भारत-संयुक्त राज्य सम्बन्ध

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भारत (हरा) तथा संयुक्त राज्य अमेरिका (केशरिया)

भारत-संयुक्त राज्य सम्बन्ध से आशय भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध से है।

यद्यपि भारत १९६१ में गुट निरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना करने वाले देशों में प्रमुख था किन्तु शीत युद्ध के समय उसके अमेरिका के बजाय सोवियत संघ से बेहतर सम्बन्ध थे।

पृष्ठभूमि[संपादित करें]

भारत और अमरीका दो ऐसे राष्ट्र हैं, जिन्होंने अपने आधुनिक इतिहास के दौरान अपने संबंधों में काफ़ी उतार-चढ़ाव देखे हैं। दोनों देशों के बीच भिन्न-भिन्न सामरिक और विचारधारात्मक कारणों से समय-समय पर तनावपूर्ण संबंध रहे हैं, लेकिन परिस्थितियां बदलने पर दोनों देश एक-दूसरे के क़रीब भी आए हैं। शीत युद्ध की राजनीति का अमेरिकी-भारत संबंधों पर गहरा प्रभाव पड़ा। जबकि विश्व के अधिकतर देश पूर्वी ब्लॉक और पश्चिमी ब्लॉक में बंटे हुए थे, भारत ने सैद्धांतिक रूप से गुट-निरपेक्ष रहने का फ़ैसला किया पर वह अमरीका के बजाय सोवियत संघ के ज्यादा क़रीब रहा। दूसरी ओर, इस समय अब भारत की मौजूदा नीति अपने राष्ट्रीय हितों की ख़ातिर एक साथ विभिन्न देशों से अच्छे संबंध बनाने की है। भारत, ईरान, फ़्रांस, इस्राइल, अमेरिका और बहुत से अन्य देशों के साथ मित्रता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। भारत और अमेरिका के रिश्ते अब और मजबूत हुए हैं। छ: अमरीकी राष्ट्रपति भारत की यात्रा कर चुके हैं : सन् २००० में बिल क्लिंटन भारत आए थे। उनसे पहले जिमी कार्टर १९७८ में, रिचर्ड निक्सन १९६९ में और ड्वाइट आइज़नहावर १९५९ में भारत आये थे। मार्च २१, २००० को राष्ट्रपति क्लिंटन और प्रधानमंत्री वाजपेयी ने नई दिल्ली में एक संयुक्त बयान, "भारत-अमेरिकी संबंध : २१वीं शताब्दी के लिए एक परिकल्पना" नामक संयुक्त दस्तावेज पर हस्ताक्षर किये थे।25 जनवरी 2015 को भारत की तीन दिन की यात्रा पर आये अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि बनने वाले पहले अमरीकी राष्ट्रपति हैं। जिससे भारत और अमरीका के रिश्ते अब और ज्यादा मजबूत हुए हैं।

वर्तमान दौर[संपादित करें]

भारत और अमरीका दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, जिनमें काफी समानताएं हैं। भारत और अमरीका के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ता जा रहा है और आने वाले वर्षों में और अधिक बढ़ने की संभावना है। इसी प्रकार सैन्य सहयोग भी बढ़ा है। बहरहाल, अमरीका भारतीय उपमहाद्वीप में स्थिरता की वकालत करता रहा है, जिसमें कश्मीर मुद्दे पर तनाव कम करना और परमाणु हथियारों के प्रसार व परीक्षण का परित्याग भी शामिल है। यह अब अच्छी तरह स्थापित हो चुका है कि दोनों देशों के पास एक-दूसरे को देने के लिए बहुत कुछ है। ... में यू.एस. कांग्रेशनल सर्विस ने एक पेपर प्रस्तुत किया है, जिसमें भारत-अमेरिकी संबंधों का बहुत ही अच्छा नवीनतम विश्लेषण दिया गया है।

भारत अमरीकी संबंधों पर अध्ययन[संपादित करें]

