भारत के वैदेशिक सम्बन्ध

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किसी भी देश की विदेश नीति इतिहास से गहरा सम्बन्ध रखती है। भारत की विदेश नीति भी इतिहास और स्वतन्त्रता आन्दोलन से सम्बन्ध रखती है। ऐतिहासिक विरासत के रूप में भारत की विदेश नीति आज उन अनेक तथ्यों को समेटे हुए है जो कभी भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन से उपजे थे। शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व व विश्वशान्ति का विचार हजारों वर्ष पुराने उस चिन्तन का परिणाम है जिसे महात्मा बुद्धमहात्मा गांधी जैसे विचारकों ने प्रस्तुत किया था। इसी तरह भारत की विदेश नीति में उपनिवेशवाद, साम्राज्यवादरंगभेद की नीति का विरोध महान राष्ट्रीय आन्दोलन की उपज है।

भारत के अधिकतर देशों के साथ औपचारिक राजनयिक सम्बन्ध हैं। जनसंख्या की दृष्टि से यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्रात्मक व्यवस्था वाला देश भी है और इसकी अर्थव्यवस्था विश्व की बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।[1]

चित्र:Dmitry Medvedev at the 34th G8 Summit 7-9 जुलाई 2008-61.jpg
भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ रूसी राष्ट्रपति, 34वाँ जी-8 शिखर सम्मेलन
चित्र:Dmitry Medvedev in China 14 अप्रैल 2011-6.jpeg
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 14 अप्रैल 2011

प्राचीन काल में भी भारत के समस्त विश्व से व्यापारिक, सांस्कृतिक व धार्मिक सम्बन्ध रहे हैं। समय के साथ साथ भारत के कई भागों में कई अलग अलग राजा रहे, भारत का स्वरूप भी बदलता रहा किंतु वैश्विक तौर पर भारत के सम्बन्ध सदा बने रहे। सामरिक सम्बन्धों की बात की जाए तो भारत की विशेषता यही है कि वह कभी भी आक्रामक नहीं रहा।

1947 में अपनी स्वतंत्रता के बाद से, भारत ने अधिकांश देशों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखा है। वैश्विक मंचों पर भारत सदा सक्रिय रहा है। 1990 के बाद आर्थिक तौर पर भी भारत ने विश्व को प्रभावित किया है। सामरिक तौर पर भारत ने अपनी शक्ति को बनाए रखा है और विश्व शान्ति में यथासंभव योगदान करता रहा है। पाकिस्तानचीन के साथ भारत के संबंध कुछ तनावपूर्ण अवश्य हैं किन्तु रूस के साथ सामरिक संबंधों के अलावा, भारत का इजरायल और फ्रांस के साथ विस्तृत रक्षा संबंध है।

भारत की विदेश नीति के निर्माण की अवस्था को निम्न प्रकार से समझा जा सकता हैः-

अनुक्रम

स्वतन्त्रता से पहले भारत की विदेश नीति का निर्माण[संपादित करें]

यद्यपि स्वतन्त्रता से पहले भारत की विदेश नीति का विकास भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनकाल में ही हुआ, लेकिन इससे पहले भी भारतीय चिन्तन में शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व, अहिंसा जैसे सिद्धान्तों के साथ-साथ कौटिल्य के चिन्तन में कूटनीतिक उपायों का भी वर्णन मिलता है। कुछ विद्वान तो आज भी यह मानते हैं कि विदेश नीति के कुछ उपकरण व साध्य कौटिल्य की ही देन है।

भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनकाल में अंगरेजों ने भारत की विदेश नीति का निर्धारण अपने व्यापारिक हितों की सुरक्षा व उसकी वृद्धि को ध्यान में रखकर किया था। अंग्रेजों ने चीन, अफगानिस्तान तथा तिब्बत को बफ़र स्टेट माना। उन्होनें चीन में भी विशेष रुचि ली और भारत-चीन सीमा का निर्धारण किया। अंग्रेजों ने नेफा (अरुणाचल प्रदेश) को भारतीय सीमा में ही रखा और भूटानसिक्किम भारत की विदेश नीति के निर्माण की अवस्था व ऐतिहासिक विकास को विशेष महत्व दिया। उन्होंने अपने व्यापारिक शर्तों के लिए इस क्षेत्र में सुरक्षा का उत्तरदायित्व स्वयं संभाला।

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन व विदेश नीति[संपादित करें]

भारत की विदेश नीति के आधानिक सिद्धान्तों का निर्माण भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना होने के बाद ही हुआ। 1885 से ही कांग्रेस ने अंग्रेजों की दमनकारी नीति का विरोध करना शुरु कर दिया और कुछ ऐसे बुनियादी सिद्धान्तों की नींव डाली जो आज भी भारत की विदेश नीति का आधार हैं।

1885 में पारित एक प्रस्ताव द्वारा कांग्रेस ने उत्तरी बर्मा को अपने क्षेत्र में मिला लेने के लिये ब्रिटेन की निन्दा की। इसी तरह 1892 में एक अन्य प्रस्ताव द्वारा भारत ने अपने आपको अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीतियों से स्वयं को स्वतन्त्र बताया। इसी दौरान कांग्रेस ने भारत को बर्मा, अफगानिस्तान, ईरान, तिब्बत आदि निकटवर्ती राज्यों के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही हेतु प्रयोग किये जाने पर असंतोष जताया गया। यह भारत की असंलग्नता की नीति की ही पृष्ष्ठभूमि थी। प्रथम विश्वयुद्ध तक कांग्रेस का अंग्रेजों के प्रति दृष्ष्टिकोण-असंलग्नता की नीति का पालन अर्थात् ब्रिटिश नीतियों से स्वयं को दूर रखना ही रहा। इस दौरान कांग्रेस ने अंग्रेजों की साम्राज्यवादी व उपनिवेशवादी तथा दक्षिण अफ्रीका में लाई जा रही रंगभेद की नीति का विरोध किया जो आगे चलकर आधुनिक भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण उद्देश्य व सिद्धान्त बनी।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद 1921 में कांग्रेस ने घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार की नीतियां भारत की नीतियां नहीं हैं और न ही वे किसी तरह भारत की प्रतिनिधि हो सकती। कांग्रेस ने यह भी घोषणा की कि भारत को अपने पड़ोसी देशों से कोई खतरा व असुरक्षा की भावना नहीं है। इसी कारण 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध में कांग्रेस ने अंग्रेजी हितों के लिए शामिल होने से मना कर दिया था। 1920 में चलाए गए खिलाफत आन्दोलन में भी भारत ने मुसलमानों का साथ दिया जो आज भी भारत की अरब समर्थक विदेश नीति का द्योतक है। भारत ने हमेशा ही अरब-इजराइल संकट में अरबों का ही पक्ष लिया है। इसी दौरान कांग्रेस ने उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद विरोधी सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और उपनिवेशवाद के शिकार देशों के साथ मिलकर अंग्रेजों की नीतियों की निन्दा की।

वैश्विक मंच पर भारत[संपादित करें]

जवाहरलाल नेहरू के साथ हरमन जोसेफ ऐब्स (१९५६)

1947 से 1990[संपादित करें]

गुटनिरपेक्ष आंदोलन[संपादित करें]

1950 के दशक में, भारत ने पुरजोर रूप से अफ्रीका और एशिया में यूरोपीय उपनिवेशों की स्वतंत्रता का समर्थन किया और गुट निरपेक्ष आंदोलन में एक अग्रणी की भूमिका निभाई।[2]

1990 के बाद[संपादित करें]

