर्षक से अखिल भारतीय दर्शन परिषद् ने उनके प्रकीर्ण हिंदी लेखन को प्रकाशित किया है।

गोविन्द चन्द्र पाण्डे (1923-2011) की सम्पूर्ण विचार-साधना समवेत रूप से संस्कृति-दर्शन के रूप में फलित हुई है। पाण्डे के संस्कृति-दर्शन पर हीगेल के इतिहास-दर्शन, बौद्ध दर्शन के विज्ञानवाद और श्री अरविंद के मानवचक्र-सिद्धांत का स्पष्ट प्रभाव दिखता है। उनकी बहुविध रचनाओं में मुख्य रूप से 'फ़ाउंडेशन ऑफ़ कल्चर ऐंड सिविलाइज़ेशन' , 'द मीनिंग ऐंड प्रोसेस ऑफ़ कल्चर', 'कांशसनेस वैल्यू कल्चर' , 'मूल्य-मीमांसा', 'भारतीय परम्परा के मूल स्वर' तथा 'शंकराचार्य : विचार और संदर्भ' जैसी कृतियाँ उन्हें बीसवीं सदीं के विश्वस्तरीय संस्कृति-दार्शनिक के रूप में प्रतिष्ठापित करती है। इसके अतिरिक्त 'भक्ति दर्शन विमर्श', 'सौंदर्य दर्शन विमर्श' भी उनकी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं।

के. सच्चिदानंद मूर्ति (1924-2011) को दार्शनिक समुदाय में द्वितीय राधाकृष्णन माना जाता था। मूर्ति ने वेदांत की मूल भावना ‘सर्व खलु इदं ब्रह्म’ की धार्मिक चेतना का दार्शनिकीकरण लोक-जीवन के यथार्थ धरातल पर किया है। 'रेवेलेशन ऐंड रीज़न इन अद्वैत वेदांत' (1959) और 'द रेल्म ऑफ़ बिटवीन' (1993) इत्यादि उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। उन्होंने शांति के दर्शन पर महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। 1960 में प्रकाशित उनकी कृति 'स्टडीज़ इन द प्रॉब्लम्स ऑफ़ पीस' इसका प्रमाण है।

दया कृष्ण (1924-2007) प्रारम्भ में पाश्चात्य दर्शन के बड़े हिमायती थे, लेकिन बाद में उनकी रुचि भारतीय दर्शन की ओर हुई। उन्होंने भारतीय दार्शनिक परम्पराओं को ‘प्रॉपर वर्क ऑफ़ रीज़न’ की दृष्टि से देख कर उसकी अविचारित रूप से स्थापित मान्यताओं के विरुद्ध आधारभूत प्रश्न उठाये जो नये ढंग से विचार करने की गुंजाइशें खोलते हैं। 1955 में प्रकाशित उनकी कृति 'द नेचर ऑफ़ फिलॉसफ़ी' और 'द आर्ट ऑफ़ कॉन्सेप्चुअल' से उनके दार्शनिक गोत्र का पता चलता है। 'प्रोलेगोमेना टू एनी क्रयूचर हिस्टीरियोग्राफ़ी ऑफ़ कल्चर ऐंड सिविलाइज़ेशन' में दयाकृष्ण एक सभ्यता-विज्ञानी के रूप में सामने आते हैं। दयाकृष्ण की ऐसी कई कृतियाँ हैं जिनमें भारतीय दर्शन को बहुलवादी बौद्धिक परम्परा के रूप में पुनःसंगठित और पुनर्रचित करने की प्रश्नाकुलता दिखाई पड़ती है।

भाषा और तार्किक विश्लेषण को दर्शन का धर्म समझने वाले राजेंद्र प्रसाद (1926-) का चरमोत्कर्ष उनके अतिमहत्त्वपूर्ण आलेख ‘अनऐेंडिंग डायलॉग विद गॉड’ और ‘डायलॉग बिटवीन फ़र्स्ट परसन ऐंड थर्ड परसन’ में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उनके दार्शनिक अध्यवसाय को प्रस्तुत करने वाली महत्त्वपूर्ण कृति कर्म, 'काज़ेशन ऐंड रिट्रीब्यूटिव मॉरलिटी' (2004) है।