भारत-अमरीकी संबंधों पर डेनिस कक्स, स्टीव कोहेन और मार्विन वाइनबाउम ने महत्वपूर्ण अध्ययन किये हैं: "डेनिस कक्स विदेश मंत्रालय में दक्षिण एशिया के विशेषज्ञ थे और सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वे दो दशकों तक भारत और पाकिस्तान के मामलों से जुड़े रहे हैं। उन्होंने १९५७ से १९५९ तक और १९६९ से १९७१ तक पाकिस्तान में काम किया था। १९८६ से १९८९ तक वह आइवरी कोस्ट में अमेरिका के राजदूत रहे। न्यूयॉर्क टाइम्स ने उनकी पहली किताब, इंडिया एंड युनाइटेड स्टेट्स : एस्ट्रेन्ज्ड डेमोक्रेसीज, 1941-191 के बारे में लिखा था कि यह "भारत-अमेरिकी संबंधों का परिभाषित इतिहास है।"

"स्टीव कोहेन दक्षिण एशिया के सबसे विद्वान अमेरिकी विश्लेषकों में से एक हैं। उन्हें इस क्षेत्र की चुनौतियों, समस्याओं और समृद्ध इतिहास एवं संस्कृति की गहरी जानकारी है," यह मानना है हैरी बारनेस का, जो भारत में अमेरिका के राजदूत रहे हैं। इलिनोए विश्वविद्यालय में इतिहास और राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर एमिरेट्स, कोहेन ब्रुकिंग इंस्टीट्यूशंस में दक्षिण एशिया के मामलों, विशेषकर सुरक्षा, परमाणु प्रसार और आपदा प्रबंधन से संबंधित अनुसंधान एवं नीति अध्ययन के एक महत्वपूर्ण नियामक हैं।

वह इस क्षेत्र में बहुत सी पुस्तकों और लेखों के लेखक और/या संपादक हैं। उनकी नयी पुस्तकें हैं- द इंडियन आर्मी (१९९० में संशोधित संस्करण), द पाकिस्तान आर्मी (१९९८ में संशोधित संस्करण, जिसके पाकिस्तान और चीन में चोरी से संस्करण छापे गये), न्यूक्लियर प्रोलिफ्रेशन इन साउथ एशिया (१९९० में संपादित) और साउथ एशिया आफ्टर द कोल्ड वॉर, इंटरनेशनल पर्सपेक्टिव्स (१९९३ में संपादित)। फ़िलहाल वे अगली शताब्दी में भारत की बढ़ती हुई अंतर्राष्ट्रीय भूमिका पर एक किताब लिख रहे हैं। "मार्विन वाइनबाउम इलिनोए विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर एमिरेट्स हैं और १९९९ में वे अमरीकी विदेश विभाग के इंटेलिजेंस एंड रिसर्च ब्यूरो में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के विश्लेषक बने। इलिनोए में वह दक्षिण एशियाई और मध्यपूर्वी अध्ययन विभाग में १५ वर्ष तक कार्यक्रम निदेशक रहे। उन्हें मिस्र और अफ़ग़ानिस्तान में फुलब्राइट रिसर्च फ़ैलोशिप मिली और यू. एस. इंस्टीट्यूट ऑफ़ पीस में वह सीनियर फ़ैलो रहे तथा मिडिल ईस्ट इंस्टिट्यूट में स्कॉलर-इन-रेज़ीडेन्स रहे। डॉ॰ वाइनबाउम का शोध राजनीतिक अर्थशास्त्र, लोकतंत्रीकरण और राष्ट्रीय सुरक्षा पर केंद्रित है। वह छह पुस्तकों के लेखक और संपादक हैं। इनमें साउथ एशिया एप्रोचेज़ द मिलेनियम : रीएक्ज़ामिनिंग नेशनल सिक्योरिटी, जो चेतन कुमार के साथ संपादित की गई है, तथा अफ़ग़ानिस्तान एंड पाकिस्तान : रेज़िसटेन्स एंड रीकन्सट्रक्शन भी शामिल है।"

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]