हाल के वर्षों में, भारत ने क्षेत्रीय सहयोग और विश्व व्यापार संगठन के लिए एक दक्षिण एशियाई एसोसिएशन में प्रभावशाली भूमिका निभाई है|[3] भारत ने विभिन्न बहुपक्षीय मंचों, सबसे खासकर पूर्वी एशिया के शिखर बैठक और जी-8 5 में एक सक्रिय भागीदारी निभाई है। आर्थिक क्षेत्र में भारत का दक्षिण अमेरिका, एशिया, और अफ्रीका के विकासशील देशों के साथ घनिष्ठ संबंध है।[4]

ब्रिक्स[संपादित करें]

भारत ने ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर ब्रिक्स समूह की स्थापना की है। यह विकसित देशों के समूह G-8, G-20 के विश्व पर प्रभाव को संतुलित करने का प्रयास है। ब्रिक्स के सभी सदस्य विकासशील या नव औद्योगीकृत देश हैं जिनकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। ये राष्ट्र क्षेत्रीय और वैश्विक मामलों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। वर्ष २०१३ तक, पाँचों ब्रिक्स राष्ट्र दुनिया के लगभग 3 अरब लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं और एक अनुमान के अनुसार ये राष्ट्र संयुक्त विदेशी मुद्रा भंडार में ४ खरब अमेरिकी डॉलर का योगदान करते हैं। इन राष्ट्रों का संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद १५ खरब अमेरिकी डॉलर का है।[5]

संयुक्त राष्ट्र में भारत[संपादित करें]

वर्ष २०१४ में बान की मून से मिलते हुए भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी

विश्व शान्ति प्रयासों में भारत का योगदान[संपादित करें]

भारत ने 100,000 सैन्य और पुलिस कर्मियों को चार महाद्वीपों भर में संयुक्त राष्ट्र के पैंतीस शांति अभियानों में सेवा प्रदान की है।[6]

प्रत्यर्पण संधियाँ[संपादित करें]

जनवरी 2014 तक भारत 37 देशों के साथ अपराधि‍यों के प्रत्‍यार्पण की संधि‍ कर चुका है[7], जिनकी सूची इस प्रकार है[8] -

  1. अमेरि‍का
  2. ब्रि‍टेन
  3. रूस
  4. स्‍वि‍ट्जरलैंड
  5. ताजि‍कि‍स्‍तान
  6. उज्‍बेकि‍स्‍तान
  7. संयुक्‍त अरब अमीरात
  8. सऊदी अरब
  9. फ्रांस
  10. जर्मनी
  11. स्‍पेन
  12. हांगकांग
  13. भूटान
  14. नेपाल
  15. कुवैत
  16. कनाडा
  17. ऑस्ट्रेलिया
  18. बहरीन
  19. बांग्लादेश
  20. बेलारूस
  21. बेल्जियम
  22. बुल्गारिया
  23. मिस्र
  24. रिपब्लिक ऑफ कोरिया
  25. मलेशिया
  26. मॉरिशस
  27. मैक्सिको
  28. मंगोलिया
  29. नीदरलैंड
  30. ओमान
  31. पोलैंड,
  32. पुर्तगाल
  33. दक्षिण अफ्रीका
  34. तुर्की
  35. युक्रेन
  36. वियतनाम

वैश्विक व्यापार एवं वित्त[संपादित करें]

ब्रेटन वुडस, बेसल
विश्व व्यापार संगठन

सीमावर्ती व निकटवर्ती देश[संपादित करें]

2014 में भारत के नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सभी सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित करके पड़ोसियों के साथ भारत के रिश्तों में नई जान फूँक दी। इस घटना को वृहत "प्रमुख राजनयिक घटना" के रूप में भी देखा गया।[9][10]

  • चीन की मोतियों की माला (String of Pearls) नीति

चीन[संपादित करें]

वेन जियाबाओ के साथ मनमोहन सिंह
अहमदाबाद में नरेंद्र मोदी के साथ चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, 2014

विवाद[संपादित करें]