चिद्द्वैतवाद के संस्थापक यशदेव शल्य (1928- ) की दार्शनिक अनुसंधान यात्रा का आरम्भ आधुनिक पाश्चात्य अनुभववादी-तार्किक प्रत्यक्षवादी परम्परा के साथ हुआ, लेकिन उन्हें अनुभववादियों की अवधारणा में कोई युक्तियुक्तता दिखायी नहीं दी। वे इसे छोड़ कर अवधारणात्मक सापेक्षतावाद की ओर आये लेकिन यह दृष्टि भी उनके लिए अधिक समय तक संतोषप्रद नहीं बनी रह सकी। इस तरह यशदेव शल्य अपने ही अवधारणा-सापेक्षतावाद से उत्तीर्ण होकर दूसरे महत्त्वपूर्ण सोपान पर पहुँचे जिसे चैत-सापेक्षतावाद से निरपेक्ष चैतन्य में उत्क्रमण के रूप में समझा जा सकता है। यशदेव शल्य के दार्शनिक चिंतन का तृतीय और अंतिम प्रस्थान है ‘चिद्द्वैतवाद’ जहाँ वे विषय जगत् की चिद्गत संरचनाओं की प्रतिष्ठा चेतना की आत्मगत प्राकृतिकता से आत्मोन्मुख निर्वृत्ति में देखते हैं। भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् द्वारा प्रकाशित 'यशदेव शल्य का दर्शन' नामक पुस्तक में गोविंद चंद्र पाण्डे, मुकुंद लाठ इत्यादि के आलेखों से यशदेव शल्य के दार्शनिक चिंतन में निहित मौलिकता और व्यापकता की झलक मिलती है।

मुकुंद लाठ (1937- ) स्वयं भी एक स्वतंत्र विचारक हैं। उन्होंने धर्म, कर्म और नीति विषयक चिंतन को अपने अध्यवसाय का विषय बना कर भारतीय औचित्य मीमांसा की मौलिक प्रतिष्ठा की है। इस सम्बन्ध में उनकी पुस्तकें धर्म संकट और कर्म चेतना के आयाम द्रष्टव्य हैं।

इलाहाबाद में संगम लाल पाण्डेय (1929-2002) ने अद्वैत वेदांत की दृष्टि से पाश्चात्य ज्ञानमीमांसा की समीक्षा कर ‘डेथ एपिस्टेमोलॅजी’ की पुनर्रचना ‘फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ प्रयाग स्कूल’ के रूप में की है। रामचन्द्र गांधी (1937-2007) की कृतियों में 'आई एम दाऊ' , जो रमण महर्षि पर केंद्रित है, महत्त्वपूर्ण है। स्वराज और 'सीताज़ किचेन' जैसे कई छोटे-बड़े ग्रंथ उनकी दार्शनिक परिकल्पनाओं को मूर्त रूप प्रदान करते हैं। पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ के दर्शन-विभाग से संबंधित धर्मेंद्र गोयल (1934) का आधुनिकोन्मुख चिंतन भी यहाँ उल्लेखनीय है। इनके दार्शनिक अध्यवसाय के प्रमुख उत्पाद ‘फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ हिस्ट्री’ (1967), ‘फिलॉसफ़ी ऑफ़ सोशल चेंज’ (1989) और ‘भाषा दर्शन’ (1991) हैं। अखिल भारतीय दर्शन परिषद् द्वारा प्रकाशित (2012) इनकी कृति ‘स्वतंत्रता मूल्य और परम्परा’ स्वातंत्र्योत्तर भारत की समसामयिक चिंताओं पर महत्त्वपूर्ण दार्शनिक विमर्श प्रस्तुत करती हैं। इसी काल में जी.सी. नायक (1935-) शंकर, नागार्जुन और कालिदास की कृतियों में अंतरविष्ट दार्शनिक दृष्टियों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने वाले प्रतिबद्ध अध्येता रहे हैं। 'फ़िलॉसॅफ़िकल रिक्रलेक्शंस' (1987), 'फ़िलॉसॅफ़िकल इंटरप्राइज़ ऐंड द साइंटिफ़िक स्पिरिट' (1994) एवं माध्यमिक शून्यता (2001) उनकी महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं।

भारत में क्षेत्रीय भाषाओं के माध्यम से दर्शनशास्त्र के पठन-पाठन की प्राचीन परम्परा रही है। इस दृष्टि से वी.एम. वेडेकर (पुणे) की 'फिलॉसफ़ी इन फ़िक्रटीन मॉडर्न इण्डियन लैंग्वेजेज़' (1979) नामक पुस्तक विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसमें असमिया, बांग्ला, अंग्रेज़ी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मराठी, उड़िया, पंजाबी, सिंधी, तमिल और तेलगु इत्यादि भाषाओं में हुए दार्शनिक लेखन का लेखा-जोखा मिलता है। स्वातंत्र्योत्तर काल में भारतीय दर्शन पर विश्वकोशीय लेखन को लेकर चार महत्त्वपूर्ण प्रयास सामने आए हैं। इसमें पहला प्रयास अमेरिका के कार्ल एच. पॉट्टर का है। उन्होंने 23 भागों में 'इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ इण्डियन फिलॉसफ़ी' प्रकाशित करने की महत्त्वाकांक्षी योजना 1968 में बनायी थी। इस विश्वकोश के कई एक खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं और शेष प्रकाशनाधीन हैं। इस क्षेत्र में दूसरा प्रयास इण्डिया हैरिटेज फ़ाउंडेशन द्वारा 1980 के दशक में किया गया और पूर्वी-पश्चिमी विद्वानों के सहयोग से ग्यारह भागों में 'इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ हिन्दूइज़्म' तैयार किया गया है। कैलिफ़ोर्निया के के.एल. शेषगिरि राव इसके प्रधान सम्पादक, दिल्ली के कपिल कपूर इसके सम्पादक हैं। इन दोनों प्रयासों से भिन्न अपने ढंग का एक अनोखा 'भारतीय दर्शन बृहत्कोश' का निर्माण 1980 के दशक में सागर विश्वविद्यालय द्वारा कराया गया था। अर्जुन मिश्र इसके निदेशक और शास्त्रपुरुष बच्चूलाल अवस्थी इसके एकमात्र शोध-कर्ता और लेखक थे। विश्वकोशीय लेखन के क्षेत्र में सबसे बड़ा और सर्वाधिक प्रामाणिक प्रयास देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय (1931-) के नेतृत्व में 'प्रोजेक्ट ऑफ़ हिस्ट्री ऑफ़ साइंस, फ़िलॉसफ़ी ऐंड कल्चर' के तहत किया गया है। समस्त भारतीय बौद्धिक सम्पदाओं को एक व्यापक अवधारणात्मक योजना में समाहित करने वाली इस महान परियोजना के 115 खण्डों का प्रकाशन पूर्ण होने को है।

स्वातंत्र्योत्तर भारत में विश्वविद्यालयीय व्यवस्था के माध्यम से जो अकादमिक वातावरण निर्मित हुआ उसके माध्यम से विभिन्न दार्शनिक सम्प्रदायों का विकास भी प्रतिबद्ध अध्येताओं के द्वारा सम्भव हुआ है। आज़ादी के बाद श्रमण परम्परा के बौद्ध और जैन दर्शन का विकास सरकारी तौर पर प्रोत्साहित किया गया। इस दौरान सक्रिय बौद्ध अध्येताओं में भदंत आनंद कौसल्यायन, राहुल सांकृत्यायन, शांति भिक्षु शास्त्री, नरेंद्र देव, सत्कड़ी मुखर्जी, गोविंद चंद्र पाण्डे, आर.सी. पाण्डेय, के. वेंकट रमन, हर्ष नारायण, ए.के. चटर्जी और रामशंकर त्रिपाठी इत्यादि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। बौद्ध दर्शन के उदीयमान अध्येताओं में एच.एस. प्रसाद, प्रदीप गोखले, मंगला चिन्चोरे और अम्बिकादत्त शर्मा संदर्भित किये जाने की अर्हता रखते हैं।