  • तिब्बत व दलाई लामा
  • चीन के साथ 1962 के भारत - चीन युद्ध
  • लद्दाख-अरुणाचल सीमा विवाद व आधुनिक समय में घुसपैठ की घटनाएँ
  • कश्मीरियों को स्टेपल वीज़ा की नीति
  • दक्षिण चीन सागर में भारत की तेल कंपनियों व वियतनाम के साथ चीन का विवाद
  • पाक अधिकृत कश्मीर से होते हुए ग्वादर पोर्ट से शिनजियांग तक सड़क का निर्माण
  • पारस्परिक व्यापार में भारत का व्यापार घाटा
  • हुआवेई व अन्य कई चीनी कंपनियों पर जासूसी का आरोप, बाल्को से भारतीय मिसाईल सामग्री की चोरी

सहयोग[संपादित करें]

  • भारत में चीनी कंपनियों का निवेश,
  • चीनी माल का आयात,
  • बुलेट ट्रेन की पेशकश,

पाकिस्तान[संपादित करें]

भारत के पड़ोसी पाकिस्तान के साथ एक तनाव भरा संबंध है और दोनों देशों के बीच चार बार युद्ध हुआ है, 1947, 1965, 1971 और 1999में। कश्मीर विवाद इन युद्धों का प्रमुख कारण था।[11]

अफ़गानिस्तान[संपादित करें]

हामिद करज़ई के साथ नरेंद्र मोदी
  • गाँधारी, शकुनि
  • तक्षशिला
  • कन्धार विमान अपहरण
  • 2014 में हेरात में भारतीय दूतावास पर हमला

नेपाल[संपादित करें]

भारत-नेपाल सम्बन्ध

भूटान[संपादित करें]

भूटान भारत का सबसे विश्वसनीय व शांतिरक्षक पड़ोसी देश है।

बांग्लादेश[संपादित करें]

  • तीस्ता जल समझौता

श्रीलंका और मालदीव[संपादित करें]

1980 के दशक में भारत दो पड़ोसी देशों के निमंत्रण पर, सेना के द्वारा संक्षिप्त सैन्य हस्तक्षेप किया, एक श्रीलंका मे और दुसरा मालदीव में।

रूस[संपादित करें]

चीन के साथ 1962 के भारत - चीन युद्ध और पाकिस्तान के साथ 1965 के युद्ध के बाद भारत और सोवियत संघ के साथ सैन्य संबंधों मे॑ काफी बडोतरी हुई। 1960 के दशक के अन्त में, सोवियत संघ भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरी थी।[12]

राजनीतिक एवं कूटनीतिक संबंध[संपादित करें]

आर्थिक संबंध[संपादित करें]

सामरिक[संपादित करें]

एडमिरल गोर्श्कोव सुखोई ब्रह्मोस

साँस्कृतिक[संपादित करें]

उत्तरी अमेरिका[संपादित करें]

Bush Vajpayee Oval Office
चित्र:Officials of India welcome Jimmy Carter and Rosalynn Carter during an arrival ceremony in नई दिल्ली, भारत - NARA - 177371.tif
Officials of India welcome Jimmy Carter and Rosalynn Carter during an arrival ceremony in नई दिल्ली, भारत
President Nixon meeting with Prime Minister Indira Gandhi in India - NARA - 194651

राजनीतिक एवं कूटनीतिक संबंध[संपादित करें]

आर्थिक संबंध[संपादित करें]

आज वैश्विक

सामरिक[संपादित करें]

साँस्कृतिक[संपादित करें]

दक्षिण अमेरिका[संपादित करें]

Vicente Fox, Mexican president (left) and Manmohan Singh, prime minister of India.