जैन दर्शन के क्षेत्र में नाथमल टाटिया, दलसुख भाई मलवानियाँ, नगिन जे. शाह और सागरमल जैन का योगदान उल्लेखनीय है। भारत की सर्वाधिक प्राचीन दर्शन परम्परा ‘सांख्य-योग’ को हरिहरानन्द आरण्य एवं रामशंकर भट्टाचार्य ने अपने अध्यवसाय से आधुनिक काल में जीवंत बनाये रखा। इसी तरह आगमिक धारा के शैव एवं काश्मीर शैव दर्शनों के आधुनिकोन्मुखी विकास को महाराज हरीसिंह (कश्मीर दरबार) ने बढ़ावा दिया। के.सी. पाण्डेय, आर.के. काव, बी.एन. पण्डित, नवजीवन रस्तोगी, कमलेश दत्त त्रिपाठी, ब्रज वल्लभ द्विवेदी और कमलाकर मिश्र ने इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। काश्मीर शैव दर्शन के ही प्रतिउत्पाद के रूप में स्वातंत्र्योत्तर काल में भारतीय सौंदर्यशास्त्र का बहुआयामी विकास हुआ है। स्वतंत्रता से पूर्व एवं स्वातंत्र्योत्तर काल में न्यायवैशेषिक दर्शन का विकास भी बहुविध रूप से होता रहा है। बंगाल मूल के न्यायदर्शन के अध्येताओं में अनन्त लाल ठाकुर, बी.के. मतिलाल, जे.एन. मोहंती, शिवजीवन भट्टाचार्य एवं पी.के. मुखोपाध्याय इत्यादि प्रमुख रहे हैं। मिथिला मूल के अध्येताओं में बालकृष्ण मिश्र, महाप्रभु लाल गोस्वामी, शशिनाथ झा, बद्रीनाथ झा, दुर्गाधर झा, आनंद झा एवं किशोर नाथ झा परिगणित किये जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त धर्मेंद्र नाथ शास्त्री, बलिराम शुक्ल, विश्वम्भर पाही, बी.एन. झा, रघुनाथ घोष एवं सच्चिदानंद मिश्र तथा अरुण मिश्र भी न्यायदर्शन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप करने वाले सक्रिय विद्वान रहे हैं। मीमांसा दर्शन का विकास स्वातंत्र्योत्तर भारत में उस तरीके से नहीं हुआ जबकि यह एक प्राचीन और समृद्ध परम्परा रही। गंगानाथ झा एवं युधिष्ठिर मीमांसक के बाद केवल गोवर्धन भट्ट ने इस दर्शन के प्रमाणशास्त्रीय पक्ष पर महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। बीसवीं शताब्दी में के.एल. सरकार और काशी प्रसाद सक्सेना ने ‘मीमांसा ज्यूरिस्पुडेंस’ के क्षेत्र में अपने लेखन के द्वारा एक नयी दिशा ली है। वेदांत दर्शन के अवांतर सम्प्रदायों में शुद्धाद्वैत के आधुनिकोन्मुखी विकास में एम.पी. तेलीवाला, केदार नाथ मिश्र एवं श्याम मनोहर गोस्वामी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। दक्षिण भारत में रामानुज वेदांत एवं मध्व वेदांत के अध्ययन-अध्यापन की अभी भी नैष्ठिक परम्परा जीवंत है। मध्व वेदांत के अध्येताओं में सत्यप्रमोद तीर्थ, प्रह्लादाचार्य, के.टी. पाण्डुरंगी प्रमुख रहे हैं। रामानुज वेदांत के अध्येताओं में रामानुज ताताचार्य, एस.एम. श्रीनिवासाचारी और अधिष्ठाता विद्वानों में वीर राघवाचार्य एवं परकाल मठाधीश अत्यंत विशिष्ट रहे हैं। सम्प्रति अद्वैत वेदांत के स्वाध्यायी विद्वान् देश भर में अनेक मिल जाएंगे लेकिन पारम्परिक पांडित्य और साधक प्रकृति के विद्वानों में स्वामी योगिंद्रा नंद, पारस नाथ द्विवेदी, सुधांशु शेखर शास्त्री एवं मणि द्राविड़ का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। अद्वैत वेदांत के आधुनिक विद्वानों में ए. राममूर्ति, श्रीनिवास राव, ए.के. नारायण, गोदावरीश मिश्र और आनंद मिश्र संदर्भित किये जाने योग्य हैं। इक्कीसवीं शताब्दी में स्वामी नारायण वेदांत ने भी अपने को एक स्वतंत्र प्रस्थान के रूप में स्थापित करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास ‘ब्रह्मसूत्रस्वामीनारायणभाष्यम्’ और ‘उपनिषद् स्वामीनारायणभाष्यम्’ लिखकर किया है। साधु भद्रेस दास और साधु श्रुति प्रकाश दास इस परम्परा के मान्य अध्येता हैं। स्वातंत्र्योत्तर भारत में भारतीय भाषा दर्शन का विकास भी दर्शन की एक स्वतंत्र विधा के रूप में हुआ है। इस क्षेत्र में के.ए.एस. अय्यर, गौरीनाथ शास्त्री, के.के. राजा, आर.सी. पाण्डेय, बी.के. मतिलाल, के.जे. शाह, पी.के. मुखोपाध्याय एवं डी.एन. तिवारी ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।

पाश्चात्य दर्शन का स्वातंत्र्योत्तर क्षेत्र विशेष रूप से एंग्लो-सेक्सन फ़िलॉसफ़ी, फ़ेनोमेनोलॅजी एवं अस्तित्ववाद तथा उत्तर-आधुनिकतावाद से संबंधित रहा है। इस क्षेत्र में जे.एल. मेहता, जे.एन. मोहंती, रिचर्ड सोराबजी और अकील बिलग्रामी ऐसे नाम रहे हैं जिन्हें पश्चिम में मान्यता मिली। इसके अतिरिक्त पश्चिमी दर्शन में दख़ल रखने वाले भारतीय विद्वानों में नित्यानंद मिश्र, बी.के. लाल, आर.पी. पाण्डेय, डी.एन. द्विवेदी, सभाजीत मिश्र, आर.सी. प्रधान, आर.पी. सिंह, अशोक वोहरा, बी.के. अग्रवाल, पी.आर. भट्ट, अमिताभ दासगुप्ता, प्रसेनजित विश्वास एवं संजय कुमार शुक्ल उल्लिखित किये जा सकते हैं।