राजनीतिक एवं कूटनीतिक संबंध[संपादित करें]

आर्थिक संबंध[संपादित करें]

सामरिक[संपादित करें]

साँस्कृतिक[संपादित करें]

यूरोप[संपादित करें]

राजनीतिक एवं कूटनीतिक संबंध[संपादित करें]

आर्थिक संबंध[संपादित करें]

सामरिक[संपादित करें]

साँस्कृतिक[संपादित करें]

अफ्रीका[संपादित करें]

=== राजनीतिक एवं कूटनीतिक संबंध ===भारत और अफीका में

आर्थिक संबंध[संपादित करें]

सामरिक[संपादित करें]

साँस्कृतिक[संपादित करें]

मध्य-पूर्व[संपादित करें]

राजनीतिक एवं कूटनीतिक संबंध[संपादित करें]

आर्थिक संबंध[संपादित करें]

सामरिक[संपादित करें]

साँस्कृतिक[संपादित करें]

शेष एशिया-प्रशांत व आस्ट्रेलिया[संपादित करें]

ऑस्ट्रेलिया[संपादित करें]

सितंबर 2014 में ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री टोनी एबॉट भारत की यात्रा पर आए। भारत के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में किसी भी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की यह प्रथम राजकीय यात्रा थी। इस यात्रा में दोनों देशों के बीच असैन्य नाभिकीय उर्जा सहयोग समझौता हुआ जिसके तहत ऑस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम निर्यात करेगा।[17][18] इस दौरान एक महत्वपूर्ण व्यक्तव्य में उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी को 2002 के दंगों के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराना चाहिए।[19]

भारत-जापान सम्बन्ध[संपादित करें]

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे की चाय पर चर्चा, सितंबर 2014

भारत और जापान के सम्बन्ध हमेशा से काफ़ी मजबूत और स्थिर रहे हैं। जापान की संस्कृति पर भारत में जन्मे बौद्ध धर्म का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भी जापान की शाही सेना ने सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज को सहायता प्रदान की थी। भारत की स्वतंत्रता के बाद से भी अब तक दोनों देशों के बीच मधुर सम्बन्ध रहे हैं। जापान की कई कम्पनियाँ जैसे कि सोनी, टोयोटा और होंडा ने अपनी उत्पादन इकाइयाँ भारत में स्थापित की हैं और भारत की आर्थिक विकास में योगदान दिया है। इस क्रम में सबसे अभूतपूर्व योगदान है वहाँ की मोटर वाहन निर्माता कंपनी सुज़ुकी का जो भारत की कंपनी मारुति सुजुकी के साथ मिलकार उत्पादन करती है और भारत की सबसे बड़ी मोटर कार निर्माता कंपनी है। होंडा कुछ ही दिनों पहले तक हीरो होंडा (अब हीरो मोटोकॉर्प) के रूप में हीरो कंपनी के पार्टनर के रूप में कार्य करती रही है जो तब दुनिया की सबसे बड़ी मोटरसाइकिल विक्रेता कंपनी थी।

जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे के आर्क ऑफ फ्रीडम सिद्धांत के अनुसार यह जापान के हित में है कि वह भारत के साथ मधुर सम्बन्ध रखे ख़ासतौर से उसके चीन के साथ तनाव पूर्ण रिश्तों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो। इसके लिये जापान ने भारत में अवसंरचना विकास के कई प्रोजेक्ट का वित्तीयन किया है और इनमें तकनीकी सहायता उपलब्ध करायी है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण रूप से उल्लेखनीय है दिल्ली मेट्रो रेल का निर्माण।

भारत की ओर से भी चीन के साथ रिश्तों और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में जापान को काफ़ी महत्व दिया गया है। मनमोहन सिंह की सरकार की पूर्व की ओर देखो नीति ने भारत को जापान के साथ मधुर और पहले से बेहतर सम्बन्ध बनाने की ओर प्रेरित किया है। दिसंबर २००६ में भारतीय प्रधानमंत्री की जापान यात्रा के दुरान हस्ताक्षरित भारत-जापान सामरिक एवं वैश्विक पार्टनरशिप समझौता इसका ज्वलंत उदहारण है। रक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच २००७ से लगातार सहयोग मजबूत हुए हैं[20] और दोनों की रक्षा इकाइयों और सेनाओं ने कई संयुक्त रक्षा अभ्यास किये हैं। अक्टूबर २००८ में जापान ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किये जिसके तहत वह भारत को कम ब्याज दरों पर ४५० अरब अमेरिकी डालर की धनराशि दिल्ली-मुम्बई हाईस्पीड रेल गलियारे के विकास हेतु देगा। विश्व में यह जापान द्वारा इकलौता ऐसा उदाहरण है जो भारत के साथ इसके मजबूत आर्थिक रिश्तों को दर्शाता है।