स्वातंत्र्योत्तर भारत में दर्शन की दशा-दिशा और उसकी उपलब्धियों का क्षैतिज विस्तार चाहे जैसा भी रहा हो, हमें इस आलोचनात्मक टिप्पणी का सामना करना ही पड़ता है कि स्वाधीन भारत में हमने कुछ ऐसा उत्पादित नहीं किया जिसे दार्शनिक दृष्टि से मौलिक और विश्वस्तरीय प्रतिष्ठा के योग्य कहा जा सके। इसके बावजूद स्वातंत्र्योत्तरकालीन भारत के दार्शनिक अध्यवसाय को भारतीय दर्शन के वैश्वीय परिप्रेक्ष्य में सकारात्मक-नकारात्मक प्रभावों के साथ उसका युगानुरूप पुनराविष्कार ही कहना उचित है। किसी भी विचार-परम्परा की पुनर्व्याख्या और उसके पुनराविष्कार की अपनी ही गति होती है। इस प्रक्रिया में मूल विचार-परम्परा का उन्नयन भी होता है तो कहीं-कहीं विजातीय प्रभावों के कारण उसके अवमूल्यन की सम्भावना भी बनी रहती है। स्वातंत्र्योत्तर भारतीय दर्शन भी इस तथ्यात्मकता का अपवाद नहीं है। हमारी औपनिवेशिक मनोवृत्ति और ऊपर से अंग्रेज़ी भाषा के प्रभुत्व ने हमारे वैचारिक स्वराज की धार को अवश्य ही कम किया है लेकिन भारत की ज्ञान सम्पदा की प्राणदा शक्ति अभी भी समाप्त नहीं हुई है। स्वातंत्र्योत्तर भारत में इस ज्ञान-सम्पदा के संवेदनशील ध्रुवों का समुदाय यद्यपि अल्पसंख्यक है लेकिन उन्हीं के अध्यवसाय से इस देश का ज्ञानात्मक अतीत जीवंत और पुरोगामी बना हुआ है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  • सर्वपल्ली राधाकृष्णन और जे.एच. म्योरहेड (सम्पा.) (1936), कंटेम्परेरी इण्डियन फिलॉसफ़ी, जॉर्ज एलेन ऐंड अनविन, लंदन.
  • नलिनी भूषण औरं जे.आर. गारफ़ील्ड (सम्पा.) (2011), इण्डियन फिलॉसफ़ी इन इंग्लिश : फ़्रॉम रिनेसाँ टू इंडिपेंडेंस, ऑक्सफ़र्ड युनीवर्सिटी प्रेस, नयी दिल्ली.
  • एस.पी. दुबे (सम्पा.) (1994-1998) (चार भाग), फ़ैसेट्स ऑफ़ रीसेंट इण्डियन फिलॉसफ़ी, भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद््, नयी दिल्ली.
  • के.एस. मूर्त्ति (सम्पा.) (1962), समकालीन भारतीय दर्शन, अखिल भारतीय दर्शन परिषद् प्रकाशन, नयी दिल्ली.
  • अम्बिकादत्त शर्मा (सम्पा.) (2005), स्वातंत्र्योत्तर दार्शनिक प्रकरण-1-समेकित दार्शनिक विमर्श, विश्वविद्यालय प्रकाशन, सागर.
  • अम्बिकादत्त शर्मा (सम्पा.) (2005), स्वातंत्र्योत्तर दार्शनिक प्रकरण-2-समेकित अद्वैत विमर्श, विश्वविद्यालय प्रकाशन, सागर.
  • अम्बिकादत्त शर्मा (सम्पा.) (2006), स्वातंत्र्योत्तर दार्शनिक प्रकरण-3-भारतीय दर्शन के 50 वर्ष, विश्वविद्यालय प्रकाशन, सागर.
  • अम्बिकादत्त शर्मा और श्रीप्रकाश दुबे (2012), ‘भारतीय दर्शन और उसका स्वातंत्र्योत्तर युग’, चिंतन-सृजन, वर्ष-10, अंक-2.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]