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने जनवरी २०१४ में भारत की सपत्नीक यात्रा की जिसके दौरान वे इस वर्ष गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाए गये थे। इसके बाद मनमोहन सिंह जी के साथ हुई शिखर बैठक दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच २००६ की शुरुआत के बाद आठवीं शिखर बैठक थी।[21] इस बैठक में जापान ने भारत को विभिन्न परियोजनाओं के लिये २०० अरब येन (लगभग १२२ अरब रुपये) का ऋण देने की पेशकश की और हाई स्पीड रेल, रक्षा, मेडिकल केयर, औषधि निर्माण और कृषि तथा तापीय ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग की भी पेशकश की। भारत जापान श्रीलंका के पूर्वी भाग में त्रिंकोमाली में तापीय विद्युत संयत्र निर्माण में भी भागीदारी करने वाले हैं। इससे पहले नवंबर-दिसंबर २०१३ में जापानी सम्राट आकिहितो और महारानी मिचिको ने भारत की यात्रा संपन्न की थी। प्रोटोकाल के विपरीत सम्राट को हवाईअड्डे पर लेने स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गये थे जो भारत जापान रिश्तों की प्रगाढ़ता दर्शाता है।

वर्तमान समय में भारत जापान द्विपक्षीय व्यापर लगभग १४ अरब डालर का है जिसे बढ़ा का २५ अरब डालर करने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही जापान का भारत में लगभग १५ अरब डालर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी है।[22]

राजनीतिक एवं कूटनीतिक संबंध[संपादित करें]

आर्थिक संबंध[संपादित करें]

सामरिक[संपादित करें]

साँस्कृतिक[संपादित करें]


इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Indian economic growth rate eases [भारत की आर्थिक विकास दर संतोषपरक]" (अंग्रेज़ी में). बीबीसी न्यूज़. ३० नवम्बर २००७. http://news.bbc.co.uk/2/hi/business/7120343.stm. अभिगमन तिथि: २४ जून २०१४. 
  2. "The Non-Aligned Movement: Description and History", nam.gov.za (The Non-Aligned Movement), 21 सितंबर 2001, http://www.nam.gov.za/background/history.htm, अभिगमन तिथि: 23 अगस्त 2007 
  3. (PDF) India's negotiation positions at the WTO, November 2005, http://library.fes.de/pdf-files/bueros/genf/50205.pdf, अभिगमन तिथि: 23 अगस्त 2010 
  4. Analysts Say India'S Power Aided Entry Into East Asia Summit. | Goliath Business News, Goliath.ecnext.com, 29 जुलाई 2005, http://goliath.ecnext.com/coms2/gi_0199-4519133/ANALYSTS-SAY-INDIA-S-POWER.html, अभिगमन तिथि: 21 नवम्बर 2009 
  5. "Amid BRICS' rise and 'Arab Spring', a new global order forms". Christian Science Monitor. 18 अक्टूबर 2011. Retrieved 2011-10-20.
  6. http://www.un.int/india/india_and_the_un_pkeeping.html
  7. "भारत की 37 देशों के साथ प्रत्‍यार्पण संधि‍ है". पत्र सूचना कार्यालय, भारत सरकार. 12 फ़रवरी 2014. http://pib.nic.in/newsite/hindirelease.aspx?relid=26806. अभिगमन तिथि: 13 फ़रवरी 2014. 
  8. "ndia has Extradition Treaties in operation with 37 countries". पत्र सूचना कार्यालय, भारत सरकार. 12 फ़रवरी 2014. http://pib.nic.in/newsite/erelease.aspx?relid=103604. अभिगमन तिथि: 13 फ़रवरी 2014. 
  9. "From potol dorma to Jaya no-show: The definitive guide to Modi’s swearing in" (अंग्रेज़ी में). फर्स्टपोस्ट. २६ मई २०१४. http://www.firstpost.com/politics/from-potol-dorma-to-jaya-no-show-the-definitive-guide-to-modis-swearing-in-1542185.html. अभिगमन तिथि: २६ मई २०१४. 
  10. उप्पुलुरी, कृष्ण (२५ मई २०१४). "Narendra Modi’s swearing in offers a new lease of life to SAARC" (अंग्रेज़ी में). नई दिल्ली: डीएनए इण्डिया. http://www.dnaindia.com/india/report-narendra-modi-s-swearing-in-offers-a-new-lease-of-life-to-saarc-1991170. अभिगमन तिथि: २६ मई २०१४. 
  11. Gilbert, Martin (17 दिसम्बर 2002), A History of the Twentieth Century: The Concise Edition of the Acclaimed World History, HarperCollins, प॰ 486–487, आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9780060505943, http://books.google.com/books?id=jhwY1j8Ao3kC&pg=PA486, अभिगमन तिथि: 22 जुलाई 2011 
  12. http://library.fes.de/pdf-files/bueros/genf/50205.pdf
  13. http://hindi.economictimes.indiatimes.com/world/america/indicted-but-immune-devyani-khobragade-leaves-for-india/articleshow/28631530.cms
  14. http://hindi.economictimes.indiatimes.com/india/national-india/no-business-as-usual-till-devyani-khobragade-issue-resolved-india/articleshow/28491550.cms
  15. http://hindi.economictimes.indiatimes.com/india/national-india/india-asks-us-embassy-here-to-withdraw-an-officer-of-a-rank-similar-to-that-of-devyani-khobragade/articleshow/28640728.cms
  16. http://navbharattimes.indiatimes.com/india/national-india/us-envoy-nancy-powell-meets-gujarat-chief-minister/articleshow/30326660.cms
  17. "ऑस्ट्रेलिया के प्रधान मंत्री की भारत यात्रा". पत्र सूचना कार्यालय, भारत सरकार. 5 सितंबर 2014. http://pib.nic.in/newsite/hindirelease.aspx?relid=30139. अभिगमन तिथि: 6 सितंबर 2014. 
  18. "ऑस्ट्रेलिया से न्यूक्लियर डील पर बन गई बात". नवभारत टाईम्स. 5 सितंबर 2014. http://hindi.economictimes.indiatimes.com/india/national-india/India-and-Australia-seal-nuclear-deal-Abbott-meets-Modi/articleshow/41783881.cms. अभिगमन तिथि: 6 सितंबर 2014. 
  19. "दंगों के लिए मोदी जिम्मेदार नहीं: ऑस्ट्रेलियाई PM". नवभारत टाईम्स. 5 सितंबर 2014. http://hindi.economictimes.indiatimes.com/india/national-india/narendra-modi-shouldnt-be-blamed-for-2002-gujarat-riots-australian-pm-tony-abbott/articleshow/41813710.cms. अभिगमन तिथि: 6 सितंबर 2014. 
  20. भारत जापान का समुद्री सहयोग रेडियो दायेच विले (जर्मन रेडियो प्रसारण सेवा)।
  21. आर्चिस मोहन - प्रधान मंत्री श्री शिंजो अबे की यात्रा : भारत - जापान संबंधों की पराकाष्‍ठा विदेश मंत्रालय, भारत सरकार
  22. भारत-जापान व्यापार 2014 तक 25 अरब डॉलर - Indo Asian News Service, Last Updated: दिसम्बर 29, 2011